भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

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Chhattisgarhi Kahawat Kosh

Vaibhav Prakashan Raipur Chhattisgarh

एक ठन लइका, गांव भर टोनही।

अकेला बच्चा और गाँव भर जादूगरनी।
व्याख्या : किसी एक बच्चे का नुकसान करने वाली अनेक जादूगरनियाँ हैं।
प्रयोग अनुकूलता : जब किसी एक वस्तु के अनेक ग्राहक हों, तब यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : टोनही-जादूगरनी, ठन-नग, लइका-बच्चा, गांव भर-पूरे गांव में

एक ठन हर्रा गाँव भर खोंखी।

एक हर्रा, गाँव भर खाँसी।
व्याख्या : एक वस्तु के अनेक ग्राहक।
प्रयोग अनुकूलता : जब किसी एक वस्तु को चाहने वाले अनेक लोग हो जाते हैं, तब यह कहावत कही जाती है। इसका आशय ‘एक अनार, सौ बीमार’वाला है।
शब्दार्थ : खोंखी-खाँसी, ठन-नग, गांव भर-पूरे गांव में

एक तो अइसने भैरी, तउन माँ बाजा बाजै।

एक तो ऐसे ही बहरी, ऊपर से बाजा बज रहा है।
व्याख्या : बहरी स्त्री के कुछ न सुनने पर बाजा पर बाजा बजने का बहाना मिल जाए, उसी प्रकार स्वभाव से अकर्मण्य व्यक्ति को यदि कोई बहाना मिल जाए, तो फिर क्या कहना।
प्रयोग अनुकूलता : बहाना खोज लेने वाले कामचोर लोगों के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : भैरी-बहरी, अइसने-ऐसा ही, तउन-उसमें, मां-ही, बाजा-वाद्य यंत्र, बाजै-बजना

एक दौरी माँ हाँकत हे।

एक दौरी में हाँकता है।
व्याख्या : फसल की मिंजाई करने के लिए बैलों को रस्सी से एक साथ जोड़कर गोल घुमाते हुए मिंजाई करते हैं। इसमें प्रयुक्त बैलों में कमजोर और शक्तिशाली बैलों का महत्व बराबर होता है।
प्रयोग अनुकूलता : जब कभी अच्छे-बुरे लोगों को बराबर महत्व दिया जाता है, तब यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : दौरी-मिंजाई के लिए प्रयुक्त बैलों को एक में जोड़ने वाली विशेष प्रकार की रस्सी, हांकत-हांकना

एक बूँद मही माँ छीर सागर नइ कल्थय।

एक बूँद मठे से क्षीर सागर का कुछ नहीं बिगड़ता।
व्याख्या : दूध के समुद्र में एक बूँद मठा डाल दिया जाए, तो उसमें का दूध फटता नहीं है।
प्रयोग अनुकूलता : अच्छाइयों की खान में छुटपुट-बुराई यों ही छिप जाती है। सौ सज्जनों का एक दुर्जन कुछ नहीं बिगाड़ पाता। एक किलो शहद में नीम की एक पत्ती कडुवाहट नहीं ला सकती। ऐसे ही प्रसंगों में इस कहावत का प्रयोग होता है।
शब्दार्थ : कल्थय-बिगड़ना, मही-मट्ठा, छीर-क्षीर, नइ-नहीं

एक राज करै राजा, के दूसर करै परजा।

एक तो राजा राज्य करता है, दूसरे प्रजा राज्य करती है।
व्याख्या : राजा तो राज्य करता है, परंतु प्रजा की बात राजा मानता है, इसलिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रजा का राज्य होता है।
प्रयोग अनुकूलता : जहाँ सभी की बात चलती है और सभी को संतोष होता है, वहाँ के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : दूसर-दूसरा, करै-करना, परजा-प्रजा

एक रात के अढ़इ हर्रा बेचागे।

एक रात में अढ़ाई हर्रा बिक गया।
व्याख्या : हर्रे की आवश्यकता अचानक इतनी अधिक हो गई कि उसका मूल्य खूब चढ़ गया, परंतु थोड़ी देर बाद ही उसकी आवश्यकता समाप्त हो गई, अचानक किसी रात में यह घटना घटित हो गई।
प्रयोग अनुकूलता : इसी प्रकार यदि कोई असामान्य बात हो जाए, तो उसे बताने के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : अढ़इ-अढ़ाई, बेचागे-बिक गया

एक लाँघन, पाँच फरहार।

एक लंघन, पाँच फलाहार।
व्याख्या : किसी व्यक्ति के पास खाद्य पदार्थ का अभाव है। वह अपने अभाव की पूर्ति के लिए मजदूरी करता है। मजदूरी से प्राप्त पैसों से वह कभी अनाज खरीद पाता है और कभी नहीं, जिससे वह कभी खाना पा जाता है और कभी नहीं पाता।
प्रयोग अनुकूलता : किसी ऐसे गरीब व्यक्ति की स्थिति जिसे खाने के विषय में “एक बार उपवास करना पड़ता है और पाँच बार अपूर्ण पेट रहना पड़ता है।” यह कहावत कहकर स्पष्ट की जाती है।
शब्दार्थ : लांघन-लंघन, फरहार-फाहार

एक ला माँय, एक ला मोसी।

एक को माँ, एक को मौसी।
व्याख्या : समान रूप से सक्षम दो व्यक्ति के साथ कोई व्यक्ति एक के साथ अधिक प्यार और दूसरे के साथ कम करता है।
प्रयोग अनुकूलता : जब कोई व्यक्ति किन्हीं दो व्यक्तियों में से एक के प्रति सगा तथा दूसरे के प्रति सौतेला व्यवहार करता है, तब यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : मांय-मां, ला-को, मोसी-मौसी

एक सिकहर हालै, त सौ घर ला घालै।

एक सींक हिले, तो सौ घर को नुकसान करे।
व्याख्या : सींक के समान किसी छोटी सी वस्तु से बहुतों का नुकसान हो जाना।
प्रयोग अनुकूलता : यों तो आश्र्चयर्जनक है, किंतु किसी सामान्य सी बात या छोटे से आदमी के कारण कभी-कभी बड़ा भारी नुकसान हो जाता है, जैसे छोटा सा छेद बड़े-से-बड़े जहाज को डुबो सकता है। ऐसा होने पर यह कहावत प्रयुक्त होती है।
शब्दार्थ : सिकहर-सींक, हालै-हिलना, त-तो, ला-को, घालै-नुकसान करना

एक हाँत खीरा के नौ हाँत बीजा।

एक हाथ ककड़ी का नौ हाथ बीज।
व्याख्या : एक हाथ लंबी ककड़ी का बीज नौ हाथ लंबा नहीं हो सकता।
प्रयोग अनुकूलता : यह बात केवल बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है, जो असंभव है। इसी प्रकार, कोई व्यक्ति जब किसी बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहता है, तब यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : हांत-हाथ, बीजा-बीज

एक हाँत माँ रोटी नइ पोवाय।

एक हाथ से रोटी नहीं बनती।
व्याख्या : जिस प्रकार एक हाथ से रोटी नहीं बन सकती, उसी प्रकार दो पक्षों के बिना झगडा नहीं हो सकता।
प्रयोग अनुकूलता : झगड़ा दोनों ओर से होता है, ऐसी ही परिपेक्ष्य में यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : हाँत-हाथ, पोवाय-बनती

ओखी के खोखी, नकटी के जूड़ी।

बहाने की खाँसी, नकटी की सर्दी।
व्याख्या : नकटी स्त्री सर्दी होने का बहाना कर के खांसती है।
प्रयोग अनुकूलता : जब कोई व्यक्ति झूठ-मूठ का बहाना बनाकर अपना प्रयोजन सिद्ध करना चाहता है, तब यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : ओखी-बहाना, खोखी-खाँसी, जूड़ी-सर्दी

ओढ़े बर ओढ़ना नहिं, बिछाय बर बिछौना।

बिहाव बर बाट देखै, रतनपुर के कैना।
व्याख्या : ओढ़ने-बिछाने के लिए तो वस्त्र नहीं है और रतनपुर की कन्या शादी का बाट जोह रही है। घर में गरीबी है, तब भी लड़की बड़े शहर में बसने के कारण शहरी बड़प्पन मानते हुए शादी का इंतजार करती है।
प्रयोग अनुकूलता : जब कोई गरीब व्यक्ति अपने बड़प्पन की बातें (वंश, जाति, स्थान, आदि की) करता है, तो यह कहावत कही जाती है। किन्हीं दिनों शादी-ब्याह में कुलीन वंश में शादी करने की बात कही जाती थी, किंतु इधर पैसों का महत्व बढ़ जाने से कुल आदि की बातों की ओर लोग ध्यान नहीं देते।
शब्दार्थ : ओढ़े-ओढ़ना, बर-के लिए, ओढ़ना-ओढ़ने का चादर, बिछाय-बिछाना, बिछौना-बिछाने का चादर

ओतिहा ला धोतिया गरू।

आलसी को धोती भी वजनी।
व्याख्या : आलसी व्यक्ति को अपने पहनने के लिए धोती भी भारस्वरूप लगती है।
प्रयोग अनुकूलता : आलसी व्यक्ति के लिए हर काम भारी पड़ता है, कुछ ऐसे ही परिपेक्ष्य में यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : ओतिहा-आलसी, गरू-वजनी

ओरिया के पानी बरेंडी नइ चढ़ै।

ओलाती (छप्पर के नीचे का भाग) का पानी बरेंडी (छप्पर के ऊपर का भाग) पर नहीं चढ़ता।
व्याख्या : छप्पर के ऊपरी हिस्से का पानी ढुलककर छप्पर के नीचे की ओर आता है। ओलाती नीची होने के कारण पानी ऊपर नहीं चढ़ सकता।
प्रयोग अनुकूलता : जो कार्य कदापि नहीं हो सकता, उसके होने के संबंध में यदि कोई कहे, तो उसकी बात को गलत सिद्ध करने के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : ओरिया-छप्पर का निचरला हिस्सा, जिससे वर्षा का पानी नीचे गिरता है, बरेंडी-छप्पर का ऊपरी भाग, नइ-नहीं, चढ़े-चढ़ना

ओले अइन, पोले गइन।

ओले के समान आए और घुल कर नष्ट हो गए।
व्याख्या : ओले गिरते हैं, जिससे कई प्रकार की क्षति होती है, परंतु वे घुलकर जल्दी समाप्त भी हो जाते हैं।
प्रयोग अनुकूलता : जो जोर-शोर से कोई कार्य प्रारंभ करता है और कुछ दिनों बाद कार्य बंद कर देता है, उस के लिए यह कहावत प्रयक्त होती है।
शब्दार्थ : अइन-आए, पोले-घुल जाना, गइन-जाना

ओस चटाय माँ लइका नइ जिए।

ओस चटने से बालक नहीं जीता।
व्याख्या : किसी बालक को जीवित रखने के लिए दूध, पानी, आदि की आवश्यकता होती है, ओस चाटने से वह जीवित नहीं रह सकता।
प्रयोग अनुकूलता : वास्तविकता को छिपाकर कोई किसी को भुलावे में डालकर कोई काम करना चाहे, तो उसमें उसे सफलता नहीं मिल सकती।
शब्दार्थ : चटाय-चटाना, लइका-बच्चा, नइ-नहीं, जिए-जीना

औंघात रहे जठना पागे।

ऊँघ रहा था, बिस्तर पा गया।
व्याख्या : अनुकूल परिस्थिति अनायास ही मिल गई।
प्रयोग अनुकूलता : किसी व्यक्ति की इच्छा जिस काम को पूरा करने की हो, उस के लिए उसे यदि अनुकूल या उपयुक्त अवसर और साधन उपलब्ध हो जाए, तब यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : जठना-बिस्तर औंघात-उंघना, पागे-पा लिया

कथरी ओढ़े, घीव खाय।

कत्थर ओढ़ना और घी खाना।
व्याख्या : जो व्यक्ति फटे-पुराने वस्त्र पहनकर लोगों को भुलावे में डालता है कि गरीबी के कारण उसकी ऐसी स्थिति है, जबकि वास्तविकता इस के विरूद्ध हो, अर्थात् घी खाता हो, तब उसके लिए कहा जाएगा कि वह अपनी वास्तविक स्थिति को छिपाकर लोगों को भुलावे में डालता है। ऐसे बहानेबाजों के लिए यह कहावत कही जाती है।
प्रयोग अनुकूलता : वास्तविकता को छुपाने वाले लोगों के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : कथरी-कत्थर, ओढ़े-ओढ़ना, घीव-घी, खाय-खाना

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