भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Chhattisgarhi Kahawat Kosh

Vaibhav Prakashan Raipur Chhattisgarh

आगू के करू बने होथे।

सामने का कड़ुआ अच्छा होता है।
व्याख्या : किसी बात को पीठ-पीछे न कहकर सामने कह देने में द्वेष तो बढ़ सकता है, परंतु ऐसा करना अच्छा होता है।
प्रयोग अनुकूलता : किसी बात को आमने-सामने स्पष्ट कर लेना ठीक रहता है, जिससे आगे चलकर मतभेद न हो।
शब्दार्थ : आगू-आगे, करू-कहुवा, बने-बढ़िया, होथे-होना

आगू के भइंसा पानी पिए, पिछू के चिखला।

आगे का भैंसा पानी पीता है, पीछे रहने वालों को कीचड़ मिलती है।
व्याख्या : खाने-पीने में आगे रहने वालों को ठीक-ठीक खाना-पीना मिलता है, पीछे आने वालों को वस्तुओं की कमी हो जाने का कराण ठीक-ठीक भोजन न मिल पाना पीछे के भैंसे को कीचड़ मिलने के समान है।
प्रयोग अनुकूलता : किसी व्यक्ति को हर दशा में अव्वल रहने की सीख देने हेतु यह कहावत प्रयोग में लायी जाती है।
शब्दार्थ : आगू-आगे, भइंसा-भैंसा, पिए-पीना, पिछू-पिछला, चिखला-कीचड़

आगे कलि के मेवा, सास करै बहुरिया के सेवा।

कलियुग का यह प्रसाद है कि सास बहू की सेवा करती है।
व्याख्या : बहू को घर का सब काम करना चाहिए। परन्तु कलियुग के प्रभाव में नीति की बात भूलकर अपने आराम की चिंता में बहू सास से काम लेती है। बहू का ऐसा कार्य लोक-मर्यादा के विरूद्ध होता है।
प्रयोग अनुकूलता : बड़ी-बूढ़ी माताओं को कार्य करते हुए तथा जवान बहू को आराम करते हुए देखकर यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : कलि-कलियुग, मेवा-प्रसाद, बहुरिया-बहू

आगे मनुवा मानै नहि, पाछू पतरी चाँटै।

मनुष्य पहले नहीं मानता, पीछे पत्तल चाटता है।
व्याख्या : कोई मनुष्य किसी के बार-बार कहने पर भी खाना नहीं खाता, किंतु भूख लगने पर स्वयं पहुँच कर बचा-खुचा खाना खा लेता है।
प्रयोग अनुकूलता : जो दूसरों के कहे हुए कार्य को नहीं करता और अपनी इच्छा का ऐसा कार्य करता है, जिससे उसे हानि होती है और बाद में हार कर उसी कार्य को करता है, जिसे करने के लिए लोगों ने कहा था, तब यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : मनुवा-मनुष्य, पाछू-पिछला, पतरी-पतल

आज के बासी काली के साग, अपन घर माँ का के लाज।

आज का बासी चांवल और कल की सब्जी अपने घर में खाने में किस बात की लज्जा ?
व्याख्या : अपने घर में चांवल और सब्जी खाने में कोई लज्जा नहीं है, क्योंकि जिसकी आर्थिक स्थिति जैसी होगी, वह उसी प्रकार अपने खाने की व्यवस्था करेगा, कौन किस प्रकार अपना उदर-पोषण कर रहा है, इससे दूसरों को क्या मतलब है।
प्रयोग अनुकूलता : अपने घर में कोई व्यक्ति कैसे भी खाए तथा कैसे भी रहे, इससे अन्य लोगों का कोई संबंध नहीं होता, इसलिए इसमें लाज की कोई बात नहीं होती। इस प्रकार अपनी कोई वस्तु अन्य लोगों से छिपाने वाले के लिए इस कहावत का प्रयोग किया जाता है। प्रयोगकर्ता से छिपाने वाले की वास्तविक स्थिति छिपी नहीं होती।
शब्दार्थ : बासी-पिछले दिनों का पका चांवल, जिसे रात में पानी में डुबो कर रख दिया जाता है और दूसरे दिन खाया जाता है, काली-कल, साग-सब्जी, अपन-अपना

आज मूँड़ मूँड़ाइस, काली महंत होगे।

आज सिर घुटाया, कल महंत हो गया।
व्याख्या : किसी महंत का शिष्य बनने के लिए पहले मुंडन आदि कार्य करना पड़ता है। अनेक बातों का अनुभव हो जाने के बाद ही शिष्य महंत बनता है। आज मुंडन होने और कल महंत होने से समय के पूर्व ही फल प्राप्ति की बात ध्वनित होती है।
प्रयोग अनुकूलता : समय से पहले अच्छा परिणाम मिलने पर यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : मुँड़-सिर, मूँड़ाइस-घुटाना, काली-कल, महंत-मंदिर का अधिकारी

आती के धोती, जाती के निगौटी।

आना होता है, तो धोती तथा जाना होता है, तो लंगोट।
व्याख्या : जब अच्छे दिनो में कुछ मिलना होता है, तब धोती जैसी बड़ी-बड़ी वस्तुएँ भी सहज रूप में मिल जाती हैं, परंतु बुरे दिनों में कुछ बिगड़ना होता है, तो लंगोट जैसी छोटी-छोटी वस्तुएँ भी हाथ से चली जाती हैं।
प्रयोग अनुकूलता : अच्छे दिनों में अनायास ही बड़ी-बड़ी चीजें प्राप्त हो जाती हैं और बुरे दिनों में छोटी-छोटी वस्तुएँ भी नहीं बच पातीं। सुदिन-दुर्दिन में किसी व्यक्ति को प्रसन्न-अप्रसन्न देखकर यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : आती-आना, जाती-जाना, निगौटी-लंगोट

आदमी-आदमी माँ अंतर, कोनो हीरा कोनो कंकर।

व्यक्ति-व्यक्ति में अंतर, कोई हीरा कोई कंकड़।
व्याख्या : मनुष्यों के स्वभाव में अंतर होता है। किसी-किसी परिवार के सदस्यों के स्वभाव में भी जमीन-आसमान का अंतर मिलता है। अपने स्वभाव के कारण कोई हीरे के समान तथा कोई कंकड़ के समान समझा जाता है।
प्रयोग अनुकूलता : विद्या, धन, आदि की दृष्टि से दो समान-व्यक्तियों के स्वभाव में बहुत मिलने पर एक को हीरे के समान मूल्यवान तथा दूसरे को कंकड़ के समान मूल्यहीन बताने के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : कोनो-कोई, कंकर-कंकड़

आदमी ला जानै बसे माँ, सोना ला जानै कसे माँ।

व्यक्ति की परख साथ रहने से तथा सोने की परख कसौटी पर कसने से होती है।
व्याख्या : सोने की परख तो उसे कसौटी पर कसने से हो जाती है, परन्तु किसी व्यक्ति को परखना इतना आसान नहीं होता। उसे परखने के लिए उसके साथ लगातार रहना आवश्यक है।
प्रयोग अनुकूलता : इस कहावत का प्रयोग यही जानने के लिए किया जाता है कि व्यक्त को समझ पाना आसान काम नहीं है।
शब्दार्थ : जानै-जानना, कसै-कसौटी

आधा अंग के महमाई।

आधे अंग की महामाई।
व्याख्या : जिस देवी में आधे अंग उसके हों तथा आधे दूसरे के हों, अर्थात् कुछ लोगों के लिए उसका स्वरूप कुछ हो तथा कुछ लोगों के लिए कुछ और, उससे वरदान पाने की आशा व्यर्थ है। हाँ उससे अनिष्ट की आशंका जरूर होती है। ऐसी देवी का स्वभाव दुष्टों के स्वभाव से मेल खाता है, अर्थात् जो किसी के लिए अच्छे हैं, किसी के लिए बुरे, जबकि देवी-देवताओं को सभी के लिए अच्छा होना चाहिए।
प्रयोग अनुकूलता : दुष्ट लोगों के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : महमाई-महामाया देवी।

आधा माँ जगधर, आधा माँ घर भर।

आधे में अकेला और आधे में घर के शेष लोग।
व्याख्या : जब किसी चीज के अर्ध भाग को कोई व्यक्ति अकेले ही ले ले और शेष वस्तु सारे सदस्यों में वितरित करे, ऐसा व्यक्ति अपनी स्वार्थ को ध्यान में रखकर करता है।
प्रयोग अनुकूलता : व्यक्ति की स्वार्थपरता को लक्ष्य करके यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : जगधर-ऐसा व्यक्ति, जो किसी वस्तु का आधा भाग स्वयं हड़प जाए

आन गाँव जाय, आन नाव धराय।

अन्य गाँव जाना, अन्य नाम रखाना।
व्याख्या : जब कोई व्यक्ति अपना गाँव छोड़कर किसी अन्य गाँव में जाकर रहने लगता है, तब वहाँ के लोग उसकी अच्छाई-बुराई शीघ्र नहीं समझ पाते, ऐसी स्थिति में यदि गुणी व्यक्ति की बेइज्जती होने लगे या अवगुणी व्यक्ति को इज्जत मिलने लगे तब इस धोखे के कारण वहाँ के लोग उसे कुछ का कुछ नाम देने लगते हैं।
प्रयोग अनुकूलता : परदेश में किसी की प्रतिष्ठा अपेक्षाकृत बढ़ जाने अथवा घट जाने पर यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : आन-दूसरा, जाय-जाना, नाव-नाम, धराय-धराना

आन बियाय, आन पथ खाय।

कोई बच्चा पैदा करे और कोई पथ्य खाए।
व्याख्या : प्रसव करने वाली स्त्री को पौष्टिक सामग्री से बनाए गए लड्डुओं का सेवन कराया जाता है, जिससे उसका खून बढ़े और स्वास्थ्य सुधरे। अन्य किसी स्त्री द्वारा ऐसे लड्डुओं का सेवन किया जाना निष्प्रयोजन तथा दूसरे का हक छीनना है।
प्रयोग अनुकूलता : कष्ट पाने वाले या वास्तविक अधिकारी को उससे संबंधित फल न मिलकर किसी और को मिलने पर यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : आन-दूसरा, बियाय-प्रसव करना, पथ-पथ्य, खाय-खाना

आप जाय जजिमानो ला ले जाय।

स्वयं जाना तथा यजमान को भी ले जाना।
व्याख्या : पंडित जी अपने साथ अपने यजमान को ले डूबे, जिससे उनकी हानि तो हुई ही, यजमान को भी हानि का भागीदार बनना पड़ गया।
प्रयोग अनुकूलता : जब कोई व्यक्ति पंडित जी के समान अपना नुकसान तो कराता ही है, साथ अपने मित्रों का भी नुकसान कराता है, तब उस व्यक्ति के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : जाय-जाना, जजिमान-यजमान

आप राज न बाप राज, मूँड़ मुँड़ाय दमाद के राज।

न अपना राज्य, न अपने बाप का राज्य, दामाद के राज्य में सिर घुटाया।
व्याख्या : कोई व्यक्ति अपने और अपने बाप के कार्य-क्षेत्र में की कार्य न कर के दामाद के कार्य-क्षेत्र में उस कार्य को करते हुए हानि उठाता है।
प्रयोग अनुकूलता : किसी अपरिचित स्थान में या ऐसे क्षेत्र में जिसमें स्वयं का कोई अनुभव न हो तो अपना व्यापार प्रारंभ कर के घाटा उठाने पर यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : मूंड़-सिर, मुंड़ाय-मुंडन, दमाद-दामांद

आप रूप भोजन, पर रूप सिंगार।

भोजन अपनी पसंद से और श्रृंगार दूसरों की पसंद से।
व्याख्या : भोजन अपनी इच्छा के अनुसार करना चाहिए और श्रृंगार दूसरों की पसंद के अनुसार करना चाहिए।
प्रयोग अनुकूलता : श्रृंगार के संबंध में सीख देने के लिए इस कहावत का प्रयोग होता है कि सजावट दूसरों को दिखाने के लिए होती है और भोजन निजी स्वास्थ्य के लिए होता है।
शब्दार्थ : सिंगार-श्रृंगार

आपन कारन मलिया जेंवावै खीर।

अपनी गरज के लिए मनुष्य महाब्राम्हण को खीर खाने के लिए आमंत्रित करता है।
व्याख्या : व्यक्ति की गरज महाब्राम्हण से होने के कारण उसके लिए परोसी गई खीर वह स्वयं न खाकर महाब्राम्हण को खाने के लिए कहता है, जिससे वह उस पर प्रसन्न होकर आवश्यकता पूरी कर दे।
प्रयोग अनुकूलता : जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु के लिए अटक जाता है, तब वह निम्न स्तर वाले की खुशामद करता है। ऐसे परिपेक्ष्य में यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : आपन-अपना, कारन-कारण, मलिया-महाब्राम्हण, जेंवावै-भोजन कराना

आमा के झरती, भोभला के मरती।

आम का झड़ना, पोपला का मरना।
व्याख्या : पके आम मिलने पर पोपला बहुत प्रसन्न होता है। जब तक आम पकते रहे, तब तक पोपला उन्हें खाकर आनंदित रहा। आम झड़ते ही पोपला भी मर गया। पोपले को मरना तो था ही, परंतु वह उचित अवसर पर मरा अर्थात् पके आमों का स्वाद लेने के बाद ही।
प्रयोग अनुकूलता : जब संयोगवश कोई काम बन जाए, तब यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : आमा-आम, झरती-झरना, भोभला-पोपला, मरती-मरना

आमा गेदरावत हे, भोभला मेंछरावत हे।

आम पक रहे हैं, पोपला व्यक्ति खुश हो रहा है।
व्याख्या : पोपले के लिए सबसे बढ़िया खाद्य पदार्थ आम है, जिसे पकता देखकर वह बहुत प्रसन्न होता है।
प्रयोग अनुकूलता : मनचाहे काम को पूरा होते देखकर जो व्यक्ति प्रसन्न होता है, उस के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : आमा-आम, भोभला-पोपला, गेदरावत हे-पक रहा है, मेंछरावत हे-प्रसन्न होता है।

आय न जाय, चतुरा कहाय।

आता-जाता तो कुछ नहीं, चतुर कहलाता है
व्याख्या : कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें अपने काम के संबंध में कुछ भी पता नहीं होता पर वे चालाक समझे जाते हैं।
प्रयोग अनुकूलता : ऐसा व्यक्ति जो किसी काम के संबंध में नहीं जानता, परंतु उस काम के लिए अपने को होशियार कहता है, उसकी बातों को समझ जाने पर उस के लिए यह कहावत कही जाती है।
शब्दार्थ : आय-आना, जाय-जाना, चतुरा-चतुर, कहाय-कहना

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App