भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Philosophy (English-Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

A B C D E F G H I J K L M N O P Q R S T U V W X Y Z

Please click here to view the introductory pages of the dictionary
शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।

Pre-Philosophy

प्राग्दर्शन
हॉकिंग के अनुसार, दर्शन के विकास की प्रारंभिक अवस्था, जिसमें जीवन तथा विश्व से संबंधित विचारों एवं विश्वासों को बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया जाता था।

Presentationism

पुरोधानवाद
प्रतिनिधानवाद (representationism) के विपरीत यह ज्ञानमीमांसीय सिद्धांत ज्ञान के लिए केवल दो घटकों के अस्तित्व में ही विश्वास करता है, अर्थात् प्रत्यक्ष में आत्मा को वस्तु का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त होता है। बौद्धों का ‘वैभाषिक संप्रदाय’ इसी पुरोधानवाद में विश्वास रखता है।

Primary Qualities

प्राथमिक गुण, मूल गुण
लॉक के अनुसार गौण गुणों (secondary qualities) के विपरीत वस्तुओं के स्वकीय गुण, जैसे ठोसपन, विस्तार, आकृति, गति, स्थिति और संख्या, जिनके बिना वस्तुओं को सोचा ही नहीं जा सकता।

Prime Matter

मूल द्रव्य
एरिस्टॉटल ने अपने ‘तत्त्वविज्ञान’ की व्याख्या ‘द्रव्य’ (matter) एवं स्वरूप (form) के माध्यम से की है। यद्यपि संसार की प्रत्येक वस्तु में द्रव्य और स्वरूप दोनों पाए जाते हैं किंतु विकास की प्रथम अवस्था में हम एक ऐसी वस्तु की कल्पना कर सकते हैं जिसमें केवल द्रव्य हो किंतु स्वरूप का आत्यन्तिक अभाव पाया जाता है। उसी प्रकार विकास की चरम अवस्था में हम एक ऐसी वस्तु की कल्पना कर सकते हैं, जिसमें केवल ‘स्वरूप’ (form) पाया जाता हो एवं जिसमें द्रव्य का आत्यन्तिक अभाव हो। ऐसी स्थिति में विकास की प्राथमिक अवस्था जो द्रव्यमात्र होगी, उसे एरिस्टॉटल ने ‘मूल-द्रव्य’ (prime matter) के नाम से अभिहित किया है।

Prime Mover

आद्य चालक, आद्य प्रवर्तक
एरिस्टॉटल के अनुसार, वह जो सभी परिवर्तनों का आदि कारण है और स्वयं अपरिवर्तित रहता है, जैसे ईश्वर।

Primitive Proposition

आद्य प्रतिज्ञप्ति
प्रतीकात्मक तर्कशास्त्र के जनकों में से एक ‘पेआनो’ (Peano) के अनुसार किसी निगमनात्मक तंत्र में उन प्रतिज्ञप्तियों में से एक जिन्हें सिद्ध नहीं किया जाता बल्कि प्रारम्भ में ही सत्य मान लिया जाता है तथा उन्हें निगमनों का आधार बनाया जाता है। उसे आद्य प्रतिज्ञप्ति कहते हैं। वह न तो ‘स्वतःसिद्ध’ है और न अनिवार्य रूप से सत्य है तथा ऐसी भी बात नहीं है कि उसे सिद्ध किया ही नहीं जा सकता। फिर भी वह सत्य रूप में मान्य होता है। तर्कशास्त्र में डब्ल्यू. ई. जॉनसन पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपने तर्कशास्त्र (logic) के प्रथम-भाग में ‘आद्य-प्रतिज्ञप्ति’ (primitive proposition) की कल्पना की थी। इस प्रतिज्ञप्ति को ‘उद्देश्यहीन-प्रतिज्ञप्ति’ (subjectless proposition) अथवा विस्मय-बोधक प्रतिज्ञप्ति (exclamatary proposition) के नाम से भी अभिहित किया जाता है।

Principle Of Economy

लाघव-न्याय
इस सिद्धांत का प्रमुख तात्पर्य यह है कि अनावश्यक रूप में तात्त्विक इकाईयों की संख्या में वृद्धि नहीं करनी चाहिए। इस सिद्धांत को भारत में ‘ कल्पना-लाघव’ या ‘लाघव-न्याय’ के नाम से जाना जाता है। विस्तार के लिए “occam’s razor” को देखिए।

Private Attitude Theories

व्यक्तिगत-अभिवृत्ति-सिद्धांत
नीतिशास्त्र में वे सिद्धांत जो कर्म के औचित्य या शुभत्व को व्यक्ति की निजी अभिवृत्ति पर आधारित मानते हैं, जैसे, यह सिद्धांत कि शुभ वह है जो मुझे अच्छा लगता है (भले ही अन्यों को वह अच्छा न लगे)।

Private Term

वैकल्प-पद
वह पद जो वर्तमान में किसी गुण का अभाव बताता है परन्तु साथ ही जिसमें यह निहित होता है कि उस गुण की क्षमता वस्तु में है, जैसे ”अंधा”, ”बहरा”, ”वंध्या” इत्यादि।

Probabilism

प्रसंभाव्यतावाद
प्राचीन यूनानी संशयवादियों का वह सिद्धांत कि किसी भी विषय में निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं है, अतः समस्त कार्यों तथा आस्थाओं का आधार प्रसंभाव्यता को ही स्वीकार करता है।

Probability

प्रसंभाव्यता
प्रसंभाव्य होने की अवस्था या विशेषता। किसी बात को ”प्रसंभाव्य” तब कहा जाता है जब उसका घटित होना असंभव तो नहीं होता परन्तु इसका घटित होना अनिवार्य भी नहीं होता। इस प्रकार इस अवस्था में मात्रा-भेद होता है और उसके घटित होने की अनिवार्यता को तथा असंभाव्यता को 0 (Zero) मानते हुए उसे एक भिन्न के रूप में व्यक्त किया जा सकता है, जिसका अंश अनुकूल विकल्पों की संख्या तथा हर अनुकूल और प्रतिकूल विकल्पों की संख्याओं का योग होता है।

Problematic Proposition

समस्यात्मक प्रतिज्ञप्ति
वह प्रतिज्ञप्ति जिसमें किसी घटना के घटित होने को न तो अनिवार्य समझा जाये और न असंभाव्य, बल्कि उसके द्वारा यह कथन किया जाए कि उक्त घटना घटित हो भी सकती है अथवा नहीं भी घटित हो सकती है। उदाहरण के लिए : यह कथन ” शायद वर्षा होगी”, समस्यात्मक प्रतिज्ञप्ति है।

Processes Simulating Induction

आभासी आगमन
पूर्ण आगमन, तर्कसाम्य-आगमन और तथ्यानुबंधी आगमन के लिए प्रयुक्त पद, जिनहें आगमनोचित प्लुति (inductive leap) के अभाव के कारण सही अर्थ में आगमन नहीं माना गया है। देखिए “perfect induction”, “induction by parity of reasoning’, और “colligation of facts”।

Process Philosophy

संभवन् दर्शन
दर्शन की वह प्रवृत्ति जिसमें कूटस्थ सत् की अपेक्षा संभवन अथवा क्रिया सातत्य पर बल दिया जाता है।

Progressive Train Of Reasoning

प्रगामी तर्कमाला
दो या अधिक न्यायवाक्यों का वह संयोग जिसमें पहले पूर्वन्यायवाक्य (prosyllogism) होता है और फिर उत्तर-न्यायवाक्य (episyllogism) जो आगामी न्यायवाक्य के लिए पूर्वन्यायवाक्य बनता है और इसी प्रकार तर्क अंतिम निष्कर्ष की ओर अग्रसर होता है।
उदाहरण :
1. सभी ब स हैं।
सभी अ ब हैं।
∴ सभी अ स हैं।
2. सभी स द हैं।
सभी अ स हैं।
∴ सभी अ द हैं।
3. सभी द य हैं।
सभी अ द हैं।
∴ सभी अ य हैं।

Proper (Or Special) Sensibles

विशिष्ट संवेद्य
सामान्य संवेद्यों के विपरित वे विषय जिनका ज्ञान केवल एक ही इंद्रिय के माध्यम से होता है, जैसे प्रकाश जो केवल चक्षुगम्य है।

Property (Or Proprium)

गुणधर्म
पारंपरिक तर्कशास्त्र में, वह विशेषता जो पद के गुणार्थ का भाग तो नहीं होती (अर्थात् पद की परिभाषा में शामिल नहीं होती) परन्तु उसका फल या उससे निगमित होती है और इस प्रकार उसका अनिवार्य परिणाम होती है, जैसे “त्रिभुज के तीनों कोणों का योग दो समकोण होना।” त्रिभुज की परिभाषा है तीन भुजाओं से घिरी हुई समतलाकृति, जिससे उदाहृत विशेषता निगमित होती है।

Proposition

प्रतिज्ञप्ति
पारंपरिक तर्कशास्त्र में किसी निर्णय (judgement) की शाब्दिक अभिव्यक्ति को प्रतिज्ञप्ति के नाम से अभिहित किया जाता था किंतु आधुनिक तर्कशास्त्र के अनुसार किसी वाक्य (sentence) का वह अर्थ जो यथार्थ अथवा अयथार्थ हो सकता है, उसे प्रतिज्ञप्ति कहते हैं। उदाहरण के लिए – “आपकी कक्षा में कितने विद्यार्थी हैं?” यह एक वाक्य है। किंतु “हमारी कक्षा में पचास विद्यार्थी हैं” – एक प्रतिज्ञप्ति है, जो या तो यथार्थ है अथवा अयथार्थ। यद्यपि प्रत्येक प्रतिज्ञप्ति वाक्य है किन्तु प्रत्येक वाक्य प्रतिज्ञप्ति का रूप धारण नहीं कर सकता।

Prosyllogism

पूर्वन्यायवाक्य
तर्कमाला अर्थात् न्यायवाक्यों की श्रृंखला में वह न्यायवाक्य जिसका निष्कर्ष दूसरे न्यायवाक्य में एक आधारवाक्य बनता है।
उदाहरण : progressive train of reasoning के अंतर्गत दी हुई तर्कमाला में प्रथम (दूसरे के संबंध में) तथा द्वितीय (तीसरे के संबंध में)।

Protocol Sentence

आधारिक वाक्य, आधार-वाक्य
देखिए – “basic sentence”।

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App