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Definitional Dictionary of Philosophy (English-Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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Objectivation

विषयीकरण, विषयीभवन
वह मानसिक प्रक्रम जिसके द्वारा संवेदन संवेत्ता की एक आंतरिक अवस्था से बदलकर बाह्य वस्तु का प्रत्यक्ष बन जाता है।

Objective

वस्तुपरक, वस्तुनिष्ठ, विषयनिष्ठ
ज्ञाता के मन से स्वतंत्र रूप में बाह्य जगत् में अस्तित्त्व रखनेवाला, अथवा ऐसी वस्तु से संबंधित, ज्ञाता की बुद्धि या मन से निरपेक्ष अर्थात् उस पर निर्भर न रहने वाला, “subjective” का विलोम।

Objective Ethics

वस्तुपरक नीतिशास्त्र
1. वह नीति या वह आचार-व्यवहार जिसका आधार व्यक्ति का समाज में नियत स्थान होता है, जैसे, हिंदू संस्कृति में व्यक्ति के वर्ण और आश्रम पर आधारित कर्तव्यों से संबंधित नीति। इस अर्थ में यह सामाजिक नीति का पर्याय है।
2. वह नीति जो अच्छाई-बुराई को व्यक्ति के भावों पर नहीं अपितु वस्तुगत गुणों पर आधारित मानती है।

Objective Idealism

विषयनिष्ठ प्रत्ययवाद
वह मत कि प्रकृति, विश्व या जगत् प्रत्ययात्मक होने के बाद भी हमारे मन से स्वतंत्र अस्तित्व रखता है, वस्तुनिष्ठ प्रत्ययवाद कहलाता है।

Objective Relativism

विषयनिष्ठ सापेक्षवाद, वस्तुनिष्ठ सापेक्षवाद
ज्ञान मीमांसा का वह सिद्धांत जिसके अन्तर्गत यह स्वीकार किया गया है कि वस्तु प्रत्यक्षकर्त्ता के मन से स्वतंत्र अस्तित्व रखती है। बाह्य वस्तुएँ परस्पर सापेक्षिक होती हैं।

Objectivism

विषयनिष्ठवाद, वस्तुनिष्ठवाद
बाह्य जगत् का मन से स्वतंत्र अस्तित्व मानने वाला सिद्धांत।

Object Language

1. वस्तु भाषा : वह भाषा जिसका प्रयोग वस्तुओं, घटनाओं और उनकी विशेषताओं की चर्चा करने के लिये किया जाता है।
2. विषय-भाषा : वह भाषा जो चर्चा का विषय होती है अथवा जिसकी छानबीन अधिभाषा (metalanguage) करती है।

Objecto-Centric Predicament

वस्तुकेंद्रिक विषमावस्था, वस्तुकेंद्रिक विप्रतिपत्ति
नव-यथार्थवादियों की यह युक्ति कि जो वस्तुएँ ज्ञान के विषय हैं उनके अतिरिक्त किसी के संबंध में कुछ नहीं कहा जा सकता, इसलिए केवल इन वस्तुओं का ही वास्तव में अस्तित्त्व है।

Object Of Moral Judgement

नैतिक निर्णय का विषय
वह कर्म या विषय जिस पर नैतिक निर्णय दिया जाता है।

Obligation

बाध्यता
नैतिक दृष्टि से कर्म करने की वह मनः स्थिति, जो बाह्य दबाव के कारण न हो कर ‘चाहियेपन’ की आन्तरिक प्रेरणा के कारण हो।

Obliteration Philosophy

अपमार्जन दर्शन
नव यथार्थवादियों द्वारा प्रत्ययवादी दर्शन को दिया गया अनादरसूचक नाम, जो उनके कथनानुसार वस्तु-जगत् के स्वतंत्र अस्तित्व का लोप ही कर देता है।

Obscure Definition

अस्पष्ट परिभाषा
वह दोषयुक्त परिभाषा जिसमें दुर्बोध भाषा का प्रयोग किया गया हो, जैसे “जीवन शरीरान्तर्गत एकत्रीभूत अभौतिक पदार्थ है।”

Obstacularity

प्रतिघता
प्राइस (Price) के अनुसार, बाह्य वस्तु में पाई जाने वाली यह विशेषता कि वह उसकी स्थिति में परिवर्तन चाहने वाले की चेष्टा का प्रतिरोध करती है।

Obverse

प्रतिवर्तित
वह निष्कर्ष जो प्रतिवर्तन के द्वारा प्राप्त होता है।

Obversion

प्रतिवर्तन
अनन्तरानुमान का वह रूप जिसमें आधारवाक्य के विधेय का व्याघाती पद निष्कर्ष वाक्य का विधेय होता है और निष्कर्ष वाक्य का
गुण आधारवाक्य के गुण से भिन्न होता है। अर्थात् आधारवाक्य यदि विध्यात्मक हो तो निष्कर्ष निषेधात्मक और यदि आधारवाक्य निषेधात्मक हो तो निष्कर्ष विध्यात्मक होता है किन्तु आधारवाक्य एवं निष्कर्ष के अर्थ और परिमाण में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
जैसे : सभी मनुष्य मरणशील हैं – प्रतिवर्त्य (आ वा)
कोई मनुष्य अमरणशील नहीं है – प्रतिवर्तित (निष्कर्ष)
यह आ, ए, इ एवं ओ में वैध होता है।

Obverted Contrapositive

प्रतिवर्तित प्रतिपरिवर्तित
प्रतिपरिवर्तन की क्रिया से प्राप्त निष्कर्ष का प्रतिवर्तन करने से प्राप्त वाक्य, अर्थात् किसी दिए हुए वाक्य का क्रमशः प्रतिवर्तन, परिवर्तन और पुनः प्रतिवर्तन करने से प्राप्त वाक्य।
उदाहरण : सभी उ वि हैं;
कोई उ-अ-वि नहीं है (प्रति.);
कोई अ-वि उ नहीं है (परि.)
∴ सभी अ-वि अ-उ हैं (प्रति प्रतिपरि.)।

Obverted Converse

प्रतिवर्तित-परिवर्तित
परिवर्तन से प्राप्त निष्कर्ष का प्रतिवर्तन करके प्राप्त होने वाला वाक्य या प्रतिज्ञप्ति।
उदाहरण : सभी स प हैं;
∴ कुछ प स है; (परिवर्तित)
∴ कुछ प अ-स नहीं हैं (प्रतिवर्तित परिवर्तित)

Obvertend

प्रतिवर्त्य
वह प्रतिज्ञप्ति जिसका प्रतिवर्तन किया जाना है। देखिए, “obversion”।

Occam’S Razor

ओकम-न्याय, लाघव-न्याय
वैज्ञानिक व्याख्या का एक सिद्धांत जिसके अनुसार “यदि आवश्यक न हो तो बहुत-सारी वस्तुओं की कल्पना नहीं करनी चाहिए” अथवा “यदि कम वस्तुओं से काम चल जाता है तो अधिक वस्तुओं को मानना व्यर्थ है।” यह सिद्धांत भारत में “कल्पना-लाघव” या “लाघव-न्याय” के नाम से बहुत पहले से प्रसिद्ध है और पश्चिम में भी ओकम (William of Occam, 1300-1349) के नाम से प्रसिद्ध होने के बावजूद पहले से प्रयोग में है।

Occasionalism

प्रसंगवाद, संयोगवाद
मन और शरीर के संबंध को समझने के लिये देकार्त के अनुयायियों गुलिंग्स तथा मेलब्रान्श (Malebranche) के द्वारा स्थापित सिद्धांत। इसके अनुसार मन एवं शरीर दोनों परस्पर विरूद्धधर्मी होने के कारण एक दूसरे पर क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं कर सकते किन्तु फिर भी दोनों में संवादिता है, इस संवादिता का कारण ईश्वर है। ईश्वर किसी एक में परिवर्तन होने पर दूसरे में भी उसी प्रकार का परिवर्तन उत्पन्न कर देता है। जैसे : जब शरीर में कुछ परिवर्तन होते हैं, तब ईश्वर उन्हीं के अनुरूप मनस् में संवेदना उत्पन्न कर देता है और जब मन में कुछ इच्छाएँ या संकल्प उत्पन्न होते हैं तो ईश्वर उन्हीं के संवाद में शरीर में गति उत्पन्न कर देता है।
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