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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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स्थिति

लाभ का एक प्रकार।

जब पाशुपत साधक के चित्‍त की रूद्र में निरंतर तथा निश्‍चल स्थिति हो जाती है। अर्थात् जब उसका चित्‍त समस्त बाह्य विषयों से खिंचकर रुद्रतत्व में ही अचल रूप से लगा रहता है तो उसकी वह अवस्था स्थिति लाभ कहलाती है। इस स्थिति के नव लक्षण कहे गए हैं- असङ्गित्वम्, योगित्वम्, नित्यात्मत्वम् अजत्वम्, मैत्रत्वम्, ऐकत्वम्, क्षेमित्वम्, त्रिकियत्वम् तथा वीतशोक्‍त्वम्।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

स्थिति

योगशास्त्र में ‘स्थिति’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। (1) चित्त की जो प्रशान्तवाहिता है वह स्थिति है (योगसू. 1/13 का भाष्य)। इस स्थिति की प्राप्ति के लिए जो प्रयत्न किया जाता है, वह अभ्यास कहलाता है। प्रशान्तवाहिता = सात्त्विकवृत्तिप्रवाह=राजस-तामसवृत्तिशून्य एकाग्रता की धारा। कुछ व्याख्याकारों के अनुसार निरोध का प्रवाह (= निरोध का बार-बार होते रहना) ही प्रशान्तवाहिता है। (2) ‘स्थिति’ (योगसू. 2.18) तमोगुण का स्वभाव है (द्र. ‘गुण’ तथा ‘तमोगुण’)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्थिति कृत्य

अपने संवित् स्वरूप से भिन्न रूप से अवभासित हो रहे इस विश्व को उसी रूप में टिकाए रखने और तदनुसार नियमपूर्वक चलाते रहने की पारमेश्वरी लीला को परमशेवर का स्थिति कृत्य कहते हैं। स्थिति कृत्य से परमेश्वर अपने में प्रतिबिम्बवत् अवभासमान विश्व को कर्मफल आदि नियमों के अनुसार चलाता हुआ उसे स्थिति प्रदान करता रहता है। यही उसकी स्थिति लीला कहलाती है। (प्रत्यभिज्ञाहृदय , पृ. 1; देखिए ना. वि. 4-18)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्थिति चक्र

सृष्ट पदार्थों की संहार करने की इच्छा के उदय होने तक उनके निराकुल अवस्थान को शास्त्रों में स्थिति के नाम से अभिहित किया गया है, अर्थात् स्वात्मस्वरूप को विभिन्न रूपों में धारण करने की इच्छा को स्थिति कहा जाता है। स्थिति चक्र में बाईस कलाएँ कार्य करती हैं। इनमें आठ शिवचक्र में, अर्थात् सहस्रार में, बारह हृदयस्थ षट्कोण चक्र में तथा दो उस षट्कोण के मध्य बिन्दु में रहती हैं। पहली आठ में से चार पीठों के अधिष्ठाता चार युगनाथ के नाम से प्रसिद्ध हैं तथा चार उन्हीं की शक्तियाँ हैं। उड्डीयान, जालन्धर, पूर्णगिरि तथा कामरूप – इन चार केन्द्रों में परमेश्वर के परमकर्तृत्व की अभिव्यक्ति होने से ये ‘पीठ’ के नाम से परिचित हैं। परमेश्वर का परमकर्तृत्व प्रथमतः उड्डीयान पीठ में अपनी शक्ति के साथ अधिष्ठित रहता है। उसे कलियुग का नाथ कहा जाता है। इसी प्रकार जालन्धर, पूर्णगिरि और कामरूप पीठ के अधिष्ठाता गण द्वापर आदि युगों के नाथ हैं। हृदय स्थित षट्कोण में जिन बारह कलाओं की बात कही गई है, वे तन्त्रशास्त्र में ‘राजपुत्र’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें छः साधिकार हैं और शेष छः निराधिकार। दर्शनशास्त्र में जिन्हें इन्द्रिय कहा जाता है, यहाँ राजपुत्र शब्द से उन्हीं का निर्देश किया गया है। बुद्धि और पाँच कर्मेन्द्रियाँ साधिकार राजपुत्र हैं तथा मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ निराधिकार राजपुत्र हैं। षट्कोण के केन्द्रस्थान में कुलेश्वर और कुलेश्वरी की स्थिति है। इन्हें अहंकार और अभिमान शक्ति का प्रतीक मानना चाहिये। इस प्रकार आत्मस्वरूप के तत्तत् रूप में स्थिति के मूल में से ही बाईस कलाएँ अनुस्यूत रहती हैं। अतः यह उचित ही है कि इसको स्थिति चक्र के नाम से जाना जाए (महार्थमंजरी, पृ. 98-99)।
Darshana : शाक्त दर्शन

स्थूल संयम

भूतों के पाँच रूप माने जाते हैं – स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व। भूतों के स्थूल रूपों के उदाहरण, जैसे – स्थूल पृथिवी (=पार्थिव वस्तु) वह है जिसमें शब्दादि पाँचों गुण रहते हैं। स्थूल अपू (=आप्य वस्तु) वह है जिसमें गन्थ छोड़कर शब्दादि चार गुण रहते हैं। स्थूल तैजः (=तेजसवस्तु) वह है जिसमें शब्द-स्पर्श-रूप गुण रहते हैं। स्थूल वायु (=वायवीय वस्तु) वह है जिसमें शब्द-स्पर्श गुण रहते हैं। स्थूल आकाश (=आकाशीय वस्तु) वह है जिसमें शब्दगुण रहता है। ये प्रत्येक गुण स्वगत भेदों से युक्त हैं, जैसे शब्द के षड्ज आदि भेद हैं, स्पर्श के उष्ण आदि भेद हैं, इत्यादि। इन स्थूल भीतों में आकारादिकृत अनेक भेद भी होते हैं (द्र. व्यासभाष्य 3/44 की टीकाएँ)। भूत के इस स्थूलरूप में संयम करने पर अणिमा, लघिमा, महिमा और प्राप्ति नामक चार सिद्धियाँ होती हैं -यह व्याख्याकारगण कहते हैं (3/45 की टीकाएँ द्र.)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्थूलशरीर

‘स्थूलशरीर’ के विषय में पूर्वाचार्यों की दृष्टियों में भिन्नता है। सामान्यतया यह कहा जा सकता है कि लिंग का आधारभूत जो भी शरीर होगा वह स्थूलशरीर है। यह स्थूलशरीर योनिज ही होगा, अयोनिज नहीं होगा। सीता, द्रोण आदि के स्थूलशरीर अयोनिज हैं – यह कोई-कोई आचार्य मानते हैं। एक मत के अनुसार योनिज से मातापितृज शरीर (शुक्र-शोणित-संघातजात शरीर) मात्र लिया जाएगा। इस जराभुज शरीर के अतिरिक्त अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज शरीर भी स्थूलशरीर हैं। स्थूलशरीर के बिना लिंग भोगशून्य ही रहता है। शास्त्र में आतिवाहिक शरीर की चर्चा है (लोकान्तरगमनार्थ इस शरीर की आवश्यकता होती है)। यह लिंगशरीर नहीं है, अतः इसको स्थूलशरीर मानना अधिक युक्त है। वस्तुतः स्थूलशरीर में भी अवान्तर सूक्ष्मता है। तेजस, वायवीय आदि शरीर भी स्थूल शरीर ही हैं, क्योंकि वे भूतनिर्मित हैं (द्र. लिंग)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्नान (ज्ञानयोग)

शैवी साधना के ज्ञानयोग का एक प्रकार जिसमें साधक यह सत्तर्क करता है कि वह तो वस्तुतः शुद्ध संवित्स्वरूप है, बंधन और मोक्ष दोनों का ही उस पर कोई प्रभाव नहीं है, क्योंकि इन दोनों के मूल में मल ही है। सुख एवं दुःख आदि विभिन्न भावों में वही शिवरूपतया व्याप्त है। इस प्रकार के शुद्ध विकल्पों से भावना द्वारा अपने आपको निर्मल बनाने के सतत अभ्यास को स्नान कहते हैं। (शि. द्व. 7-87 से 90)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्नेह

पूर्ण विसर्ग पद। शिव एवं शक्ति का सतत् स्फुरणशील संघट्टात्मक रूप। अनुत्तर परमसिव। अवच्छेदरहित एवं अपरिमित आनंद की स्थिति। अनुत्तर परमशिव का अपने में अपनी ही इच्छा से होने वाले परिपूर्ण विसर्ग रस से सुंदर तथा आनंद की सभी भूमिकाओं से उत्तीर्ण जगदानंद से आप्लावित शिवशक्ति का पूर्ण संघट्ट अर्थात् सामरस्यात्मक रूप ही स्नेह कहलाता है। (मा. वि. वा. 1-895)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्पंद

शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण परमशिव में सृष्टि लीला के निमित्त से अपने ही स्वरूप को अभिमुख करके देखने के प्रति होने वाली सूक्ष्मातिसूक्ष्म उमंग जैसी प्रवृत्ति को स्पंद कहते हैं। यही उसके परमानंद की स्थिति है। यह वह सर्वप्रथम उमंग है जिसमें समस्त सृष्टि अपने बीज रूप में स्थित रहती है। इसे ही तुटि, उद्योग, उद्यम, उन्मेष, महासत्ता, महास्फुरत्ता, हृदय आदि नामों से अभिव्यक्त किया गया है। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा 1-5-14)। यह परिपूर्ण एवं अचल परमशिव में रहने वाली अतिसूक्ष्म गतिशीलता की सी विशेषता है। इसलिए इसे ऊर्मि, उच्छलत्ता आदि भी कहा गया है। परंतु इस अतिसूक्ष्म गतिशीलता जैसे किंचिच्चलन से परमशिव की परमेश्वरता में कोई अंतर नहीं आता है। क्योंकि चलनशीलता का केवल आभासमान ही होता है और वह भी प्रतिबिंब न्याय से। वस्तुतः चलन नहीं होता है। हाँ चलन होता हुआ सा प्रतीत होता है। यही वह किंचित् चलन कहलाता है जिसको स्पंद कहते हैं। (पटल त्रि. वि. पृ. 207; ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 1, पृ. 208-9)। यह स्पंद सामान्य जीवन में किसी भी तीव्र भावावेश के प्रथम क्षण में अभिव्यक्त होता है। (स्पंदकारिका 22)। यह दो प्रकार का होता है : (1) सामान्य स्पंद (देखिए) तथा विशेष स्पंद (देखिए)। (पटल त्रि. वि., पृ. 208)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्पन्दतत्त्व

बीज से जैसे अंकुर स्फुरित होता है, उसी तरह से शिव से यह सारा जगत् निकलता है। बीज मिट्टी-पानी आदि सहकारी कारणों का संयोग होने पर ही प्रस्फुटित होता है। सहकारी कारणों के संपर्क में आने के साथ ही बीज में स्पंन्दन होने लगता है और वह अंकुर के रूप में परिणत हो जाता है। किन्तु शिव को किसी सहकारी कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती। स्वेच्छा से जब उसमें स्पंदन होने लगता है, तो वह अपनी इस स्पन्द शक्ति के माध्यम से जगत् के रूप में परिणत होता है। इसी व्यापार को स्फुरत्ता कहते हैं। यह स्फुरत्ता जैसे शिव को परिमित प्रमाता बना देती है, उसी तरह से स्वात्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा भी इस स्फुरत्ता शक्ति से ही निष्पन्न होती है। ‘सा स्फुरत्ता महासत्ता’ (1/5/4) इस प्रत्यभिज्ञाकारिका में स्फुरता को ही महासत्ता, स्पन्दतत्त्व आदि नामों से जाना जाता है। स्पन्दकारिका, योगवासिष्ठ प्रभृति ग्रन्थों में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

स्पन्दन

द्‍वारा का एक प्रकार।

पाशुपत साधना का एक आचार स्पन्दन है, जहाँ पाशुपत साधक को ऐसी कंपकंपी का अभिनय करना होता है जैसे वह वातरोग या गठिया से पीड़ित हो। जब लोगों के बीच में स्पन्दन (काँपने) का अभिनय करेगा तो लोग उसका अपमान करेंगे तथा साधक इस तरह से अपमानित होने पर पुण्यों का अर्जन करता रहेगा। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 84; ग.का.टी.पृ. 19)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

स्फुरत्ता

देखिए महास्फुरत्ता।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्फोट

यद्यपि योगसूत्र और उसके भाष्य में यह शब्द नहीं है, तथापि सूत्र 3/17 के भाष्य में शब्दसम्बन्धी जो विचार किया गया है, वह स्फोटवादानुसारी है – यह टीकाकारों का कहना है। योगपरक कुछ ग्रन्थों में स्फोट शब्द प्रयुक्त भी हुआ है तथा स्फोटवाद की दृष्टि से शब्दतत्त्व पर विचार भी किया गया है। यह स्फोट शब्द श्रूयमाण वर्णों से भिन्न है। यह क्रमहीन, निरवयव, अखण्ड और एकप्रयत्न से जनित होता है। चूंकि इस शब्द से ही अर्थ ज्ञापित होता है, अतः यह स्फोट (स्फुटित अर्थः अस्मात्) कहलाता है। यह स्फोट न वह शब्द है जो वक्ता द्वारा उच्चारित होता है और न वह शब्द है जो श्रोता के कर्ण में पहुँचता है। यह स्फोट श्रोता की बुद्धि में ही प्रतिभासित होता है; इसलिए यह ‘बौद्धशब्द’ कहलाता है। चूंकि यह ध्वनियों से अभिव्यक्त होता है – निर्मित या उच्चारित नहीं होता, अतः यह ‘ध्वनिव्यङ्ग्य’ कहलाता है। स्फोट की सिद्धि युक्तियों के द्वारा की गई है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्मृति

पाँच वृत्तियों में स्मृति एक है। योगसूत्र (1/11) में अनुभूत विषय के असंप्रमोष को स्मृति कहा गया है। सूत्र का तात्पर्य यह है – स्मृति का हेतु संस्कार है, जो अनुभव से निष्पन्न होता है। जितने विषय का अनुभव किया गया है, उससे अधिक विषय स्मृति में नहीं हो सकता, भले ही उससे कम विषय स्मृति में हो। जो विषय अनुभूत नहीं हुआ है, उसकी स्मृति नहीं होती। अधिक-विषय का परिग्रह करना ‘संप्रमोष’ कहलाता है; पहले से अज्ञात विषय को लेकर स्मृति नहीं होती, अतः स्मृति-लक्षण में ‘असंप्रमोष’ शब्द दिए गए हैं। कभी-कभी स्मृति में अनुभूत विषय से अधिक विषय उद्भासित होते हैं – ऐसा देखा जाता है; पर वहाँ वस्तुतः विभिन्न काल के अनुभवों से निष्पन्न संस्कारों का युगपद् उद्बोध होता है, अतः स्मृति के सूत्रोक्त लक्षण में कोई दोष नहीं है। यह ध्यान देने योग्य है कि उपर्युक्त सूत्र में जो ‘अनुभूत विषय का असंप्रमोष’ कहा गया है, वह स्मृति का असाधारण धर्म है – अन्य वृत्तियों में यह धर्म नहीं है; सूत्र में धर्म और धर्मी में अभेदविवक्षा करके असंप्रमोष को ही स्मृति कहा गया है। व्याख्याकारों ने कहा है कि स्मृति के विषय घटादि पदार्थ एवं पदार्थविषयक ज्ञान (=वृत्ति) दोनों हैं। सभी स्मृतियाँ प्रमाणादि पाँच वृत्तियों से होती हैं। (स्मृति से भी स्मृति होती है)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्मृतिशक्ति

लोकव्यवहारों का आधार बनी हुई परमेश्वर की तीन शक्तियों में से एक प्रमुख शक्ति। परमेश्वर अपनी अपोहनशक्ति से अपने अविच्छिन्न स्वरूप में विच्छेद का आभासन करता है। उससे प्रमाता और प्रमेय परस्पर विच्छिन्न हो जाते हैं। फिर एक दूसरे के प्रति ज्ञातृ भाव में और ज्ञेयभाव में ठहरते हुए अनंत प्रकार से ज्ञान के व्यवहारों को सिद्ध करता है। तदनंतर असंख्य ज्ञानों के संस्कारों के होते हुए भी किसी भी प्रमाता में किसी भी प्रमेय के ज्ञान का संस्कार किसी भी विशेष रूप से कभी भी उद्बुद हो जाता है, जिससे उस प्रमाता को पहले जाने हुए प्रमेय की किसी विशेष प्रकार से पुनः स्मृति हो जाती है। इस अनंत प्रकारों से उदित होने वाले स्मृति व्यापार की अधारभूताशक्ति परमेश्वर की स्मृतिशक्ति है जिससे अनंत प्रकार के वैचित्र्य से स्मर्तृ-स्मार्य-व्यापार इस संसार में चलते रहते हैं। संसार के समस्त व्यवहारों का प्रधान आधार यह स्मृति ही है। आदान, प्रदान आदि, शब्द प्रयोग आदि तथा समस्त क्रिया कलाप आदि सभी का आसरा स्मृति है। प्राणियों की इस असंख्य प्रकार से उदित होने वाली स्मृति की नियामिका शक्ति तथा आधारभूताशक्ति परमेश्वर की स्मृतिशक्ति कहलाती है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 1-3-7 1-4-1)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्रोतोविभाग

तान्त्रिक वाङ्मय का स्रोतोविभाग प्रसिद्ध है। कुछ ग्रन्थों में यह तीन अथवा चार प्रकार का तथा अन्यत्र पाँच प्रकार का माना गया है। त्रिविध विभाग में वाम, दक्षिण और सिद्धान्त नामक तन्त्रों की गणना की गई है। अजितागम (26/59-60) में बताया गया है कि मूलावतार प्रभृति तन्त्र वाम, स्वच्छन्दतन्त्र प्रभृति दक्षिण और कामिक प्रभृति तन्त्र सिद्धान्त के नाम से प्रसिद्ध हैं। नेत्रतन्त्र (16/2) के अनुसार सदाशिव, भैरव और तुम्बुरु क्रमशः सिद्धान्त दक्षिण और वाम स्रोतस् (धारा) के प्रवर्तक हैं। तुम्बुरु के चार मुखों से शिरच्छेद, वीणाशिव, संमोह और नयोत्तर नामक चार तन्त्रों का आविर्भाव हुआ, इसकी सूचना हमें डॉ. प्रबोधचन्द्र वागची के ग्रन्थ ‘स्टडीज़ इन दी तंत्राज’ (पृ. 2) से मिलती है। तुम्बुरु और भैरव शिव के ही अवतार हैं। इसकी सूचना योगवासिष्ठ (निर्वाण, 1/18/23-26) और नेत्रतन्त्र (9/11) से मिलती है।
सिद्धान्तशिखामणि (5/11) से सप्त मातृकाओं के प्रतिपादक मिश्र तन्त्र का भी समावेश कर स्रोतोविभाग को चतुर्विध माना है। किन्तु सम्प्रति इसके पाँच विभाग ही प्रसिद्ध हैं। तदनुसार शिव के ऊर्ध्व मुख से सिद्धान्त, पूर्व मुख से गारुड, दक्षिण से भैरव, पश्चिम से भूत और उत्तर मुख से वाम तन्त्रों का आविर्भाव हुआ। मृगेन्द्रागम के चर्यापाद (1/40) में अष्टविध अनुस्रोतोविभाग वर्णित है। उनके नाम ये हैं – शैव, मान्त्रेश्वर, गाणपत्य, दिव्य, आर्ष, गोह्यक, योगिनीकौल और सिद्धकौल। इन सबका विस्तृत विवरण नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्धात (पृ. 51-59) में देखना चाहिये।
Darshana : शाक्त दर्शन

स्वच्छंदनाथ

ईश्वर भट्टारक के एक अवतार। श्रीकंठनाथ के शिष्य। कैलासवासी भगवान उमापतिनाथ का ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव और अघोर इन पाँच मुखों वाला एक विशिष्ट आकार। ये पाँचमुख परमेश्वर की चित्, निर्वृति (आनंद), इच्छा, ज्ञान और क्रिया नाम की पाँच अंतरंग शक्तियों के तथा सृष्टि, स्थिति, संहार, विधान और अनुग्रह नाम के पाँच पारमेश्वरी कृत्यों के द्योतक होते हैं। उमापतिनाथ ने अपने इसी रूप में आकर शैवशास्त्रों का उपदेश किया है। उनके ये पाँच मुख सदाशिव, ईश्वर, रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा के स्थानों को उसमें धारण करते हैं (मा. वि. वा., 1-251 से 257)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वप्न

स्वापावस्था। वह अवस्था जिसमें प्राणी के शरीर के परिश्रांत होने पर तथा श्रोत्रादि बाह्यकरणों द्वारा अपने अपने कार्यों से विरत हो जाने पर भी मन से ही विषयों का ग्रहण होता रहता है, परंतु, भ्रांति से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो बाह्य इंद्रियाँ ही उनका ग्रहण करती हैं। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा 3-2-17) (स्पन्दविवृति पृ. 20)। बाह्य विषयों के अभाव में भी अंतः विकल्पों का भिन्न भिन्न विषयों के प्रति नव नवोदय होते रहने वाली अवस्था। (शिवसूत्र 1-9)। स्फुट एवं अस्फुट रूप अवस्था (म. भ. पटल पृ. 185।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वप्न सृष्टि :

ऐसी सृष्टि जिसकी संपूर्ण संरचना सूक्ष्म होती है, जहाँ के समस्त शरीर, भुवन, भाव तथा संपूर्ण व्यवहार सूक्ष्म एवं स्वप्नवत् ही होते हैं। पितरों, देवों आदि के लोक इसी सृष्टि के अंतर्गत आते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वप्रकाश

स्वाभास। अपने नैसर्गिक एवं स्वात्मनिष्ठ परमार्थ तत्त्व के सतत स्फुरणशील स्वभाव का बिना किसी अंतः करण एवं बाह्यकरण की सहायता के स्वयमेव प्रकाशित होते रहना। आत्मतत्व का स्वरूप। (भास्करी 2 पृ. 126-28)। चैतन्य स्वरूप आत्मतत्त्व। अन्य किसी भी करण से प्रकाशित न होने वाला केवलमात्र अपने में ही स्थित शुद्ध स्वरूप। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 1 पृ. 135; भास्करी 1 पृ. 174)। स्वच्छंदरूप से स्वयमेव अपने ही प्रति भासित होने वाला अपना संवित् स्वरूप। अपने ही प्रकाश से प्रकाशमान भाव। एकमात्र संवित् स्वरूप आत्मा ही स्वप्रकाश है। शेष सभी पदार्थ उसी के प्रकाश से आभासित होते हैं। व्यवहार में ज्ञाता और ज्ञान स्वप्रकाश हैं, शेष सभी कुछ ज्ञान से ही प्रकाशित होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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