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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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सुवर्ण-कुंडल-न्याय

सुवर्ण ही एक आकार-विशेष को प्राप्‍त होकर ‘कुंडल’, अर्थात् कान का आभरण-विशेष बन जाता है। यहाँ पर स्वर्ण के कुंडल के आकार में परिणत होने पर भी इसके मूल स्वरूप स्वर्ण में जैसे कोई विकार नहीं होता, किंतु कुंडलावस्था में भी वह पूर्ण स्वर्ण ही रहता है, उसी प्रकार वीरशैव दर्शन में शिव अपने मूल स्वरूप में कोई विकार अथवा स्वरूप की किसी हानि के बिना स्वस्वातंत्र्यशक्‍ति के बल से इस विश्‍व के रूप में परिणत हो जाता है। इसी को ‘सुवर्ण-कुंडल-न्याय’ कहा जाता है।

इस प्रकार वीरशैव दर्शन में प्रपंच मिथ्या नहीं है, किंतु शिव का ही परिणाम हने से शिवस्वरूप ही है और सत्य है। अतएव इस दर्शन को ‘सर्वंलिङ्-गमयं जगत्’ कहा गया है। वस्तुत: अद्‍वैत् वेदांत में जिसे ‘विवर्त’ कहा जाता है, जिससे कि स्वस्वरूप की हानि के बिना अन्यस्वरूप का आपादन होता है, उसी को वीरशैव दर्शन में ‘अविकृत-परिणामवाद’ कहते हैं और उसका ‘सुवर्ण-कुंडल-न्याय’ के दृष्‍टांत से प्रतिपादन करते हैं (श.वि.द. पृष्‍ठ 218)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

सुशिव

ईश्वर दशा से ऊपर और सदाशिव दशा के नीचे जो बीच वाली अवांतर दशा होती है उस दशा में ठहरे हुए परमेश्वर को ही सुशिव कहा जाता है। यद्यपि प्रमातृ तत्वों या प्रमेय तत्त्वों के विश्लेषण में इस अवस्था को कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया है फिर भी उपासना के क्रम में सुशिव के भी विशेष स्थान को माना गया है जिसको पार करके ही साधक सदाशिव दशा पर आरोहण कर सकता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सुषुप्ति

वह अवस्था, जिसमें न तो बाह्य इंद्रियाँ ही कोई काम करती हैं और न अंतः ही, परंतु फिर भी जिसमें विषयावभास के अभाव का आभास होता रहता है और साथ ही उस अभाव का साक्षी रूप प्रमाता भी अपने ही चित्प्रकाश से चमकता रहता है। इसके कई एक प्रकार होते हैं जैसे – श्रम के कारण होने वाली सुषुप्ति को निद्रा, मादक द्रव्य के प्रभाव से होने वाली को मद, शरीरस्थ धातुओं के दोष से होने वाली को मूर्च्छा और स्वेच्छापूर्वक सिद्ध की गई सुषुप्ति को समाधि कहा जाता है। यह पुनः दो प्रकार की होती है –
– अपवेद्य
वह सुषुप्ति जिसमें प्रमेयांश का लेशमात्र भी आभास नहीं रहता है। इसे शून्य सुषुप्ति कहा जाता है। इसमें प्रमाता अपने शून्य स्वरूप में प्रविष्ट होकर रहता है।
– सवेद्य
वह निद्रा, जिसमें सुख का, शरीर के हल्केपन या भारीपन आदि का थोड़ा सा तथा धीमा सा आभास बना ही रहता है। इसे प्राण सुषुप्ति कहते हैं। इसमें प्रमाता के भीतर प्राणवृत्ति तथा अपानवृत्ति का थोड़ा सा आभास बना रहता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सुषुम्ना नाडी

नाडी शब्द के विवरण में बताया गया है कि शरीर स्थित अनन्त नाडियों में से तीन नाडियाँ मुख्य हैं – इडा, पिंगला और सुषम्ना। सुषुम्ना इनमें प्रधानतम है। शरीर के मध्य भाग में इसकी स्थिति है। चूंकि यह इडा और पिंगला दोनों नाडियों से संबद्ध है, अतः इसको अग्नीषोमात्मक माना गया है। प्राचीन ग्रन्थों में उक्त तीनों नाडियों को सोम, सूर्य और वह्नि का धाम तथा वाम, दक्षिण और मध्य पवन का आधार माना गया है। सुषुम्ना शरीर के मध्य भाग में पृष्ठवंश में स्थित है। ब्रहमरन्ध्र पर्यन्त इसकी गति है। सुषुम्ना नाडी प्रधानतम इसलिये मानी जाती है कि इडा और पिंगला नाडी का इसी में लय हो जाता है। शारदातिलक और उसकी टीका में स्वाधिष्ठात, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञाचक्र – ये सुषुम्ना नाडी के पाँच पर्व माने गये हैं। इडा और पिंगला नाडी के मार्ग से जब पवन ऊपर उठता है, तब उक्त स्थानों पर उनका सुषुम्ना नाडी से संपर्क होता है। इस प्रकार उक्त तीनों नाडियाँ ऊर्ध्वगामिनी मानी गई हैं।
सुषुम्ना नामक यह मध्य नाडी कन्द भाग से ब्रहमरन्ध्र तक ऊपर की ओर गतिशील होती है। ज्ञानसंकलिनी तन्त्र (11-12 श्लो.) में इडा को गंगा, पिंगला को यमुना और सुषुम्ना को सरस्वती बताया गया है। यह तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। इसमें स्नान करने वाला व्यक्ति सब पापों से मुक्त हो जाता है। सुषुम्ना नाडी ही ब्रह्मनाडी कहलाती है। इसी में सारा विश्व प्रतिष्ठित है। गुदा के पृष्ठभाग से शिरोभाग तक जो अस्थिदण्ड स्थित है, उसी को वीणादण्ड अथवा ब्रह्मदण्ड कहते हैं। उसके अंतिम भाग में एक सूक्ष्म सुषिर (छिद्र) है। इसी को ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं। योगाभ्यास के प्रभाव से मध्यनाडी सुषुम्ना यहाँ शिव और शक्ति के सामरस्य के रूप में जब विश्राम करती है, तब साधक समाधिस्थ हो जाता है, जीवन्मुक्त हो जाता है।
पूर्णानन्द प्रदर्शित सुषुम्ना तथा उसकी सहयोगिनी नाडियों का वर्णन नाडी शब्द की परिभाषा में भी किया गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

सूक्ष्मभूत

भूतजय के प्रसंग में ‘सूक्ष्मभूत’ का उल्लेख योगसूत्र (3/44) में मिलता है। यह ‘सूक्ष्म’ तन्मात्र है; द्र. तन्मात्र शब्द। ‘भूतसूक्ष्म’ शब्द का प्रयोग भी योगशास्त्र में मिलता है; द्र. व्यासभाष्य 1/49। यहाँ भूतभूक्ष्म का अर्थ है – परमाणु (द्र. तत्त्ववैशारदी)। 1/44 व्यासभाष्य में परमाणु अर्थ में भूतसूक्ष्म शब्द प्रयुक्त हुआ है (द्र. तत्त्ववैशारदी)। पार्थिव, आप्य (= जलीय), तेजस, वायवीय एवं आकाशीय भेद से परमाणु पाँच प्रकार के हैं। गन्धतन्मात्र प्रधान पाँच तन्मात्रों से पार्थिव परमाणु की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार गन्धतन्मात्रहीन रसतन्मात्रप्रधान चतुर्विध तन्मात्रों से आप्य (जलीय) परमाणु; गन्धरसहीन रूपतन्मात्र प्रधान त्रिविध तन्मात्रों से तेजस परमाणु; गन्ध-रस-रूप-तन्मात्रहीन स्पर्शप्रधान त्रिविध तन्मात्रों से वायवीय परमाणु एवं शब्दतन्मात्र से आकाशीय परमाणु उत्पन्न होते हैं (द्र. तत्त्ववैशारदी)। घटादि पदार्थ इन भूतसूक्ष्मों (परमाणुओं) का संस्थानविशेष है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सूक्ष्मशरीर

सांख्य में (यह शरीर मातापितृज शरीर से भिन्न है) इस शरीर का वर्णन सांख्यकारिका 40-42 में किया गया है। यह शरीर बुद्धिरूप लिंग (पुरुष का ज्ञापक) के इसमें रहने के कारण अथवा महाप्रलय में इसके प्रकृति में लीन होने के कारण लिंग भी कहलाता है।
सूक्ष्मशरीर महत्तत्त्व, अहंकार, मन, दस इन्द्रिय तथा पाँच तन्मात्रों का समुदाय है (18 अवयवों से युक्त)। प्रत्येक पुरुष के लिए एक-एक सूक्ष्म शरीर है जो आदिसर्ग में उत्पन्न होकर महाप्रलय-पर्यन्त अवस्थित रहता है। यह शरीर स्वयं भोगहीन रहता है और स्थूल शरीरों से युक्त होकर ही भोग करने में समर्थ होता है। यह भोग-अपवर्ग रूप पुरुषार्थ द्वारा प्रयोजित होकर नाना योनियों में नाना प्रकार के स्थूल शरीरों को लेकर संसरण करता रहता है। 3/7 सांख्यसूत्र में सूक्ष्म शरीर का निर्देश है। व्याख्याकारों ने कहा है कि यह वही शरीर है जिसका विवरण सांख्यका. 40 में है। विज्ञानभिक्षु कहते हैं कि सूक्ष्मशरीर के 17 अवयव हैं (अहंकार का अन्तर्भाव बुद्धि में है) तथा यह सर्गादी में एक ही उत्पन्न होता है। कुछ अन्य मतभेद भी हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सूक्ष्मसंयम

भूतों की जय करने के लिए भूतों को जिन पाँच रूपों में संयम करना आवश्यक होता है, ‘सूक्ष्म’ उनमें अन्यतम है (योगसूत्र 3/44)। तन्मात्र ही भूतों का यह सूक्ष्मरूप है। तन्मात्र भूत का चरम रूप (सूक्ष्मतम) है। चूंकि तन्मात्र भूत का उपादान कारण है और उपादान कारण कार्य से सदैव सूक्ष्म होता है, अतः तन्मात्र नामक रूप को ‘सूक्ष्म’ शब्द से कहा गया है। द्र. तन्मात्र शब्द। वशित्व नामक जो विभूति है (अणिमादि अष्टसिद्धियों के अन्तर्गत) वह इस सूक्ष्म संयम से होता है। भौतिक वस्तु एवं भूतों को सर्वथा नियंत्रित करने की शक्ति इस विभूति से होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सूक्ष्मादीक्षा

देखिए निर्वाण दीक्षा।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सूर्य

1. ज्ञानशक्ति स्वरूप केवल शुद्ध प्रकाशमात्र। (तन्त्रालोक 3-120)। शुद्ध तेज होने के कारण इसे तीक्ष्णस्वरूप तथा रक्त वर्ण वाला माना गया है। (वही 3-114)।
2. संविद्रूप पर-प्रकाश ही जब किंचित् संकोच के कारण प्रमाणरूप में प्रकट हो जाता है तो इस स्थिति में पहुँचने पर ही उसे सूर्य कहते हैं। इसी कारण सूर्य को प्रमाणस्वरूप भी कहा गया है। (तन्त्रालोक खं 3-117, 121)।
3. पाँच प्राणों में से प्रथम प्राण स्वरूप। (वही पृ. 20)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सृष्टि कृत्य

अपने शुद्ध संवित् स्वरूप में संवित् रूप में ही प्रकाशित हो रहे स्वात्म रूप विश्व को अपने ही पारमेश्वरी आनंद के लिए अपने से भिन्न रूप में अवभासित करने की पारमेश्वरी लीला। परमेश्वर अपने अभिन्न एवं अद्वैत प्रकाश के भीतर ही प्रतिबिंब की भांति भेदमय जगत् को अवभासित करता है। इस प्रकार शिव के विश्वोत्तीर्ण स्वरूप को छिपाती हुई उसके विश्वमय रूप में अवभासित होने की इस पारमेश्वरी लीला को परमेश्वर का सृष्टि कृत्य कहते हैं। (तन्त्र सार पृ. 11)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सृष्टिचक्र

तरंगहीन समुद्र में जिस प्रकार वायु की क्रिया के कारण कुछ चांचल्य दिखलाई देता है, जिसके द्वारा एक के बाद एक महातरंगों की उत्पत्ति होती रहती है, उसी प्रकार निर्विशेष शान्त तथा क्षोभशून्य ‘भासा’ रूपी महासत्ता के वक्षस्थव पर स्वातन्त्र्य के उल्लास के कारण उद्योगरूपी आदि स्पन्द का उदय होता है। इसे ही सृष्टि की प्रथम कला का आत्मप्रकाश कहते हैं। उद्योग, अवभास, चर्वण, आत्मविलापन तथा निस्तरंग की समष्टि को ही सृष्टि कहा जाता है। प्रत्येक जीवात्मा में समरूप से ये विद्यमान हैं।
दृष्टान्त के लिये एक कुम्हार के घड़ा बनाने के व्यापार को ले सकते हैं। घड़ा बनाने से पहले घड़े का भाव कुम्हार के आत्मचैतन्य के साथ अभिन्न रूप से स्थित रहता है। आत्मस्वरूप में अभिन्न रूप से विद्यमान इस भाव को भिन्न अथवा पृथक् रूप में बाहर निकालने के लिये जो प्राथमिक स्पन्दन होता है, वही ‘उद्योग’ नामक प्रथम प्रथा है। इसके पश्चात् दण्ड, चक्र आदि की सहायता से यह भाव बाहर प्रकाशित होता है। इसी को अवभास कहते हैं। सृष्टि क्रिया के अन्तर्गत यह द्वितीय प्रथा है। इसके बाद बाह्य रूप से अवभासित इस भाव को नाना प्रकार के व्यापारों के द्वारा बार-बार अपने रूप में अनुभव करना पड़ता है। इसी का पारिभाषिक नाम चर्वण है। अर्थक्रियाकारित्व अथवा प्रयोजन सम्पादन ही सब भावों का एकमात्र उद्देश्य होता है। इस उद्देश्य के सिद्ध हो जाने पर इसके प्रति उदासीनता का होना स्वाभाविक है। यही ‘विलापन’ नामक चतुर्थ प्रथा है। जब इस अर्थक्रिया की स्मृति तक लुप्त हो जाती है, तब ‘निस्तरंगत्व’ नाम की पंचम प्रथा का आविर्भाव होता है।
ऊपर जो दृष्टान्त दिया गया है, उसमें आत्मा या परमेश्वर का स्वरूप ही समुद्रस्थानीय है तथा घट आदि प्रत्येक भाव उसके तरंगस्वरूप हैं। ये तरंगें परमेश्वर में ही उदित होती हैं और फिर उन्हीं में लीन भी हो जाती हैं। भासा अथवा स्वातन्त्र्य शक्ति वस्तुतः निष्कल होते हुए भी कलामय है, क्रमहीन होते हुए भी क्रमविशिष्ट प्रतीत होती है। सृष्टि व्यापार में जिन पाँच प्रथाओं का उल्लेख किया गया है, वे सभी उसी की कला के खेल हैं। आत्मा की स्वधामस्थ पंचयोनि तथा उनके साथ अविनाभूत पंचसिद्ध मिलकर सृष्टि की दस कला के रूप में वर्णित होते हैं। तात्त्विक दृष्टि से देखने पर ये उद्योग, अवभासन, चर्वण, आत्मविलापन तथा निस्तरंगत्व से भिन्न पदार्थ नहीं है। सृष्टि प्रभृति प्रत्येक व्यापार में इनका खेल देखने को मिलता है। इसी कारण एकमात्र सृष्टि में ही सृष्टि, स्थिति, संहार, अनाख्या तथा भासा नामक पाँचों कृत्यों की समस्त विचित्रताओं का स्पष्ट रूप से विकास पाया जाता है (महार्थमंजरी, पृ. 97-98)।
Darshana : शाक्त दर्शन

सृष्टिसंहार बीज

अनाहत नाद की अभिव्यक्ति के दो प्रमुख स्थान हैं – एक सृष्टि बीज सकार और दूसरा संहार बीज हकार। इन दो बीजों का आश्रय लेकर ही नाद अभिव्यक्त होता है। योगी लोग जानते हैं कि प्राण के आदि कारण का अनुसन्धान करने पर चिदाकाश के प्रथम स्पन्दन पर ही दृष्टि पड़ती है। चिदाकाश का यह स्पन्दन भी वस्तुतः स्वतः सिद्ध नहीं है। वह परम पुरुष और परमा प्रकृति की यामलावस्था से उद्भूत है। बिन्दुयुक्त हकार (हं) परम पुरुष का और विसर्गयुक्त सकार (सः) परमा प्रकृति का वाचक है। दोनों की यामलावस्था ही आदि हंस का रूप हैं, जिसे निष्पन्द और स्पन्दतत्त्व का सन्धिस्थान माना जा सकता है। इस आदि प्राण को ही संवित् का प्रथम स्फुरण कहते हैं। यही सृष्टि के सब तत्त्वों को धारण करने वाली शक्ति है। हम लोगों के शरीर में श्वास-प्रश्वास का खेल इस सृष्टिसंहार बीजात्मक हंसरूपी प्राण का ही व्यापार है। (तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि, पृ. 296-297)।
Darshana : शाक्त दर्शन

सेतु व्यपदेश

पाप समुद्र को पार करने के लिए आत्मा में किया गया सेतु (पुल) का श्रौत व्यवहार सेतु व्यपदेश है। उक्त व्यवहार “अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिः” इस श्रुति में किया गया है (अ.भा.पृ. 963)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सैद्ध मत

सिद्धों का मत। सिद्धों का पराद्वैत दर्शन। सैद्ध मत में क्रिया को ज्ञान की घनीभाव की सी दशा और ज्ञान को क्रिया की द्रवीभाव की सी दशा कहा गया है। इस प्रकार जहाँ ज्ञान है वहाँ क्रिया भी है तथा जहाँ क्रिया है वहाँ ज्ञान भी है। महाराष्ट्र के स्वतंत्रानंद नाथ ने इस दर्शन को सैद्ध मत कहा है। (मा. चि. वि., 1-15, 16)। काश्मीर शैव दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में इसी सैद्ध मत का सविस्तार प्रतिपादन किया गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सोपक्रम कर्म

जिस कर्म का फल आयु है, वह सोपक्रम या निरुपक्रम होता है (द्र. योगसू. 3/22)। जो कर्म तीव्रयोग से फल देता है या फलदान के लिए तीव्ररूप से उन्मुख रहता है, वह सोपक्रम है। उपक्रम का अर्थ है – व्यापार या कार्य करने के लिए उन्मुख होना। ऐसे कर्मों का नाश योगी अनेक शरीरों का निर्माण कर तत्काल ही कर सकते हैं – ऐसा कहा जाता है।
सोपक्रम कर्म में संयम करने पर योगी को चित्त में अपरान्त (= मरण) का कालज्ञान, अर्थात् कब मृत्यु होगी, इसका स्फुट निश्चयज्ञान उदित होता है – यह योगशास्त्र का मत है। अन्य व्यक्ति के सोपक्रम कर्म में संयम करने पर उसके मरणकाल का भी ज्ञान होता है – यह व्याख्याकार कहते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सोम

1. क्रियाशक्ति स्वरूप। अमृतात्मक प्रकाशमात्र। (तन्त्रालोकविवेक2 पृ. 125)। इसे श्वेत वर्ण वाला तथा अमृतस्वरूप होने के कारण आह्लादकारक माना गया है। (तन्त्रालोक 3-114)।
2. पर-प्रकाश जब प्रमेय के रूप में प्रकट होता है तो उसे ही सोम कहते हैं। इसी कारण सोम को प्रमेय स्वरूप भी कहा जाता है। (वही 3-117, 121)। प्रमेय के प्रति सुख, दुःख एवं मोह में से आह्लादकारी सुखात्मक उत्कृष्ट अंश से समस्त भावजात को अभिषिक्त करने वाले शुद्ध प्रकाश को ही अमृत की वर्षा करने के कारण भी सोम कहा जाता है। (वही 3-120 पृ. 125)।
3. अपान। (वही पृ. 120)। सिद्ध संपद्राय में प्राण को सूर्य और अपान को सोम कहा जाता है।
4. उमासहित शिव को भी सोम कहते हैं। तात्पर्य है शक्ति के आभिमुख्य में आया हुआ शिव।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सौमनस्य

शौच (नियम रूप योगांगविशेष) के आचरण से जो आभ्यन्तर सिद्धियाँ होती हैं, सौमनस्य उनमें एक है (द्र. योगसू. 2/41)। सौमनस्य सत्त्वशुद्धि का फल है। अतः सौमनस्य का स्वरूप है – मन की क्षोभहीनता, द्वेष और शोक वाली परिस्थिति में भी मन में प्रसन्नभाव की अक्षुण्ण रूप से स्थिति। व्याख्याकारों ने सौमनस्य के लिए ‘स्वच्छता’ एवं ‘प्रीति’ शब्दों का प्रयोग किया है, जो उपर्युक्त मानस स्थिति को ही लक्ष्य करता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्त्यान

यह नवविध योगविघ्नों में एक है (योगसू. 1/30)। व्यासभाष्य में इसे ‘चित्त की अकर्मण्यता’ (= अभीष्ट कर्म को करने में अयोग्यता) कहा गया है। यह देह की अकर्मण्यता नहीं है, चित्तमात्र की है – यह भेद विवेच्य है। शरीर में कफ आदि की वृद्धि होने पर शरीर आसन-प्राणायाम का अनुष्ठान करने में अक्षम हो जाता है, पर मन योगानुकूल रह सकता है। जब शरीर के योगाभ्यासानुकूल रहने पर भी मन योगांग-अभ्यास करने में दक्ष नहीं होता, तब यह अदक्षता स्त्यान कहलाती है। यह अदक्षता अनिच्छामात्र नहीं है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्थल

वीरशैव सिद्‍धांत में परशिवब्रह्म को ‘स्थल’ नाम से जाना जाता जाता है। वह एक, अखंड और स्वप्रकाश वस्तु है, जिसका आदि और अंत नहीं है। यह सच्‍चिदानन्दस्वरूप विमर्श-शक्‍ति-विशिष्‍ट रहता है। सच्‍चिदानन्दस्वरूप का जो बोध है, वही विमर्शशक्‍ति कहलाती है। इस बोधरूप शक्‍ति के अभाव में शिव, स्वप्रकाश होने पर भी, रत्‍न आदि के समान जड़ हो जाता है, अतः इस दर्शन में परशिव को शक्‍ति-विशिष्‍ट माना गया है। ‘यत्रादौस्थीयतेविश्‍वं अन्ते चलीयते तत् स्थलम्’ – इस उक्‍ति के अनुसार सचराचर प्रपंच की उत्पत्‍ति, स्थिति तथा लय के कारणीभूत इस परशिव को ‘स्थल’ नाम से निर्देश करना सार्थक हो जाता है। स्थलरूपी इस परशिव को जब उपास्य और उपासक रूप से लीला करने की इच्छा उत्पन्‍न होती है, तब परशिव में, शांत समुद्र के वक्षस्थल पर विपुलाकार तरंगों के उठने के पहले क्षुद्र कंपन के समान स्पंद उत्पन्‍न होता है, जिसे विमर्शशक्‍ति का क्षोभ कहते हैं। उस क्षोभ से सामरस्य का विभेद होकर शक्‍ति-तारतम्य से ‘अंगस्थल’ और ‘लिंगस्थल’ भेद से स्थल-रूपी परशिव दो भागों में विभक्‍त हो जाता है। इनमें ‘लिगस्थल’ उपास्य शिव है और अंगस्थल उपासक जीव है (अनु.सू. 2/1-18; श.वि.द. पृष्‍ठ 177; वे.वी.चिं. उत्‍तरखंड 2/41-59)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

स्थान कल्पना

आणव उपाय में कारण एवं ध्वनि योग के नीचे स्थान कल्पना का स्थान आता है। इस योग में बाह्य विषयों पर ही चित्त को ठहराकर उसके अनंत आभासों को भावना के द्वारा अपनी संवित् रूप अग्नि में विलीन करने का सतत अभ्यास करना होता है। इस अभ्यास की पूर्णता पर जब चित्त के अनंत अशुद्ध विकल्पों का क्षय होता है तो आणव समावेश हो जाता है। इस योग को स्थान कल्पना कहते हैं। इस योग में प्राणवायु, स्थूल शरीर और प्रमेय जगत् धारणा के मुख्य आलंबन बनते हैं। (तन्त्र सार पृ. 45)। स्थान कल्पना में एक एक ग्राह्य या बाह्य प्रमेय पर धारणा को जमाकर भावना के बल से उसी को परिपूर्ण परमेश्वर के रूप में देखने का सतत अभ्यास किया जाता है। उससे भी साधक को आणव समावेश हो जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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