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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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सानन्दा समापत्ति

ग्रहण (इन्द्रिय) रूप विषय में जो समापत्ति होती है, उसका नाम सानन्दासमापत्ति है – ऐसा कई व्याख्याकार कहते हैं। इसके दो अवान्तर भेद होते हैं – शब्दार्थज्ञान के विकल्प से संकीर्ण तथा इस विकल्प से हीन। समापत्ति = संप्रज्ञात समाधि से जात प्रज्ञा।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सामनस्

देखिए समना।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सामरस्य

ऐसी दशा या भाव जिसमें सभी रस, अवस्थाएँ, भाव आदि एक रस होकर लोलीभाव में रहते हैं अर्थात् अभिन्नतया स्पंदित होते रहते हैं और एकरूपतया चमकते रहते हैं। (स्व.तं. उ. खं. 2 पृ. 191)। परस्पर संघट्ट रूपता, परिपूर्ण एकरूपता या एकरसता। (तं. आत्मविलास, खं. 3, पृ. 223)। सामरस्य भाव को मयूराण्ड रस न्याय से समझाया जाता है। मोर के पंखों के सभी रंग उसके अंडे के भीतर रहने वाले रस में हुआ करते हैं। परंतु वहाँ कोई भी रंग पृथक्तया दीखता नहीं। सभी रंग एकरूपतया स्पंदमान होते हुए वहाँ रहते हैं और जब पक्षिशावक के रूप में परिणत हो जाते हैं तो पृथक् पृथक् रूप को लेकर के अभिव्यक्त हो जाते हैं। रस की अवस्था सभी रंगों के सामरस्य की अवस्था है। परमेश्वर समस्त विश्व की ही सामरस्य की अवस्था है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सामान्यकरणवृत्ति

करणों की वृत्ति = करणवृत्ति। सामान्य जो करणवृत्ति = सामान्यकरणवृत्ति। सामान्य = साधारण। यहाँ करण का तात्पर्य आन्तर करण से है। बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार तथा मन रूप आन्तर करणों की जो सामान्य (सभी में अनुस्यूत) वृत्ति है, वही ‘प्राणादि’ कहलाती है (सां. का. 29)। (बुद्धि आदि की निजी वृत्तियाँ भी हैं; द्र. सां. का. 23, 24, 27।) प्राणादि अर्थात् प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान – ये पाँच वायु-रूप हैं। सांख्यसूत्र (2/31) में भी इन प्राणों का उल्लेख है (द्र. प्राण आदि शब्द)।
इन प्राणों की स्थिति (शरीर के विभिन्न अङ्गों में) एवं क्रिया (व्यापार) का विवरण सांख्यकारिका (29) एवं सांख्यसूत्र (2/31) की व्याख्याओं के अतिरिक्त व्यासभाष्य (3/39) में भी मिलता है। योग के अधिकांश ग्रन्थों में इन पाँच प्राणों के अतिरिक्त नाग, कूर्म आदि पाँच उपप्राणों की स्थिति एवं क्रियाओं का विशद विवरण मिलता है।
तीन अन्तःकरणों की इस सामान्य वृत्ति का स्वरूप है जीवन अर्थात् शरीर -विधारण। शरीरान्तर्वती वायु विभिन्न अङ्गों में अवस्थित होकर स्व-स्व कर्म का जो निष्पादन करती है, वह अन्तःकरणों के प्रयत्न से नियंत्रित होकर ही होता है। यह सामूहिक प्रयत्न ही सामान्य वृत्ति है। अन्तःकरणों की कोई सामान्यवृत्ति हो सकती है – यह मत कई वेदान्तियों की दृष्टि में असंगत है।
प्राण, अपान आदि वायु-विशेष-रूप ही हैं; यह वायु सामान्य-करणवृत्ति नहीं है; अन्तःकरणों का सामूहिक प्रयत्न ही व्यापार या वृत्ति है – यह कई टीकाकारों ने स्पष्टतया कहा है। अन्तःकरणों की जो वृत्ति है वह आभ्यन्तरी ही है; यही जीवन अर्थात् शरीरधारण-प्रयत्न है। यह प्रयत्न ही शरीर वायु का नियामक है – यह तत्त्ववैशारदी में वाचस्पति ने स्पष्टतया कहा है।
प्राण को बाह्यन्द्रियों की सामान्यवृत्ति के रूप में भी किन्हीं आचार्यों ने माना है; पर यह मत उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि सुषुप्ति में रूपग्रहण-रूप चक्षुव्यापार नहीं रहता पर श्वास-प्रश्वास रूप प्राणनक्रिया चलती रहती है। कुछ व्याख्याकार पंचप्राण को वायुरूप नहीं समझते हैं; वायु की तरह संचरण करने के कारण ये प्राणादि ‘वायु’ कहे जाते हैं – यह उनका मत है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सामान्यतोदृष्ट

अनुमान के तीन भेदों में से यह एक है (अन्य दो भेद हैं – पूर्ववत् और शेषवत्)। भविष्यत् और अतीत वस्तु की सिद्धि के लिए जिस प्रकार पूर्ववत् और शेषवत् अनुमान है, उसी प्रकार सामान्यतोदृष्ट अनुमान भी वर्तमानकालिक वस्तु को सिद्ध करने के लिए है। देशान्तर (=स्थानांतर)-प्राप्ति के साथ गति का नियत सम्बन्ध है, सूर्य (जिसकी गति दृष्ट नहीं होती) चूंकि आकाशस्थ विभिन्न देशों में दृष्ट होता है, अतः सूर्य की गति है – यह सामान्यतोदृष्ट का उदाहरण है।
वाचस्पति कहते हैं कि सामान्यतोदृष्ट पूर्ववत् की तरह अन्वय पर आधारित होता है। (उसमें अन्वयव्याप्ति की प्रधानता रहती है), पर यह ‘अदृष्ट-स्वलक्षण-सामान्य’ है अर्थात् साध्य के समानजातीय दृष्टान्त का प्रत्यक्ष इसमें नहीं होता। उदाहरण – रूपादिज्ञान का अवश्य ही कोई करण होगा, क्योंकि वह क्रिया है; जिस प्रकार छेदन क्रिया का करण होता है उसी प्रकार रूपादिज्ञान रूप क्रिया का भी करण होगा। पर यह करण अभौतिक इन्द्रिय-जातीय है, (जो प्रत्यक्ष योग्य नहीं है), छेदन क्रिया के करण कुल्हाड़े की तरह बाह्य भौतिक द्रव्य नहीं है। यहाँ इन्द्रियजातीय किसी वस्तु के साथ व्याप्ति का ग्रहण नहीं हुआ है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सामान्यस्पंद

प्रतिष्ठित स्पंद। अंतः एवं मूलभूत स्पंद (देखिए)। परमशिव। परस्पंद। मुख्य स्पंद। (स्पन्दविवृति पृ. 70)। सृष्टि, स्थिति आदि पाँचों कृत्य सामान्यस्पंद की ही भिन्न भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इस प्रकार संपूर्ण विश्व सामान्यस्पंद का ही विस्तार है। (मा. वि. वा. 1-276, 277)। परमशिव की शिवता को भी सामान्य स्पंद कहा जाता है; (परात्रीशिकाविवरण पृ. 208)। इसे परम उपादेय माना गया है तथा मूलभूत कारण होने के कारण इसे स्वरूप प्रत्यभिज्ञा करवाने वाला भी माना गया है। (स्व. वि. पृ. 63, 64)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सामिकृत कर्म

अधूरा किया कर्म सामिकृत कर्म है। लोक में सुषुप्ति के पूर्व किए जा रहे कर्म के शेष भाग की पूर्ति पुनः जागरण के अनन्तर की जाती है। ऐसे ही शयन के पूर्व का व्यक्ति “सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामहे”, (इस श्रुति वचन के अनुसार) सुषुप्ति दशा में भगवत् स्वरूप में मिल जाता है, और वही पुनः जग कर शेष कार्य को पूर्ण करता है, दूसरा व्यक्ति नहीं। इस प्रसंग से आत्मा की स्थिरता सिद्ध होती है (अ.भा.पृ. 893)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

साम्यावस्था

पंचभूत से शुरू कर बुद्धितत्त्व पर्यन्त व्यक्त पदार्थों में सत्त्व-रजः-तमः-नामक त्रिगुण विषम अवस्था में (प्रधान-अप्रधान-भाव में, अर्थात् कोई एक गुण प्रधान एवं अन्य दो गुण अप्रधान – इस रूप में) रहते हैं – यह देखा जाता है। इन व्यक्त पदार्थों का जो चरम कारण होगा, वह गुणवैषम्य रूप नहीं हो सकता, क्योंकि गुणवैषम्य होने और व्यक्त पदार्थ का आविर्भाव होना अविनाभावी है। यही कारण है कि व्यक्त पदार्थों के मूल उपादान कारण को त्रिगुणसाम्यावस्था के रूप में माना गया है।
कई व्याख्याकारों ने यह भी कहा है कि इस साम्यावस्था में धर्म-धर्मी-भाव नहीं रहता। जिस प्रकार व्यक्त सत्त्वगुण का धर्म प्रकाश है, ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार अव्यक्तभूत (अर्थात् साम्यावस्था में स्थित) सत्त्वगुण का धर्म प्रकाश है – यह नहीं कहा जा सकता; इस अवस्था में प्रकाश ही सत्त्व है। इस दृष्टि के अनुसार साम्यावस्था में प्रकाश (सत्त्व), क्रिया (रजः) और स्थिति (तमः) ही रहते हैं – प्रकाश-क्रिया-स्थिति-धर्मक कोई वस्तु नहीं रहती है। साम्यावस्था में स्थित त्रिगुण देशकालातीत है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

साम्योपायन

ब्रह्म के साथ साम्य की प्राप्ति साम्योपायन है। अर्थात् ब्रह्म के साथ संबंध होने पर पूर्व में तिरोहित जीव के आनंदांश तथा ऐश्वर्य आदि पुनः ब्रह्म के समान ही आविर्भूत हो जाते हैं। इस स्थिति को साम्योपायन शब्द से अभिहित किया गया है (अ.भा.पृ. 1055)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सायुज्य

मर्यादा भक्ति मार्ग में भगवान् के साथ एकत्व प्राप्त कर लेना या भगवान् में प्रवेश सायुज्य मुक्ति है। इसे सार्ष्टि मुक्ति शब्द से भी प्रतिपादित किया जाता है। किन्तु पुष्टि भक्ति मार्ग में अलौकिक सामर्थ्य प्राप्त कर जाना सायुज्य है (प्र.र.पृ. 135)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सार्वकामिक

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत दर्शन के अनुसार ईश्‍वर समस्त कार्य को अपनी स्वतंत्र इच्छाशक्‍ति से ही उत्पन्‍न करता है। किसी बहीः कारण पर निर्भर नहीं करता है। समस्त जगत की उत्पत्‍ति अपनी इच्छानुसार करता है। जैसे चाहता है वैसे करता है अतः सार्वकामिक कहलाता है। उसे जीवों के अनादि कर्म पर उनकी अनादि अविद्‍या या अनादि वासना पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। वह स्वतंत्र है। अतः जैसे वे चाहता है वैसे ही सब कुछ घटता है। इसीलिए उसे सार्वकामिक कहते हैं। (पा.सू.कौ.भा.पृ.60)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सालम्बन चित्त

जिस चित्त का कोई आलम्बन रहता है, वह सालम्बन चित्त कहलाता है। योगाभ्यास के लिए इच्छापूर्वक जिस विषय पर चित्त को स्थिर किया जाता है, वह आलम्बन है। सालम्बन चित्त में जो भी समाधि होगी, वह सबीज ही होगी – यह ज्ञातव्य है। कोई भी सालम्बन अभ्यास निर्बीज समाधि का साधन नहीं हो सकता, यह व्यासभाष्य (1/18) में कहा गया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सास्मिता समापत्ति

जिस समापत्ति का विषय अस्मिता (अहंकार) है, वह सास्मिता समापत्ति है। यह ‘ग्रहीतृविषयक समापत्ति’ है (समापत्ति के तीन ही विषय हैं – ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीता)। समापत्ति = संप्रज्ञातसमाधिजात प्रज्ञा। सबीज समाधि एवं समापत्तियों के परस्पर सम्बन्ध में टीकाकारों में कुछ मतभेद हैं, यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सिद्‍ध योगी

अलौकिक शक्‍ति संपन्‍न योगी।

पाशुपत दर्शन के अनुसार पाशुपत योग का अभ्यास करके साधक सिद्‍ध योगी का पद प्राप्‍त कर लेता है। सिद्‍ध योगी वह होता है जिसने अपनी आत्मा को पहचाना है तथा जिसका महेश्‍वर से ऐकात्म्य स्थापित हुआ हो। सिद्‍ध योगी और भी कई सिद्‍धियों से संपन्‍न होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.121,122)। इस तरह से साधक पारमार्थिक सिद्‍धियों को प्राप्‍त करके रूद्रसायुज्य को प्राप्‍त करता है और साथ ही साथ दूरदर्शन श्रवण आदि व्यावहारिक सिद्‍धियों का उपयोग भी करता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सिद्धदर्शन

योगसूत्र का कहना है कि मूर्धज्योतिः अर्थात् शिरःकपाल (=खोपड़ी) के प्रकाशबहुल छिद्र विशेष में संयम करने पर द्युलोक एवं पृथ्वी के मध्य स्थान में विचरण करने वाले सिद्धनामक अदृश्यप्राणी-विशेष (यह एक प्रकार की देवायोनि है) का दर्शन होता है (3/32)। कोई-कोई ‘सिद्ध’ का अर्थ योगसिद्ध दिव्यदेही पुरुष भी बताते हैं। उपर्युक्त ‘छिद्र’ ब्रह्मरन्ध्र है, यह किसी-किसी का कहना है। ब्रह्मरन्ध्र (नामान्तर-ब्रह्मतालु) सुषुम्नानाडी में स्थित है। अतः यह प्रभास्वर, ज्योतिबहुल है – ऐसा व्याख्याकारों का कहना है। मस्तिष्क के पश्च भाग में यह मूर्धज्योति नामक स्थान है – यह मत भी प्रसिद्ध है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सिद्‍धि

लाभ का एक प्रकार।

पाशुपत साधक को निरंतर योगाभ्यास से दुःखांत प्राप्‍ति होती है; परंतु यह दुःखांत शून्यवत् नहीं होता है। इसमें केवल दुःख की ही समाप्‍ति नहीं होती है, अपितु ऐश्‍वर्यस्वरूप सिद्‍धियों की प्राप्‍ति भी होती है। यह सिद्‍धि दो प्रकार की होती है – ज्ञानशक्‍ति रूप तथा क्रियाशक्‍ति रूप। ज्ञानशक्‍ति रूप सिद्‍धि से दूरश्रवण, मनन आदि सिद्‍धियाँ प्राप्‍त होती हैं तथा क्रियाशक्‍ति रूप सिद्‍धि से मनोजवित्व, कामरूपित्व आदि सामर्थ्य योगी में जागते हैं। (ग.का.टी.पृ. 9,10)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सिद्धि (प्रत्ययसर्गान्तर्गत)

सांख्यकारिका एवं सांख्यसूत्र में विभूतिरूप सिद्धि के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार की सिद्धि की चर्चा है, जो प्रत्यय सर्ग के अन्तर्गत है। सिद्धि का अर्थ है – ‘यथेष्टस्य साधनम्’, जो अभीष्ट हो उसका साधन अर्थात् अभीष्टसिद्धि करना। निश्चयज्ञान को उत्पन्न करना सिद्धि है – यह भी किसी-किसी का मत है। सिद्धि एवं उसके भेदों का प्रकृत स्वरूप बहुत कुछ स्पष्ट हो चुका है।
इस सिद्धि के ऊह आदि आठ भेद हैं, यह सांख्यकारिका (51) में कहा गया है। ऊह आदि के तार आदि अन्य नाम भी हैं – यह टीकाकारों ने कहा है। ऊह आदि की व्याख्या में कहीं-कहीं मतभेद मिलते हैं, यथा – (1) ऊह = तर्क अर्थात् आगम के अविरोधी न्याय से आगमार्थ का मनन करना, अथवा उपदेश के बिना भी स्वयं स्वप्रतिभा से तर्करूप मनन करना। गुरु से, शास्त्र से या स्वतः जो तत्त्वज्ञान (मोक्ष प्राप्ति का हेतुभूत) होता है वह ऊह है, ऐसा भी कोई-कोई कहते हैं। (2) शब्द=शब्दजनित अर्थज्ञानः इसके दो अवान्तरभेद हैं – अक्षरानुपूर्वी का ग्रहण तथा अर्थज्ञान। अथवा अन्यों द्वारा अध्यात्मशास्त्र पाठ को सुनकर जो तत्त्वज्ञान होता है, वह। (3) अध्ययन = गुरुमुख से विधिवत् अध्यात्मशास्त्र का ग्रहण अथवा सांख्यशास्त्र का अध्ययन करने पर जो ज्ञान होता है, वह। (4-6) तीन प्रकार का दुःखनाश अर्थात् आध्यात्मिक दुःख, आधिदैविक दुःख एवं आधिभौतिक दुःखों का नाश। ऊह-शब्द-अध्ययनजनित ज्ञान द्वारा ही दुःखनाश करणीय है – यह भी कहा जाता है। (7) सुहृत्प्राप्ति = स्वीय मनन से जो मत निर्धारित हुआ है, गुरु-शिष्य-सहाध्यायियों के साथ विचार-विमर्श कर उस मत की एकवाक्यता करना। एकमतावलम्बी गुरु-शिष्य-सहाध्यायियों की प्राप्ति ही यह सिद्धि है। अथवा तत्वज्ञ सुहृदों के संपर्क से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह यह सिद्धि है। गुरु से शास्त्रतात्पर्य समझने में असमर्थ व्यक्ति जब किसी सुहृद के द्वारा सरल रीति से समझाने पर समझता है, तब यह ‘सुहृत्-प्राप्ति’ रूप सिद्धि है – यह किसी-किसी का कहना है। (8) दान = विवेकज्ञान की शुद्धि = विवेक के स्वच्छ प्रवाह में अवस्थित होना। अथवा धनादिदान से प्रयत्न कर किसी ज्ञानी से ज्ञान प्राप्त करना।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सुघट मार्ग

यम, नियम आदि क्लेश साध्य प्रयत्नों से विहीन सहज ही में अपने शिवभाव के समावेश को प्राप्त करवाने वाले बिल्कुल नए, सुकर एवं आनंददायक शैवी साधना को उत्पल देव ने सुघट मार्ग कहा है। शैवी साधना के इस सुललित मार्ग को थोड़े से ही प्रयत्न से साधक को शुद्ध संवित्स्वरूपता का समावेश करवाने वाला, सहज साध्य तथा महाफल प्रदान करने वाला माना गया है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, 2 पृ. 271)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सुप्रबुद्ध

ईश्वर के परम अनुग्रह के पात्र बने प्राणी, जिनमें किसी भी अंश में माया का प्रभाव नहीं रहता है और इस कारण जिन्हें अपने परिपूर्ण शिवभाव का साक्षात्कार हो गया होता है। ऐसे प्राणी को तत्त्व की उपलब्धि अनायास ही हो जाती है। परिणामस्वरूप वह सदा अपनी शुद्ध संविद्रूपता के आनंदात्मक चमत्कार से ओत प्रोत बना रहता है। (स्व. वि. पृ. 9, 57, 58)। जाग्रत् अवस्था में रहने वाले उत्कृष्ट सिद्धयोगी सुप्रबुद्ध कहलाते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सुरतयोग

मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग प्रभृति योग की सभी शाखाओं में नादानुसन्धान की महिमा वर्णित है। प्राचीन वैयाकरण इसका वाग्योग (शब्दयोग) के रूप में वर्णन करते हैं। मध्य युग के सन्त-महात्मा सुरतयोग के नाम से जिस योग मार्ग का अनुसरण करते हैं, वह इस वाग्योग का ही विस्तार है। सुरत शब्द सुरति शब्द का अपभ्रंश माना जाता है। सुरति का अर्थ है स्मृति। यह सुरति आहत नाद को अपना लक्ष्य बनाकर उसकी ओर क्रमशः अग्रसर होती है और अन्त में इस शब्दब्रहम नामक परमतत्त्व को आत्मसात् कर लेती है। सहज समाधि दशा शब्द व सुरति के संयोग का ही परिणाम है। अनुभवी सिद्ध आ. अमृत वाग्भव जी के कथनानुसार नादयोग के अभ्यास से स्पष्ट मन्त्र सुनाई देते है। उसी को श्रुति कहते हैं। प्राचीन ऋषियों को भी इसी तरह से मन्त्रों की श्रुति प्राप्त हुई थी। श्रुति शब्द का ही अपभ्रंश सुरति है।
प्रसिद्ध सन्त दरिया साहब ने अपने ‘शबद’ नामक ग्रन्थ में विहंगम योग का जो वर्णन किया है, उससे ज्ञात होता है कि सुरति और निरति इन दोनों का समन्वय कर सकने पर ही योगसाधना सिद्ध होती है। ‘सुरति’ एक असाधारण दृष्टि है। इस दृष्टि के खुलने पर भाँति-भाँति के सुन्दर दृश्य और शब्दों का अनुभव होता है। ‘निरति’ से निर्विकल्पक ध्यान का बोध होता है। इसमें दृश्य का मान बिल्कुल ही नहीं रहता। निरतिहीन, अर्थात् निर्विकल्प ध्यान रहित शुद्ध सुरति जैसे सिद्धिलाभ के लिये उपयोगी नहीं होती, वैसे ही असाधारण दृष्टिरूप सुरति रहित शुद्ध निरति, अर्थात् निर्विकल्पक ध्यान भी उपयोगी नहीं होता। दोनों का सामंजस्य होने पर ही योगी इष्ट साधन में सफलता प्राप्त कर सकता है।
बौद्ध तन्त्र ग्रन्थों में सुरतयोग की व्याख्या इस प्रकार मिलती है – वज्रजाप के द्वारा ललना और रसना का शोधन वस्तुतः नाडी शुद्धि का ही नामान्तर है। सिद्धाचार्य लुइपाद कहते हैं कि चन्द्र शुद्ध होकर ‘आलि’ कहा जाता है। इस शोधन का फल धवन (या धमन) है। सूर्य शुद्ध होकर ‘कालि’ कहा जाता है। इसका फल चवन (या चमन) है। आलि और कालि का संयोग ही वज्रसत्व की अधिष्ठान भूमि है, विशुद्ध चन्द्र और सूर्य मिलकर जब ऐक्य लाभ करते हैं, तब उस अद्वैत भूमि वज्रसत्त्व का आविर्भाव होता है। यह संयोग आरब्ध होकर क्रमशः चलता रहता है एवं उसी अनुपात में शून्यता, अद्वयभाव, आनन्द या रति और नैरात्म्यबोध या बोधि गंभीर भाव से उपलब्ध होने लगते हैं। इस संयोग अथवा मिलन का पारिभाषिक नाम ‘सुरत’ अथवा श्रृंगार है एवं इसका फल रस की अभिव्यक्ति है (तान्त्रिक वाङमय में शाक्तदृष्टि, पृ. 279, तन्त्र और सन्त पृ. 264, भारतीय संस्कृति और साधना, भास्करी 2, पृ. 43, 259)।
Darshana : शाक्त दर्शन

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