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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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संसार वृक्ष

संसार एक ऐसा आदिवृक्ष है, जिसकी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार, ये आठ शाखायें हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार रस हैं। दश इन्द्रियाँ जिसके पत्ते हैं, जिस पर जीव और ईश्वर रूप दो पक्षी हैं, सुख और दुःख रूप दो फल हैं तथा देहवर्ती नव द्वार ही जिसके कोटर हैं।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

संस्कार

चित्त में कोई भी क्रिया होने पर उसके अनुरूप जो भाव चित्त में (विधारिणी शक्ति के द्वारा) सूक्ष्म रूप से रह जाता है, वह संस्कार कहलाता है। कर्म करते रहने पर उसमें जो दक्षता उत्पन्न होती है, वह इस संस्कार के कारण ही होती है। योगशास्त्र का मुख्य विषय चूंकि वृत्तिरोध है, अतः योगियों ने ज्ञानसंस्कार (वृत्तिजनित संस्कार) पर ही विशेषतया विचार किया है। संस्कार को चित्त का दर्शनवर्जित (साक्षात् जिसका ज्ञान संभव न हो) धर्म या अपरिदृष्ट धर्म माना गया है। यही कारण है कि संस्कार के कार्य को देखकर संस्कार की सत्ता का अनुमान किया जाता है।
संस्कार के विषय में योगशास्त्र में जो मुख्य-मुख्य बातें कही गई हैं, वे ये हैं – (1) वृत्ति से संस्कार और संस्कार से तदनुरूप वृत्ति का उद्भव त्रिगुण स्वभाव के कारण नियत रूप से तब तक सदैव चलता रहेगा, जब तक चित्त का निरोध न हो। (2) वृत्तिरोध होने मात्र से संस्काररोध नहीं होता, संस्काररोध के लिए पृथक् प्रयत्न करना पड़ता है। (3) योगशास्त्रोक्त कौशल से चित्त को वृत्तिहीन कर संस्कारयुक्त रूप से रखा जा सकता है। यह अवस्था संस्कारशेष-निरोध कहलाती है। (4) यद्यपि लौकिक व्यक्ति के लिए वृत्तियाँ ही साक्षात् ज्ञात होती हैं, संस्कार नहीं, पर योगी के लिए संस्कार भी साक्षात्कारयोग्य पदार्थ है; अपने संस्कारों का साक्षात्कार करके योगी अपने अतीत जन्मों को जान सकते हैं (योगसूत्र 3/18)। (5) संस्कारानुकूल वृत्तियों का उद्भव जितना बढ़ता जायेगा, संस्कार का बल भी उतना ही बढ़ता जायेगा। (6) पूर्वसंस्कार के अधीन होकर साधारण प्राणी को प्रायः सभी कर्म करने पड़ते हैं, इस वशीभूतता के कारण प्राणी को ऐसे अनेक कर्म करने पड़ते हैं, जिनसे दुःख की वृद्धि होती है, इसको संस्कारहेतुक दुःख कहा गया है।
वृत्ति और संस्कार दोनों चित्त के धर्म हैं। कैवल्य में दोनों की अत्यन्त निवृत्ति होती है। संस्कारों को दो भागों में बाँटा गया है – कर्माशय तथा वासना (द्र. कर्म, कर्माशय एवं वासना शब्द)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संस्कारदुःखता

सब कुछ दुःखप्रद है’, इस मत को सिद्ध करने के लिए जो युक्तियाँ योगसूत्र (2/15) में दी गई हैं, यह उनमें एक है। संस्कारदुःख = संस्कारहेतुक दुःख = सुख-दुःख-संस्कार-जनित दुःख। चूंकि संस्कार के कारण यह दुःख होता है, अतः यह संस्कारदुःख कहलाता है। युक्ति का स्वरूप यह है – सुख-दुःख के अनुभाव से उनके संस्कार होते हैं; इन संस्कारों से तदनुरूप स्मृतियाँ उठती हैं; इन स्मृतियों के द्वारा राग-द्वेष उद्बुद्ध होते हैं; उनसे पुनः तदनुरूप प्रवृतियाँ होती हैं। ये प्रवृत्तियाँ दुःख को उत्पन्न करती हैं; क्योंकि कर्म के विपाक से जो वासना होती है, वह जीव को दुःखकर कर्म में प्रवृत्त करती है। वस्तुतः ‘संस्कार-दुःख’ शब्द में संस्कार का मुख्य अर्थ ‘वासना’ है, कर्माशय नहीं – यह टीकाकारों ने स्पष्टतया दिखाया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सहजमाट

देखिए ‘माट’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

संहत्यकारित्व

यह वह युक्ति है जिसके बल पर व्यक्त-अव्यक्त से भिन्न अपरिणामी चिद्रूप पुरुष की सत्ता प्रमाणित की जाती है। जो पदार्थ संहत (अनेक अवयवों से निर्मित वस्तु जो अपने अवयवों द्वारा किसी प्रयोजन को निष्पन्न करती है) होता है, वह अन्य किसी के द्वारा प्रयोजित होता है – यह इस युक्ति का स्वरूप है। यह युक्ति सांख्यकारिका (17), सांख्यसूत्र (1/66), योगसूत्र (4/24), व्यासभाष्य (2/20) के अतिरिक्त शंकरादि आचार्यों के द्वारा भी प्रयुक्त हुई है। जिस प्रकार अनेक अवयवों द्वारा निर्मित शय्या ‘शयन करना’ रूप प्रयोजन को निष्पन्न करती है, जिस प्रयोजन का सम्बन्ध किसी अन्य वस्तु से है (अन्य कोई प्राणी ही उस पर सोता है, शय्या स्वयं नहीं सोती); उसी प्रकार महत्तत्त्व (जो अन्तिम व्यक्त पदार्थ है) संहत होने के कारण (त्रिगुण से निर्मित होना ही उसकी संहतता है) अपने से भिन्न किसी पदार्थ के प्रयोजन को निष्पन्न करता है, अर्थात् महत्तत्त्व स्वयं दुःखी या सुखी नहीं होता, पुरुष ही सुखी-दुःखी होता है – ऐसा पूर्वाचार्यों ने कहा है। त्रैगुणिक चित्त पुरुषरूपी स्वेतर पदार्थ के भोग-अपवर्ग रूप प्रयोजन को निष्पन्न करता है (योगसूत्र 4/24)।
व्याख्याकारों ने यह भी कहा है कि जो वस्तु जिस स्वेतर वस्तु के प्रयोजन को निष्पन्न करती है, वह वस्तु यदि संहत हो तो वह भी परार्थ होगी; अतः संहतपरार्थत्व-युक्ति से सिद्ध होने वाली ‘पर’ वस्तु अवश्य ही असंहत होगी। यही कारण है कि संहत पदार्थ (व्यक्त बुद्धि या अव्यक्त प्रकृति जो त्रिगुणात्मक होने के कारण संहत है) की परार्थता के कारण जो पुरुष रूप पदार्थ की सत्ता निश्चित होती है, वह असंहत वस्तु है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सहस्रार चक्र

आज्ञाचक्र के ऊपर महानाद की और इसके ऊपर शंखिनी नामक नाडी के शिखर भाग के शून्य स्थान में ब्रह्मरन्ध्र स्थित विसर्ग के नीचे सहस्रदल पद्म की स्थिति मानी जाती है। इस अधोवक्त्र सहास्रार पद्म के दल प्रातःकालीन सूर्य की किरणों के समान कमनीय कान्ति वाले हैं। इसमें अकारादि क्षकारान्त सभी वर्ण विराजमान हैं। सहस्रार पद्म में पचास-पचास दलों की पच्चीस आवृतियाँ होती हैं। प्रत्येक पचास दलों की आवृति में पचास वर्णों की स्थिति मानी जाती है। इस सहस्रार चक्र की कर्णिका में निष्कलंक चन्द्रमण्डल निरन्तर प्रकाशित रहता है। इस चन्द्रमण्डल के मध्य में त्रिकोण और त्रिकोण के मध्य में परबिन्दु की स्थिति मानी गई है। कुछ आचार्यों के मत से सहस्रार स्थित इस त्रिकोण के बाहर अ, क और थ के क्रम से सोलह-सोलह वर्णों की तथा त्रिकोण के भीतर ह, क्ष और ळ वर्णों की स्थिति रहती है। इस बिन्दु स्थान में ही हंसपीठ पर भगवान् परमशिव निवास करते हैं। परमशिव के नीचे परमहंस नामक अन्तरात्मा की स्थिति मानी गई है। इस सहस्रार कमल की कर्णिका में शैवों के अनुसार शिव, वैष्णवों के अनुसार विष्णु, शाक्तों के अनुसार शक्ति का निवास है। इस स्थान में अपने इष्टदेवता का साक्षात्कार कर लेने के उपरान्त साधक पुनः संसार के आवागमन के चक्र में कभी नहीं पड़ता और उसमें सृष्टि और संहार करने की भी सामर्थ्य आविर्भूत हो जाती है (श्रीतत्त्वचिन्तामणि, षट्चक्र-प्रकरण, पृ. 6)।
Darshana : शाक्त दर्शन

सहस्रांश

वीरशैव दर्शन में चिच्छक्‍ति से क्रियाशक्‍ति पर्यन्त षड्‍विध शक्‍तियों की उत्पत्‍ति को बताते समय चिच्छक्‍ति के सहस्रांश से पराशक्‍ति की, पराशक्‍ति के सहस्रांश से आदिशक्‍ति की, आदिशक्‍ति के सहस्रांश से इच्छाशक्‍ति की और इसी प्रकार ज्ञानशक्‍ति तथा क्रियाशक्‍ति की भी उत्पत्‍ति बताई गई है। यहाँ पर ‘सहस्रांश’ का अर्थ है हजारवाँ भाग, अर्थात् एक पूर्ण वस्तु में समान परिमाण के हजार भाग करने पर, उनमें एक भाग जितना परिमाण का होता है, उसे ‘सहस्रांश’ कहते हैं (वा.शु.तं. 1/24-26)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

संहार कृत्य

विश्व को अपने में विलीन कर लेने की पारमेश्वरी लीला। परमेश्वर की अपने विश्वोतीर्ण रूप में अपने विश्वमय रूप को एकरस कर देने की लीला। प्रमेय जगत् को उसके संवित् स्वरूप मूलरूप में समा लेने की लीला। अपने संवित् स्वरूप में अपने ही स्वातंत्र्य से अपने आनंद के लिए प्रतिबिंबतया अवभासित हो रहे संपूर्ण सूक्ष्म एवं स्थूल सृष्ट प्रपंच को पुनः अपने अपने कारणभूत तत्त्वों में विलीन करते हुए अंततोगत्वा सभी तत्त्वों को एकरूप बनाकर अपने शुद्ध संवित् स्वरूप में एकरस कर देने की परमेश्वर की इस लीला को संहार कृत्य कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संहारचक्र

संहारचक्र में ग्यारह कलाओं का कार्य देखने में आता है। जितने भाव आत्मस्वरूप से पृथक् होकर विक्षिप्त हैं, उनको फिर आत्मप्रकाश में वासनारूप से अवस्थापित करना ही ‘संहार’ शब्द का अर्थ है। ग्यारह संहार शक्तियाँ अन्तःकरण के समष्टिरूप अहंकार को तथा बाह्य दस इन्द्रियों को ग्रास करके स्फुरित होती हैं। यहाँ अहंकार ही प्रमाता, इन्द्रियाँ प्रमाण तथा इन्द्रियों के विषय रूप समस्त ग्राह्य वस्तुएँ प्रमेय हैं। जो कलाएँ इन प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय को भीतर ग्रास करके प्रकाशित होती हैं, वे ही आत्मरूपी भगवान् की संहारिणी शक्तियाँ हैं। इन्हीं ग्यारह शक्तियों के संबंध के कारण परमेश्वर एकादश रुद्र संज्ञा को प्राप्त करते हैं (महार्थमंजरी, पृ. 99-100)।
Darshana : शाक्त दर्शन

साक्षात् उपाय

प्रकाशात्मक स्वरूप तथा विमर्शात्मक स्वभाव की परिपूर्ण सामरस्यात्मक अपनी संवित् रूपता को आत्मसाक्षात्कार द्वारा साक्षात् पहचानने का एकमात्र उपाय बनने के कारण शांभव उपाय को साक्षात् उपाय कहा जाता है। यही उपाय जब परिपूर्णता को प्राप्त कर जाता है तो अनुपाय कहलाता है। (तन्त्रालोकविवेक1-142)। अन्य सभी उपाय इसी उपाय के द्वारा पूर्ण साक्षात्कार पदवी तक पहुँचा सकते हैं। इस कारण से वे परंपरा उपाय हैं और यह साक्षात् उपाय है। (देखिए शांभव उपाय)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

साक्षात्कार

किसी वस्तु का साक्षात् ज्ञान। इंद्रिय और विषय के परस्पर साक्षात् संबंध से जिस साक्षात्कार रूप ज्ञान का उदय होता है उसे इंद्रिय – संवेदन या निर्विकल्प संवेदन कहते हैं। मानस साक्षात्कार से सुख, दुःख, आश्चर्य, घृणा, स्नेह आदि का संवेदन होता है। ये प्रत्यक्ष साक्षात्कार हैं।
तुर्या दशा में प्राणी को अपने चिन्मय स्वरूप का स्वयमेव जो संवेदन होता है उसे अपरोक्ष साक्षात्कार कहते हैं। यह साक्षात्कार साक्षात् ही होता है। अतः इसे परोक्ष नहीं कह सकते। यह इंद्रियों से या मन से नहीं होता है। अतः इसे प्रत्यक्ष भी नहीं कहा जा सकता। इसीलिए इसे अपरोक्ष कहते हैं। आत्म साक्षात्कार जब भी होता है अपरोक्ष ही होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

साक्षी

सांख्य में पुरुष को साक्षी कहा गया है (सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य, सांख्यकारिका 19)। साक्षी उस प्रकाशक को कहते हैं जो किसी करण की सहायता के बिना ही अपने विषय को प्रकाशित करता है। बाह्य या आन्तर इन्द्रिय की सहायता से बुद्धि विषयप्रकाशन करती है, अतः बुद्धि विषय की साक्षी नहीं है। पुरुष के द्वारा वृत्तिरूप ज्ञान का जो प्रकाशन होता है, उसमें किसी करण की अपेक्षा नहीं है, अतः पुरुष वृत्तियों के साक्षी हैं। इसी दृष्टि से पुरुष को चित्तसाक्षी या बुद्धिसाक्षी माना जाता है क्योंकि पुरुष और बुद्धि या चित्त के बीच में अन्य कोई पदार्थ नहीं है – दोनों में अव्यवधान है। कई आचार्यों का मत है कि पुरुष बुद्धि के साक्षी हैं, अन्य करणों के द्रष्टा हैं। पुरुष का यह साक्षित्व उसके सदा वृत्ति-ज्ञातृत्व-स्वभाव एवं अपरिणामिता के कारण हैं – यह व्याख्याकारों का कहना है। ‘साक्षी’ शब्द गौण अर्थ में भी प्रयुक्त होता है (द्र. सांख्यसूत्र 1/161 की टीकाएँ)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सांख्य

पांरपरिक मान्यता के अनुसार कपिल के द्वारा उपदिष्ट शास्त्र का नाम। कपिल ने निर्माणचित्त का आश्रय लेकर जिज्ञासु आसुरि नामक ऋषि को आत्मा-अनात्मा सम्बन्धी जो दार्शनिक विश्लेषणात्मक ज्ञान दिया था, वही सांख्य नाम से प्रसिद्ध है। प्रतीत होता है कि ‘सांख्य’ नाम बाद में दिया गया है, क्योंकि कपिलोपदेश के प्रसंग में सांख्यकारिका में तथा पंचशिख के वाक्य में (1/25 व्यासभाष्य में उद्धृत) सांख्य शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ है (पंचशिख के वाक्य में ‘तन्त्र’ शब्द है, सांख्य नहीं)।
सांख्य के एकमात्र अवशिष्ट ग्रन्थ सांख्यकारिका को देखने से सांख्यविद्या का मूल स्वरूप तर्कप्रधान दिखाई देता है। वस्तुतः मोक्षविद्या या निर्गुणपुरुषविद्या के पदार्थों पर दार्शनिक दृष्टि से विचार करना – अलौकिक पदार्थों को लौकिक पुरुषों को युक्ति से समझाना – सांख्यदर्शन का मुख्य उद्देश्य है। किसी विषय पर सम्यक् रूप से विचार होने पर उसके अंश आदि का पूर्ण ज्ञान हो जाता है, अर्थात् किस पदार्थ की संख्या कितनी है, उसके भेद कितने हैं – इत्यादि विषय पूर्णतः निर्धारित हो जाते हैं। अतः गणनावाची संख्या शब्द से सांख्य शब्द को व्युत्पादित किया जाता है। कुछ आचार्यों का कहना है कि विवेकवाची संख्या शब्द से सांख्य शब्द निष्पन्न हुआ है। विश्व के सभी कार्य किन-किन कारणों से हुए हैं – सूक्ष्म कारणों से उन स्थूल कार्यों का भेद किस प्रकार का है – ऐसा विचार संख्या कहलाता है; ऐसे विचार की प्रधानता कपिलोपदेश में रहने के कारण कपिल-तन्त्र बाद में सांख्य नाम से प्रसिद्ध हुआ। गुण-दोष-निर्धारण भी संख्या पद से अभिहित होता है; इस दृष्टि से भी सांख्य शब्द को व्युत्पादित किया जा सकता है।
कपिल के प्रथम शिष्य आसुरि का कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। आसुरि के शिष्य पंचशिख ने ही सबसे पहले कपिल के उपदेश को सुव्यवस्थित रूप दिया तथा एक ग्रन्थ का प्रणयन किया जो षष्टितन्त्र नाम से प्रसिद्ध है। इसमें सभी सांख्यीय प्रमेयों को 60 भागों में बाँटकर विचार किया गया था, अतः षष्टि-तन्त्र नाम पड़ा – ऐसा स्पष्टतया प्रतीत होता है। पंचशिख के बाद वार्षगण्य, देवल आदि आचार्यों ने सांख्य पर जो ग्रन्थ लिखे, वे लुप्त हो चुके हैं। पुरागों में सांख्याचार्यों के मतों का पौराणिक रूप प्राप्त होता है जो मूल उपदेश की तरह शुद्ध नहीं है। अर्वाचीन काल में ईश्वरकृष्ण द्वारा रचित सांख्यकारिका या सांख्य-सप्तति ग्रन्थ में पूर्वाचार्यों के मतों का अत्यन्त संक्षिप्त सार मिलता है। प्रचलित सांख्यसूत्र किसी मूल ग्रन्थ का बदला हुआ रूप है, जिसके अनेक सूत्र अर्वाचीन काल के आचार्यों के हैं। तत्त्वसमास सूत्र भी प्राचीन प्रतीत नहीं होता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सादाख्य

परशिव जगत्-सृष्‍टि के लिए जब इच्छा करता है, तब वह स्वयं ‘शिवतत्व’ और ‘शक्‍तितत्व’ बन जाता है। ये दोनों मिलकर आगे उत्पन्‍न होने वाली चित् और अचित् सृष्‍टि के कारण बनते हैं। इन दोनों में से ‘शक्‍ति’ जब अपने ज्ञानांश से ‘इदन्ता’ का प्रथम स्फुरण करती है तब उसको ‘सदाशिव-तत्व’ कहते हैं। उसी सदाशिवतत्व को ‘सादाख्य’ शब्द से संबोधित किया गया है। (शि. मं. पृष्‍ठ 35)। यह सादाख्य सकल (साकार) कहलाता है। सादाख्य का जो सकल स्वरूप है उसका अनुभव सामान्य जनों को नहीं होता, किंतु योगी, ज्ञानी और मंत्रोपासना करने वाले उच्‍चकोटि के साधकों को पूजा, ध्यान आदि के निमित्‍त पर शिव अपनी शक्‍ति के सादाख्य का स्फुरण करता है (वा.शु.तं. 1/28-29; सू.आ. क्रियापद 1/23)।

इसी के माध्यम से साधक शुद्‍ध निष्कल परशिव में समरस होता है। यह ‘शिव-सादाख्य’, ‘अमूर्त सादाख्य’, ‘मूर्त सादाख्य’, ‘कर्तृसादाख्य’ और ‘कर्मसादाख्य’ के नाम से पाँच प्रकार का होता है। (वा.शु.तं. 1-30, 31)। इन पाँच सादाख्यों के पाँच पर्याय नाम हैं, जैसे शिव-सादाख्य का ‘सदाशिव’, अमूर्त सादाख्य का ‘ईश’, मूर्त सादाख्य का ‘ब्रह्मा’, कर्तृ-सादाख्य का ‘ईश्‍वर’ और कर्म सादाख्य का ‘ईशान’ (वा.शु.तं. 1/33-34; सू.आ. क्रियापद 1/24-26)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

क. शिव-सादाख्य
परशिव की जो पराशक्‍ति है, उसको ‘शान्तयतीत कला’ भी कहते हैं। उस पराशक्‍ति के दशमांश से शिवसादाख्य का प्रादुर्भाव होता है। पराशक्‍ति से उत्पन्‍न होने के कारण यह शुद्‍ध है। आकाश में स्फुरित विद्‍युत् के समान यह सर्वतोमुख और सूक्ष्म-ज्योतिस्वरूप है। यह विद्‍युत् वर्ण का है। सभी तत्वों के आलयभूत सदाशिव को ‘शिव-सादाख्य’ कहा गया है। (वा.शु.तं. 1/44-47; सू.आ.क्रियापाद 1/33)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

ख. अमूर्त सादाख्य
शांति-कला की पर्यायवाचक जो ‘आदिशक्‍ति’ है, उस आदिशक्‍ति के दशमांश से अमूर्त-सादाख्य का प्रादुर्भाव होता है। आदिशक्‍ति अमूर्त होने के कारण उससे उत्पन्‍न यह सादाख्य भी अमूर्त कहलाता है। कोटि सूर्य प्रकाश के समान इसका दिव्य तेज है और इसकी आकृति ज्योति के स्तंभ के समान है। प्रपंच की उत्पत्‍ति और विलय का स्थान होने के कारण इसको ‘मूलस्तंभ’ और ‘दिव्यलिंग’ भी कहा जाता है। इन लक्षणों से युक्‍त ‘ईश’ को ही ‘अमूर्त सादाख्य’ कहा गया है। (वा.शु.तं. 1/48-52; सू.आ.क्रियापाद. 1-34-35)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

ग. मूर्त सादाख्य
इच्छाशक्‍ति के, जो कि ‘विद्‍याकला’ भी कहलाती है, दशमांश से मूर्त-सादाख्य की सृष्‍टि होती है। इच्छाशक्‍ति के मूर्तस्वरूप वाली (सूक्ष्म साकार) होने से उससे उत्पन्‍न यह सादाख्य मूर्त कहलाता है। अग्‍नि की ज्वाला के समान इसकी आकृति होती है। इसके ऊर्ध्व भाग में एक मनोहर वक्‍त्र है, जिसमें तीन नेत्र विराजमान हैं। यह सभी अवयवों से संयुक्‍त है। इसकी चार भुजाएँ हैं। ये चारों हाथ कृष्ण-हरिण, परशु, वरद-मुद्रा और अभय-मुद्राओं से सुशोभित हैं। इस प्रकार सभी सुलक्षमों से संयुक्‍त ‘ब्रह्मा’ को मूर्त सादाख्य कहा जाता है (वा.शु.तं. 1/53-57; सू.आ. क्रियापाद 1/36-37)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

घ. कर्तृ-सादाख्य
प्रतिष्‍ठाकला की पर्यायवाचक जो ज्ञानशक्‍ति है, उसमें दशमांश से ‘कर्तृ-सादाख्य’ की उत्पत्‍ति होती है। ज्ञान शुद्‍धस्वरूप है, अतः उससे उत्पन्‍न यह कर्तृ-सादाख्य भी शुद्‍ध स्फटिक की प्रभा के समान प्रतीत होता है। यह भी साकार है। इसके चार शिर, चार मुख, बारह नेत्र, आठ कान, दो चरण और आठ हाथ हैं। इन आठ हाथों में से दाहिने चार हाथों में क्रमशः त्रिशूल, परशु, खड्‍ग और अभय-मुद्राएँ हैं। उसी प्रकार बाएँ चार हाथों में क्रमशः पाश, नाग, घंटा और वरद-मुद्राएँ हैं। इस प्रकार सभी अवयवों से युक्‍त, सर्व आभूषणों से अलंकृत जो ‘ईश्‍वर’ है, उसी को कर्तृ-सादाख्य कहते हैं (वा.शु.तु. 1/58-64; सू.आ. क्रियापाद 1/38-42)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

ड. कर्म-सादाख्य
क्रियाशक्‍ति के, जो कि निवृत्‍तिकला भी कहलाती है, दशमांश से कर्म-सादाख्य का उदय होता है। क्रिया को ही कर्म कहते हैं, अतः क्रियाशक्‍ति से उत्पन्‍न इस सादाख्य को कर्म-सादाख्य कहा गया है। सृष्‍टि और संहार का निमित्‍त कर्म ही होता है, अतः इन कर्मों के स्वामी को कर्म-सादाख्य कहते हैं। इसका स्वरूप इस प्रकार वर्णित है- इस सादाख्य के पाँच शिर, पाँच मुख हैं। प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र विराजमान हैं। इसकी दश भुजाएँ और दो पाद हैं, जो कि दोनों कमलों पर विराजित हैं। इसके दाहिने पाँच हाथों में क्रमशः त्रिशूल, परशु, खड्ग अभय मुद्रा और वज्रायुध हैं। बाएँ पाँच हाथों में क्रमशः नाग, पाश, अङ्कुश, घंटा तथा अग्‍नि हैं। इस सादाख्य के दस हाथों के दस प्रकार के चिह्न उसके दशविध उत्कृष्‍ट गुणों का या शक्‍तियों का द्‍योतन करते हैं, जैसे त्रिशूल से सत्व आदि त्रिगुणों का, परशु से शक्‍ति का, खड्‍ग से प्रताप का, वज्रायुध से दुर्भेद्‍य सामर्थ्य का तथा अभय-मुद्रा से अनुग्रह-शक्‍ति का द्‍योतन होता है। इसी प्रकार वाम भाग के हाथों में रहने वाले नाग से विधि अर्थात् आज्ञा शक्‍ति का, पाश से मायाशक्‍ति का, अङ्कुश से विवरण अर्थात् आवरणरहितत्व का (शिव के अपने स्वरूप का आवरण नहीं रहता है), घंटा से नादशक्‍ति का एवं अग्‍नि से संहार-सामर्थ्य का द्‍योतन होता है। इन दस प्रकार के उत्कृष्‍ट गुणों से युक्‍त तथा दिव्य गंध, दिव्यमाला, दिव्य वस्‍त्रों से अलंकृत जटा-मुकुट धारी, शांतस्वरूप के और मंद मुस्कान वाले ‘ईशान’ को ही कर्म-सादाख्य कहते हैं (वा.शु.तं. 1/65-107; सू.आ. क्रियापद 1/43-51)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादारण्य तत्त्व

छत्तीस तत्त्वों के क्रम में तीसरा तत्त्व। इस तत्व से पूर्व शिव और शक्ति तत्वों में किसी भी प्रकार के भेद का अंश प्रकट ही नहीं होता है। इसी तीसरे तत्त्व में आकर आगे होने वाली समस्त शुद्ध सृष्टि तथा अशुद्ध सृष्टि की सत्ता का धीमा सा आभास उभरने लगता है। सृष्टि क्रम में इसी तत्व को पहला तत्व माना जाता है। इसी तत्त्व के आगे ‘सत्’ ऐसा कहना (आख्या) संभव है, क्योंकि इससे ऊपर सत् असत् जैसे आपेक्षिक भावों के आभास के लिए कोई अवसर ही नहीं। इसी कारण सदाशिव तत्व को सादारण्य तत्त्व कहा जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2 पृ. 191)। देखिए सदाशिव तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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