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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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समानाभिहार

जिन हेतुओं से वस्तु के विद्यमान रहने पर भी उसकी उपलब्धि नहीं होती, समानाभिहार उनमें एक है (द्र. सांख्यकारिका 7)। इसका अर्थ है – समगुण, सदृश या समानजातीय पदार्थ के साथ मिल जाना। उदाहरणार्थ, मेघ से गिरे जल -बिन्दु जलाशय में गिरने पर पृथक् रूप से नहीं दीखते। जलाशय-स्थित जल एवं मेघजात जल की सजातीयता ही इस अनुपलब्धि का हेतु है। यह समानाभिहार ‘अर्थान्तर’ नामक दोष (= उपलब्धि-व्याघातकारी तत्त्व) में आता है (जयमङ्गलाटीका, सां. का. 7)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समापत्ति

योगसूत्र (1/41) में समापत्ति और उसके भेदों (1/42 -44) का स्पष्ट विवरण उपलब्ध होता है। सूत्रकार का कहना है कि अभीष्ट यानी ध्येय विषय में (जैसा कि आगे कहा जायेगा) सर्वविक्षेपशून्य एकाग्रभूमिस्थित चित्त की जो तत्स्थता (ध्येयसंलग्नता) एवं तदजनता (ध्येय का आकार ग्रहण कर लेना) होती है, वह समापत्ति है। इस अवस्था में ध्येयमात्र ही निर्भासित होता है – ध्येयसम्बन्धी कोई काल्पनिक ज्ञान नहीं रहता।
संप्रज्ञातसमाधि (1/17 योगसूत्रोक्त) और समापत्ति एक ही पदार्थ है – ऐसा कई व्याख्याकार कहते हैं। अन्यों का कहना है कि संप्रज्ञातसमाधि से उत्पन्न प्रज्ञा का नाम समापत्ति है। संप्रज्ञातसमाधि का लक्षण बताने वाले सूत्र में उन आलम्बनों का उल्लेख है जिनका आश्रय कर समापत्ति होती है। यह मत ही संगत प्रतीत होता है। समापत्ति प्रत्यक्षवृत्ति है – कुछ व्याख्याकारों ने स्पष्टतः ऐसा कहा है। यह समापत्ति संप्रज्ञातसमाधि में ही होती है – अन्य प्रकार की समाधियों में नहीं।
ध्येय विषय के अनुसार ज्ञान में भेद होता है। अतः समापत्ति के तीन भेद किए गए हैं, क्योंकि सभी ध्येयविषय, ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीता – इन तीन भेदों में विभक्त होते हैं। इस प्रकार ग्राह्यविषयक, ग्रहणविषयक एवं ग्रहीता-विषयक समापत्तियाँ होती हैं। (ग्राह्य=भौतिक, भूत एवं भौतिक; ग्रहण = बाह्य एवं आभ्यन्तर इन्द्रिय; ग्रहीता=अहंबोध रूप बुद्धितत्त्व तथा अहंकार)। इस समापत्ति के सवितर्का, निर्वितर्का, सविचारा एवं निर्विचारा भेद हैं; द्र. सविर्तका आदि शब्द। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि बौद्धशास्त्र में भी समापत्तियों की चर्चा है, पर वह योग से कुछ भिन्न है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समावेश

काश्मीर शैव दर्शन के साधना क्रम में पर तत्त्व के साथ एकीभाव हो जाने की अवस्था को समावेश कहते हैं। इस अवस्था में साधक अपनी जीवरूपता को भुलाकर अपनी शुद्ध असीम एवं परिपूर्ण संवित्स्वरूपता में प्रवेश करता है। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा 3-2-12)। त्रिक आचार में भिन्न भिन्न साधनाओं में समावेश की ही प्रधानता रहती है, तथा समावेश की अवस्था में समाविष्ट होना ही उनका लक्ष्य भी होता है। समावेश की अवस्था में स्थिति प्राप्त कर लेने पर साधक जीवन्मुक्त हो जाता है तथा इसके पुनः पुनः अभ्यास से इसी जन्म में उसे अपनी परमेश्वरता का भी अनुभव हो जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2, पृ. 232)।
– (आणव)
आणव उपाय के अभ्यास से होने वाला शिवभाव का समावेश (देखिए आणव समावेश)।
– (तुर्य)
समावेश की वह अवस्था जिसमें देहादि के अभिमान का सूक्ष्मतर रूप से कोई न कोई अंश विद्यमान तो रहता है, परंतु सभी देह आदि जड़ पदार्थ भी संविद्रूपता से ओतप्रोत हो जाते हैं। इस अवस्था में स्थिति होने पर भी साधक जीवन्मुक्त हो जाता है (भ. 2, पृ. 258; ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2, पृ. 231)।
– तुर्यातीत
समावेश की वह अवस्था जिसमें देहाभिमान किसी भी अंश में विद्यमान नहीं रहता है। यह भी जीवन्मुक्त की अवस्था होती है। (वही)।
– (शाक्त)
शाक्त-उपाय से होने वाला शिवभाव का समावेश। देखिए शाक्त समावेश
– शांभव
शांभव-उपाय से होने वाला शिवभाव का समावेश। देखिए शांभव समावेश।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समावेश

समावेश, समापत्ति, समाधि – ये सब शब्द पर्यायवाची हैं। समाधि के अर्थ में समापत्ति शब्द का प्रयोग बौद्ध साहित्य में भी मिलता है। समावेश दशा में व्यक्ति अपने बाह्य स्वरूप को भूल जाता है और अपने इष्टदेव के स्वरूप में समाविष्ट (लीन) हो जाता है। समावेश का लक्षण और उसके भेदों का, विशेष कर शाम्भव, शाक्त और आणव समावेशों का, निरूपण तन्त्रालोक के प्रथम आह्निक (पृ. 205-255) में विस्तार से मिलता है। आणव, शाक्त और शाम्भव नामक उपायों का सहारा लेकर साधक आणव, शाक्त और शाम्भव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। भगवद्गीता (9/23 तथा 12/3-5) में बताया गया है कि अन्य देवताओं की उपासना करने से और अक्षर ब्रह्म की उपासना करने से भी भगवत्पद की ही प्राप्ति होती है, किन्तु अन्य उपायों के अनुष्ठान में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी तरह से आणव प्रभृति विभिन्न उपायों का सहारा लेने पर भी साधक को एक ही परम पद की प्राप्ति होती है। फल की प्राप्ति में कोई भेद नहीं रहता। उपायों के अनुष्ठान में ही तरतमभाव रहता है।
उपायों की भिन्नता में शक्तिपात के तीव्र, मध्य, मन्द आदि भेदों को ही कारण माना गया है। ऐसा कहा जा सकता है कि मन्द शक्तिपात होने पर आणव उपाय का, मध्य शक्तिपात में शाक्त उपाय का और तीव्र शक्तिपात में शाम्भव उपाय का सहारा लेने में साधक समर्थ होता है। इन सबका प्रयोजन स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना है। अनुपाय प्रक्रिया से भी वही स्वात्मस्वरूप प्रकाशित होता है और आणव उपाय से भी। इस प्रकार आलम्बन का भेद होने पर भी समावेश दशा में कोई भेद नहीं रहता। आणव समावेश, शाक्त समावेश और शाम्भव समावेश दशा एक ही है। उपायों के भेद के कारण समावेश दशा में भेद आरोपित कर लिया जाता है। इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए अभिवनगुप्त ने तन्त्रसार (पृ. 43) में कहा है – “नैषां परफलविधौ कापि हि भिदा”।
Darshana : शाक्त दर्शन

समीप

सान्‍निध्य।

पाशुपत साधक का चित्त जब विषयों के प्रति काफी इच्छुक होते हुए भी रूद्रतत्व में ही लगा रहे अर्थात् चित्‍तवृत्‍तियों का सतत प्रवाह रूद्र तत्व से विचलित न होने पाए, वह अवस्था समीप कहलाती है। इस तरह से समीप योगधारण की एक स्थिर ध्यानमयी साधना के अभ्यास का नाम है। इस अभ्यास से चित्‍त शुद्‍ध हो जाता है और साधक रूद्र सामीप्य और रूद्र सायुज्य के प्रति आगे बढ़ता जाता है। (ग.का.टी.पृ.15)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

समुच्छलन

परमेश्वर के परिपूर्ण आनंद के उन्मेष की दशा। शुद्ध एवं परिपूर्ण परमशिव में जब स्वातंत्र्य के विलास से अपने ही आनंदात्मक स्वरूप एवं स्वभाव को अपने अभिमुख करते हुए देखने की अतिसूक्ष्म सी उमंग उठती है तो उसे ही समुच्छलन कहते हैं। इसे स्पंद, स्फूर्ति, घूर्णि आदि भी कहा जाता है। इसी समुच्छलन के प्रभाव के कारण शिव से लेकर पृथ्वी पर्यंत समस्त सृष्टि की अभिव्यक्ति होती है। (स्वा.द. 2-9, 10)। यह परिपूर्ण आनंद रस की छलकन जैसी वह दिव्यातिदिव्य पारमेश्वरी क्रिया है जो परमेश्वर की परमेश्वरता को स्फुटतया अभिव्यक्त करती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समुत्क्रमण दीक्षा

देखिए प्राणोत्क्रमण दीक्षा।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सम्पराय

परलोक सम्पराय है। अथवा सम्=सम्यक, पर=पुरुषोत्तम, अय=ज्ञान। अर्थात् जिससे पर पुरुषोत्तम सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो, वह भक्ति मार्ग सम्पराय है (अ.भा.पृ. 1060)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सम्पातलय

कर्म का लय सम्पातलय है अथवा कर्माशय का लय सम्पातलय है। कर्म को या कर्माशय को सम्पात कहा गया है, क्योंकि वह पात का, बंधन का विशिष्ट कारण है। इस प्रकार बंधकारणीभूत कर्म की या कर्माशय की निवृत्ति ही सम्पातलय है (अ.भा. 841, 1308)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सम्प्रयोग

योगशास्त्र में ‘संप्रयोग’ शब्द दो प्रसंगों में मुख्यतया प्रयुक्त होता है – (1) इष्टदेवतासंप्रयोग (द्र. योगसूत्र 2/44) तथा (2) विषयसंप्रयोग। प्रथम प्रसंग में संप्रयोग का अर्थ है – दर्शन करना अर्थात् इष्टदेवता का दर्शन करना एवं उनसे मन्त्रादि की प्राप्ति करना। विषयसंप्रयोग (द्र. व्यासभाष्य 1/15, 1/30 आदि) का अर्थ है – विषयप्राप्ति या विषय का सन्निकर्ष। विषयसंप्रयोगजन्य जो गर्ध (=अभिलाषा) है वह अविरति नामक अन्तराय है, यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सम्बोध

किसी विषय का साक्षात्कार संबोध कहलाता है। योगसूत्रोक्त 2/39 में ‘जन्मकथन्तासंबोध’ शब्द में इसका इसी अर्थ में प्रयोग है। सम्यग्ज्ञान के अर्थ में भी यह शब्द योगग्रन्थों में प्रयुक्त होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संयद्वाम

आनन्दात्मक सभी कर्मफलों का एकमात्र उपजीव्य (स्रोत) संयद्वाम है। अथवा सभी सुखों का घनीभूत जो अपवर्ग रूप फल है, उसका प्रदाता ब्रह्म संयद्वाम है। संयद्=प्रदाता, वाम=सुख, यह व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है (अ.भा.पृ. 318)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

संयम

धारणा, ध्यान एवं समाधि का एक ही विषय में प्रयोग करना (विभूतिविशेष को उत्पन्न करने की दृष्टि से) संयम कहलाता है (योगसूत्र 3/4)। सभी सिद्धियाँ इस संयम के अधीन हैं, अर्थात् अभीष्ट विषय में संयम करने पर ही विषयानुसारी सिद्धि प्राप्त होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संयमजय

संयम’ योगशास्त्र का एक पारिभाषिक शब्द है। यह तान्त्रिकी संज्ञा (अर्थात् स्वशास्त्रमात्र प्रयुक्त) है – ऐसा माना जाता है। धारणा, ध्यान और समाधि, इन तीनों का एक ही विषय में प्रयोग करना संयम कहलाता है। यद्यपि ध्यान धारणा का ही विकसित रूप है तथा समाधि ध्यान का ही विकसित रूप है, तथापि तीनों का ही उल्लेख करना साभिप्राय है, क्योंकि संयमाभ्यास में धारणादि तीनों की ही अपेक्षा रहती है – ऐसा योगविदों ने कहा है (द्र. स्वामी हरिहरानन्द आरण्य कृत – हिन्दी योगदर्शन (3/4)। पतंजलि ने कहा है कि ‘संयम जय’ से प्रज्ञालोक होता है (3/5)। संयम का स्थैर्य ही संयम जप है। योगशास्त्रोक्त सिद्धियाँ संयम की अधीन हैं, अर्थात् एक-एक प्रकार के संयम से एक-एक प्रकार की सिद्धि होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संरम्भ

स्पंद, स्पंदमानता। (भास्करी 1 पृ. 73, 74)। उद्यन्तृता। (भास्करी 1, पृ. 251)। स्वात्मोच्छलत्ता अर्थात् अपने में ही अपने ही स्वभावभूत आनंदस्वरूप का उच्छलन। इसी उच्छलत्तात्मक स्वभाव को पर दशावाली क्रिया कहते हैं। परमशिव शक्तिपंचक का पूर्ण सामरस्यात्मक स्वरूप है। इस शक्तिपंचक में चित् और निर्वृति अर्थात् आनंद ही प्रधान हैं जिन्हें क्रमशः प्रकाश और विमर्श भी कहा जाता है। विमर्शरूपता ही परमशिव की आनंदस्वरूपता है। अपने इसी स्वभाव के कारण जब वह आनंदातिरेक से विभोर हो जाता है तो अपने बाह्य रूप में प्रकट होने की लिए उद्यत हो उठता है। अपनी अंतः शक्तियों को बाहर छलकाने लगता है। उसकी इसी स्वात्मोच्छलत्ता को संरम्भ कहते हैं। (शिव दृष्टि पृ. 7)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सर्ग (सृष्टि)

सांख्य में त्रिविध सर्ग माना गया है – तत्त्व, भूत और भाव। तत्त्वों की सृष्टि (उपादान कारण से कार्य का व्यक्त होना) का अर्थ है – पुरुष और प्रकृति के अतिरिक्त अन्यान्य 23 तत्त्वों का अपने-अपने उपादान-कारण से व्यक्त होना, जैसे प्रकृति से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार के सात्त्विक भाग से 11 इन्द्रियाँ तथा तामस भाग से पाँच तन्मात्र; तन्मात्रों से पाँच भूत।
भूतसर्ग का अभिप्राय है – विभिन्न प्रकार के जीवन का आविर्भाव। सांख्यकारिका में जीवों को 14 श्रेणियों में बाँटा गया है (53)। शरीर-धारी जीवों का आविर्भाव विभिन्न लोकों में होता है और लोकों की सृष्टि ही भूतसर्ग का अर्थ है (जीव के अन्तर्गत पुरुषतत्त्व असृष्ट पदार्थ है – जीव के शरीरादि ही सृष्ट होते हैं, जीवगत इन्द्रिय-मन-अहंकार-बुद्धितत्त्व तत्त्व-सर्ग में गिने जाते हैं। सृष्टिकर्त्ता के सृष्टिसंकल्पयुक्त तामस अन्तःकरण से तन्मात्र व्यक्त होते हैं, जिनसे क्रमशः भौतिक ब्रह्माण्ड बनता है। ब्रह्माण्ड में सत्यादि लोक क्रमशः अभिव्यक्त होते हैं। सभी लोक (सूक्ष्म होने पर भी) भूतनिर्मित हैं – अतः भौतिक हैं। भावसृष्टि का अभिप्राय है – आठ भावों की सृष्टि (द्र. भाव)।
तात्त्विक दृष्टि से संपूर्ण सृष्ट पदार्थों के दो ही कारण हैं – पुरुषरूप अपरिणामी वस्तु मूल निमित्त कारण है तथा त्रिगुण प्रकृति रूप परिणामी वस्तु मूल उपादान है। सभी सोपाधिक पुरुष (मनुष्य, कीट, देव, प्रजापति, ईश्वर आदि सभी) प्रकृति-पुरुष के संहत रूप है। तत्त्वतः ऐसा होने पर भी व्यवहारतः नानाविध संहत पुरुषों का कर्तृत्व (विभिन्न प्रकार की सृष्टियों में) माना जाता है, जैसे ब्रह्माण्ड की सृष्टि में हिरण्यगर्भ-रूप सोपाधिक पुरुष का कर्तृत्व। यह सोपाधिक पुरुष भी तत्त्वतः त्रिगुण एवं पुरुष (तत्त्व) का समाहारभूत पदार्थ है – यह सांख्यीय दृष्टि है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सर्व

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत दर्शन के अनुसार ईश्‍वर स्वयमेव ही सभी भूतों में स्थित है क्योंकि समस्त सृष्‍टि उसकी स्वतंत्र इच्छाशक्‍ति की क्रीड़ा है। अतः उसे ‘सर्व’ कहा गया है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.90)। ईश्‍वर को सर्व कहने का तात्पर्य है कि वही सब कुछ है। जो कुछ भी दीखता है वह सब वस्तुतः परमेश्‍वर ही है, क्योंकि परमेश्‍वर की परमसत्‍ता के भीतर ही विश्‍व की सत्‍ता होती है। विश्‍व स्वयं अपने बल से कुछ भी नहीं है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सर्व-वू-शून्यवागि

देखिए ‘सर्व-शून्य-निरालंब-स्थल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सर्व-शून्य-निरालंब-स्थल

देखिए ‘शून्य’ शब्द के अंतर्गत ‘सर्व-शून्य-निरालंब’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सर्वज्ञता

पाशुपत साधक की एक शक्‍ति।

पाशुपत योग के अनुसार सिद्‍ध साधक की सर्वज्ञत्व शक्‍ति जागृत हो जाती है। विज्ञानशक्‍ति के जागृत होने पर सिद्‍ध साधक वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप को जानता है तथा सर्वज्ञत्व शक्‍ति के जागृत होने पर वह समस्त वस्तुओं (चाहे वे जगत के किसी भी कोने में हों) के स्वरूप को जान लेता है। अतः इस सिद्‍धि को प्राप्‍त कर लेने पर सिद्‍ध साधक को समस्त कार्य का ज्ञान हो जाता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.43)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

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