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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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सद्विद्या

देखिए विद्या (शुद्ध)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संनिपात

लौकिक समस्त व्यवहार संनिपात है। अर्थात् “तू, मैं” इत्यादि बुद्धि तथा मन इन्द्रिय आदि पर आश्रित समस्त व्यवहार संनिपात है (अ.भा.पृ. 137)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सन्

मुक्‍त जीव का एख लक्षण।

पाशुपत दर्शन के अनुसार मुक्‍त जीव निश्‍चल स्थिति में रहता है अर्थात् साधक समस्त आंतरिक व बाह्य, सूक्ष्म व स्थूल क्रियाओं से विरत होकर तथा चित्‍त को रूद्र में लगाकर अचल तथा स्थिर स्थिति को धारण करता है। उसी स्थिर स्थिति को सन् (निष्क्रिय) कहा गया है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 138)।

इस स्थिति पर पहुँचकर साधक को कोई योगाभ्यास भी नहीं करना होता है अतः उसे निष्‍क्रिय कहा गया है। (ग.का.टी.पृ. 16)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सन्तोष

पंचविध नियमों में सन्तोष एक है (योगसू. 2/32)। संतोष का स्वरूप भाष्य में इस प्रकार कहा गया है – ‘सन्निहित साधन से अधिक वस्तु ग्रहण करने की इच्छा का न होना’। सन्निहित साधन से जितना अर्थ सिद्ध होता है, उसके पूर्ण तृप्तिकारक न होने पर भी मन को क्षुब्ध न करना – प्राप्त वस्तु में ‘यह पर्याप्त है’ ऐसा बोध रखना – सन्तोष है। योगाभ्यासी की दृष्टि में ‘अधिक वस्तु ग्रहण करने की अनिच्छा’ का तात्पर्य है – शरीर को धारण मात्र करने के लिए आवश्यक वस्तु से अधिक वस्तु का ग्रहण न करना (जैसा कि मनु ने संन्यासप्रकरण में कहा है – प्राणयात्रिकमात्रः स्यात्, 6/57)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सप्त तत्त्व धारणा

तत्तव भेदन नामक योग की एक धारणा। छः तत्त्वों को साधना का आलंबन बनाते हुए उन्हें अपने शुद्ध संवित् स्वरूप सातवें तत्त्व में विलीन करने में सहायक बनने वाली आणवोपाय की तत्त्वाध्वा नामक धारणा। इस धारणा में अकल, मंत्रमहेश्वर तथा मंत्रेश्वर नामक तीन प्रमातृ तत्त्वों को उनकी तीन शक्तियों सहित साधना का आलंबन बने हुए मंत्र प्रमाता के स्वरूप में ही एकरूपता से देखते हुए इस समस्त प्रपंच को अपनी शुद्ध संवित्स्वरूपता का ही विस्तार समझना होता है और क्रम से उन्हें अपने इस शुद्ध स्वरूप में विलीन करना होता है। इस अभ्यास की परिपक्वता पर साधक को अपनी शिवस्वरूपता का समावेश हो जाता है। इस धारणा को सप्तमी विद्या भी कहते हैं (तं. आ 10-111 से 113, 125, 126)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सप्‍ताचार

क्रियाचार, ज्ञानाचार भावाचार, सत्याचार, नित्याचार, धर्माचार और सर्वाचार इन सात प्रकार के आचारों को ‘सप्‍ताचार’ कहा गया है। ये सात आचार अंतरंग की शुद्‍धि के साधन माने जाते हैं। वीरशैव संत-साहित्य में इनका विवरण इस प्रकार है –

क. क्रियाचार
जैसे क्षुधा, तृष्णा आदि शरीर के स्वाभाविक धर्म होते हैं, उसी प्रकार वीरशैव धर्म में प्रतिपादित स्‍नान, भस्मधारण, अष्‍टविध एवं षोडशविध उपचारों से गुरु, लिंग और जंगम की पूजा आदि करना यदि साधक का स्वभाव बन जाता है, तो उसे ‘क्रियाचार’ कहते हैं।

ख. ज्ञानाचार
शिवभक्‍तों एवं शिवज्ञानियों में अनन्य श्रद्‍धा रखकर उनकी वाणी (वचनशास्‍त्र) का अध्ययन, उन शिवभक्‍तों के द्‍वारा अनुभूत “मैं शिवस्वरूप हूँ” इस शिवानुभव को प्राप्‍त कर लेना ही ‘ज्ञानाचार’ कहलाता है।

ग. भावाचार
अज्ञानावस्था के काम, क्रोध आदि दुर्गुणों के स्वरूप को समझ के, उन्हें त्यागकर सदा सद्‌गुणों से मुक्‍त होने से साधक के अंतःकरण में जिस परिशुद्‍ध भावना का उदय होता है, उसे ‘भावाचार’ कहा गया है।

घ. सत्याचार
लेने-देन व्यवहार में आशा आदि से युक्‍त होकर कदापि असत्य न बोलना, दूसरों को देने वाले सदुपदेशों का स्वयं आचरण करना तथा स्वयं किए हुए वायदे का प्राणसंकट होने पर भी परिपालन करना ‘सत्याचार’ कहलाता है।

ड. नित्याचार
हठयोग से प्राप्‍त होने वाली अणिमा, महिमा आदि सिद्‍धियों की अभीप्सा न करके सहजरूप से प्राप्‍त उपयोग्य वस्तुओं को शिवप्रसाद समझकर उसी से सन्तृप्‍त होना ही ‘नित्याचार’ है।

च. धर्माचार
शिव की अर्चना से प्राप्‍त ‘पादोदक’ (चरणामृत) तथा ‘प्रसाद’ के अतिरिक्‍त ऐहिक एवं पारलौकिक किसी प्रकार के फल की अपेक्षा न करना ही ‘धर्माचार’ कहलाता है।

छ. सर्वाचार
उपर्युक्‍त सभी आचारों का पालन करते हुए, भक्‍त, महेश्‍वर, प्रसादी, प्राणलिंगी, शरण तथा ऐक्य इन छः साधनाजन्य अवस्थाओं को प्राप्‍त करके लिंगांग-सामरस्य-रूप मोक्ष को प्राप्‍त करना ही ‘सर्वाचार’ है। (च.ब.व. 1410; पं.प्र.पृष्‍ठ 58-60; व.वी.व. पृष्‍ठ 275-276)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

संप्रज्ञातसमाधि

अभ्यास और वैराग्यपूर्वक वृत्तिनिरोध का अभ्यास करते रहने पर जब कुछ काल पर्यन्त अनभीष्टवृत्ति को निरुद्ध करने की शक्ति उत्पन्न होती है, तब चित्त में योगशास्त्रोक्त उपायविशेष की सहायता से जो समाधि आविर्भूत होती है, वह संप्रज्ञातसमाधि कहलाती है। चूंकि यह समाधि एकाग्रभूमि चित्त में होती है, अतः यह ‘योग’ पद से अभिहित होती है (क्षिप्त-मूढ-विक्षिप्त-भूमि में उत्पन्न समाधि ‘योग’ पद से अभिहित नहीं होती)।
जिन उपायों के माध्यम से संप्रज्ञात -समाधि निष्पन्न होती है, वे चार हैं, वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता, जो उत्तरोतर अधिक सूक्ष्म हैं (द्र. योगसूत्र 1/17)। स्थूल आलम्बन को लेकर जो समाधि होती है, वह ‘सवितर्क’ संप्रज्ञात है; इसी प्रकार सूक्ष्म आलम्बन से युक्त समाधि सविचार-संप्रज्ञात है (ये ‘वितर्कानुगत-विचारानुगत’ भी कहलाते हैं)। बाह्य-आभ्यन्तर-इन्द्रियरोध-जनित आनन्द को आलम्बन के रूप में लेकर जो समाधि होती है, वह सानन्द (आनन्दानुगत) संप्रज्ञात है; इसी प्रकार बुद्धिरूप अस्मिता का आलम्बन लेकर जो समाधि होती है वह सास्मित (अस्मितानुगत) संप्रज्ञात कहलाती है। आलम्बन से युक्त रहने के कारण ये सभी समाधियाँ सबीज कहलाती हैं। संप्रज्ञातसमाधि से जात प्रज्ञा का नाम समापत्ति है। (यह ज्ञातव्य है कि समाधिप्रक्रिया एवं समाधिज प्रज्ञा का विशदीकरण अयोगियों द्वारा नहीं हो सकता और अयोगी टीकाकारों ने भाषाज्ञान-मात्र के बल पर जो व्याख्या की है, उससे कुछ भी विशेष बात ज्ञात नहीं होती)। योगशास्त्र का कहना है कि सास्मित-समाधि-सिद्ध योगी देहत्याग के बाद (उपयुक्त संस्कार रहने पर) प्रजापति होकर ब्रह्माण्ड-सृष्टि करने में समर्थ होते हैं। इन समाधियों से क्लेश-संस्कारों का अत्यन्त नाश नहीं होता, अतः पुनरावृत्ति की संभावना रहती ही है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संबंध (गुरु शिष्य)

शास्त्रों के तत्त्वज्ञान की परंपरा शिव से लेकर मानवों तक चलती आ रही है। इसके प्रवाह की छः सीढ़ियां मानी गई है। प्रकाश रूप शिव के तत्व का विमर्शन विमर्श रूपिणी शक्ति किया करती है। यह कोई भेद प्रधानगुरु शिष्य संबंध तो नहीं, परंतु फिर भी कहने मात्र के लिए इसे पर संबंध कहा गया है। यह पर नामक संबंध शेष पाँच स्तरों के संबंध में ओतप्रोत भाव में रहता है। पाँचों के रूप में वस्तुतः यही चमकता रहता है। चार संबंध प्रायः देवगणों में या देवतुल्य शिवयोगियों में स्फुरित होते हैं और पाँचवा संबंध लौकिक प्राणियों में। वे पाँच स्तरों के गुरु शिष्य संबंध इस प्रकार हैं – महानसंबंध, अवांतर या अंतराल संबंध, दिव्य संबंध, दिव्यादिव्य संबंध तथा इतरेतर संबंध। (यथास्थान देखिए)। (पटलत्रि.वि., टि. 0 पृ. 12)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सबीज समाधि

जिस समाधि में ‘बीज’ रहता है, वह सबीज समाधि कहलाती है। पूर्वाचार्यों ने ‘बीज’ को प्रधानतः आलम्बन के अर्थ में लिया है। कई व्याख्याकार कहते हैं कि ग्राह्य-विषयक जो चार प्रकार की समापत्ति हैं (जो संप्रज्ञात समाधि के क्षेत्र में आते हैं) वही सबीज हैं। इन व्याख्याकारों के अनुसार इन चार ग्राह्य-विषयक समापत्तियों के अतिरिक्त चार अन्य समापत्तियाँ भी हैं, जिनके विषय ग्रहीता और ग्रहण (इन्द्रियाँ) हैं। दूसरे व्याख्याकार कहते हैं कि ग्रहीता, ग्रहण और ग्राह्य (अर्थात् भूत-तन्मात्र-पाँच भौतिक पदार्थ) में जो समापत्तियाँ होती हैं, वे सब सबीज हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समना (स्)

स्वच्छंद तंत्र के उद्योत के अनुसार वह सूक्ष्म अवस्था, जहाँ मन का मनन धर्म किसी न किसी अंश में विद्यमान ही रहता है। इसी कारण समना को अति शुद्ध प्रकार की अनुभव दशा भी कहा गया है। (स्वच्छन्दतंत्र उद्योत खं. 2 पृ. 166, 169)। तंत्रालोकविवेक के अनुसार अनाश्रित शिव (देखिए) भी जहाँ विलीन हो जाता है उसे समना अवस्था या सामनस्य पद / सामानस पद कहा गया है। इस पद या अवस्था तक अकल्पकाल की गणना की जा सकती है (तन्त्रालोकविवेकखं. 5, पृ. 257 60 )
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समयदीक्षा (समयाचार, समयी)

क्रिया प्रधान आचारमयी दीक्षा। इस दीक्षा में मंत्रोपदेश, वेषभूषा, दिनचर्या आदि बाह्य नियमों के पालन की प्रधानता होती है। इसके द्वारा साधक में उत्कृष्टतर दीक्षाओं को प्राप्त करने की योग्यता आ जाती है। समय दीक्षा के नियमों का पालन करने वाले साधक को समयी कहा गया है। उसके द्वारा पालन किए जाने वाले अनुशासन को ही त्रिक प्रक्रिया में समयाचार कहा गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समयमत

वसिष्ठ, सनक, शुक, सनन्दन और सनत्कुमार द्वारा रचित संहिताएँ शुभागमपंचक के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा प्रदर्शित तान्त्रिक साधना का मार्ग समयाचार के नाम से प्रसिद्ध है। समयाचार का अभिप्राय है आन्तर वरिवस्था में अभिरुचि। समय मत में समय अर्थात् सादाख्य तत्त्व की सपर्या आन्तर सहस्रदल कमल में की जाती है, बाह्य पीठ प्रभृति में नहीं। श्रीचक्र को वियच्चक्र भी कहा जाता है। दहराकाश और बाह्याकाश में भी इसकी पूजा होती है, अतः इसको वियच्चक्र कहा जाता है। इस मत में दहराकाश, अर्थात् हृदय स्थित अवकाश में श्रीचक्र की पूजा की जाती है। इसी को समयपूजा कहते हैं। पाँच शक्तिचक्र और चार वह्निचक्रों के संयोग से श्रीचक्र बनता है। स्वाभिमुख त्रिकोणपरम्परा को शक्ति तथा ऊर्ध्वमुख त्रिकोणपरम्परा को वह्नि कहा जाता है। समय मत में यही स्थिति मान्य है। इस मत में सृष्टिक्रम से श्रीचक्र की रचना की जाती है। शांकर मत के अनुयायी इसी विधि से श्रीचक्र की पूजा करते हैं। सौन्दर्यलहरी की टीका में लक्ष्मीधर ने इस मत का विस्तार से निरूपण किया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

समरस-भक्‍ति

देखिए ‘भक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

समाकर्ष

समीचीन आकर्ष समाकर्ष है। अथवा निश्चय का हेतु भूत आकर्ष समाकर्ष है। आकर्ष का अर्थ है – अपने स्थान से च्युत किया जाना। यह आकर्ष निश्चय का हेतु होने से समाकर्ष कहा जाता है। जैसे – असद्वा इदमग्र आसीत्, तद्धैक आहुः असदेवेदमग्र आसीत्, अव्याकृत मासीत्, तमआसीत् इत्यादि श्रुतियों में “असत्-अव्याकृत-तम आदि पद अपने अर्थ से च्युत कर दिए जाते हैं और केवल ब्रह्म की सद्रूपता निश्चित या सिद्ध की जाती है। प्रकृत में यही समाकर्ष है (अ.भा.पृ. 507)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

समाधि

योग के आठों अंगों में समाधि अन्तिम है। यह समाधि कभी-कभी योगशब्द से भी अभिहित होती है; समाधि -विशेष योग है (द्र. योग शब्द)।
समाधि में एकाग्रता की पराकाष्ठा होती है। योगशास्त्रोक्त प्रकृत समाधि की अवस्था में शारीरिक-क्रियाओं का अत्यन्त रोध हो जाता है (श्वास-प्रश्वास, रक्त का संचरण आदि बन्द हो जाते हैं)। यदि ऐसा रोध न हो तो वह समाधि नहीं है। यह निरोध योगशास्त्रीय उपाय द्वारा यदि हो तो वह शास्त्रीय समाधि है; यदि कृत्रिम उपायों द्वारा हो तो समाधि भी कृत्रिम है। यमादि अवर अंगों के अभ्यास के बिना समाधि अधिगत नहीं होती। समाधि चित्त का धर्म है और चित्त की प्रत्येक भूमि में इस धर्म का उदय हो सकता है। ध्यान जब अभीष्ट अर्थमात्र का प्रकाशक होता है, और ध्यानकारी जब अपने ज्ञातृत्वस्वरूप को भूल-सा जाता है, तब वह अवस्था समाधि कहलाती है (योगसूत्र 3/3)। समाधि में जिस प्रकार अस्थैर्य या विक्षेप का अशेष क्षय होता है, उसी प्रकार ज्ञानशक्ति का असाधारण उत्कर्ष होता है। अस्थैर्यक्षय के कारण समाधिसिद्ध व्यक्ति में असाधारण बल या शक्ति का आविर्भाव होता है और ज्ञानशक्ति के उत्कर्ष के कारण अलौकिक तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है। ग्राह्य, ग्रहण एवं ग्रहीता के अन्तर्गत सभी ज्ञेय वस्तु समाधि के विषय हो सकते हैं।
यह कहा गया है कि समाधि में जो विक्षेपक्षय या निरोध है उस निरोध की प्रकृति के भेद से समाधि के कई भेद किए गए हैं, ‘भवप्रत्यय’ आदि भेद निरोध-आश्रित भेद हैं। समाधि में जो ज्ञान का उत्कर्ष है, उसके भेद से समापत्तियों का भेद किया गया है – यह विशेषतया ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समाधि

1. स्वतंत्रतापूर्वक बिना किसी अन्य वस्तु या स्थिति के प्रभाव से अपनी ही इच्छाशक्ति के बल से जागते हुए ही सुषुप्ति की अवस्था में प्रवेश करके उसी में कुछ समय के लिए ठहरना समाधि कहलाती है। इस तरह से समाधि सुषुप्ति का एक उत्कृष्टतर प्रकार है। इसके निकृष्ट प्रकार निद्रा, मद, मूर्च्छा आदि होते हैं।
2. शैवयोग के समावेशरूपी उत्कृष्ट अंग को भी कभी कभी समाधि कहा जाता है और समावेशयुक्त योगी को समाहित चित्त कहा जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समाधि भाषा

समाधि में ऋषियों द्वारा स्वयं अनुभव कर जो कहा गया हो, वह समाधि भाषा है। इसमें ऋषि स्वानुभूत विषय का प्रतिपादन करते हैं (त.दी.नि.पृ. 26)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

समाधिपरिणाम

जिस समय चित्त में सर्वार्थता (विक्षिप्तता) का क्षय तथा एकाग्रता (एक निश्चित आलम्बन में चित्त को स्थिर रखना) का उदय (वृद्धि) होता है, उस समय चित्त का जो परिणाम होता है, उसका नाम समाधि-परिणाम है। सर्वार्थता और एकाग्रता चित्तरूप एक ही धर्मी के धर्म हैं; इन दोनों धर्मों में एक ही चित्त अन्वित रहता है। सर्वार्थता का क्षय जैसे-जैसे होता जाएगा, एकाग्रता की वृद्धि वैसे-वैसे होती जाएगी। यह समाधिपरिणाम चित्त की अवस्था-विशेष है, अतः वह शाश्वत नहीं होता। द्र. योगसूत्र 3/11।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समान

पाँच वायुओं में यह है (योगसूत्रभाष्य 3.39)। आहार्य द्रव्य का पाक हो जाने पर जो रस बनता है, उसका समनयन करना (= नाड़ी में रसों को ले जाना) समान नामक वायु का मुख्य व्यापार है। भुक्त आहार्य पदार्थों को शरीर के उपादान के रूप में परिणत करना समान का मुख्य व्यापार है, नाडी में रसों को ले जाना मात्र नहीं। प्राण चूंकि शरीरधारण-शक्ति है, अतः यह कहना अधिकतर युक्त है कि देह के उपादाननिर्माण की शक्ति का जो अधिष्ठान है, उसका विधारण (निर्माण-वर्धन-पोषण ही विधारण है) करना समान का व्यापार है। नाभी से शुरू कर हृदय-पर्यन्त प्रदेश समान का मुख्य स्थान है, ऐसा माना जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समान

प्राण की पाँच वृत्तियों में से वह वृत्ति जो सुषुप्ति में काम करती है। समान वृत्ति में विषयत्यागमयी प्राणवृत्ति और विषयग्रहणमयी आपान वृत्ति दोनों एकरूपतया समरस हो जाती हैं। समान वह प्राणना व्यापार है जिसमें प्रश्वास निःश्वास रूपी प्राण और अपान दोनों विलीन होकर नाभि मण्डल के आसपास मण्डलाकार गति से विचरण करते हुए योगियों के अनुभव का विषय बनते हैं। उच्चार योग में समान प्राण और विश्रांति से ब्रह्मानंद नामक आनंदभूमिका की अभिव्यक्ति हो जाती है। इसी प्राण के द्वारा शरीर के अंगप्रत्यंग में रस, रुधिर आदि धातुओं का समीकरण संपन्न होता है। जठराग्नि का प्रज्वलन भी समान के ही द्वारा होता रहता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, खं 2, पृ. 245)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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