भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

सत्कार्यवाद

भारतीय दर्शनों में कार्य-कारण (= उपादानकारण) भाव की व्याख्या के लिए जो तीन प्रसिद्ध वाद हैं, उनमें सत्कार्यवाद एक है (अन्य दो हैं – आरम्भवाद तथा विवर्तवाद)। सत्कार्यवाद वह वाद (या दृष्टि) है जो यह मानता है कि कार्य (= उत्पन्न वस्तु) अपने उपादानकारण में विद्यमान रहता है। यह सांख्ययोगीय दृष्टि है। इस दृष्टि के अनुसार यह कहा जाता है कि उत्पन्न वस्तु अपने उपादान कारण (मूल उपादान त्रिगुण है) के संस्थानविशेष (= अवयवों के विभिन्न रूपों से रहने) के अतिरिक्त कुछ नहीं है – त्रिगुण की नाना प्रकार की विषम-अवस्थाएँ ही नानाविध वस्तुएँ हैं – त्रिगुण के अतिरिक्त अन्य कुछ उनमें नहीं है।
कारण का ही संस्थानविशेष कार्य है – इससे यह भी सिद्ध होता है कि कार्य कारण की स्थूल अवस्थाविशेष है – कारण कार्य की तुलना में सूक्ष्म है। सूक्ष्म होने के कारण कार्य में पूर्णतया व्याप्त रहता है, दूसरे शब्दों में, कार्य अपने कारण से अतिरिक्त कोई पृथक् सत्ता नहीं रखता।
सूक्ष्म कारण का स्थूल अवस्था रूप जो कार्य होता है, वह नित्य नहीं होता; किसी काल में वह अभिव्यक्त होता है (उत्पन्न होता है – ऐसा न कहकर अभिव्यक्त होता है – यही इस दृष्टि के अनुसार कहना चाहिए) और कुछ काल के बाद अपने कारण में ही लीन हो जाता है – नष्ट हो जाता है (नाश का अर्थ इस शास्त्र के अनुसार कारण के साथ अविभाग-प्राप्ति है)। यह अभिव्यक्ति और नाश हेतु-सापेक्ष हैं। यह हेतु ही ‘कारक-व्यापार’ कहलाता है अर्थात् उपयुक्त कारक-व्यापार से ही कोई कारण रूपान्तर को प्राप्त करता है – कारक व्यापार के बिना नहीं।
कार्य उपादानकारण के संस्थान विशेष के अतिरिक्त कुछ नहीं है – इस दृष्टि को ही ‘कारण और कार्य अभिन्न है’ ऐसा कहा जाता है। सर्वमूल कारण त्रिगुण है, जो अहेतुमान्, नित्य, सर्वव्यापी, अक्रिय, अनाश्रित, निरवयव तथा स्वतन्त्र है और त्रिगुणविकारभूत प्रत्येक कार्य (बुद्धि आदि) हेतुमान्, अनित्य, अव्यापी, सक्रिय, आश्रित, सावयव तथा परतन्त्र है (द्र. सांख्यकारिका 10), अतः यह कहना असंगत है कि सांख्य कार्य और उपादानकारण में ऐकान्तिक अभेद मानता है। यह ऐकान्तिक अभेद की अस्वीकृति स्पष्टतया व्यासभाष्य में की गई है (एकान्तानम्युपगमात्) 3/13 सूत्र पर)। पारमार्थिक दृष्टि में कार्य और कारण अभिन्न हैं, पर व्यवहारतः भिन्न हैं – यह इस भाष्यवाक्य का तात्पर्य है। सत्कार्यवाद की दृष्टि के अनुसार ही कहा जाता है कि न असत् (अविद्यमान) वस्तु की उत्पत्ति होती है और न सत् (विद्यमान) वस्तु का सर्वथा अभाव होता है; वस्तु के अतीत एवं अनागत धर्म सामान्य रूप से उसमें रहते हैं – धर्मरूप मृत्तिका में उसके अतीत-अनागत धर्म सूक्ष्मरूप से रहते हैं; द्र. योगसूत्र 4/12।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्कार्यवाद

काश्मीर शैवदर्शन का वह सिद्धांत, जिसके अनुसार जो कुछ भी है, वह परमशिव ही है, सत्य है और अनुत्तर संवित् है; कोई भी वस्तु, भाव या अवस्था सर्वथा असत्य नहीं है; समस्त विश्व परमशिव में अनुत्तर संवित् के रूप में ही विद्यमान रहता है तथा उसी के स्वातंत्र्य के विलास से उसी में ही व्यावहारिक जगत् के रूप में प्रतिबिंब के न्याय से प्रकट होता है। इस प्रकार जो कुछ भी जिस भी रूप में है वह है और सत्य है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सत्तर्क

1. शुद्ध विकल्प। अपने आपको समुचित युक्तियों के आधार पर शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संविद्रूप ही समझना सत्तर्क है।
2. परमशिव, प्रकाश एवं विमर्श का परिपूर्ण सामरस्य है, समस्त प्रपंच उसी के संविद्रूप में संवित् के ही रूप में स्थित है, विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय इन दोनों रूपों में वही चमक रहा है, उससे भिन्न और कुछ भी नहीं है – इस प्रकार का शुद्ध विकल्प ही सत्तर्क कहलाता है।
3. निश्चयपूर्वक यह विचार करना कि मैं वस्तुतः प्रकाश और विमर्श का परिपूर्ण सामरस्य हूँ, समस्त सूक्ष्म एवं स्थूल प्रपंच मेरा ही विस्तार है तथा मूलभूत रूप से यह सारा प्रपंच मेरी ही शुद्ध संवित् में संवित् ही के रूप में स्थित है, विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय इन दोनों रूपों में मैं ही स्थित हूँ, आदि भी सत्तर्क कहलाता है। (तन्त्र सार पृ. 21-23)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सत्त्वगुण

सांख्योक्त प्रसिद्ध त्रिगुण में से यह एक है। अन्य दो हैं – रजोगुण एवं तमोगुण। सत्त्वगुण के लक्षणादि के लिए गुणशब्द देखें।
शब्दादि पाँच गुणों में शब्द, पाँच भूतों में आकाश, पाँच तन्मात्रों में शब्दतन्मात्र, पाँच ज्ञानेन्द्रियों में कर्ण, पाँच कर्मेन्द्रियों में वाक् सात्त्विक (= सत्त्वप्रधान) है। चूंकि सत्त्वगुण सदैव रजस् -तमस् के साथ संयुक्त रहता है, अतः सत्त्वप्रधान विवेकख्याति की प्राप्ति भी सर्वोच्च लक्ष्य नहीं है – त्रिगुणातीत कैवल्य ही सर्वोच्च लक्ष्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्त्वगुण

परमेश्वर की ज्ञानशक्ति जब माया तत्त्व तथा इससे विकसित कला आदि पाँच कंचुकों से अत्यधिक संकोच को प्राप्त करके जीव में प्रकट हो जाती है तो उस अवस्था में वह जीव का सत्त्वगुण कहलाती है। इस प्रकार संकोच की अवस्था में पड़े हुए प्रमाता को जो प्रकाशात्मक सुख अपने स्वरूप की सत्ता के आनंद के आभास से प्राप्त होता है वह उसका सत्त्वगुण कहलाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 4-1-4, 6)। इस गुण के शेष स्वभाव सांख्य दर्शन के अनुसार ही माने गए हैं, परंतु इसके बीज को परमशिव में, इसके विकास को मूलतः पुरुष तत्त्व में और इसके प्रसार को प्रकृति तत्त्व में माना गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सत्त्वपुरुषान्याताख्याति

सत्त्व (= बुद्धितत्व) तथा पुरुष (= अपरिणामी द्रष्टा) दोनों स्वभावतः अत्यन्त भिन्न हैं, क्योंकि बुद्धि त्रिगुणजात, परार्थ, परप्रकाश्य, विषय, अचेतन एवं संहत है और पुरुष अत्रिगुण, स्वार्थ, स्वप्रकाश, विषयी, चेतन एवं असंहत है। अविद्या एवं अस्मिता के कारण बुद्धि पुरुषवत् प्रतीत होती है। समाधिनिर्मल प्रज्ञा में सत्त्व और पुरुष का भेद स्फुटरूप से ज्ञात होता है। यही ज्ञान सत्त्वपुरुषान्यताख्याति (= विवेकख्याति) है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्त्वशुद्धि

शौच रूप नियम (योगाङ्गाविशेष) का पालन करने से दो प्रकार की सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं – बाह्य एवं आभ्यन्तर। सत्त्वशुद्धि आभ्यन्तर सिद्धियों में एक है (द्र. योगसू. 2/41)। सत्त्व (= चित्तसत्त्व) की मलहीनता ही सत्त्वशुद्धि है। चित्त जितना मलहीन होगा, उतना ही उसमें सात्विक प्रवाह बढ़ेगा। यह सत्त्वशुद्धि सौमनस्य का हेतु है। छान्दोग्य उपनिषद् में जो ‘आहार शुद्धिजनित सत्त्वशुद्धि’ का उल्लेख है (7/26/2), वह भी यही सत्त्वशुद्धि है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्य

यमों का एक प्रकार।

पाशुपत योग में सत्य नामक यम दो प्रकार का कहा गया है – परिदृष्‍ट भूतार्थ तथा वाक् सत्य। समस्त दृष्‍ट अर्थों को जिस रूप में देखा हो, उन्हें ठीक उसी रूप में प्रस्तुत करना परिदृष्‍ट भूतार्थ सत्य होता है। वाणी में सत्य अर्थात् जिस सत्य को कहने से किसी का भला हो सकता है। यदि वह उस रूप में न भी देखा गया हो परंतु आपदा में पड़े जीव की रक्षा के लिए झूठ को भी सत्य बनाकर बोलना पड़े, वह वाक् सत्य होता है क्योंकि कहा भी गया है –
सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्‍न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्म: सनातनः।।

अतः कभी-कभी भलाई के लिए बोला हुआ अनृत (झूठ) भी सत्य बन जाता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.21,22)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सत्य

पंचविध यमों में सत्य एक है (योगसूत्र 2/30)। जैसा जाना गया है या सुना गया है या अनुमित हुआ है, यदि वैसा ही कहा जाए तो यह सत्य है। अपने ज्ञान को अन्य को देने के लिए सत्य का कथन किया जाता है। स्वबोधसंक्रमणार्थ कहे गए वाक्य में यदि वंचना आदि करने की इच्छा हो तो वह सत्य नहीं होगा। सत्य वाक्य के द्वारा यदि हिंसा होती हो तो वहाँ वाक्य का उच्चारण करना निषिद्ध है। परपीड़ा का हेतुभूत सत्यवाक्य सत्याभास ही है। असत्य कह कर पर पीड़ा की निवृत्ति करने की अपेक्षा मौन रह कर पर-पीड़ा की निवृत्ति करना योगक्षेत्र का सत्यसाधन है। चित्त में सत्य की प्रतिष्ठा होने पर (मिथ्याकथन का संस्कार पूर्णतया नष्ट होने पर) वाणी अमोघ हो जाती है – यह योग शास्त्र की मान्यता है (योगसू. 2/36)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सत्याचार

देखिए ‘सप्‍ताचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सदसत्ख्याति

विपर्यय की सांख्यसम्मत व्याख्या। सांख्यसूत्र (5/56) के अनुसार शुक्ति (सीपी) में जो रजत का ज्ञान होता है, उसमें सत् और असत् दोनों का ज्ञान होता है। ‘यह रजत है’, ऐसा जो बोध होता है, उसमें ‘यह’ रूप अंश सत् ही रहता है – उसका बोध नहीं होता। ‘रजत है’, यह अंश असत् है, क्योंकि वह रहता नहीं है, उसका बोध होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सदाचार

देखिए ‘पंचाचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सदाशिव

इच्छाशक्‍ति की अंतरंगभूत ज्ञान-शक्‍ति से संयुक्‍त परशिवांश ही उपासकों के अनुग्रहार्थ जिस ध्यानगम्य सूक्ष्म साकार स्वरूप को धारण करता है, उसे ‘सदाशिव’ कहते हैं। यह शक्‍ति का प्रथम उन्मेष है। जैसे जल में भिगोया गया चना अंकुरित होने की प्रक्रिया में अपनी पूर्व अवस्था से विलक्षण अवस्था को धारण करता है, उसी प्रकार ‘शक्‍तित्व’ का ज्ञानांश के प्राधान्य से होने वाला सृष्‍ट्‍युन्मुख ‘इदंता’ रूप यह प्रथम स्फुरण ही ‘सदाशिव-तत्व’ है। यह शिव की शुद्‍ध सृष्‍टि के अंतर्गत है (शि.मं. पृष्‍ठ 35)।

यह अपने नाम के अनुरूप उपासकों को सदा मंगल प्रदान करने वाला है। पाँच ‘सादाख्य’ ही इस सदाशिव के पाँच मुख हैं। ये चार दिशाओं में चार और एक उर्ध्व दिशा में हैं। इनमें ‘कर्म-सादाख्य’ पूर्व दिशा का, ‘कर्तृसादाख्य’ दक्षिण दिशा का, ‘मूर्तसादाख्य’ पश्‍चिम दिशा का, ‘अमूर्त सादाख्य’ उत्‍तर दिशा का और ‘शिवसादाख्य’ ऊर्ध्वदिशा का मुख कहलाता है। ‘सदाशिव’ का कर्मसादाख्य नामक पूर्व दिशा का मुख स्थूल और साकार है। इसके भी पाँच मुख हैं। इन्हीं मुखों से शैवतंत्र के सिद्‍धान्तागमों की उत्पत्‍ति होती है। वस्तुत: यह कह सकते हैं कि ‘सदाशिव-तत्व’ पाँच सादाख्यों का समष्‍टि स्वरूप हैं अर्थात् ‘सदाशिव-तत्व’ से ही सादाख्यों का स्फुरण होता है।

Darshana : वीरशैव दर्शन

सदाशिव तत्त्व

अभेद के भीतर के धीमे से अवभास वाली भेदाभेद दशा। वह दशा जिसमें परिपूर्ण एवं शुद्ध प्रकाश विमर्शात्मक ‘अहं’ के स्वरूप के भीतर ही प्रमेयता अर्थात् ‘इदंता’ के अंश का धीमा सा संवदेन होता है और फिर भी ‘अहम्’ का अंश ही प्रधानतया चमकता रहता है। इस दशा में प्रमाता के भीतर उसकी शुद्ध संवित् ‘अहम् इदम्’ अर्थात् ‘मैं यह हूँ’, इस रूप में चमकने लगती है। विश्व की इसी दशा को सदाशिवतत्त्व कहा जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2 पृ. 191)। इस तत्त्व में परमेश्वर की ज्ञानशक्ति की स्फुट अभिव्यक्ति मानी गई है। (शिवदृष्टिवृत्ति पृ. 37)। अहम् अंश प्रधान भेदाभेद दृष्टिकोण वाले मंत्रमहेश्वर प्राणी इसी तत्त्व में ठहरते हैं। इस तत्त्व के अधिपति सदाशिव भट्टारक हैं। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, 2 पृ. 192, 193)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सदाशिव दशा

देखिए सदाशिव तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सदाशिव भट्टारक

सदाशिव तत्त्व पर शासन करने वाले तत्त्वेश्वर। प्रमातृ अंश में ही ‘इदंता’ का धीमा सा आभास होने पर भी ‘अहम् इदम्’ अर्थात् ‘मैं यह हूँ’ इस प्रकार की भेदाभेद की ही दृष्टि से देखने वाले मंत्रमहेश्वर प्राणियों के उपास्य देव। (तन्त्र सार पृ. 74, 75, 94)। अपने में सतत रूप से शुद्ध ‘अहम्’ अंश की प्रधानता के कारण सदाशिव भट्टकार ‘इदंता’ से स्फुट हुए भेद को अपने में ही शांत करते हुए सदैव अपने अभेद के आनंद से आप्लावित रहते हैं। इस प्रकार सृष्टि के विशेष कार्यों को ‘इदंता’ अंश प्रधान ईश्वर भट्टारक ही स्फुटतया करते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सद्‍भक्‍ति

देखिए ‘भक्‍ति’ शब्द के अंतर्गत ‘श्रद्‍धाभक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सद्‍योजात

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत सूत्र के कौडिन्य भाष्य के अनुसार ‘सद्योजात’ शब्द में विग्रह करके तीन भिन्‍न – भिन्‍न शब्द बनकर ईश्‍वर की तीन शक्‍तियों का अर्थ निकलता है। विग्रह इस प्रकार से है- सन् + आद्य + अजात, अर्थात् सद्य इस पद में दो अर्थ हैं सन् (सत्‍ता) तथा आद्य (आदिकारण), अतःजिसक सत्‍ता सदा व सर्वदा रहती है, जिसकी सत्‍ता अनादिकाल से है तथा जो जन्ममरण रहित (अजात) है, वह परमसत्‍ता सद्योजात कहलाती है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 52,53)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सद्योजात

स्वच्छंदनाथ (देखिए) के पाँच मंत्रात्मक रूपों में से तीसरा रूप। इस रूप में आकर शिव विशेष प्रकार के शैव शास्त्रों का उपदेश करता है। प्रक्रिया मार्ग की दृष्टि से साधना के क्रम में सदाशिव तत्त्व को इच्छा शक्ति की अभिव्यक्ति मान लेने पर सद्योजात को सदाशिव तत्त्व तथा ज्ञानशक्ति का स्फुट रूप माना गया है। (तं.आ.वि. 1-18)। स्वच्छंदनाथ के पाँच मुखों में से पश्चिमाभिमुख चेहरे का नाम भी सद्योजात है। सद्योजात मुख का वर्ण शुक्ल माना गया है। इसकी अवस्था शून्य संवेदनात्मक होती है। यहाँ समस्त प्रपंच अज्ञात अवस्था में ही पड़ा रहता है। यह रौद्री दशा प्रधान अवस्था है। (मा. वि. वा., 1-249 से 251, 255. 259, 266, 267)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सद्योनिर्वाण दीक्षा

देखिए प्राणोत्क्रमणदीक्षा।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App