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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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षट्कोश

माता-पिता से उत्पन्न शरीर को ‘षाट्कौशिक’ (छह कोशों से अन्वित) कहा जाता है। व्याख्याकारों के अनुसार स्त्रीबीज से प्राप्त लोम, लोहित (= रोहित = रक्त) और मांस तथा पुंबीज से प्राप्त स्नायु, अस्थि और मज्जा – ये छः कोश हैं (द्र. सां. का. 39, तत्वकौमुदी)। लोम का तात्पर्य त्वक् से है। ‘षाट्कौशिक शरीर’ का उल्लेख गर्भोपनिषद् में भी है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

षट्विंश तत्त्व

देखिए तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

षट्‍स्थल

देखिए ‘अंग-स्थल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

षट्‍स्थल-संप्रदाय

जीव को मोक्ष की प्राप्‍ति कराने वाली षट्‍स्थल-प्रक्रिया के प्रतिपादक वीरशैव दर्शन को षट्‍स्थल-संप्रदाय कहते हैं। इस संप्रदाय में उपासक अंग (जीव) के मोक्षमार्ग में प्रवृत्‍त होने पर क्रमशः भक्‍त, महेश्‍वर, प्रसादी, प्राणलिंगी, शरण तथा ऐक्य नाम की छः अवस्थाओं की प्राप्‍ति बताई गयी है इन अवस्थाओं की परिभाषा ‘अंग-स्थल’ शब्द में प्रतिपादित है। जैसे उपासक जीव की छः अवस्थायें हैं, उसी प्रकार उपास्य लिंग (शिव) की भी आचारलिंग, गुरुलिंग, शिवलिंग, जंगम-लिंग, प्रसादलिंग और महालिंग के नाम से छः लीला-अवस्थायें मानी गयी हैं (इन अवस्थाओं की परिभाषा के लिये ‘लिंग-स्थल’ शब्द देखिये)।

शिव के इन लीला-विग्रहों की उपासना करता हुआ जीव अपनी उपासना के बल से तथा शिव के अनुग्रह के क्रमशः भक्‍त, महेश्‍वर आदि अवस्थाओं को प्राप्‍त करता हुआ अंत में ‘ऐक्य-स्थल’ में महालिंग के साथ समरस हो जाता है। इस प्रकार छः प्रकार की उपासनाजन्य अवस्थाओं की प्राप्‍ति के द्‍वारा उपासक जीव के लिये मोक्षमार्ग के प्रतिपादक इस वीरशैव दर्शन को षट्‍स्थल-संपदाय कहा गया है।

Darshana : वीरशैव दर्शन

षडंग योग

अष्टांग योग की तरह षडंग योग की भी एक परम्परा है, जो पर्याप्त प्राचीन है, क्योंकि मैत्रायणी आरण्यक (6/18) में इसका उल्लेख मिलता है। इसके छः अंगों की गणना में भिन्नता पाई जाती है जैसा कि निम्नोक्त उदारहणों से प्रकट है – (1) प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क एवं समाधि (अमृतनाद उप., दक्षस्मृति आदि द्र.)। (2) आसन, प्राणसंरोध (= प्राणायाम), प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि (ध्यान-बिन्दु उप.; योगचूडामणि उप. आदि द्र.)। (3) प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि (गुरुडपु. आदि) इनमें द्वितीय प्रकार का षडंगयोग बहुत प्रसिद्ध है और शैवशास्त्र में प्रायः स्वीकृत हुआ है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

षडंग योग

अनुपाय शब्द की व्याख्या में बताया गया है कि यहाँ साधक उपाय के रूप में केवल सतर्क का सहारा लेता है। षडंग योग में तर्क को भी योग का अंग माना गया है। शैव, वैष्णव, बौद्ध सभी सम्प्रदायों में षडंग योग की चर्चा मिलती है। गुह्यसमाज तन्त्र (18/140) में प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, अनुस्मृति और समाधि – ये छः योग के अंग माने गये हैं। श्रद्धेयचरण पण्डित गोपीनाथ कविराज के ग्रन्थ ‘भारतीय संस्कृति और साधना’ (पृ. 537-540) में इस विषय पर अनेक बौद्धतन्त्र ग्रन्थों की सहायता से अच्छा प्रकाश डाला गया है। भगवद्गीता के भास्कर भाष्य (पृ. 127) में प्रत्याहार, ध्यान, प्राणायाम, धारणा, तर्क और समाधि ये छः अंग गिनाये गये हैं। यहाँ अनुस्मृति के स्थान पर तर्क नाम आया है। तन्त्रालोक के टीकाकार जयरथ ने षडंग योग का उल्लेख किया है। वहाँ का क्रम इस प्रकार है – प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, तर्क और समाधि। विष्णुसंहिता में प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, तर्क, समाधि और ध्यान – यह क्रम मिलता है। विष्णुसंहिता (30/61-72) में विस्तार से इनका विवरण भी मिलता है। इनमें तर्क के सिवाय अन्य अंग पातंजल योग संमत ही हैं। इनमें क्रम में भिन्नता मिलती है, किन्तु सर्वत्र तर्क को समाधि के साथ रखा गया है।
मालिनीविजय (17/18) और तन्त्रालोक (4/15) में योग के सभी अंगों में तर्क को श्रेष्ठ बताया गया है। विष्णुसंहिता (30/69-70) में कहा गया है कि धारणा में जब चित्त संलग्न हो, तब अन्वय और व्यतिरेक की सहायता से किया गया निश्चय ही तर्क कहलाता है। भारतीय वाङमय में सत्तर्क को बहुत पहले प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी। तिरुक्त (13/12) में बताया गया है – ऋषियों की परम्परा के समाप्त हो जाने पर मनुष्यों ने देवताओं से पूछा कि अब हमारे बीच ऋषि का कार्य कौन करेगा? इसके उत्तर में देवताओं ने मनुष्य को तर्कशक्ति दी कि अब यही तुम लोगों के लिये ऋषि का कार्य करेगी। मनु (12/106) प्रभृति धर्मशास्त्रकारों ने भी शास्त्रों के अविरोधी सत्तर्क को मान्यता दी है। उपर्युक्त स्थल पर (पृ. 15-20) तन्त्रालोक के टीकाकार ने अनेक शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर शास्त्रानुरोधी सत्तर्क की प्रतिष्ठा की है। उनका कहना है कि तर्क को अप्रतिष्ठित तभी माना जाता है, जबकि यह शास्त्रविरुद्ध हो।
जयरथ ने ऊहको तर्क का ही पर्याय माना है। मृगेन्द्रागम के योगपाद में योग के अंग के रूप में वीक्षण (अभिवीक्षण) परिगणित है। उसी को ऊह भी कहा गया है और उसका प्रयोजन भी बताया गया है। बौद्ध पालिवाङमय तथा तन्त्रों में वर्णित अनुस्मृति और अभिवीक्षण में पर्याप्त समानता है। वृत्तिकार नारायण कण्ठ ने यहाँ ऊह की पृष्टि में स्वायम्भुवागम को भी उद्धृत किया है। भगवद्गीता (15/15) के भाष्य में रामानुजाचार्य ने अपोहन शब्द को ऊह का पर्यायवाची भी माना है और इसकी परिभाषा यह की है – ऊह का कार्य यह देखना है कि किसी भी प्रमाण की प्रवृति सही ढंग से हो रही है या नहीं ? प्रमाण-प्रवर्तक सामग्री की परीक्षा करना भी इसी का कार्य है। इस तरह से ऊह प्रमाणों का अनुग्रहक ज्ञान है। स्पष्ट है कि आगम और तन्त्रशास्त्र में ही नहीं, पूरे भारतीय वाङमय में तर्क या ऊह की प्राचीन काल से प्रतिष्ठा चली आ रही है।
Darshana : शाक्त दर्शन

षडंगोपहार

छः अंगो वाला उपहार।

पाशुपत योग के अनुसार साधक को भगवान महादेव के चरणों में छः अंगों वाला उपहार अर्पण करना होता है। षडंगोपहार के छः अंग हसित, गीत, नृत्यु, डुंडुंकार, नमस्कार तथा जप हैं। (ग.का.टी.पृ. 19)। साधक शिव मंदिर में शिवमूर्त्‍ति अथवा शिवलिंग के सामने गाता है, नाचता है, खिलखिलाकर हँसता है, हुडक्‍कार सुनाता है, दण्डवत् प्रणाम करता है और शिव मंत्र का जप करता है। इस तरह से इन छः पूजा कार्यों की भेंट शिवजी को चढ़ाता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

षडध्व धारणा

आणवोपाय में कालाध्वा के वर्ण, मंत्र तथा पद और देशाध्वा के कला, तत्त्व और भुवन, इन छः को आलंबन बनाकर की जाने वाली धारणा को षडध्व धारणा कहते हैं। ये सभी आलंबन पूर्णतया बाह्य पदार्थ होते हैं। आणवोपाय के इस बाह्य मार्ग में काम आने वाले आलंबनों को तथा उनसे संबंधित सभी अनात्म आभासों को संवित् में समाहित करने के सतत अभ्यास से आणव समावेश हो जाता है। (तन्त्र सार पृ. 47, 63)। देखिए काल-अध्वन्, देश-अध्वन। षडध्व धारणा से देशकृत और कालकृत संकोच पूर्णतया मिट जाते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

षडध्वा

शैव और शाक्त तन्त्रों में षडध्व प्रक्रिया के आधार पर भी सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। महाकवि कालिदास ने शिव और पार्वती के अर्धनारीश्वर रूप की उपमा शब्द और अर्थ से दी है। शारदातिलक की टीका में उद्धृत वायवीय संहिता के ‘शब्दजातमशेषं तु’ प्रभृति वचन में बताया गया है कि पार्वती और परमेश्वर ही शब्द और अर्थ के रूप में परिणत होते हैं। महार्थमंजरीकार ने लिखा है कि अर्थस्वरूप तीन अध्वा प्रकाशमय शिव का अर्ध भाग है और शब्दरूप तीन अध्वा विमर्शमय शक्ति का अर्ध भाग है। इस तरह से शब्द और अर्थमय यह सारा जगत् शिव के यामल स्वरूप से, अर्धनारीश्वर स्वरूप से उल्लिखित होता है। प्रकाशमय शिव से कला, तत्त्व और भुवन की तथा विमर्शमय शक्ति से वर्ण, पद और मन्त्र की सृष्टि होती है। ये ही तन्त्रशास्त्र में षडध्व के नाम से परिभाषित हैं। भास्करराय ने वरिवस्यारहस्य में इनको शब्दमयी और अर्थमयी सृष्टि का नाम दिया है। यह विभाग काश्मीर शैव दर्शन और शाक्त दर्शन को भी समान रूप से मान्य है।
इनमें से कला के पाँच भेद हैं – शान्त्यतीत, शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति। तत्व 36 हैं। इनको तीन भागों में बाँटा गया है। शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर और शुद्धविद्या – ये पाँच शुद्ध तत्त्व हैं। माया, कला, अविद्या, राग, काल, नियति और पुरुष – ये सात शुद्धाशुद्ध तत्व हैं। प्रकृति से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सांख्य संमत 24 तत्त्व अशुद्ध कहलाते हैं। अनाश्रित से कालाग्निरुद्र पर्यन्त भुवनों की संख्या 224 है। वर्णों की संख्या 50, पदों की 81 और मन्त्रों की संख्या 11 है। शाक्त तन्त्रों में वर्णों की संख्या 51 है। तान्त्रिक दीक्षा में षडध्व की शुद्धि अनिवार्य मानी जाती है। शैव और शाक्त तन्त्रों में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

षडर्धशास्त्र

त्रिकशास्त्र। देखिए आगम (त्रिक)। छः शास्त्रों का आधा भाग। श्री स्वच्छंदनाथ के ईशान मुख से भी जो उत्कृष्टतर उसका अदृश्यमुख माना गया है वह मुख उसके पाँचों मुखों का समष्टि रूप है। उसके उसी मुख से ऊर्ध्व से भी ऊर्ध्व आग्नायों का (शास्त्रों का) उद्गम हुआ। वे शास्त्र सौर, मर्गशिखा आदि छः आगम हैं। उन छः में से भी विशेष उत्कृष्ट तीन आगम हैं। वे हैं – सिद्धातंत्र, नामकतंत्र और मालिनी तंत्र। इन्हीं तीन आगमों को षडर्धशास्त्र या त्रिकशास्त्र कहा जाता है। (मा. वि. वा. 1-161-165)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

षष्टि पदार्थ

सांख्यशास्त्र को लक्ष्य कर ‘षष्टितन्त्र’ शब्द पूर्वाचार्यों द्वारा प्रयुक्त हुआ है, जिससे अनुमित होता है कि कभी सांख्याचार्यों ने साठ भागों में विभक्त कर प्रमेय पदार्थों पर विचार किया था। राजवार्त्तिक में इस विभाग का विवरण मिलता है। इस विवरण के अनुसार 60 विचार्य पदार्थ हैं (वाचस्पतिकृत तत्त्वकौमुदीटीका में राजवार्त्तिक के वचन उद्धृत हुए हैं) – (1) प्रधान और पुरुष का अस्तित्व, (2) प्रधान का एकत्व, (3) भोग-अपवर्ग रूप अर्थ, (4) प्रधान से पुरुष की भिन्नता, (5) प्रधान की परार्थता (पुरुष-प्रयोजन की सिद्धि करना), (6) पुरुष की असंख्यता, (7) प्रकृति-पुरुष का वियोग, (8) इन दोनों का संयोग, (9) शेषवृत्ति अर्थात् प्रधान का स्थूलसूक्ष्मरूपेण विद्यमान रहना, (10) पुरुष का अकर्तृत्व (11 -15) पाँच प्रकार का विपर्यय अर्थात् अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, (16 -25) नौ तुष्टियाँ (द्र. तुष्टिशब्द), (25 -52) अट्ठाईस अशक्तियाँ (द्र. अशक्ति शब्द) और (53 -60) आठ सिद्धियाँ (अह आदि; द्र. सिद्धि शब्द) (विपर्यय-तुष्टि-अशक्ति-सिद्धि के लिए द्र. सांख्यकारिका 46 -51)। इन साठों में प्रथम दस ‘मूलिकार्थ’ कहलाते हैं।
षष्टि पदार्थों की अन्यविध गणना अहिर्बुध्न्यसंहिता (12/19-30) में मिलती है। इसमें ये 60 पदार्थ इस प्रकार गणित हुए हैं – षष्टितन्त्र में दो मंडल हैं, प्राकृतमण्डल, जिसमें 32 तन्त्र (खण्ड) है तथा वैकृत मण्डल, जिसमें 28 तन्त्र (खण्ड) हैं। 60 तन्त्रों के विषय ये हैं ‘ ब्रह्म, पुरुष, शक्ति, नियति, काल, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, अक्षर, प्राण, कर्ता, सामि (‘स्वामी’ होना चाहिए), पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच तन्मात्र, पाँच भूत (32 विषय); पाँच कृत्य, भोग, वृत्ति, पाँच क्लेश, तीन प्रमाण, ख्याति, धर्म, वैराग्य, ऐश्वर्य, गुण, लिंग, दुःख, सिद्धि, काषाय, समय, मोक्ष (28 विषय; गिनती के अनुसार 26 होते हैं, संभवतः गुण का अर्थ तीन गुण है, इस प्रकार 28 संख्या की पूर्ति हो जाती है)। ऐसा प्रतीत होता है कि मूल षष्टितन्त्र शास्त्र का जो वैष्णवसंप्रदायीय-रूप परवर्तीकाल में हुआ था, उसमें ये विषय थे।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

षष्ठबीज

मातृका क्रम में ऋ ऋृ लृ लृृ इन चार वर्णों को षष्ठ वर्ण या षष्ठबीज कहते हैं। बीज स्वरों को कहते हैं। स्वर होते हुए ये भी बीज हैं। परंतु जैसे अ, आ से कवर्ग की, इ, ई से चवर्ग की सृष्टि होती है वैसे इन बीजों से किन्हीं भी व्यंजन वर्णों की सृष्टि नहीं होती है। अतः इन बीजों को नपुंसक तुल्य होने के कारण षष्ठ बीज कहा जाता है। वस्तुतः ये वर्ण इ ई वर्णों के ही रूपांतर हैं। इच्छा और ईशना में जब एष्टव्य तत्त्व और ईषणीय तत्त्व का प्रवेश हो जाता है तो इन वर्णों की अभिव्यक्ति हो जाती है। वे तत्त्व कप्रतामय रूप में समाविष्ट हों तो रश्रुति प्रधान ऋ और ऋृ की अभिव्यक्ति होती है और स्थिरतामय रूप में समाविष्ट हों तो लश्रुति प्रधान लृ और लृृ की अभिव्यक्ति होती है। (तन्त्रालोक 2 पृ. 178, तन्त्र सार पृ. 14)। इन्हें अमृत बीज भी कहा गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संकरहानि

विशुद्‍धि का एक भेद।
पाशुपत योगी की समस्त वैषयिक आसक्‍ति का जब अत्यंत उच्छेद हो जाता है तो उसे सङ्करहानि नामक विशुद्‍धि की प्राप्‍ति होती है। सङ्करहानि विशुद्‍धि का तृतीय भेद है। (ग.का.टी.पृ.7)। सङ्कर से तात्पर्य है वैषयिक आसक्‍ति का मनोवृत्‍तियों में मिलकर रहना। सङ्कर एक विशेष प्रकार का मानस संसर्ग होता है। मुक्‍ति पाने के लिए इस संकर को सर्वथा धो डालने से योगी संकरहानि रूपिणी विशुद्‍धि का पात्र बन जाता है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सकल

पूर्ण भेद की भूमिका के प्राणी। इन प्राणियों में आणव, मायीय तथा कार्म नामक तीनों मल स्फुट रूप से पूर्ण विकास को प्राप्त करके रहते हैं। परिणामस्वरूप ये प्राणी संसृति के चक्कर में बँध जाते हैं। ये समस्त प्रपंच को भेद दृष्टि से देखते हैं। कर्मवासना से घिरे रहने के कारण ये जन्म-मरण के भंवरों में फँसे रहते हैं। देवताओं से लेकर सामान्य जंतुओं तक का सारा प्राण / वर्ग सकल कोटि में ही गिना जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2, पृ. 227-229; स्वच्छन्द तंत्र पटल 7-237)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सकल-निष्कल

स्वच्छन्दतन्त्र (7/238-239) में बताया गया है कि मन्त्र का जब तक उच्चारण किया जा सकता है और जब तक उसको लिखा जा सकता है या चित्रित किया जा सकता है, तभी तक वह सकल रहता है। निष्कल स्वरूप भेदातीत है। इसका अभिप्राय यह है कि सकल स्वरूप ही भेदातीत स्थिति में पहुँच कर निष्कल हो जाता है। मन्त्र के विषय में यहाँ जो बात कही गई है, वही देवता के विषय में भी सही है। इसी सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए योगिनीहृदय (1/27-28) में भगवती त्रिपुरसुन्दरी के श्रीचक्र की सकल, सकलनिष्कल और निष्कल स्थिति का वर्णन किया गया है। आज्ञाचक्र पर्यन्त सकल, उन्मनी पर्यन्त सकल-निष्कल और महाबिन्दु में निष्कल रूप में भगवती स्थित है। इसी प्रकार प्रत्यभिज्ञा दर्शन में प्रतिपादित पराशक्ति की स्थिति निष्कल, परापरा की सकल-निष्कल और अपरा की सकल मानी गई है। सेतुबन्धकार (पृ.46) भास्करराय का मत है कि सकल जीव सकल स्वरूप की, प्रलयाकल सकलनिष्कल की और विज्ञानाकल निष्कल स्वरूप की आराधना का अधिकारी है। सकल शब्द के अन्तर्गत कला पद का अर्थ उन्होंने अंश, अर्थात् अंशांशीभाव किया है। अंशांशीभाव जहाँ रहेगा, वहाँ भेद की स्थिति अवश्य रहेगी। अतः इस स्थूल अंशांशीभाव रूप मालिन्य से युक्त स्वरूप को सकल कहा जाता है। जो स्वरूप इस दोष से रहित होगा, वह निष्कल कहा जाएगा। इसके लिये सगुण और निर्गुण शब्द भी प्रयुक्त किये जा सकते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

सकलीकरण

विरूपाक्षपंचाशिका की विद्याचक्रवर्ती कृत विवृति (श्लो. 51) में आचार्य योगीश्वर का एक वचन उद्धृत किया गया है। उसमें बताया है कि प्रकाशात्मक शिव के साथ विमर्शात्मक शक्ति की कूटस्थ एकात्मकता की प्रत्यभिज्ञा के उदित होने से जो परमानन्द का आविर्भाव होता है, उसी का नाम सकलीकरण है। यह सकलीकरण की अद्वैतवादी व्याख्या है। तान्त्रिक वाङमय में दीक्षा के प्रसंग में इस शब्द का प्रयोग बार-बार हुआ है। विवृतिकार ने उक्त स्थल पर बताया है कि दाह और आप्यायन क्रिया के द्वारा सकलीकरण सम्पन्न होता है। प्राणायाम शब्द की व्याख्या के प्रसंग में शोष, दाह और आप्यायन विधियों की चर्चा की गई है। इन्हीं की सहायता से सकलीकरण प्रक्रिया सम्पन्न होती है। पाँच भौतिक देह स्थित मल का, पाप पुरुष का शोष और दाह हो जाने के उपरान्त दैवत्व भावना से देह को आप्यायित करना ही सकलीकरण है। मृगेन्द्रतन्त्र क्रियापाद (3/4-10) में बताया गया है कि इसमें ईशान की 5 कला, तत्पुरुष की 4, अघोर की 8, वामदेव की 13 और सद्योजात की 8, इस प्रकार शिव की कुल 38 कलाओं से साधक के देह को आप्यायित किया जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

सकाम गति

कामना के अनुरूप प्राप्त होने वाली गति सकाम गति है अथवा सकाम कर्म के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली गति सकाम गति है। यह गति कामना के अनन्त होने से अनन्त प्रकार की होती है (अ.भा.पृ. 852)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सक्‍तिहेतु

मल का एक विशेष प्रकार।

भासर्वज्ञ के अनुसार भौतिक विषयों के प्रति आसक्‍ति से मनुष्य को जो सुख मिलता है तथा उस सुख से उसे जो अभिमान होता है, “कि मैंन अमुक कार्य किया या करूँगा, उससे मुझे अमुक प्रकार का आनन्द मिला या मिलेगा” इस प्रकार का उसका यह सुखाभिमान ही सक्‍ति हेतु नामक मल होता है। यह मल का तीसरा प्रकार है तथा बन्धन का एक कारण बनता है। इसीलिए इसे मलों के भीतर गिना गया है। (ग.का.टी.पृ.22)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

संगमादित्य

पंद्रहवीं पीढ़ी के त्र्यंबकादित्य के पुत्र। मानसपुत्र न होकर स्त्रीपुरुष संगम से उत्पन्न होने के कारण इन्हें संगमादित्य ऐसा नाम दिया गया था। सोमानंद के पांचवीं पीढ़ी के पूर्वज। संगमादित्य के पुत्र वर्षादित्य, वर्षादित्य के पुत्र अरूणादित्य, अरूणादित्य के पुत्र आनंद तथा आनंद के पुत्र सोमानंद हुए। (शिव दृष्टि 7/114-120)। संगमादित्य के कश्मीर में आने के अनंतर ही इस प्रदेश में अद्वैत शैव दर्शन की पर्याप्त प्रगति होने लगी। इस प्रकार संगमादित्य को ही कश्मीर में त्र्यंबकमठिका की स्थापना एवं अद्वैत शैवदर्शन के सर्वप्रथम प्रचार का श्रेय जाता है। बाद में सोमानंद आदि आचार्यों ने इस दर्शन को पूर्ण विकास में लाया। (देखिए ‘त्र्यंबकादित्य’ एवं त्र्यंबकमठिका)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संघात

देहेन्द्रिय (देह+इन्द्रिय), प्राण, अंतःकरण और जीव ये चारों संघात भगवद् विभूति रूप हैं। इनमें देहेन्द्रिय रूप प्रथम संघात स्थूल शरीर रूप है। द्वितीय संघात प्राणमय रूप है। तृतीय संघात मनोमयरूप है। मन सभी इन्द्रियों से सम्बद्ध है। यह स्वयं इन्द्रिय भी है और अंतःकरण भी है। चतुर्थ संघात जीव तत्त्व रूप है। ये परस्पर में संहन्यमान (संहत) होकर ही पुरुषार्थ के साधक होते हैं, इसलिए संघात कहे जाते हैं (अ.भा.पृ. 187)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

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