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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अमोहकारिणी

शिव में रहने वाली शक्‍ति विपरीत ज्ञान के द्‍वार शिव को मोहित नहीं करती, अतः शिव की इस शक्‍ति को अमोहकारिणी कहा जाता है। इसे ‘शुद्‍धोपाधि’, ‘परामाया’, ‘ऊर्ध्वमाया’ भी कहते हैं। यह ‘सूक्ष्मचित्’ अर्थात् सर्वज्ञत्वरूपा और सूक्ष्म-अचित् अर्थात् सर्वकर्तृत्वरूपा है। इसी के कारण शिव सर्वज्ञ और सर्वकर्ता बन जाता है। काँच से आवृत वस्तुओं का स्वरूप जैसे तिरोहित नहीं होता, उसी प्रकार इस ऊर्ध्वमाया से आवृत होने पर भी शिव का स्वरूप तिरोहित नहीं होता। इसीलिये इसको शुद्‍धोपाधि कहा गया है। इस ऊर्ध्वमाया से उपहित शिव प्रपंच की उत्पत्‍ति में निमित्‍त कारण बनता है। यह शिव एक होने पर भी इस ऊर्ध्वमाया की महिमा से सद्‍योजात आदि अनेक मूर्तियों का रूपधारण करता है और आणव आदि अनादिमलों से रहित होकर सर्वज्ञत्व आदि षड्‍गुणों से संपन्‍न हो जाता है। (सि.शि. 5/44-46 पृष्‍ठ 69-70)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अम्बिका

त्रिपुरा दर्शन में शान्ता नामक शक्ति को विश्व का कारण माना है। जब इस शक्ति में विश्व की सिसृक्षा उत्पन्न होती है, तो उसमें स्फुरता या स्पन्दन होता है और यह शान्ता शक्ति अम्बिका के रूप में परिणत हो जाती है। इसी को परा वाक् भी कहा जाता है। बीज में छिपे वृक्ष के समान इस अम्बिका शक्ति में ही सारा विश्व संनिहित रहता है। श्रृंगार के मध्य में स्थित बिन्दु में इसकी स्थिति मानी जाती है। (योगिनीहृदय, 1/36)।
Darshana : शाक्त दर्शन

अरिष्ट

आसन्न मृत्यु के ज्ञापक चिह्न को ‘अरिष्ट’ कहते हैं। इन चिह्नों का विवरण योगग्रन्थों के अतिरिक्त इतिहास -पुराण के योगपरक अध्यायों में (यथा वायुपुराण, अ. 19) तथा आयुर्वेद के ग्रन्थों में (द्र. सुश्रुत सूत्रस्थान) भी मिलता है। योगियों के लिए ये चिह्न मृत्यु के सर्वथा निश्चायक होते हैं, पर साधारण जन के लिए ये मृत्यु-सम्बन्धी प्रबल संभावना बुद्धि के जनक होते हैं।
अरिष्टों को तीन भागों में बाँटा गया है – (1) आध्यात्मिक (अर्थात् दैहिक एवं मानसिक विकार) जैसे – कान बंद करने पर शरीरगत शब्द न सुनना, आँखों के दबाने पर ज्योति का न दीखना, दीप के बुझने पर उसका गन्ध न पाना, स्वप्न में स्वमलमूत्रवमन का दर्शन, अरुन्धती नक्षत्र को न देख सकना, आदि; (2) आधिदैविक (=अमानुष सत्त्वादि का दर्शन), जैसे – अकस्मात् स्वर्ग का दर्शन, आकाश में इन्द्रजाल की तरह गन्धर्वनगर का दर्शन आदि; (3) आधिभौतिक, जैसे – मरे हुए पितरों को देखना, स्वप्न में महिषारोहण का दर्शन, मस्तक में कपोत, काक, पेचक का गिरना। किसी-किसी के अनुसार ‘विपरीतदर्शन’ (अर्थात् प्राकृतिक नियम के अनुसार जिसको जैसा होना चाहिए, उसको उससे विपरीत रूप से देखना) ही आधिदैविक है। अन्य आचार्य कहते हैं कि अरिष्टदर्शन का स्वरूप ही है – विपरीत-दर्शन। स्वप्न भविष्यत् अर्थ का सूचक है – यह मत प्रायः सभी दर्शनों को अनुमत है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अरुणान्याय

“अरुणया पिङ्गाक्ष्या एकहायन्या गवा सोमं क्रीणाति”। इस ज्योतिष्टोम प्रकरणस्थ वाक्य में केवल अरुणत्व गुण अर्थात् रक्त रूप सोम के क्रयण का साधन नहीं बन सकता क्योंकि अरुणा शब्द में स्त्रीलिंगत्व बोधक टाप् प्रत्यय का योग होने से अरुणा शब्द आरुण्य विशिष्ट गो पदार्थ का बोधक होगा। अतः आरुण्य गुण विशिष्ट लाल गौ सोमक्रयण का साधन बन सकता है केवल आरुण्य गुण नहीं”। फिर भी यहाँ सोमक्रयण के प्रति आरुण्य धर्म की ही प्रधानता होती है, गौ की नहीं। यह अरुणान्याय है। इस न्याय से “देवाः श्रद्धां जुहवति” यहाँ पर भी श्रद्धा गुण का हवन असंभव होने से श्रद्धा धर्म वाले मन का हवन प्रतिपादित होता है। किन्तु ऐसा होने पर भी श्रद्धा ही हवनीय रूप में मुख्य मानी जाती है और मन गौण माना जाता है (अ.भा.पृ. 833)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अर्चन

विष्णु की प्रीति के निमित्त प्रतिमा आदि पर गंध, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य आदि का अर्पण रूप व्यापार अर्चन है। यह श्रवण कीर्तन आदि व्यापार से पृथक् है (शा.भ.सू.वृ.पृ. 160)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अर्चावतार

मन्त्रादि द्वारा संस्कार की गयी मूर्ति को अर्चावतार कहते हैं। ऐसी मूर्ती पूजा के निमित्त हुआ भगवान का अवतार विशेष है (शा.भ.सू.वृ.पृ. 151)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अर्चिमार्ग

ऊर्ध्व गति को या ब्रह्म गति को प्राप्त कराने वाला मार्ग अर्चिमार्ग है। यह मार्ग ज्ञानी भक्त को प्राप्त होता है। इसी मार्ग का वर्णन “अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्”, इस वचन द्वारा किया गया है। इसके विपरीत अज्ञानियों का मार्ग धूममार्ग है, जिससे पुनः अधोगति प्राप्त होती है। इसका वर्णन “धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्”, इस वचन से किया गया है (अ.भा.पृ. 822)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अर्थभावन

अर्थभावन का सम्बन्ध जप से है। जप्य मन्त्र (प्रणव अर्थात् ओंकार प्रधान जप्य मन्त्र है) का जिस अर्थ में संकेत किया गया है (पूर्व-पूर्व आचार्यों के द्वारा) उस अर्थ का स्मरण करना तथा चित्त में उसका निवेशन करना अर्थभावन है। प्रणव मन्त्र अनादि, मुक्त ईश्वर के लिए संकेतित हुआ है। अतः योगशास्त्र में अर्थभावन से प्रणवार्थभावन (उपर्युक्त पद्धति के अनुसार) लिया जाता है। यह अर्थभावन स्वाध्यायरूप योगांग के अन्तर्गत है। इस भावन से साधक प्रत्यक् चेतन का अधिगम करने में समर्थ होता है (द्र. योगसूत्र 1/28 -29)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अर्थवत्त्व

भूतों तथा इन्द्रियों के जिन पाँच रूपों में संयम करने से भूतजय तथा इन्द्रियजय होता है, ‘अर्थवत्त्व’ उन रूपों में एक है। यह भूत तथा इन्द्रिय का चरम रूप है (योगसूत्र 3/44)। व्यासभाष्य में भूत से सम्बन्धित अर्थवत्त्व के विषय में इतना ही कहा गया है कि ‘भोग और अपवर्ग रूप जो दो अर्थ हैं, वे गुणों में अन्वित रहते हैं और तन्मात्र, भूत एवं भौतिक-रूप पदार्थ गुणों के सन्निवेशमात्र हैं। इन्द्रिय से सम्बन्धित अर्थवत्त्व है – त्रिगुण में अनुगत पुरुषार्थता। भोग-अपवर्गजनन-रूप परार्थता ही यह अर्थवत्त्व है। भूतों के अर्थवत्त्वरूप में संयम करने पर यत्रकामावसायिता-रूप सिद्धि उत्पन्न होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अर्धत्र्यम्बक मठिका

त्र्यम्बकादित्य से अपनी पुत्री के द्वारा प्रतिष्ठित करवाई गई अद्वैत प्रधान शैवशास्त्र की मठिका। (तं. अ., 36-11, 12)। संभवतः पर्याप्त मात्रा में विकसित न हो सकने के कारण ही इस मठिका को अधूरी मठिका माना गया हो। वर्तमान काल में शैव दर्शन की अर्धत्र्यम्बक शाखा प्रचलन में नहीं है, परंतु अभिनवगुप्त के समय अर्थात् ग्यारहवीं शताब्दी तक, यह अवश्य ही प्रचलित थी। अभिनवगुप्त ने तंत्रालोक में इस मठिका के तत्कालीन प्रधानगुरु जालंधरपीठ (कांगड़ा) के निवासी श्री शंभुनाथ की भिन्न भिन्न संदर्भो में अत्यधिक प्रशंसा की है जिससे इस शाखा के महत्व पर भी प्रकाश पड़ता है। (तन्त्रालोक, 1-13; वही, 4-266 इत्यादि)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अर्धमात्रा

“अर्धमात्रा स्थिता नित्या याsनुच्चार्या विशेषतः” (1/74) दुर्गा सप्तशती के इस श्लोक में अर्धमात्रा को अनुच्चार्य (जिसका उच्चारण नहीं किया जा सकता) माना है। हृस्व स्वर का उच्चारण काल ‘मात्रा’ कहलाता हैं योगिनी हृदय के टीकाकार अमृतानन्द योगी (दीपिका, पृ. 53) के अनुसार बिन्दु से लेकर समना पर्यन्त प्रणव कलाओं के उच्चारण का काल अर्धमात्रा है। दुर्गा सप्तशती के उक्त श्लोक की व्याख्या में भास्कर राय ने भी यही कहा है। वे इसको अनुच्चार्य इसलिये मानते हैं कि प्रणव अथवा पिण्ड मन्त्र में स्थित इन कलाओं का उच्चारण नहीं किया जा सकता। ये केवल भावना गम्य हैं, अतः केवल योगी ही इनका साक्षात्कार कर सकते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

अर्धसम्पत्ति

मूर्छा आदि के अनन्तर मुग्ध भाव में रहने वाले जीवित व्यक्ति को हुई प्रतिपत्ति बुद्धि या ज्ञान अर्धसम्पत्ति है। यह प्रतिपत्ति अर्ध ही होती है, संपूर्ण नहीं अर्थात् मूर्छा आदि के अनन्तर की अवस्था में व्यक्ति की बुद्धि सामान्यात्मक होती है, विशेष का निश्चय नहीं कर पाती। इसीलिए फलेच्छा आदि विशेषण के न होने से उस व्यक्ति का काम्य यज्ञादि कर्म में अधिकार नहीं होता। केवल अधिकार के अन्यतम प्रयोजक जीवित्व के कारण पहले से प्रवृत्त अग्निहोम आदि कर्म ही कर पाता है। इसी प्रकार अन्य लौकिक व्यवहार भी उसका वही होता है जो पहले से प्रवृत्त है (अ.भा.पृ. 894)।
वेदांत में प्रस्तुत इस प्रसंग से विद्ध किया गया है कि मुग्ध भाव के कारण ही व्यक्ति को हुई प्रतिपत्ति अर्धसम्पत्ति होती है। अर्थात् विशेष का निर्धारण न कर पाने वाली सामान्यात्मिका बुद्धि होती है। ऐसा नहीं है कि मुग्धावस्था में उसके शरीर में किसी अन्य जीव का प्रवेश होने के कारण अर्धसम्पत्ति होती है। इसीलिए कहीं पूर्वानुस्मृतिका हेतु प्राप्त हो जाने पर मुग्ध को भी संपूर्ण बुद्धि हो जाती है। भिन्न जीव का प्रवेश मानने पर ऐसा कथमपि नहीं होता। इसीलिए सुषुप्ति के पूर्व जो जीव रहता है, वही सुषुप्ति के बाद भी रहता है, यह वेदांत का मान्य सिद्धांत है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अलब्धभूमिकत्व

यह योगाभ्यास के नौ अन्तरायों (=विघ्नों) में एक है (योगसू. 1/30)। व्यासभाष्य के अनुसार इसका लक्षण है – मधुमती आदि समाधि-भूमियों में से किसी की भी प्राप्ति न होना। किसी बाधक हेतु के कारण ही इन भूमियों की प्राप्ति नहीं होती है, यद्यपि भूमि की प्राप्ति के लिए प्रयास किया ही जाता है। दीर्घकाल तक प्राप्ति न होने पर साधक योगाभ्यास को छोड़ सकता है – इस दृष्टि से ही अलब्धभूमिकत्व को अन्तराय के रूप में माना गया है। भूमि का अर्थ है चित्त का वह धर्म जो अनायास उदित होकर दीर्घकाल तक वर्तमान रह सके। वितर्क आदि (योगसू. 1/17) को भी कोई-कोई भूमि कहते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अलिंग

लिंग’ बुद्धि है। अतः बुद्धि का उपादानभूत त्रिगुण (जो साम्यावस्थापन्न है और ‘प्रधान’ शब्द से अभिहित होता है) अलिंग कहलाता है। चूंकि साम्यावस्था भी गुणत्रय की एक अवस्था है, अतः ‘अलिंग-परिणाम’ शब्द भी प्रयुक्त होता है। इसको अलिंग कहने का अभिप्राय यह है कि यह कहीं भी लीन नहीं होता – साम्यावस्था का कोई उपादान कारण नहीं है। यह स्पष्टतया ज्ञातव्य है कि इस अलिंगावस्था का हेतु पुरुषार्थ नहीं है। यह परिणामी -नित्य है। सभी व्यक्त पदार्थों का यह लयस्थान है। इसके तीन महत्वपूर्ण विशेषण ‘निःसत्तासत्त’, ‘निःसदसत्’ एवं ‘निरसत्’ व्यासभाष्य 2/19 में दिए गए हैं, जिनसे अलिंग अवस्था का पारमार्थिक स्वरूप ज्ञात होता है। द्र. ‘अव्यक्त;, ‘साम्यावस्था’।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अलिंगपरिणाम

गुणत्रय का परिणाम चार प्रकार का होता है – विशेष, अविशेष, लिंगमात्र और अलिंग। इस अलिंग नामक परिणाम में लिंगमात्र का लय होता है। यह वस्तुतः गुणसाम्य की अवस्था है। चूंकि त्रिगुण परिणामशील है, अतः इस अवस्था में भी गुणपरिणाम नष्ट नहीं होता; इस अवस्था में जो परिणाम होता है, उसको ‘सदृश परिणाम’ कहा जाता है। गुणत्रय के प्रथम तीन परिणामों का हेतु है पुरुषार्थ। चूंकि इस अलिंगपरिणाम का कोई हेतु नहीं है, अतः यह अवस्था ‘नित्या’ मानी जाती है। इस अवस्था को ‘निःसत्त-असत्त’ कहा जाता है, क्योंकि यह अवस्था पुरुषार्थ -क्रिया को करने में समर्थ नहीं है तथा यह तुच्छ (सत्ताहीन) भी नहीं है (व्यासभाष्य 2/19)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अवतार (अवतरण)

स्वसंकल्पपूर्वक भक्त वात्सल्य आदि अनेक गुणों से परिपूर्ण हो भगवान् इस प्रकार विग्रह को प्रक्रट करे कि मानो वह भक्तादि के पराधीन हो तो उसे अवतार कहते हैं। सभी अवतारों में ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज इन षड्गुणों की समान रूपता रहती है।
अवतार के चार भेद हैं – (1) गुणावतार, (2) लीलावतार, (3) विभवावतार, (4) अर्चावतार।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अवतार (अवतरण)

(1) सत्त्व, रज और तम गुणों को उपाधि बना कर हुआ अवतार गुणावतार है। जैसे, सत्त्वगुणोपाधिक विष्णु, रजो गुणोपाधिक ब्रह्मा एवं तमो गुणोपाधिक रुद्र, ये तीनों गुणोपाधिक अवतार गुणावतार हैं।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अवतार (अवतरण)

(2) स्वेच्छा से ग्रहण किया हुआ लीला शरीर रूप अवतार लीलावतार है। जैसे, मत्स्यादि अवतार। लीलावतार कल्प भेद से अनन्त होते हैं।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अवतार (अवतरण)

(3) स्वच्छन्दतापूर्वक गमनागमन एवं संश्लेष विश्लेष के योग्य दिव्य देह में प्रकटित अवतार विभवावतार है।
विभवावतार के दो भेद हैं – स्वरूपावतार और आवेशावतार। सर्वेश्वरत्व एवं अपने अलौकिक रूप को अन्य सजातीय रूप में प्रकट कर स्थित अवतार स्वरूपावतार है। इसके भी दो भेद हैं – मनुजावतार, जैसे -राम -कृष्ण आदि। अमनुजावतार, जैसे -देव तिर्यक रूप में उपेन्द्र, मत्स्य आदि अवतार।
आवेशावतार के दो भेद हैं – स्वरूपावेशावतार और शक्त्यावेशावतार। किसी चेतन में अपने स्वरूप से सन्निहित होकर स्थित अवतार स्वरूपावतार है। जैसे, कपिल, व्यास, परशुराम आदि। किसी चेतन में अपनी शक्ति से सन्निहित होकर स्थित अवतार शक्त्यावेशावतार है, जैसे, पृथुधन्वंतरि प्रभुति।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अवतार (अवतरण)

(4) अर्चावतार वह है जहाँ मंत्र संकल्प आदि के वश भगवान् सन्निहित होते हैं। जैसे, मन्त्रादि से संस्कार की हुई शालग्राम आदि मूर्ति अर्चावतार है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

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