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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अपरोक्ष ज्ञान

इंद्रिय अर्थ के सन्निकर्ष से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष होता है, अनुमान, शब्द आदि से जन्य ज्ञान को परोक्ष कहते हैं। प्रत्यक्ष ज्ञान साक्षात् होता है। अपरोक्ष ज्ञान उस ज्ञान को कहते हैं जो प्रत्यक्ष की तरह साक्षात् होता है, जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय के बीच में कोई तीसरी वस्तु होती ही नहीं परंतु जो साक्षात् होता हुआ भी इंद्रियजन्य नहीं होता है। प्रत्येक प्राणी अपने आप को अपरेक्ष ज्ञान के द्वारा स्वयं साक्षात् जानता है कि मैं हूँ।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अपवर्ग

दृश्य को भोगापवर्गार्थ माना गया है (योगसूत्र 1/18) – भोग और अपवर्ग जिसके प्रयोजन हैं – वह भोगापवर्गार्थ हैं। यह अर्थ या पुरुषार्थ रूप अपवर्ग कैवल्य-मोक्ष नहीं है। चित्त से भिन्न अपरिणामी दृष्टा पुरुष है – इस प्रकार का अवधारण (निश्चय) अपवर्ग है। यह एक प्रकार का ज्ञान है जैसा कि व्यासभाष्य में कहा गया है – भोक्ता का स्वरूप-अवधारण या दृष्टा की स्वरू -उपलब्धि अपवर्ग है (2/18, 23)। भोग एवं अपवर्ग दोनों बुद्धिस्थ, बुद्धिकृत हैं; दोनों अनादि भी हैं। भोग की समाप्ति अपवर्ग में और इन दोनों की समाप्ति कैवल्यावस्था में होती है। कैवल्य में चित्तवृत्तिरूप ज्ञान नहीं रहता, अतः पुरुषावधारण रूप ज्ञान (अपवर्ग) भी कैवल्य में नहीं रहता। अपवर्ग (पुरुषस्वरूपावधारण) होने पर कुछ प्राप्तव्य नहीं रह जाता। चूंकि पुरुषावधारण के बाद कुछ करणीय नहीं रहता, सभी फलों का त्याग हो जाता है, अतः यह अपवर्ग (अप+वृज् धातु; यह धातु वर्जनार्थक है) कहलाता है। अपवर्ग सिद्ध होने पर कैवल्य होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अपवेद्य सुषुप्ति

देखिए सुषुप्ति।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अपसंहार दर्शन

सामान्य अर्थ में प्राप्त का किसी विशेष अर्थ में संकोच का देखा जाना उपसंहार दर्शन है। अथवा सामान्यतः प्राप्त का किसी विशेष अर्थ में संपादन या निरूपण का देखा जाना या अपेक्षा का देखा जाना उपसंहार दर्शन है। जैसे, सामान्यतः कुलाल जाति में प्राप्त घटकर्तृत्व संकुचित होकर दंड चक्रचीवरादि से युक्त कुलाल में ही देखा जाता है, न कि सभी में, तो इसे उपसंहार दर्शन कहते हैं (अ.भा.पृ. 595)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अपहतपाप्या

सभी पापों से रहित।
साधक के पाशुपत विधि के अनुसार पाशुपत योग का पालन करने पर उसके समस्त पापों का क्षय हो जाता है। पाशुपत मत में पाप दो तरह के माने गए हैं – सुखलक्षण वाले तथा दुःखलक्षण वाले। उन्माद, मद, मोह, निद्रा, आलस्य, कोणता (कँपकँपी की बीमारी वाली अवस्था), लिङ्गरहित (पाशुपत मत को बताने वाले भस्मादि चिन्हरहित रहना), झूठ बोलना तथा बहुत भोजन करना आदि सुखलक्षण वाले पाप माने गए हैं; क्योंकि इन पापों को मनुष्य सुख प्राप्‍ति तथा आत्मतृप्‍ति के लिए करता है। शिरोवेदना, दंतपीड़ा, अक्षिपीड़ा आदि के कारणभूत पाप दुःखलक्षण वाले पाप माने गए हैं; क्योंकि यह शारीरिक पीड़ा देने वाले होते हैं और मनष्य का इन पर वश नहीं रहता है। पाशुपत साधक के इन सभी तरह के पापों के क्षय होने पर वह अपहत पाप्या अर्थात् पापों से पूर्णतया मुक्‍त हो जाता है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 80)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अपान

पंच प्राणों में से एक (प्राण वायु-विशेष या हवा नहीं है; इसको आज की भाषा में देहधारण-शक्ति कहा जा सकता है)। अपान का मुख्य स्थान वायु और उपस्थ है। वस्तु मल का अपनयन जिन शरीर-यंत्रों की क्रिया से अथवा जिन शरीरावयवों के माध्यम से होता है, वे सब अपान का स्थान हैं। जीर्ण खाद्य से मलांश को पृथक् करना मात्र अपान का व्यापार है; उस मल को शरीर से पृथक् निक्षिप्त करना वायु का व्यापार है – यह विवेक करना चाहिए। वायु के व्यापार में अपान सहायक है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अपान (प्राण)

अपान शैव दर्शन में उपादान करने वाली प्राणवृत्ति को कहते हैं। प्राणी शरीर द्वारा, इंद्रियों द्वारा, अंतःकरणों द्वारा तथा प्राणवायु के द्वारा और उससे उत्पन्न होने वाली वाणी के द्वारा जिस जिस भी उपादान करने की अर्थात् ग्रहण या आत्मसात्करण की क्रिया को करता रहता है वह क्रिया उसका अपान कहलाता है। शैव योगाभ्यास में बाह्य आकाश से हृदय तक संचार करने वाले प्राण वायु को अपान कहते हैं। अपान प्राणन-क्रिया का अर्थात् जीवित रहने की क्रिया का वह स्वरूप है जिसके द्वारा विषयों का उपादान हुआ करता है। अपान नामक प्राण के सूक्ष्मतर स्वरूप का साक्षात्कार योगी को नाभिमंडल के पास और उससे नीचे होता है। अतः नाभि से गुदा द्वार तक अपान नामक प्राण की व्याप्ति मानी गई है। (तंत्र आत्मविलास, पृ. 54, वही. पृ. 56, वही, आ. 6-186, वही, वि. पृ. 155)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अपितत्करण

पाशुपत योग की विशेष साधनाओं में से एक।
इसका अर्थ है सभी निंदनीय क्रियाओं को करना। पाशुपत साधक को क्राथन आदि सभी निंदनीय क्रियाएँ करनी होती हैं। यह नहीं, कि वह क्राथन, स्पंदन, मंटन आदि में से कोई एक क्रिया ही करे, अपितु उसे सभी क्रियाओं को करना होता है। तब कहीं योग सिद्‍धि होती है। इन सभी क्रियाओं के करने पर लोग कहेंगे कि यह पुरुष अनुचित कार्यों का कर्ता है। इसे शुचि, अशुचि, कार्य अकार्य का ज्ञान नहीं है। इन निंदा से वह पापों से छुटकारा पाता हुआ पुण्यों का ही अर्जत करता रहेगा और अंतत: शुद्‍धि को प्राप्‍त करेगा। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 87)।
गणकारिका की टीका के अनुसार पाशुपत साधक को कार्य और अकार्य के विवेक से शून्य होकर, अर्थात् क्या उचित है क्या नहीं इन बातों का ध्यान छोड़कर, ऐसे ऐसे कार्य करने होते हैं, जिनसे लोकनिंदा होती रहेगी। यही साधक की अपितत्करण नामक योग क्रिया है। (ग. का. टी. पृ. 19)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अपितद्‍ भाषण

पाशुपत योग की विशेष साधना का एक प्रकार।
पाशुपत मत में अपितद्‍भाषण भी एक साधना है जिसमें साधक को अनर्गल बोलते जाना होता है, ताकि लोग यह समझें कि यह पुरुष वक्‍तव्य तथा अवक्‍तव्य में अंतर नहीं जानता है, अनर्गल प्रलाप करता है। तब वे उसकी निंदा करने लग जाते हैं। ऐसी निंदा से साधक के सभी पापों का क्षय होता है (पा. सू. कौ. भा. पृ. 87)। क्योंकि परिभव के होने पर साधक श्रेष्‍ठ तप का अभ्यास करने वाला योगी बन जाता है। (परिभूयमानो हि विद्‍वान् कृत्स्‍नतपा भवति पा. सू. 3-19)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अपोहन

परमार्थतः अपोहन व्यापार की कोई स्थिति नहीं है, किन्तु जागतिक व्यवहार का संचालन ज्ञान, स्मृति और अपोहन नाम की शक्ति के सहारे चलता है। “मतः स्मृतिर्ज्ञानमपोहन च” (भ. गी. 15/15), “स्यादेकश्चिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहन-शक्तिमान्” (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा 1/3/7) इत्यादि वचनों में इन्हीं व्यापारों की चर्चा की गई है। बौद्ध दर्शन में भी एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ को अलग करने के लिये, एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ का भेद बताने के लिये अपोह की कल्पना की गई है। महेश्वरानन्द ने महार्थमंजरी की स्वोपज्ञ परिमल व्याख्या (पृ. 135-136) में अपोहन व्यापार की विस्तृत व्याख्या की है। भगवद् गीता (15/15) के भाष्य में रामानुजाचार्य ने अपोहन शब्द को ऊह का पर्यायवाची माना है और इसकी परिभाषा यह की है – ऊह का कार्य यह देखना है कि किसी भी प्रमाण की प्रवृत्ति सही ढंग से हो रही है या नहीं ?
Darshana : शाक्त दर्शन

अपोहनशक्ति

परमेश्वर के परिपूर्ण एवं अखंड स्वरूप में भेद की स्थिति को आभासित करने वाली पारमेश्वरी शक्ति जो वस्तुतः समस्त आंतर एवं बाह्य संवित् में उससे अभिन्न एवं अखंड रूप में स्थित है। यही इसकी परिपूर्णता है। परंतु परमेश्वर अपने इस संविद्रूप में भेद का आभास करता हुआ अपने परिपूर्ण आनंद का उपभोग करता रहता है। परिपूर्ण तत्त्व में भेद का आभासन हो ही नहीं सकता। अतः परमेश्वर अपने परिपूर्ण स्वरूप के भीतर ही विच्छिन्नता या संकुचितता का अवभासन करता है, तब कहीं प्रमाता से प्रमेय को भिन्नतया अवभासित किया जाता है। परमेश्वर के भीतर ही इस प्रकार की विच्छिन्नता को अवभासित करने के प्रति जो स्वाभाविक उन्मुखता उसमें रहती है, वही उसकी अपोहनशक्ति कहलाती है। उसकी यही शक्ति भेद का आभासन करवाती है। परमेश्वर की यह शक्ति प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय में; प्रमाता-प्रमाता में, प्रमेय प्रमेय में सर्वथाभेद को आभासित कर देती है। ऐसा होने पर ही ज्ञातृ-ज्ञेय भाव और स्मर्तृ-स्मार्य भाव भी आभासित होते हैं। (ई, प्र. वि. खं. 1, पृ. 110)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अप्रकृति-अविकृति

सांख्यकारिका (3) में पुरुष को ‘अप्रकृति-अविकृति’ कहा जाता है। पुरुष निष्क्रिय एवं अपरिणामी होने के कारण किसी का कारण (उपादान) नहीं है, अतः वह अप्रकृति है। निरवयव एवं असंहत होने के कारण पुरुष किसी का कार्य (विकार) भी नहीं है, अतः वह अविकृति है। पुरुष यद्यपि अप्रकृति है, पर वह बुद्धि आदि की व्यक्तता का निमित्त कारण है – यह ज्ञातव्य है। पुरुष को अप्रकृति कहने से यह ध्वनित होता है कि सांख्यीय दृष्टि में शुद्ध चेतन वस्तु जगत् का उपादान नहीं है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अप्रतीघात

पाशुपत सिद्‍धि का एक लक्षण।
पाशुपत मत के अनुसार युक्‍त साधक प्राप्‍त सिद्‍धियों के सामर्थ्य से अपने समस्त अभिप्रेत स्थानों व देशों में घूम फिर सकता है। उसको किसी तरह का कोई प्रतीघात (बाधा) नहीं पड़ता है। वह प्राकार के बीच में से संक्रमम करके बाहर जा सकता है; समुद्र के तल तक पहुँच सकता है; बिना किसी वायुयान के इच्छामात्र से देश देशांतरों का भ्रमण कर सकता है। उसे देश – काल का प्रतीघात अर्थात् रुकावट कहीं नहीं आती है। (ग. का. टी. प. 10)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अप्रबुद्ध

अबुद्ध। वह जीवन जिसे स्वरूप साक्षात्कार के उद्देश्य से दिए गए किसी भी उपदेश से कोई लाभ नहीं होता है, जो सदा अज्ञान की ही स्थिति में पड़ा रहता है। इस प्रकार स्वरूप साक्षात्कार का उपदेश देने वाले शास्त्रों का भी उसके लिए कोई उपयोग नहीं होता है। ऐसा जीव यदि कोई अभ्यास कर भी ले, उससे भी उसे कोई अंतर नहीं पड़ता है। परिणामस्वरूप वह ईश्वर के शक्तिपात से वंचित रहता है और संसृति के चक्कर में फँसा रहता है। (स्पन्दविवृति पृ. 9, 58, 67)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अप्रमाद

पाशुपत योग में यमों का एक प्रकार।
पाशुपत योगी को सभी यमों का पालन करते हुए अप्रमादी रहना होता है; अर्थात् बहुत ध्यानपूर्वक रहना होता है; क्योंकि अप्रमाद, दम (संयम) तथा त्यागवृत्‍ति ब्राह्मण के घोड़े होते हैं, मन रथ होता है, शील लगाम होती है। मन रुपी ऐसे रथ पर साधक आरूढ होकर जन्म व जरा के पाशों का क्षय करके अप्रमादी बनकर ब्रह्मभाव को प्राप्‍त करता है। अतः अप्रमाद एक बहुत आवश्यक यम है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 33, 141)।
भासर्वज्ञ ने अप्रमाद को पंचम प्रकार का बल माना है। जब पाशुपत साधक की निश्‍चल स्थिति केवल शुद्‍ध ज्ञान में ही रहती है, उसकी ऐसी अवस्था को उन्होंने अप्रमाद कहा है। (ग. का. टी. पृ. 7)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अंबा

परमशिव की वह स्वभावभूत शक्ति जो सर्वथा पूर्ण अद्वैत पद पर ही आरूढ़ रहती है। समस्त प्रपंच में परमेश्वर की निग्रह तथा अनुग्रह लीलाओं एवं इस प्रपंच को टिकाए रखने की लीला का संचालन करने वाली परमेश्वर की चार शक्तियों में प्रमुख शक्ति। (मा. वि. तं., 3-5; शिवसूत्रवार्तिक (भास्कर), पृ. 7)। अंबा ही निग्रह और अनुग्रह लीलाओं को चलाने के लिए ज्येष्ठा, रौद्री और वामा नामक तीन रूपों में प्रकट होती है। ज्येष्ठा अनुग्रह लीला को तथा वामा निग्रह लीला को चलाती है। संसार को टिकाए रखने की लीला को रौद्री चलाती है। (तन्त्रालोक, 6-57)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अभयत्व

पाशुपत सिद्‍धि का लक्षण।
पाशुपत शास्‍त्र के अनुसार मुक्‍त साधक को योग की उच्‍च भूमि पर अधिष्‍ठित होने के उपरांत किसी तरह का भय नहीं रहता है, अर्थात् भूत, वर्तमान व भविष्य संबंधी किसी भी बात का डर उसे नहीं रहता है। साधक की इस प्रकार की स्थिति अभयत्व कहलाती है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 49; ग. का. टी. पृ. 10)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अभाव

सांख्ययोग चूंकि सत्कार्यवाद का प्रतिपादक है, इसलिए इस शास्त्र की दृष्टि में अभाव का अर्थ अस्तित्वहीनता न होकर अवस्थान्तरता है। त्रिगुण-परिणामभूत वस्तु निरन्तर परिणत होती रहती है अर्थात् एक अवस्था से दूसरी अवस्था में – स्थूल से सूक्ष्म में एवं सूक्ष्म से पुनः स्थूल अवस्था में – परिणत होती रहती है। मिट्टी जब घटाकार-अवस्था में है तब उसमें पिण्डाकार का अभाव है अर्थात् पिण्डाकार अतीत अवस्था में है। उसी प्रकार जब चित्त में क्रोध है तब रागधर्म का अभाव है – वह धर्म अनागत अवस्था में है, क्योंकि बाद में चित्त में रागधर्म आविर्भूत हो सकता है। इस दृष्टि से दुःखाभाव का अर्थ होगा – सदा के लिए दुःख की अव्यक्तावस्था-प्राप्ति। द्र. योगसूत्र 4/12 की टीकाएँ।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अभावप्रत्यय

निद्रारूप वृत्ति के लक्षण में यह शब्द योगसूत्र (1/10) में प्रयुक्त हुआ है। प्रायः सभी व्याख्याकार प्रत्यय को कारण (हेतु) का वाचक समझते हैं। अतः अभावप्रत्यय का अर्थ होता है – अभाव का हेतु। निद्रा के प्रसंग में जाग्रतावस्था एवं स्वप्नावस्था का अभाव ही इस अभाव शब्द से लिया जाता है। तमः विशेष (सत्त्व-रजः का आच्छादक भाव-विशेष) के आविर्भाव से जाग्रत और स्वप्नावस्था नष्ट हो जाती है और सुषुप्ति अवस्था आती है, अतः यह तमः विशेष ही अभावप्रत्यय है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अभिनिवेश

पाँच प्रकार के क्लेशों में अभिनिवेश एक है। इसका स्वरूप है मरणभय – ऐसा प्रायः कहा जाता है (द्र. योगसूत्र 2/9 की टीकाएँ)। यह भय स्वभावतः किसी हेतु के बिना – वासनावश सभी प्रकार के प्राणियों में विद्यमान रहता है और प्राणी को क्लिष्ट करता रहता है। व्याख्याकारगण कहते हैं कि इस मरणभय (नामान्तर ‘आत्माशी’: द्र. तत्ववै.) से अनुमित होता है कि प्राणी का पूर्वजन्म था (पहले कभी प्राणी जन्म लेकर मृत हुआ था)। यह मरण -भयरूप क्लेश श्रवण-मनन-जात प्रज्ञा से युक्त व्यक्तियों में भी रहता है – आत्म-साक्षात्कारी में नहीं रहता। कुछ व्याख्याकार कहते हैं कि मरणभय अभिनिवेश क्लेश का एक उत्कृष्ट उदाहरणमात्र है; वस्तुतः भयमात्र अभिनिवेश है। (कोई कहते हैं कि सुखदुःखः, विवेकहीन मोहविशेष अभिनिवेश है)। अभिनिवेश अज्ञानमूलक है, क्योंकि आत्मभाव का ध्वंस या परिणाम नहीं हो सकता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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