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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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अहंकार

सांख्य में यह एक तत्त्व है जो महत्तत्त्व से उद्भूत होता है। इसका लक्षण या धर्म अभिमान (अहन्ता-ममता-रूप) है। युक्तिदीपिका में अभिमान को ‘स्वात्मप्रत्यविमर्श’ कहा गया है (सांख्यका. 24)। आचार्यों ने इसे रजःप्रधान माना है (बुद्धि या महत्तत्त्व सत्त्वप्रधान है)। यह अस्मिता अथवा अस्मितामात्र शब्द से भी अभिहित होता है। यह सात ‘प्रकृति-विकृतियों’ में से एक है (सांख्यका. 3) – इन्द्रियों का उपादान होने के कारण ‘प्रकृति’ और बुद्धि से उद्भूत होने के कारण ‘विकृति’ – ऐसा समझना चाहिए। योगसूत्र में यह अविशेषों में गिना गया है; भाष्यकार ने इसको षष्ठ अविशेष कहा है (2/19)। अहंकार के वैकारिकनामक सात्त्विक भाग से दश इन्द्रियाँ तथा मन और इसके तामस भाग भूतादि से पाँच तन्मात्र उद्भूत होते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अहंकार

संकुचित अहम्। बुद्धि तत्त्व से प्रकट होने वाला दूसरा अंतःकरण। शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण ‘अहं’ का ही अतीव संकुचित रूप। ‘अहंकार’ में ‘कार’ को कृत्रिमता का वाचक मानकर अहंकार को कृत्रिम ‘अहं’ भी कहा जाता है। बुद्धि तत्त्व में प्रतिबिम्बित सभी प्रमेय पदार्थो के प्रति बुद्धि तत्त्व में ही प्रतिबिम्बित पुरुष का निश्चित रूप से संकुचित प्रमातृभाव का अभिमनन करना उसका अहंकार कहलाता है। वह इसी के द्वारा यह समझने लगता है कि ‘मैं यह देह आदि हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं चलता हूँ’ इत्यादि। संरंभ रूप अर्थात् क्रिया रूप होने के कारण अहंकार को प्राण, अपान आदि पाँचों प्राणों को प्रेरित करने वाला भी माना गया है। (तन्त्र सार , पृ. 89-8 ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, 2, पृ. 212)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अहमंश विश्रांति

अपनी शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संवित् रूपता पर स्थिति। चैतन्यात्मक शुद्ध प्रकाश रूप अहं पर स्थिति। परिपूर्ण अहमंश में किसी भी प्रकार का द्वैताद्वैत या द्वैत भाव नहीं रहता है। यहाँ सभी प्रमेय पदार्थ शुद्ध प्रकाश रूप में ही चमकते हैं। इदंता का वहाँ आभास तक नहीं होता है। इस प्रकार संपूर्ण सृष्टि को अपनी ही शुद्ध प्रकाशरूपता का विकास समझते हुए उसी परिपूर्ण प्रकाशरूपता पर स्थिति ही अहमंश विश्रांति है। (भास्करी 1, पृ. 176-177)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अहमितिपूर्वापरानुसंधान

किसी वस्तु विशेष, भाव या अवश्ता के स्मृति काल के प्रथम क्षण में ही होने वाला वह अतिसूक्ष्म संवेदन या परामर्श जिसमें यह विमर्श होता है कि अमुक वस्तु, भाव या अवस्था के प्रत्यक्ष ज्ञान के समय जो ‘अहम्’ अर्थात् ‘मैं’ था वही ‘अहम्’ उनके स्मृति काल की अवस्था में भी है। इस विमर्श के बिना किसी वस्तु आदि का स्मरण नहीं हो सकता है। यह विमर्श ही अनुभव और स्मृति को परस्पर जोड़ता है। (भास्करी 1, पृ. 136-137)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अहमिदम्

सदाशिव तत्त्व के मंत्रमहेश्वर (देखिए) नामक प्राणियों का अपने शुद्ध अहं के प्रति तथा सृष्ट होने वाले समस्त प्रपंच के प्रति भेदाभेदात्मक दृष्टिकोण। अहमिदम अर्थात् ‘मैं यह प्रमेय तत्त्व हूँ’, मुझ में ही प्रमेयता का आभास स्थित है। इस विमर्श में प्रकाश रूपता की ही प्रधानता रहती है। इस प्रकार इस दृष्टिकोण में शुद्ध अहं में इदंता अर्थात् प्रम़ेयता का बहुत ही धीमा सा आभास होता है। इसी दृष्टिकोण को उत्कृष्टतर शुद्ध विद्या कहते हैं। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, 2, पृ. 197-197)। देखिए इदम् अहम्।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अहम्

प्रकाश की अपनी ही शुद्ध प्रकाशरूपता में विश्रांति अर्थात् अपनी शुद्ध संविद्रूपता का परामर्श। (अ. प्र. सि., 22)। जब अकारात्मक अनुत्तरतत्त्व ही हकारात्मक अपनी परा विसर्ग शक्तिरूपता में आभासित होता हुआ अपनी ही पर संविद्रूपता में बिंदु (देखिए) रूप से अविभागतया विश्रांति को प्राप्त करता है तो उसे अहं कहते हैं। (तन्त्रालोक 3-201, 202, वही पृ. 194)। अनुत्तरशिव तथा विसर्गात्मक शक्ति का सामरस्य रूप। अ से लेकर ह पर्यांत समस्त परामर्शो का एकरस स्वरूप। (वही, 3-203, 204)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अहम्परामर्श / अहम्प्रत्यवमर्श

शुद्ध प्रकाश रूप ‘अहम्’ का अंतःविमर्शन। यह विमर्श पूर्ण स्वातंत्र्ययुक्त होता है। परमशिव में इस परिपूर्ण प्रकाश के विमर्श की अवस्था में किसी भी प्रकार की सृष्टि के प्रति किसी भी प्रकार की उन्मुखता या उमंग अभी उभरी नहीं होती है। इस प्रकार केवल अपने शुद्ध संविद्रूपता के आनंदमय सतत अंतःविमर्श को ही अहम्परामर्श या अहम्प्रत्यवमर्श कहते हैं। (ई, प्र. वि. 1-6-1)। प्रति से अभिप्राय प्रतीय या उल्टे से है। यह विमर्श बाह्य प्रमेय के प्रति न होता हुआ उल्टा अपने आपका ही विमर्शन करता है। यही इसकी प्रतीपता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अहम्महोरूप

अपने असीम, परिपूर्ण एवं शुद्ध संवित् रूप ‘अहम्’ का एकघन सामरस्यात्मक स्वरूप। छत्तीस तत्त्वों एवं उनमें स्थित सभी सूक्ष्म एवं स्थूल भावों तथा भुवनों का शुद्ध प्रकाश रूप जिसमें सभी कुछ निर्विभागतया शुद्ध प्रकाश के ही रूप में विद्यमान रहता है। सच्चिदानंदकंद एवं सर्वथा स्वतंत्र, परिपूर्ण और शुद्ध अहंता का स्वविलास रूपी विमर्शात्मक प्रकाश। (आ.वि., 3-1)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अहम्महोविलास

परमशिव की पारमेश्वरी लीला। अपने शुद्ध एवं परिपूर्ण चैतन्यात्मक अहम् का सतत विमर्शात्मक स्वरूप। संपूर्ण अंतः सृष्टि जब परमेश्वर के अपने ही आनंद से अपने में ही अपने ही आनंद के लिए बाह्य रूप धारण करने को उद्यत होती है, धारण कर रही होती है या धारण कर चुकी होती है तो इन सभी अवस्थाओं को उसका अहम्महोविलास कहा जाता है। (आत्मविलास, 3-1-, 3 )।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अहल्लिक

मिथ्या शरीर अहल्लिक कहा जाता है। “अहनि लीयते” इस व्युत्पत्ति के अनुसार दिन में-प्रकाश में-ज्ञान में जिसका लय हो जाए, वह अहल्लिक है। यह शब्द शाकल्य ब्राह्मण में आया है। “कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितं भवतीति शाकल्यप्रश्ने याज्ञवल्क्यो अहल्लिक इति होवाच”। (द्रष्टव्य. अ. भा. प्रकाश की रश्मि व्याख्या) (अ.भा.पृ. 578)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अहिंसा

पंचविध यमों में अहिंसा एक है। अहिंसा का अर्थ है अनाभिद्रोह (=प्राणियों को पीड़ा न देना)। वस्तुतः प्राणियों को पीड़ा देकर सुखी होने की इच्छा का त्याग करना अहिंसा का मानस रूप है, जो प्रकृत अहिंसा है। अस्त्रादि साधनों से पीड़ा न देना अहिंसा का वाह्य रूप है। हिंसा के मूल में द्वेष है, अतः अहिंसा के साथ मैत्री -भावना का अविच्छेद्य संबंध है। यह मैत्री सत्त्वगुणप्रधान है। योगियों की अहिंसा सर्वप्रकार के प्राणियों के प्रति, सदैव, सर्वप्रकार से होती है। शरीर धारण जब तक रहेगा तब तक प्राणी को पीड़ा देना किसी न किसी रूप में अवश्यंभावी है। इस अवश्यंभावी हिंसा से होने वाले पाप का क्षालन प्राणायामादि से हो जाता है। जाति आदि से सीमित न होने पर अहिंसा ‘महाव्रत’-संज्ञक होती है। योगशास्त्र की मान्यता है कि अहिंसा -प्रतिष्ठ योगी के निकट शत्रुभावापन्न प्राणी भी कुछ समय के लिए वैरभाव का त्याग कर देते हैं। पूर्वाचार्यों ने कहा है कि (1) अन्यान्य सभी यमनियमों का आचरण अहिंसा को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए तथा (2) सभी यमनियम वस्तुतः अहिंसा को ही विकसित करते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अहिंसा

पाशुपत योग के अनुसार यमों का एक प्रकार।

पाशुपत धर्म में हिंसा का पूर्णरूपेण निषेध किया गया है। हिंसा तीन प्रकार की कही गई है – दुःखोत्पादन, अण्डभेद (अण्डे फोड़ देना) तथा प्राणनिर्मोचन। दुःखोत्पत्‍ति क्रोधपूर्ण शब्दों से, डांटने से, मारने पीटने से तथा भर्त्सना से होती है। अतः पाशुपत साधक के लिए चारों प्रकार के जीवों (जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्‍भिज्‍ज) के प्रति दुःखोत्पादन रूपी हिंसा का पूर्ण निषेध किया गया है। अण्डभेद नामक हिंसा का भी पूर्णरूपेण निषेध किया गया है। पशुपत साधक के लिए अण्डों को ताप, अग्‍नि तथा धूम के पास लाने का तथा उन्हें जरा भी हिलाने डुलाने का पूर्ण निषेध किया गया है अर्थात् अण्डों को किसी भी कारणवश बिगाड़ना या फोड़ना निषिद्‍ध है। प्राणनिर्मोचन नामक हिंसा का भी निषेध किया गया है। पाशुपत साधक को खाने पीने के बर्तन, पहनने के कपड़े उचित ढंग से देखने होते हैं ताकि किसी भी सूक्ष्म जीव की प्राणहानि न हो, क्योंकि सूक्ष्म जीव बहुत तीव्रता से मर जाते हैं। अतः अपने प्रयोग की हर वस्तु का ध्यान से परीक्षण करना होता है। यदि सिद्‍ध साधक के द्‍वारा ज़रा सी भी हिंसा हो तो उसका उच्‍च पद से पात होता है; अर्थात् वह फिर से बंधन में पड़ जाता है। अतः पाशुपत साधक को जल छानकर पीना होता है तथा इस प्रकार से हर तरह की हिंसा से सावधान रहना होता है। पाशुपत दर्शन के अनुसार जो साधक अहिंसा का पालन करता है उसको अमरत्व प्राप्ति होती है। इस प्रकार से अहिंसा की बहुत महत्‍ता बताई गई है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 16-19)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

आनंद शक्ति (देखिए) को द्योतित करने वाला वर्ण। अ अर्थात् अनुत्तर शक्ति पर ही पूर्ण विश्रांति की स्थिति को अभिव्यक्त करने वाला आनंदशक्ति स्वरूप वर्ण। (तन्त्र सार , पृ. 12; तन्त्रालोक, 3-67,68)। अ अनुत्तर परम शिव है। आनंद उसका नैसर्गिक स्वभाव है। इसी स्वभाव के प्रभाव से परमशिव में जगत् सृष्टि के प्रति इच्छा होती है। अनुत्तर और इच्छा के बीच में आनंद की स्थिति है। इसी कारण अ और इ के बीच में आ ठहरता है। इस आ को पर विसर्ग भी कहते हैं क्योंकि सृष्टि का कारण बनने वाला पारमेश्वर विसर्ग का प्रारंभ यहीं से होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

आकाशगमन

एक सिद्धि जिसे प्राप्त करके योगी आलंबनहीन होकर विचरण कर सकता है (योगसूत्र 3/42)। इसके दो उपाय हैं – (1) शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करना तथा (2) लघुतूलसमापत्ति (अल्पभारयुक्त तूला आदि पर प्रक्रिया विशेष के अनुसार समाहित हो जाना)। ‘भारहीनता की भावना’ से शरीर -उपादान अपने गुरुत्व नामक धर्म से हीन हो जाता है, अतः शरीर लघु होता है, जिससे आकाश में चलना संभव होता है। इस सिद्धि में शरीर के अवयव यथावत् रहते हैं, उसका भार मात्र अत्यल्प हो जाता है या भार नहीं रहता – यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

आकूति

कर्मेन्द्रियों का एक धर्म आकूति है। इसी के कारण वागिन्द्रिय द्वारा वचन क्रिया, हाथ द्वारा आदान (ग्रहण) क्रिया, पैर द्वारा गमन क्रिया, गुदेन्द्रिय द्वारा मल विसर्ग क्रिया तथा जननेन्द्रिय द्वारा आनंद क्रिया की उत्पत्ति होती है (कर्मेन्द्रिय से संबद्ध होने के कारण आकूति बाह्य प्रयत्न रूप है (अ.भा.पृ. 500, 782)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

आगति

परलोक से जीव का इस लोक में आना आगति है तथा इस लोक से जीव का परलोक में गमन शास्त्रों में गति शब्द से कहा गया है (अ.भा.पृ. 710)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

आगम

1. दिव्य ज्ञान। आ = चारों ओर से, गम = वस्तु तत्त्व का बोध कराने वाला ज्ञान। पराशक्ति के स्फार रूप ज्ञान या शास्त्र को आगम कहते हैं। (स्वच्छन्दतंत्र उद्योत, खं. 2, पृ0. 214)।
2. साक्षात्कारी सिद्ध की अपनी उत्कृष्टतर योगज अनुभूति को आगम कहते हैं। उसी से उन तत्त्वों का प्रकाशन होता है जिन्हें प्राणी लौकिक प्रमाणों के द्वारा जान नहीं सकते। (वही)।
3. साक्षात्कारी सिद्ध अपनी योगज अनुभूति को उसके अनुकूल शब्दों के माध्यम से जब प्रकट करता है तो उसकी वह शब्दावली भी आगम ही कहलाती है। इस तरह से सारे आर्ष ग्रंथ और देवताओं द्वारा उपदिष्ट शास्त्र भी आगम कहलाते हैं। ये शब्दात्मक आगम द्वितीय कोटि के आगम होते हैं। मुख्य आगम तो योगियों की स्वानुभूति ही है।
4. शिव और पार्वती के संवाद।

आगम (त्रिक) –
1. नामक तंत्र, सिद्ध तंत्र और मालिनी तंत्र।
2. स्वच्छंद तंत्र, विज्ञान भैरव, चरात्रीशिका, शिवसूत्र आदि।

आगम (शैव)
ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव और अघोर – इन पाँच मंत्रों के द्वारा उपदिष्ट आगम। भैरवों, रुद्रों आदि के द्वारा उपदिष्ट आगम। दस भेदप्रधान शिवआगम, अठारह भेदाभेद प्रधान रुद्र आगम और चौसठ अभेदप्रधान भैरव आगम। (भास्करीवि.वा., 1-391, 392)। इस समय उपलब्ध आगमों में से मालिनी विजयोत्तर तंत्र, स्वच्छंद तंत्र, शिव सूत्र, विज्ञान भैरव और परात्रीशिका अद्वैत प्रधान शैवागम हैं।

Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

आगम-प्रमाण (=आप्तवचन)

सांख्य-योग में स्वीकृत तीन प्रमाणों में से यह एक है। ‘आगम’ शब्द योगसूत्र (1/7) में है; सांख्यकारिका में ‘आप्तवचन’ शब्द का इस अर्थ में प्रयोग हुआ है। यह स्पष्टतया ज्ञातव्य है कि इस शास्त्र में आगम या आप्तवचन प्रमाणरूप बुद्धिवृत्ति (चित्तवृति) का एक भेद है – यह शब्द विशेष-रूप नहीं है, यद्यपि गौण दृष्टि से शब्दविशेष को भी आगम प्रमाण या आप्तवचन कहा जाता है। माठरवृत्ति (सां. का. 4 -5) वाक्यविशेष को ही आप्तवचन समझती है – ऐसा प्रतीत होता है।
आप्तवचन की परिभाषा में सांख्यकारिका में ‘आप्तश्रुति’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। वाचस्पति के अनुसार (श्रुति = वाक्यार्थज्ञान तथा आप्त = युक्त = सर्वदोषहीन)। इसका अर्थ दोषहीन वाक्यार्थज्ञान है जो तभी संभव होता है जब वह अपौरुषेय वेदवाक्य से उत्पन्न हो। अन्यान्य शास्त्रों से होने वाला ज्ञान तभी प्रमाण होगा, जब वे वेदमूलक हों। कपिलादि आचार्यों का ज्ञान भी वस्तुतः वेदमूलक है। जो शास्त्र वेदमूलक नहीं हैं, वह प्रमाण नहीं हैं। युक्तिदीपिका भी आप्तश्रुति से वेदवाक्यजनित ज्ञान तथा वेदमूलक शास्त्रवाक्यजनित ज्ञान – यह द्विविध ज्ञान समझती है।
कोई आप्त-श्रुति का अर्थ आप्त (सनत्कुमारादि व्यक्ति) तथा श्रुति (वेद) करते हैं अर्थात् प्रमाणभूत व्यक्ति के वाक्य को सुनने पर अथवा वेदवाक्य (जो पुरुषवाक्यविशेष नहीं है), को सुनने पर जो निश्चय-ज्ञान होता है, वह आप्तवचन है। ब्रह्मा के आप्त होने के कारण उनका वेदरूप वचन तथा मन्वादि के आप्त होने के कारण उनके स्मृति रूप वचन=आप्तवचन है यह भी कोई कहते हैं। सांख्य सूत्र (1/101) में ‘आप्तोपदेशः शब्द’ कहा गया है। भिक्षु ने आप्तोपदेश का अर्थ – ‘निर्दोष शब्दजन्य ज्ञान’ किया है।
इस प्रमाण का मुख्य विषय वह है जो अत्यन्त परोक्ष है अर्थात् जो प्रत्यक्ष और अनुमान से सिद्ध नहीं होता (जैसे स्वर्ग आदि की सत्ता)। अन्य प्रमाण से ज्ञेय विषय भी आगमप्रमाण से ज्ञात हो सकते हैं।
इस संदर्भ में योगसूत्र (1/7) और उसके भाष्य की व्याख्या में कुछ और विशेष बातें इस प्रकार बताई गई हैं – आगम का संबंध वस्तु के सामान्य धर्मों से है, विशेष धर्म से नहीं, क्योंकि विशेष धर्मों के साथ शब्दों का संकेत नहीं है। आगम प्रमाण में वक्ता और श्रोता की विद्यमानता अपरिहार्य है – ग्रंथपाठ गौण आगमप्रमाण है। वक्ता यदि आप्त अर्थात् यथार्थज्ञाता न हो तो उनके उपदेश को सुनकर जो ज्ञान होगा वह सदोष आगम होगा। निर्दोष वक्ता ईश्वर है अथवा अपौरुषेय वेदवाक्य सर्वथा निर्दोष है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

आचार

शास्‍त्रविहित कर्मों के आचरण से शिवभक्‍ति की उत्पत्‍ति होती है। इन कर्मों का अनुष्‍ठान ही ‘आचार’ कहलाता है। यह आचार जिज्ञासु तथा ज्ञानी दोनों के लिये अलंकार बन जाता है। अतः वीरशैव दर्शन में ज्ञान के साथ शास्‍त्रविहित कर्मों के अनुष्‍ठान रूप ‘आचार’ को अधिक महत्व दिया गया है। (चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद. 9/16-18)। (वीरशैव दर्शन में ‘पंचाचार’ और ‘सप्‍ताचार’ प्रसिद्‍ध हैं। इनकी परिभाषा यथास्थान देखिए।
Darshana : वीरशैव दर्शन

आचार

तान्त्रिक संम्प्रदाय सात प्रकार के आचारों में विभक्त हैं। कुलार्णव तन्त्र (2/7-8) में बताया गया है कि वेदाचार सबसे श्रेष्ठ है। वेदाचार से वैष्णवाचार महान् है। वैष्णवाचार से शैवाचार उत्कृष्ट है। शैवाचार से दक्षिणाचार उत्तम है। दक्षिणाचार से वामाचार श्रेष्ठ है। वामाचार से सिद्धान्ताचार उत्तम है और सिद्धान्ताचार की अपेक्षा कौलाचार श्रेष्ठ है। इस संसार में कौलाचार से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। प्राणतोषिणी (पृ. 965-966) में उद्धृत नित्यातन्त्र प्रभृति ग्रन्थों में इन सातों आचारों का वर्णन मिलता है। इनका विवरण नीचे अकारादि क्रम से स्थापित इन शब्दों की व्याख्या में देखना चाहिये।
(क) कौलाचार
कौलाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 1027) में उद्धृत नित्यातन्त्र के वचनों में बताया गया है कि इस कौलाचार का आचारण करने वाले के लिये दिशा अथवा काल का भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। तिथि आदि के नियमों को मानना भी जरूरी नहीं है। महामन्त्र के साधन की भी कोई आवश्यकता नहीं है। कभी शिष्ट कभी भ्रष्ट और कभी भूत, पिशाच आदि के समान वह नाना प्रकार के वेष धारण कर इस पृथ्वी पर निःशंक विचरण करता है। जो साधक कर्दम और चन्दन में, मित्र और शत्रु में, श्मशान और गृह में, स्वर्ण और तृण में कोई भेद नहीं देखता, उसको कौल कहते हैं। उसका आचारण ही वास्तविक कौलाचार है। कुलाचार या कौलाचार के नाम से इस विषय का शास्त्रों में विस्तार से वर्णन मिलता है। अर्थरत्नावली टीका (पृ. 134-135) में विद्यानन्द ने कुलाचार का लक्षण बताते हुए लिखा है कि पर, सहज, कुलज और अन्त्यज क्रम से सोलह, आठ, चार और एक योगिनियों को आमंत्रित करना, उनके उपवास आदि का अनुष्ठान कर पवित्र हो जाने पर सुवर्ण, वस्त्र, माला, चन्दन, धूप, दीप, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य, चर्वण द्रव्य, पात्रासादन तथा दक्षिणा दान आदि से उनको संतुष्ट करना। यही वास्तविक कुलाचार है।
(ख) दक्षिणाचार
दक्षिणाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत एक वचन में बताया गया है कि दक्षिणाचार का पालन करने वालों को चाहिये कि वे वेदाचार के अनुसार आद्या शक्ति की पूजा करें और रात को संवित् (विजया) का ग्रहण करके एकाग्र चित्त से जप करें।
यद्यपि नित्यातन्त्र और कुलार्णव में सात प्रकार के आचारों का उल्लेख है, तथापि प्रधानतः दक्षिणाचार और वामाचार ये दो प्रकार के आचार ही देखने में आते हैं। दक्षिणाचार तन्त्र में लिखा है कि इस तन्त्र में जिस प्रकार की कर्मपद्धति वर्णित है, वह शुद्ध वैदिक है। वास्तव में दक्षिणाचारी लोग वेदोक्त विधि के अनुसार ही भगवती की अर्चना करते हैं। वे वामाचारियों की तरह मद्य, मांस का सेवन तथा शक्ति साधन आदि नहीं करते। दक्षिणाचार तन्त्र में रक्त, मांस आदि से रहित सात्त्विक बलि ही ब्राह्मण के लिये विहित है। दक्षिणामूर्ति द्वारा प्रवृत्त होने से इसको दक्षिणाचार कहा जाता है।
(ग) वामाचार
वामाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत आचार भेद तन्त्र के अनुसार वामाचार की परिभाषा यह दी गई है कि पंचतत्त्व अर्थात् पंचमकार, खपुष्प अर्थात् रजस्वला का रज और कुलस्त्री का पूजन प्रभृति के माध्यम से आद्या शक्ति की उपासना करने वाली विधि को वामाचार कहते हैं। इसमें साधक अपने में वामा भाव को जगाता है और इसी रूप में वह परा शक्ति की उपासना करता है। बंगाल में तान्त्रिक शब्द से प्रधानतः वामाचारियों का ही बोध होता है। किसी के मत से ये वेदविरुद्ध आचरण करने से वामाचारी के नाम से प्रसिद्ध है। बंगाल के तान्त्रिकों में वामाचार और दक्षिणाचार दोनों ही मिश्रित हैं। उनके मत से मनुष्य जन्ममात्र से दक्षिणाचारी तथा दीक्षा और अभिषेक के बाद वामाचारी कहलाता है।
(घ) वेदाचार
वेदाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 280-283) में उद्धृत नित्यातन्त्र में बताया गया है कि साधक को चाहिये कि वह ब्रह्म मुहूर्त में उठे और गुरु के नाम के अंत में आनंदनाथ बोल कर उनको प्रणाम करे। फिर सहस्त्र दल पद्म में ध्यान करके पंचोपचार पूजा करे और वाग्भव बीज का जप करके परम शक्ति का ध्यान करे। संक्षेप में यही विधि वेदाचार के नाम से प्रसिद्ध है। उक्त ग्रन्थ में रुद्रयामल, विश्वसार तन्त्र प्रभृति के आधार पर इस विषय को विस्तार से समझाया गया है। उस सारे प्रकरण का सार यह है कि सौन्दर्यलहरी के टीकाकार लक्ष्मीधर ने आन्तर वरिवस्था के माध्यम से जिस समयाचार का प्रतिपादन किया है, उसी का नामान्तर वेदाचार है।
(च) वैष्णवाचार
वैष्णवाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत नित्यातन्त्र में बताया गया है कि वैष्णवाचार का पालन करने वाले को वेदाचार की विधि के अनुसार सर्वदा नियम तत्पर होना चाहिये। मैथुन या उसका कथा प्रसंग भी कभी नहीं करना चाहिये। मांस भोजन का परित्याग करना चाहिये। रात्रि में कभी भी माला या यन्त्र को नहीं छूना चाहिये। भगवान् विष्णु की ही सदा पूजा करे तथा उन्हीं को सब कुछ निवेदित कर दे। वैष्णवाचार का पालन करने वाला इस सारे जगत् को विष्णुमय ही मानता है।
(छ) शैवाचार
शैवाचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत नित्यातन्त्र के एक वचन में कहा गया है कि शैवाचार और शाक्ताचार का पालन करने वालों के लिये भी वही व्यवस्था है, जो कि वेदाचार का पालन करने वालों के लिए विहित है। शैवाचार में विशेषता यह है कि यहाँ पशु बलि का भी विधान है। इस आचार में पशु बलि को निषिद्ध घोषित नहीं किया गया है। शैवागम और शैवतन्त्र प्रतिपादित आचार विधि का पालन करना ही वस्तुतः शैवाचार पद का अभिप्राय है।
(ज) सिद्धान्ताचार
सिद्धान्ताचार का वर्णन करते हुए प्राणतोषिणी (पृ. 965) में उद्धृत एक वचन में बताया गया है कि सिद्धान्ताचार में शुद्ध या अशुद्ध सभी प्रकार की वस्तुएँ शास्त्रोक्त विधि से शुद्ध कर ली जाती हैं। प्राणतोषिणी (पृ. 965) में ही उद्धृत समयाचारतंत्र में सिद्धान्ताचारियों के विषय में बताया गया है कि वे सर्वदा देव पूजा में निरत रहते हैं। दिन में तो ये वैष्णवाचार विधि से जीवन-यापन करते हैं, किन्तु रास्त्रि में मिल जाने पर ये भक्ति-भाव से मद्य आदि का भी सेवन कर अपने को कृतकृत्य, आप्तकाम मानते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

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