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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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स्फोट

यद्यपि योगसूत्र और उसके भाष्य में यह शब्द नहीं है, तथापि सूत्र 3/17 के भाष्य में शब्दसम्बन्धी जो विचार किया गया है, वह स्फोटवादानुसारी है – यह टीकाकारों का कहना है। योगपरक कुछ ग्रन्थों में स्फोट शब्द प्रयुक्त भी हुआ है तथा स्फोटवाद की दृष्टि से शब्दतत्त्व पर विचार भी किया गया है। यह स्फोट शब्द श्रूयमाण वर्णों से भिन्न है। यह क्रमहीन, निरवयव, अखण्ड और एकप्रयत्न से जनित होता है। चूंकि इस शब्द से ही अर्थ ज्ञापित होता है, अतः यह स्फोट (स्फुटित अर्थः अस्मात्) कहलाता है। यह स्फोट न वह शब्द है जो वक्ता द्वारा उच्चारित होता है और न वह शब्द है जो श्रोता के कर्ण में पहुँचता है। यह स्फोट श्रोता की बुद्धि में ही प्रतिभासित होता है; इसलिए यह ‘बौद्धशब्द’ कहलाता है। चूंकि यह ध्वनियों से अभिव्यक्त होता है – निर्मित या उच्चारित नहीं होता, अतः यह ‘ध्वनिव्यङ्ग्य’ कहलाता है। स्फोट की सिद्धि युक्तियों के द्वारा की गई है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्मृति

पाँच वृत्तियों में स्मृति एक है। योगसूत्र (1/11) में अनुभूत विषय के असंप्रमोष को स्मृति कहा गया है। सूत्र का तात्पर्य यह है – स्मृति का हेतु संस्कार है, जो अनुभव से निष्पन्न होता है। जितने विषय का अनुभव किया गया है, उससे अधिक विषय स्मृति में नहीं हो सकता, भले ही उससे कम विषय स्मृति में हो। जो विषय अनुभूत नहीं हुआ है, उसकी स्मृति नहीं होती। अधिक-विषय का परिग्रह करना ‘संप्रमोष’ कहलाता है; पहले से अज्ञात विषय को लेकर स्मृति नहीं होती, अतः स्मृति-लक्षण में ‘असंप्रमोष’ शब्द दिए गए हैं। कभी-कभी स्मृति में अनुभूत विषय से अधिक विषय उद्भासित होते हैं – ऐसा देखा जाता है; पर वहाँ वस्तुतः विभिन्न काल के अनुभवों से निष्पन्न संस्कारों का युगपद् उद्बोध होता है, अतः स्मृति के सूत्रोक्त लक्षण में कोई दोष नहीं है। यह ध्यान देने योग्य है कि उपर्युक्त सूत्र में जो ‘अनुभूत विषय का असंप्रमोष’ कहा गया है, वह स्मृति का असाधारण धर्म है – अन्य वृत्तियों में यह धर्म नहीं है; सूत्र में धर्म और धर्मी में अभेदविवक्षा करके असंप्रमोष को ही स्मृति कहा गया है। व्याख्याकारों ने कहा है कि स्मृति के विषय घटादि पदार्थ एवं पदार्थविषयक ज्ञान (=वृत्ति) दोनों हैं। सभी स्मृतियाँ प्रमाणादि पाँच वृत्तियों से होती हैं। (स्मृति से भी स्मृति होती है)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्मृतिशक्ति

लोकव्यवहारों का आधार बनी हुई परमेश्वर की तीन शक्तियों में से एक प्रमुख शक्ति। परमेश्वर अपनी अपोहनशक्ति से अपने अविच्छिन्न स्वरूप में विच्छेद का आभासन करता है। उससे प्रमाता और प्रमेय परस्पर विच्छिन्न हो जाते हैं। फिर एक दूसरे के प्रति ज्ञातृ भाव में और ज्ञेयभाव में ठहरते हुए अनंत प्रकार से ज्ञान के व्यवहारों को सिद्ध करता है। तदनंतर असंख्य ज्ञानों के संस्कारों के होते हुए भी किसी भी प्रमाता में किसी भी प्रमेय के ज्ञान का संस्कार किसी भी विशेष रूप से कभी भी उद्बुद हो जाता है, जिससे उस प्रमाता को पहले जाने हुए प्रमेय की किसी विशेष प्रकार से पुनः स्मृति हो जाती है। इस अनंत प्रकारों से उदित होने वाले स्मृति व्यापार की अधारभूताशक्ति परमेश्वर की स्मृतिशक्ति है जिससे अनंत प्रकार के वैचित्र्य से स्मर्तृ-स्मार्य-व्यापार इस संसार में चलते रहते हैं। संसार के समस्त व्यवहारों का प्रधान आधार यह स्मृति ही है। आदान, प्रदान आदि, शब्द प्रयोग आदि तथा समस्त क्रिया कलाप आदि सभी का आसरा स्मृति है। प्राणियों की इस असंख्य प्रकार से उदित होने वाली स्मृति की नियामिका शक्ति तथा आधारभूताशक्ति परमेश्वर की स्मृतिशक्ति कहलाती है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 1-3-7 1-4-1)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्रोतोविभाग

तान्त्रिक वाङ्मय का स्रोतोविभाग प्रसिद्ध है। कुछ ग्रन्थों में यह तीन अथवा चार प्रकार का तथा अन्यत्र पाँच प्रकार का माना गया है। त्रिविध विभाग में वाम, दक्षिण और सिद्धान्त नामक तन्त्रों की गणना की गई है। अजितागम (26/59-60) में बताया गया है कि मूलावतार प्रभृति तन्त्र वाम, स्वच्छन्दतन्त्र प्रभृति दक्षिण और कामिक प्रभृति तन्त्र सिद्धान्त के नाम से प्रसिद्ध हैं। नेत्रतन्त्र (16/2) के अनुसार सदाशिव, भैरव और तुम्बुरु क्रमशः सिद्धान्त दक्षिण और वाम स्रोतस् (धारा) के प्रवर्तक हैं। तुम्बुरु के चार मुखों से शिरच्छेद, वीणाशिव, संमोह और नयोत्तर नामक चार तन्त्रों का आविर्भाव हुआ, इसकी सूचना हमें डॉ. प्रबोधचन्द्र वागची के ग्रन्थ ‘स्टडीज़ इन दी तंत्राज’ (पृ. 2) से मिलती है। तुम्बुरु और भैरव शिव के ही अवतार हैं। इसकी सूचना योगवासिष्ठ (निर्वाण, 1/18/23-26) और नेत्रतन्त्र (9/11) से मिलती है।
सिद्धान्तशिखामणि (5/11) से सप्त मातृकाओं के प्रतिपादक मिश्र तन्त्र का भी समावेश कर स्रोतोविभाग को चतुर्विध माना है। किन्तु सम्प्रति इसके पाँच विभाग ही प्रसिद्ध हैं। तदनुसार शिव के ऊर्ध्व मुख से सिद्धान्त, पूर्व मुख से गारुड, दक्षिण से भैरव, पश्चिम से भूत और उत्तर मुख से वाम तन्त्रों का आविर्भाव हुआ। मृगेन्द्रागम के चर्यापाद (1/40) में अष्टविध अनुस्रोतोविभाग वर्णित है। उनके नाम ये हैं – शैव, मान्त्रेश्वर, गाणपत्य, दिव्य, आर्ष, गोह्यक, योगिनीकौल और सिद्धकौल। इन सबका विस्तृत विवरण नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्धात (पृ. 51-59) में देखना चाहिये।
Darshana : शाक्त दर्शन

स्वच्छंदनाथ

ईश्वर भट्टारक के एक अवतार। श्रीकंठनाथ के शिष्य। कैलासवासी भगवान उमापतिनाथ का ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव और अघोर इन पाँच मुखों वाला एक विशिष्ट आकार। ये पाँचमुख परमेश्वर की चित्, निर्वृति (आनंद), इच्छा, ज्ञान और क्रिया नाम की पाँच अंतरंग शक्तियों के तथा सृष्टि, स्थिति, संहार, विधान और अनुग्रह नाम के पाँच पारमेश्वरी कृत्यों के द्योतक होते हैं। उमापतिनाथ ने अपने इसी रूप में आकर शैवशास्त्रों का उपदेश किया है। उनके ये पाँच मुख सदाशिव, ईश्वर, रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा के स्थानों को उसमें धारण करते हैं (मा. वि. वा., 1-251 से 257)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वप्न

स्वापावस्था। वह अवस्था जिसमें प्राणी के शरीर के परिश्रांत होने पर तथा श्रोत्रादि बाह्यकरणों द्वारा अपने अपने कार्यों से विरत हो जाने पर भी मन से ही विषयों का ग्रहण होता रहता है, परंतु, भ्रांति से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो बाह्य इंद्रियाँ ही उनका ग्रहण करती हैं। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा 3-2-17) (स्पन्दविवृति पृ. 20)। बाह्य विषयों के अभाव में भी अंतः विकल्पों का भिन्न भिन्न विषयों के प्रति नव नवोदय होते रहने वाली अवस्था। (शिवसूत्र 1-9)। स्फुट एवं अस्फुट रूप अवस्था (म. भ. पटल पृ. 185।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वप्न सृष्टि :

ऐसी सृष्टि जिसकी संपूर्ण संरचना सूक्ष्म होती है, जहाँ के समस्त शरीर, भुवन, भाव तथा संपूर्ण व्यवहार सूक्ष्म एवं स्वप्नवत् ही होते हैं। पितरों, देवों आदि के लोक इसी सृष्टि के अंतर्गत आते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वप्रकाश

स्वाभास। अपने नैसर्गिक एवं स्वात्मनिष्ठ परमार्थ तत्त्व के सतत स्फुरणशील स्वभाव का बिना किसी अंतः करण एवं बाह्यकरण की सहायता के स्वयमेव प्रकाशित होते रहना। आत्मतत्व का स्वरूप। (भास्करी 2 पृ. 126-28)। चैतन्य स्वरूप आत्मतत्त्व। अन्य किसी भी करण से प्रकाशित न होने वाला केवलमात्र अपने में ही स्थित शुद्ध स्वरूप। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 1 पृ. 135; भास्करी 1 पृ. 174)। स्वच्छंदरूप से स्वयमेव अपने ही प्रति भासित होने वाला अपना संवित् स्वरूप। अपने ही प्रकाश से प्रकाशमान भाव। एकमात्र संवित् स्वरूप आत्मा ही स्वप्रकाश है। शेष सभी पदार्थ उसी के प्रकाश से आभासित होते हैं। व्यवहार में ज्ञाता और ज्ञान स्वप्रकाश हैं, शेष सभी कुछ ज्ञान से ही प्रकाशित होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वय जंगम

देखिए ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत ‘जंगम’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

स्वयं प्रकाश

देखिए स्वप्रकाश।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वरसवाहिता

स्वरसवाही का भाव स्वरसवाहिता। आगन्तुक हेतु के बिना जो प्रवाहित हो सके – अन्य किसी के बिना ही जो सक्रिय रह सके – वह स्वरसवाही कहलाता है। योगसूत्र (2/1) में अभिनिवेश नामक कोश को स्वरसवाही कहा गया है (द्र. अभिनिवेश शब्द)। चूंकि अभिनिवेश स्वभावतः प्रवहणशील रहकर प्राणी को क्लिष्ट करता रहता है, अतः वह स्वरसवाही है। पूर्व-पूर्व जन्मों के मरणदुःखों के अनुभवजन्य संस्कारसमूह स्वरस हैं; स्वरसरूप से प्रवहणशील है। इस अर्थ में अभिनिवेश अर्थात् मरणत्रास स्वरसवाही है। ऐसा टीकाकारों का कहना है। अभिनिवेश जातमात्र प्राणी में, जिसने जीवन में किसी प्रमाण के आधार पर मरणदुःख का अनुभव नहीं किया है, वर्तमान रहता है, अतः उसको स्वरसवाही कहना उचित ही है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्वरूप संयम

भूत एवं इन्द्रिय के जिन पाँच रूपों में संयम करने पर भूतजय तथा इन्द्रियजय होती हैं, ‘स्वरूप’ उनमें एक है (योगसूत्र 3/44)। इस स्वरूप में जो संयम किया जाता है, वह स्वरूप-संयम कहलाता है। भूत का यह जो स्वरूप नामक रूप है, वह भूतों के इन पाँच धर्मों से सम्बन्धित है – मूर्ति = काठिन्य (पृथ्वी), स्नेह (जल), उष्णता (वह्रि), वहनशीलता = सदा गति (वायु) तथा सर्वतोगति (आकाश)। इन पाँच धर्मों को सामान्यधर्म भी कहा जाता है। धर्म एवं धर्मी में अभेद है – यह सांख्य-योग का मत है। स्वरूप संयम से प्राकाम्य रूप सिद्धि होती है। इन्द्रिय का जो स्वरूप नामक रूप है (योगसूत्र 3/47) उसमें जो संयम किया जाता है, वह भी स्वरूपसंयम कहलाता है। प्रकाशात्मा बुद्धिसत्त्व का एक विशिष्ट समूह ही इन्द्रिय का स्वरूप नामक रूप है। इन्द्रिय का यह रूप सामान्य-विशेषात्मक है, यह टीकाकारों ने दिखाया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्वरूपप्रतिष्ठ

निर्गुणपुरुष के विशेषण के रूप में यह शब्द प्रयुक्त होता है। इसका अर्थ है – ‘स्वरूप में प्रतिष्ठा है जिसकी वह’। (चित्ति या चित्ति शक्ति विशेष्य होने पर स्वरूप प्रतिष्ठा शब्द होगा)। कूटस्थ एवं अपरिणामी होने के कारण पुरुष (चित्तिशक्ति) वस्तुतः स्वरूप में ही प्रतिष्ठित रहता है, पर वृत्तिसारूप्य (योगसूत्र 1/3) के कारण वैसा प्रतीत नहीं होता। गुणविकारभूत बुद्धि आदि के लय हो जाने पर चित्तिशक्ति की अ-स्वरूपप्रतिष्ठा की जो प्रतीति हो रही थी, वह प्रतीति नहीं रहती, अतः गौणदृष्टि से कहा जाता है कि चित्तिशक्ति स्वरूप में प्रतिष्ठित हुई। ‘स्वरूप में प्रतिष्ठा’ इस अर्थ में स्वरूप-प्रतिष्ठा शब्द होता है, अतः यह भी कहा जा सकता है कि बुद्धि आदि के लय होने पर पुरुष की स्वरूप-प्रतिष्ठा होती है (वस्तुतः पुरुष की सदैव स्वरूप प्रतिष्ठा = स्वरूप में अवस्थान ही है)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

स्वलक्षण

वस्तु का अपना वह वैयक्तिक स्वरूप जिसका कोई भी संबंध सामान्य (जाति) आदि के द्वारा किसी के भी साथ नहीं होता, तथा जिसे किसी विशेष वाचक शब्द के द्वारा कहा या जाना नहीं जा सकता। निर्विकल्प अवस्था में अवभासित हो रही वस्तु का नाम एवं रूप की कल्पना से रहित अपना नियमित रूप। नियत देश एवं नियत काल से आविर्भूत होने के कारण संकुचित बनी हुई वस्तु का अपने ही स्वरूप में सीमित एवं अननुयायी स्वरूप अर्थात् वह स्वरूप जो अपने से इतर सभी वस्तुओं से विलक्षण एवं भिन्न हो। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 1-4-2)। वस्तु का अपनी जाति, गुण, क्रिया, नाम एवं द्रव्य इन पाँचों विशेषताओं को अपने भीतर रखता हुआ परंतु फिर भी उनके विशेष आभास से रहित एक साथ आभासित होने वाला वैयक्तिक रूप। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी खं. 2 पृ. 71-2)। ऐसा रूप जिसमें इन पाँचों भेदों के विद्यमान होने पर भी इनमें से किसी एक भेद का भी स्फुट आभास नहीं होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वसंवेदन

स्वानुभव। स्वप्रकाश। स्वरूपभूत संवेदन। अपने वास्तविक स्वरूप का आभास। स्वानुभव सिद्ध स्वप्रकाश संवित्ति। बिना किसी बाह्य एवं अंतःकरणों की सहायता के स्वात्म अनुभव से ही होने वाला अपने अविच्छिन्न एवं शुद्ध प्रकाशरूप स्वरूप का आभास। स्वसंवित्तिरूप प्रमातृ तत्त्व। (भास्करी 2, पृ. 367) अपनी शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण परमेश्वरता के नैसर्गिक सामरस्यात्मक मूलभूत स्वभाव का साक्षात् अपरेक्ष अनुभव। (भास्करी 2 पृ. 367)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वातंत्र्य शक्ति

अन्य किसी की भी अपेक्षा न रखने वाली परमशिव की मूलभूत शक्ति। विमर्शशक्ति। परमशिव की परमेश्वरता को द्योतित करने वाली उसकी सारभूत शक्ति। सृष्टि, स्थिति, संहार, विधान एवं अनुग्रह – इन पाँचों कृत्यों को स्वेच्छा से स्वतंत्रतापूर्वक सतत गति से करते रहने में सहायक बनने वाली परमशिव की स्वभावभूत पराशक्ति। एकत्व में अनेकत्व तथा अनेकत्व में एकत्व को अवभासित करने जेसे अतिदुर्घट कार्यों का संपादन करने वाली शक्ति। पूर्ण अहं परामर्श रूपा शक्ति। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2, पृ. 177)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वातंत्र्य सिद्धांत

काश्मीर शैव दर्शन का वह मूलभूत सिद्धांत जिसके अनुसार केवल परमशिव ही एकमात्र परम सत्य तत्व है और शेष सब कुछ उसी की स्वतंत्र लीला का विलास है। वह दार्शनिक सिद्धांत जिसके अनुसार विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय दोनों ही रूप परमशिव की ही स्वातंत्र्य लीला के विलास हैं। अभेद में भेद को तथा भेद में अभेद को नित्यप्रति अवभासित करते रहने वाली परमशिव की स्वभावभूत स्वातंत्र्य शक्ति की स्वच्छंद लीला के विलास का सिद्धांत। परमशिव शुद्ध प्रकाश स्वरूप है। विमर्श प्रकाश का मूलभूत स्वभाव है, क्योंकि विमर्श वस्तुतः प्रकाश से भिन्न और कोई वस्तु है ही नहीं। ये दोनों भाव एक दूसरे से सर्वथा अभिन्न हैं। परमशिव इन दोनों भावों का परिपूर्ण सामरस्यात्मक अनुत्तर संवित् तत्व है। उसके भीतर उसी के विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वात्मक दोनों ही रूप समरस होकर शुद्ध संवित् के रूप में ही चमकते हैं। वह अपने ही स्वातंत्र्य से समस्त विश्व को अवभासित करता हुआ भी स्वयं सदैव परिपूर्ण संवित् रूप में ही प्रकाशमान होता रहता है। समस्त बाह्य प्रपंच को अवभासित करते हुए भी परमशिव में किसी भी अंश में किसी भी प्रकार का कोई भी परिणाम या विकार नहीं आता है क्योंकि समस्त अभिव्यक्ति केवल प्रतिबिंबन्याय से होती हुई उसी के स्वातंत्र्य का विलास है तथा उसी की नैसर्गिक परमेश्वरता का विश्वात्मक रूप है। वस्तुतः परमशिव अपने ही भीतर अपने द्वारा ही अपने ही स्वातंत्र्य से अपने आनंद के लिए विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वात्मक दोनों रूपों में अवभासित होता रहता है और ऐसा होने पर भी वह सर्वदा और सर्वथा परिपूर्ण संविद्रूप ही बना रहता है। इस प्रकार सभी कुछ उसी के भीतर उसी के स्वातंत्र्य का विलास होने के कारण उससे इतर कुछ भी नहीं है। इसी सिद्धांत को दृष्टि में रखते हुए क्षेमराज ने काश्मीर शैव दर्शन को ‘स्वतंत्र् शिवाद्वय दर्शन’ भी कहा है। (स्व. सं. पृ. 10)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

स्वाधिष्ठात चक्र

लिंग के मूल में सुषुम्ना नाडी स्थित है। इसके मध्य भाग में सिन्दुर के समान अरुण वर्ण के षड्दल कमल की स्थिति मानी गई है। इसी को स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं। इसको स्वाधिष्ठान इसलिये कहते हैं कि यह स्व शब्द से अभिप्रेत पर लिंग का अधिष्ठान है, घर है, अर्थात् इसमें परलिंग का निवास माना जाता है। इस षड्दल कमल में बँ भँ मँ यँ रँ लँ इन छः बीजाक्षरों की स्थिति मानी गई है। इस स्वधिष्ठान चक्र के मध्य में अर्धचन्द्राकार शुक्ल वर्ण का वरुण देवता का मण्डल अवस्थित है। इसके बीच में बंकार बीज आलोकित है। इसका वाहन मकर है। सारे विश्व के पालक भगवान् विष्णु इसके अधिकारी हैं और राकिणी नामक योगिनी इस चक्र की अधिष्ठात्री शक्ति है (श्रीतत्त्वचिन्तामणि, षट्चक्र प्रकरण, पृ. 6)।
Darshana : शाक्त दर्शन

स्वार्थसंयम

पुरुषज्ञान जिस संयम से प्रकट होता है, वह स्वार्थसंयम कहलाता है (योगसूत्र 3/35)। इस स्वार्थसंयम का साक्षात् विषय अपरिणामी कूटस्थ पुरुष (तत्त्व) नहीं होता, बल्कि पौरुषेय प्रत्यय ही इस संयम का विषय होता है। बुद्धिवृत्ति पुरुष को प्रकाशित नहीं कर सकती। बुद्धिवृत्ति में पुरुष का जो प्रतिबिम्ब है, उस प्रतिबिम्ब में संयम (ध्यान) करना ही स्वार्थसंयम है – यह संयम ही पुरुषज्ञान (= आत्मसाक्षात्मकार) का हेतु है। इस स्वार्थसंयम के कुछ बाह्य फल भी हैं (पुरुषज्ञान प्रकट होने से पहले ये फल प्रकट होते हैं)। वे हैं – प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता नामक सिद्धियों का आविर्भाव (योगसूत्र 3/36)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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