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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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सास्मिता समापत्ति

जिस समापत्ति का विषय अस्मिता (अहंकार) है, वह सास्मिता समापत्ति है। यह ‘ग्रहीतृविषयक समापत्ति’ है (समापत्ति के तीन ही विषय हैं – ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीता)। समापत्ति = संप्रज्ञातसमाधिजात प्रज्ञा। सबीज समाधि एवं समापत्तियों के परस्पर सम्बन्ध में टीकाकारों में कुछ मतभेद हैं, यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सिद्‍ध योगी

अलौकिक शक्‍ति संपन्‍न योगी।

पाशुपत दर्शन के अनुसार पाशुपत योग का अभ्यास करके साधक सिद्‍ध योगी का पद प्राप्‍त कर लेता है। सिद्‍ध योगी वह होता है जिसने अपनी आत्मा को पहचाना है तथा जिसका महेश्‍वर से ऐकात्म्य स्थापित हुआ हो। सिद्‍ध योगी और भी कई सिद्‍धियों से संपन्‍न होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.121,122)। इस तरह से साधक पारमार्थिक सिद्‍धियों को प्राप्‍त करके रूद्रसायुज्य को प्राप्‍त करता है और साथ ही साथ दूरदर्शन श्रवण आदि व्यावहारिक सिद्‍धियों का उपयोग भी करता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सिद्धदर्शन

योगसूत्र का कहना है कि मूर्धज्योतिः अर्थात् शिरःकपाल (=खोपड़ी) के प्रकाशबहुल छिद्र विशेष में संयम करने पर द्युलोक एवं पृथ्वी के मध्य स्थान में विचरण करने वाले सिद्धनामक अदृश्यप्राणी-विशेष (यह एक प्रकार की देवायोनि है) का दर्शन होता है (3/32)। कोई-कोई ‘सिद्ध’ का अर्थ योगसिद्ध दिव्यदेही पुरुष भी बताते हैं। उपर्युक्त ‘छिद्र’ ब्रह्मरन्ध्र है, यह किसी-किसी का कहना है। ब्रह्मरन्ध्र (नामान्तर-ब्रह्मतालु) सुषुम्नानाडी में स्थित है। अतः यह प्रभास्वर, ज्योतिबहुल है – ऐसा व्याख्याकारों का कहना है। मस्तिष्क के पश्च भाग में यह मूर्धज्योति नामक स्थान है – यह मत भी प्रसिद्ध है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सिद्‍धि

लाभ का एक प्रकार।

पाशुपत साधक को निरंतर योगाभ्यास से दुःखांत प्राप्‍ति होती है; परंतु यह दुःखांत शून्यवत् नहीं होता है। इसमें केवल दुःख की ही समाप्‍ति नहीं होती है, अपितु ऐश्‍वर्यस्वरूप सिद्‍धियों की प्राप्‍ति भी होती है। यह सिद्‍धि दो प्रकार की होती है – ज्ञानशक्‍ति रूप तथा क्रियाशक्‍ति रूप। ज्ञानशक्‍ति रूप सिद्‍धि से दूरश्रवण, मनन आदि सिद्‍धियाँ प्राप्‍त होती हैं तथा क्रियाशक्‍ति रूप सिद्‍धि से मनोजवित्व, कामरूपित्व आदि सामर्थ्य योगी में जागते हैं। (ग.का.टी.पृ. 9,10)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सिद्धि (प्रत्ययसर्गान्तर्गत)

सांख्यकारिका एवं सांख्यसूत्र में विभूतिरूप सिद्धि के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार की सिद्धि की चर्चा है, जो प्रत्यय सर्ग के अन्तर्गत है। सिद्धि का अर्थ है – ‘यथेष्टस्य साधनम्’, जो अभीष्ट हो उसका साधन अर्थात् अभीष्टसिद्धि करना। निश्चयज्ञान को उत्पन्न करना सिद्धि है – यह भी किसी-किसी का मत है। सिद्धि एवं उसके भेदों का प्रकृत स्वरूप बहुत कुछ स्पष्ट हो चुका है।
इस सिद्धि के ऊह आदि आठ भेद हैं, यह सांख्यकारिका (51) में कहा गया है। ऊह आदि के तार आदि अन्य नाम भी हैं – यह टीकाकारों ने कहा है। ऊह आदि की व्याख्या में कहीं-कहीं मतभेद मिलते हैं, यथा – (1) ऊह = तर्क अर्थात् आगम के अविरोधी न्याय से आगमार्थ का मनन करना, अथवा उपदेश के बिना भी स्वयं स्वप्रतिभा से तर्करूप मनन करना। गुरु से, शास्त्र से या स्वतः जो तत्त्वज्ञान (मोक्ष प्राप्ति का हेतुभूत) होता है वह ऊह है, ऐसा भी कोई-कोई कहते हैं। (2) शब्द=शब्दजनित अर्थज्ञानः इसके दो अवान्तरभेद हैं – अक्षरानुपूर्वी का ग्रहण तथा अर्थज्ञान। अथवा अन्यों द्वारा अध्यात्मशास्त्र पाठ को सुनकर जो तत्त्वज्ञान होता है, वह। (3) अध्ययन = गुरुमुख से विधिवत् अध्यात्मशास्त्र का ग्रहण अथवा सांख्यशास्त्र का अध्ययन करने पर जो ज्ञान होता है, वह। (4-6) तीन प्रकार का दुःखनाश अर्थात् आध्यात्मिक दुःख, आधिदैविक दुःख एवं आधिभौतिक दुःखों का नाश। ऊह-शब्द-अध्ययनजनित ज्ञान द्वारा ही दुःखनाश करणीय है – यह भी कहा जाता है। (7) सुहृत्प्राप्ति = स्वीय मनन से जो मत निर्धारित हुआ है, गुरु-शिष्य-सहाध्यायियों के साथ विचार-विमर्श कर उस मत की एकवाक्यता करना। एकमतावलम्बी गुरु-शिष्य-सहाध्यायियों की प्राप्ति ही यह सिद्धि है। अथवा तत्वज्ञ सुहृदों के संपर्क से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वह यह सिद्धि है। गुरु से शास्त्रतात्पर्य समझने में असमर्थ व्यक्ति जब किसी सुहृद के द्वारा सरल रीति से समझाने पर समझता है, तब यह ‘सुहृत्-प्राप्ति’ रूप सिद्धि है – यह किसी-किसी का कहना है। (8) दान = विवेकज्ञान की शुद्धि = विवेक के स्वच्छ प्रवाह में अवस्थित होना। अथवा धनादिदान से प्रयत्न कर किसी ज्ञानी से ज्ञान प्राप्त करना।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सुघट मार्ग

यम, नियम आदि क्लेश साध्य प्रयत्नों से विहीन सहज ही में अपने शिवभाव के समावेश को प्राप्त करवाने वाले बिल्कुल नए, सुकर एवं आनंददायक शैवी साधना को उत्पल देव ने सुघट मार्ग कहा है। शैवी साधना के इस सुललित मार्ग को थोड़े से ही प्रयत्न से साधक को शुद्ध संवित्स्वरूपता का समावेश करवाने वाला, सहज साध्य तथा महाफल प्रदान करने वाला माना गया है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, 2 पृ. 271)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सुप्रबुद्ध

ईश्वर के परम अनुग्रह के पात्र बने प्राणी, जिनमें किसी भी अंश में माया का प्रभाव नहीं रहता है और इस कारण जिन्हें अपने परिपूर्ण शिवभाव का साक्षात्कार हो गया होता है। ऐसे प्राणी को तत्त्व की उपलब्धि अनायास ही हो जाती है। परिणामस्वरूप वह सदा अपनी शुद्ध संविद्रूपता के आनंदात्मक चमत्कार से ओत प्रोत बना रहता है। (स्व. वि. पृ. 9, 57, 58)। जाग्रत् अवस्था में रहने वाले उत्कृष्ट सिद्धयोगी सुप्रबुद्ध कहलाते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सुरतयोग

मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग प्रभृति योग की सभी शाखाओं में नादानुसन्धान की महिमा वर्णित है। प्राचीन वैयाकरण इसका वाग्योग (शब्दयोग) के रूप में वर्णन करते हैं। मध्य युग के सन्त-महात्मा सुरतयोग के नाम से जिस योग मार्ग का अनुसरण करते हैं, वह इस वाग्योग का ही विस्तार है। सुरत शब्द सुरति शब्द का अपभ्रंश माना जाता है। सुरति का अर्थ है स्मृति। यह सुरति आहत नाद को अपना लक्ष्य बनाकर उसकी ओर क्रमशः अग्रसर होती है और अन्त में इस शब्दब्रहम नामक परमतत्त्व को आत्मसात् कर लेती है। सहज समाधि दशा शब्द व सुरति के संयोग का ही परिणाम है। अनुभवी सिद्ध आ. अमृत वाग्भव जी के कथनानुसार नादयोग के अभ्यास से स्पष्ट मन्त्र सुनाई देते है। उसी को श्रुति कहते हैं। प्राचीन ऋषियों को भी इसी तरह से मन्त्रों की श्रुति प्राप्त हुई थी। श्रुति शब्द का ही अपभ्रंश सुरति है।
प्रसिद्ध सन्त दरिया साहब ने अपने ‘शबद’ नामक ग्रन्थ में विहंगम योग का जो वर्णन किया है, उससे ज्ञात होता है कि सुरति और निरति इन दोनों का समन्वय कर सकने पर ही योगसाधना सिद्ध होती है। ‘सुरति’ एक असाधारण दृष्टि है। इस दृष्टि के खुलने पर भाँति-भाँति के सुन्दर दृश्य और शब्दों का अनुभव होता है। ‘निरति’ से निर्विकल्पक ध्यान का बोध होता है। इसमें दृश्य का मान बिल्कुल ही नहीं रहता। निरतिहीन, अर्थात् निर्विकल्प ध्यान रहित शुद्ध सुरति जैसे सिद्धिलाभ के लिये उपयोगी नहीं होती, वैसे ही असाधारण दृष्टिरूप सुरति रहित शुद्ध निरति, अर्थात् निर्विकल्पक ध्यान भी उपयोगी नहीं होता। दोनों का सामंजस्य होने पर ही योगी इष्ट साधन में सफलता प्राप्त कर सकता है।
बौद्ध तन्त्र ग्रन्थों में सुरतयोग की व्याख्या इस प्रकार मिलती है – वज्रजाप के द्वारा ललना और रसना का शोधन वस्तुतः नाडी शुद्धि का ही नामान्तर है। सिद्धाचार्य लुइपाद कहते हैं कि चन्द्र शुद्ध होकर ‘आलि’ कहा जाता है। इस शोधन का फल धवन (या धमन) है। सूर्य शुद्ध होकर ‘कालि’ कहा जाता है। इसका फल चवन (या चमन) है। आलि और कालि का संयोग ही वज्रसत्व की अधिष्ठान भूमि है, विशुद्ध चन्द्र और सूर्य मिलकर जब ऐक्य लाभ करते हैं, तब उस अद्वैत भूमि वज्रसत्त्व का आविर्भाव होता है। यह संयोग आरब्ध होकर क्रमशः चलता रहता है एवं उसी अनुपात में शून्यता, अद्वयभाव, आनन्द या रति और नैरात्म्यबोध या बोधि गंभीर भाव से उपलब्ध होने लगते हैं। इस संयोग अथवा मिलन का पारिभाषिक नाम ‘सुरत’ अथवा श्रृंगार है एवं इसका फल रस की अभिव्यक्ति है (तान्त्रिक वाङमय में शाक्तदृष्टि, पृ. 279, तन्त्र और सन्त पृ. 264, भारतीय संस्कृति और साधना, भास्करी 2, पृ. 43, 259)।
Darshana : शाक्त दर्शन

सुवर्ण-कुंडल-न्याय

सुवर्ण ही एक आकार-विशेष को प्राप्‍त होकर ‘कुंडल’, अर्थात् कान का आभरण-विशेष बन जाता है। यहाँ पर स्वर्ण के कुंडल के आकार में परिणत होने पर भी इसके मूल स्वरूप स्वर्ण में जैसे कोई विकार नहीं होता, किंतु कुंडलावस्था में भी वह पूर्ण स्वर्ण ही रहता है, उसी प्रकार वीरशैव दर्शन में शिव अपने मूल स्वरूप में कोई विकार अथवा स्वरूप की किसी हानि के बिना स्वस्वातंत्र्यशक्‍ति के बल से इस विश्‍व के रूप में परिणत हो जाता है। इसी को ‘सुवर्ण-कुंडल-न्याय’ कहा जाता है।

इस प्रकार वीरशैव दर्शन में प्रपंच मिथ्या नहीं है, किंतु शिव का ही परिणाम हने से शिवस्वरूप ही है और सत्य है। अतएव इस दर्शन को ‘सर्वंलिङ्-गमयं जगत्’ कहा गया है। वस्तुत: अद्‍वैत् वेदांत में जिसे ‘विवर्त’ कहा जाता है, जिससे कि स्वस्वरूप की हानि के बिना अन्यस्वरूप का आपादन होता है, उसी को वीरशैव दर्शन में ‘अविकृत-परिणामवाद’ कहते हैं और उसका ‘सुवर्ण-कुंडल-न्याय’ के दृष्‍टांत से प्रतिपादन करते हैं (श.वि.द. पृष्‍ठ 218)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

सुशिव

ईश्वर दशा से ऊपर और सदाशिव दशा के नीचे जो बीच वाली अवांतर दशा होती है उस दशा में ठहरे हुए परमेश्वर को ही सुशिव कहा जाता है। यद्यपि प्रमातृ तत्वों या प्रमेय तत्त्वों के विश्लेषण में इस अवस्था को कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया है फिर भी उपासना के क्रम में सुशिव के भी विशेष स्थान को माना गया है जिसको पार करके ही साधक सदाशिव दशा पर आरोहण कर सकता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सुषुप्ति

वह अवस्था, जिसमें न तो बाह्य इंद्रियाँ ही कोई काम करती हैं और न अंतः ही, परंतु फिर भी जिसमें विषयावभास के अभाव का आभास होता रहता है और साथ ही उस अभाव का साक्षी रूप प्रमाता भी अपने ही चित्प्रकाश से चमकता रहता है। इसके कई एक प्रकार होते हैं जैसे – श्रम के कारण होने वाली सुषुप्ति को निद्रा, मादक द्रव्य के प्रभाव से होने वाली को मद, शरीरस्थ धातुओं के दोष से होने वाली को मूर्च्छा और स्वेच्छापूर्वक सिद्ध की गई सुषुप्ति को समाधि कहा जाता है। यह पुनः दो प्रकार की होती है –
– अपवेद्य
वह सुषुप्ति जिसमें प्रमेयांश का लेशमात्र भी आभास नहीं रहता है। इसे शून्य सुषुप्ति कहा जाता है। इसमें प्रमाता अपने शून्य स्वरूप में प्रविष्ट होकर रहता है।
– सवेद्य
वह निद्रा, जिसमें सुख का, शरीर के हल्केपन या भारीपन आदि का थोड़ा सा तथा धीमा सा आभास बना ही रहता है। इसे प्राण सुषुप्ति कहते हैं। इसमें प्रमाता के भीतर प्राणवृत्ति तथा अपानवृत्ति का थोड़ा सा आभास बना रहता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सुषुम्ना नाडी

नाडी शब्द के विवरण में बताया गया है कि शरीर स्थित अनन्त नाडियों में से तीन नाडियाँ मुख्य हैं – इडा, पिंगला और सुषम्ना। सुषुम्ना इनमें प्रधानतम है। शरीर के मध्य भाग में इसकी स्थिति है। चूंकि यह इडा और पिंगला दोनों नाडियों से संबद्ध है, अतः इसको अग्नीषोमात्मक माना गया है। प्राचीन ग्रन्थों में उक्त तीनों नाडियों को सोम, सूर्य और वह्नि का धाम तथा वाम, दक्षिण और मध्य पवन का आधार माना गया है। सुषुम्ना शरीर के मध्य भाग में पृष्ठवंश में स्थित है। ब्रहमरन्ध्र पर्यन्त इसकी गति है। सुषुम्ना नाडी प्रधानतम इसलिये मानी जाती है कि इडा और पिंगला नाडी का इसी में लय हो जाता है। शारदातिलक और उसकी टीका में स्वाधिष्ठात, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञाचक्र – ये सुषुम्ना नाडी के पाँच पर्व माने गये हैं। इडा और पिंगला नाडी के मार्ग से जब पवन ऊपर उठता है, तब उक्त स्थानों पर उनका सुषुम्ना नाडी से संपर्क होता है। इस प्रकार उक्त तीनों नाडियाँ ऊर्ध्वगामिनी मानी गई हैं।
सुषुम्ना नामक यह मध्य नाडी कन्द भाग से ब्रहमरन्ध्र तक ऊपर की ओर गतिशील होती है। ज्ञानसंकलिनी तन्त्र (11-12 श्लो.) में इडा को गंगा, पिंगला को यमुना और सुषुम्ना को सरस्वती बताया गया है। यह तीर्थराज प्रयाग है, जिसमें गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। इसमें स्नान करने वाला व्यक्ति सब पापों से मुक्त हो जाता है। सुषुम्ना नाडी ही ब्रह्मनाडी कहलाती है। इसी में सारा विश्व प्रतिष्ठित है। गुदा के पृष्ठभाग से शिरोभाग तक जो अस्थिदण्ड स्थित है, उसी को वीणादण्ड अथवा ब्रह्मदण्ड कहते हैं। उसके अंतिम भाग में एक सूक्ष्म सुषिर (छिद्र) है। इसी को ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं। योगाभ्यास के प्रभाव से मध्यनाडी सुषुम्ना यहाँ शिव और शक्ति के सामरस्य के रूप में जब विश्राम करती है, तब साधक समाधिस्थ हो जाता है, जीवन्मुक्त हो जाता है।
पूर्णानन्द प्रदर्शित सुषुम्ना तथा उसकी सहयोगिनी नाडियों का वर्णन नाडी शब्द की परिभाषा में भी किया गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

सूक्ष्मभूत

भूतजय के प्रसंग में ‘सूक्ष्मभूत’ का उल्लेख योगसूत्र (3/44) में मिलता है। यह ‘सूक्ष्म’ तन्मात्र है; द्र. तन्मात्र शब्द। ‘भूतसूक्ष्म’ शब्द का प्रयोग भी योगशास्त्र में मिलता है; द्र. व्यासभाष्य 1/49। यहाँ भूतभूक्ष्म का अर्थ है – परमाणु (द्र. तत्त्ववैशारदी)। 1/44 व्यासभाष्य में परमाणु अर्थ में भूतसूक्ष्म शब्द प्रयुक्त हुआ है (द्र. तत्त्ववैशारदी)। पार्थिव, आप्य (= जलीय), तेजस, वायवीय एवं आकाशीय भेद से परमाणु पाँच प्रकार के हैं। गन्धतन्मात्र प्रधान पाँच तन्मात्रों से पार्थिव परमाणु की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार गन्धतन्मात्रहीन रसतन्मात्रप्रधान चतुर्विध तन्मात्रों से आप्य (जलीय) परमाणु; गन्धरसहीन रूपतन्मात्र प्रधान त्रिविध तन्मात्रों से तेजस परमाणु; गन्ध-रस-रूप-तन्मात्रहीन स्पर्शप्रधान त्रिविध तन्मात्रों से वायवीय परमाणु एवं शब्दतन्मात्र से आकाशीय परमाणु उत्पन्न होते हैं (द्र. तत्त्ववैशारदी)। घटादि पदार्थ इन भूतसूक्ष्मों (परमाणुओं) का संस्थानविशेष है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सूक्ष्मशरीर

सांख्य में (यह शरीर मातापितृज शरीर से भिन्न है) इस शरीर का वर्णन सांख्यकारिका 40-42 में किया गया है। यह शरीर बुद्धिरूप लिंग (पुरुष का ज्ञापक) के इसमें रहने के कारण अथवा महाप्रलय में इसके प्रकृति में लीन होने के कारण लिंग भी कहलाता है।
सूक्ष्मशरीर महत्तत्त्व, अहंकार, मन, दस इन्द्रिय तथा पाँच तन्मात्रों का समुदाय है (18 अवयवों से युक्त)। प्रत्येक पुरुष के लिए एक-एक सूक्ष्म शरीर है जो आदिसर्ग में उत्पन्न होकर महाप्रलय-पर्यन्त अवस्थित रहता है। यह शरीर स्वयं भोगहीन रहता है और स्थूल शरीरों से युक्त होकर ही भोग करने में समर्थ होता है। यह भोग-अपवर्ग रूप पुरुषार्थ द्वारा प्रयोजित होकर नाना योनियों में नाना प्रकार के स्थूल शरीरों को लेकर संसरण करता रहता है। 3/7 सांख्यसूत्र में सूक्ष्म शरीर का निर्देश है। व्याख्याकारों ने कहा है कि यह वही शरीर है जिसका विवरण सांख्यका. 40 में है। विज्ञानभिक्षु कहते हैं कि सूक्ष्मशरीर के 17 अवयव हैं (अहंकार का अन्तर्भाव बुद्धि में है) तथा यह सर्गादी में एक ही उत्पन्न होता है। कुछ अन्य मतभेद भी हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सूक्ष्मसंयम

भूतों की जय करने के लिए भूतों को जिन पाँच रूपों में संयम करना आवश्यक होता है, ‘सूक्ष्म’ उनमें अन्यतम है (योगसूत्र 3/44)। तन्मात्र ही भूतों का यह सूक्ष्मरूप है। तन्मात्र भूत का चरम रूप (सूक्ष्मतम) है। चूंकि तन्मात्र भूत का उपादान कारण है और उपादान कारण कार्य से सदैव सूक्ष्म होता है, अतः तन्मात्र नामक रूप को ‘सूक्ष्म’ शब्द से कहा गया है। द्र. तन्मात्र शब्द। वशित्व नामक जो विभूति है (अणिमादि अष्टसिद्धियों के अन्तर्गत) वह इस सूक्ष्म संयम से होता है। भौतिक वस्तु एवं भूतों को सर्वथा नियंत्रित करने की शक्ति इस विभूति से होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सूक्ष्मादीक्षा

देखिए निर्वाण दीक्षा।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सूर्य

1. ज्ञानशक्ति स्वरूप केवल शुद्ध प्रकाशमात्र। (तन्त्रालोक 3-120)। शुद्ध तेज होने के कारण इसे तीक्ष्णस्वरूप तथा रक्त वर्ण वाला माना गया है। (वही 3-114)।
2. संविद्रूप पर-प्रकाश ही जब किंचित् संकोच के कारण प्रमाणरूप में प्रकट हो जाता है तो इस स्थिति में पहुँचने पर ही उसे सूर्य कहते हैं। इसी कारण सूर्य को प्रमाणस्वरूप भी कहा गया है। (तन्त्रालोक खं 3-117, 121)।
3. पाँच प्राणों में से प्रथम प्राण स्वरूप। (वही पृ. 20)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सृष्टि कृत्य

अपने शुद्ध संवित् स्वरूप में संवित् रूप में ही प्रकाशित हो रहे स्वात्म रूप विश्व को अपने ही पारमेश्वरी आनंद के लिए अपने से भिन्न रूप में अवभासित करने की पारमेश्वरी लीला। परमेश्वर अपने अभिन्न एवं अद्वैत प्रकाश के भीतर ही प्रतिबिंब की भांति भेदमय जगत् को अवभासित करता है। इस प्रकार शिव के विश्वोत्तीर्ण स्वरूप को छिपाती हुई उसके विश्वमय रूप में अवभासित होने की इस पारमेश्वरी लीला को परमेश्वर का सृष्टि कृत्य कहते हैं। (तन्त्र सार पृ. 11)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सृष्टिचक्र

तरंगहीन समुद्र में जिस प्रकार वायु की क्रिया के कारण कुछ चांचल्य दिखलाई देता है, जिसके द्वारा एक के बाद एक महातरंगों की उत्पत्ति होती रहती है, उसी प्रकार निर्विशेष शान्त तथा क्षोभशून्य ‘भासा’ रूपी महासत्ता के वक्षस्थव पर स्वातन्त्र्य के उल्लास के कारण उद्योगरूपी आदि स्पन्द का उदय होता है। इसे ही सृष्टि की प्रथम कला का आत्मप्रकाश कहते हैं। उद्योग, अवभास, चर्वण, आत्मविलापन तथा निस्तरंग की समष्टि को ही सृष्टि कहा जाता है। प्रत्येक जीवात्मा में समरूप से ये विद्यमान हैं।
दृष्टान्त के लिये एक कुम्हार के घड़ा बनाने के व्यापार को ले सकते हैं। घड़ा बनाने से पहले घड़े का भाव कुम्हार के आत्मचैतन्य के साथ अभिन्न रूप से स्थित रहता है। आत्मस्वरूप में अभिन्न रूप से विद्यमान इस भाव को भिन्न अथवा पृथक् रूप में बाहर निकालने के लिये जो प्राथमिक स्पन्दन होता है, वही ‘उद्योग’ नामक प्रथम प्रथा है। इसके पश्चात् दण्ड, चक्र आदि की सहायता से यह भाव बाहर प्रकाशित होता है। इसी को अवभास कहते हैं। सृष्टि क्रिया के अन्तर्गत यह द्वितीय प्रथा है। इसके बाद बाह्य रूप से अवभासित इस भाव को नाना प्रकार के व्यापारों के द्वारा बार-बार अपने रूप में अनुभव करना पड़ता है। इसी का पारिभाषिक नाम चर्वण है। अर्थक्रियाकारित्व अथवा प्रयोजन सम्पादन ही सब भावों का एकमात्र उद्देश्य होता है। इस उद्देश्य के सिद्ध हो जाने पर इसके प्रति उदासीनता का होना स्वाभाविक है। यही ‘विलापन’ नामक चतुर्थ प्रथा है। जब इस अर्थक्रिया की स्मृति तक लुप्त हो जाती है, तब ‘निस्तरंगत्व’ नाम की पंचम प्रथा का आविर्भाव होता है।
ऊपर जो दृष्टान्त दिया गया है, उसमें आत्मा या परमेश्वर का स्वरूप ही समुद्रस्थानीय है तथा घट आदि प्रत्येक भाव उसके तरंगस्वरूप हैं। ये तरंगें परमेश्वर में ही उदित होती हैं और फिर उन्हीं में लीन भी हो जाती हैं। भासा अथवा स्वातन्त्र्य शक्ति वस्तुतः निष्कल होते हुए भी कलामय है, क्रमहीन होते हुए भी क्रमविशिष्ट प्रतीत होती है। सृष्टि व्यापार में जिन पाँच प्रथाओं का उल्लेख किया गया है, वे सभी उसी की कला के खेल हैं। आत्मा की स्वधामस्थ पंचयोनि तथा उनके साथ अविनाभूत पंचसिद्ध मिलकर सृष्टि की दस कला के रूप में वर्णित होते हैं। तात्त्विक दृष्टि से देखने पर ये उद्योग, अवभासन, चर्वण, आत्मविलापन तथा निस्तरंगत्व से भिन्न पदार्थ नहीं है। सृष्टि प्रभृति प्रत्येक व्यापार में इनका खेल देखने को मिलता है। इसी कारण एकमात्र सृष्टि में ही सृष्टि, स्थिति, संहार, अनाख्या तथा भासा नामक पाँचों कृत्यों की समस्त विचित्रताओं का स्पष्ट रूप से विकास पाया जाता है (महार्थमंजरी, पृ. 97-98)।
Darshana : शाक्त दर्शन

सृष्टिसंहार बीज

अनाहत नाद की अभिव्यक्ति के दो प्रमुख स्थान हैं – एक सृष्टि बीज सकार और दूसरा संहार बीज हकार। इन दो बीजों का आश्रय लेकर ही नाद अभिव्यक्त होता है। योगी लोग जानते हैं कि प्राण के आदि कारण का अनुसन्धान करने पर चिदाकाश के प्रथम स्पन्दन पर ही दृष्टि पड़ती है। चिदाकाश का यह स्पन्दन भी वस्तुतः स्वतः सिद्ध नहीं है। वह परम पुरुष और परमा प्रकृति की यामलावस्था से उद्भूत है। बिन्दुयुक्त हकार (हं) परम पुरुष का और विसर्गयुक्त सकार (सः) परमा प्रकृति का वाचक है। दोनों की यामलावस्था ही आदि हंस का रूप हैं, जिसे निष्पन्द और स्पन्दतत्त्व का सन्धिस्थान माना जा सकता है। इस आदि प्राण को ही संवित् का प्रथम स्फुरण कहते हैं। यही सृष्टि के सब तत्त्वों को धारण करने वाली शक्ति है। हम लोगों के शरीर में श्वास-प्रश्वास का खेल इस सृष्टिसंहार बीजात्मक हंसरूपी प्राण का ही व्यापार है। (तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि, पृ. 296-297)।
Darshana : शाक्त दर्शन

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