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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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सवितर्का समापत्ति

स्थूलवस्तुविषयक जो दो समापत्तियाँ होती हैं, उनमें सवितर्का प्रथम है (द्वितीय जो इससे उच्च कोटि की है, वह निर्वितर्का कहलाती है)। स्थूल को महत् भी कहा जाता है। जिसको विकृति या केवलविकृति कहा जाता है, वही स्थूल है; ऐसे पदार्थ संख्या में सोलह हैं – पाँच भूत तथा ग्यारह इन्द्रियाँ। यह समापत्ति शब्द, अर्थ (वाच्य अर्थ) तथा ज्ञान (शब्दहेतुक मनोभाव) – इन तीनों के विकल्प से संकीर्ण (= मिश्रित) होती है (योगसूत्र 1/42)। इस समापत्ति को योगियों का ‘अपरप्रत्यक्ष’ माना जाता है (निर्वितर्का समापत्ति ‘पर प्रत्यक्ष’ कहलाती है)। कोई-कोई व्याख्याकार कहते हैं कि 1/17 सूत्र में जिस वितर्क का उल्लेख है (स्थूलविषयक आभोग), उसके ही दो भेद सवितर्का-निर्वितर्का रूप समापत्तियाँ हैं। विज्ञानभिक्षु ने कहा है कि वेदान्तियों की जो सविकल्प समाधि है, वही यह सवितर्क है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संवित्

“प्राक् संवित् प्राणे परिणता” (अनेक स्थलों पर उद्धृत भट्ट कल्लट का वचन), “संविदैव भगवती स्वान्तः स्थितं जगद् बहिः प्रकाशयति” (ऋजु पृ. 27) इत्यादि स्थलों में संवित् शब्द पराहन्ता (पूर्णाहन्ता) मयी स्वातन्त्र्य शक्ति का वाचक है। शाक्त मत में यही परम तत्त्व के रूप में मान्य है। लक्ष्मीतन्त्र (14/5) में संवित् को लक्ष्मी का स्वच्छ, स्वच्छन्द रूप बताया गया है। इस शब्द का प्रयोग विमर्श शक्ति के लिये भी किया जाता है। दार्शनिकों ने इस शब्द का प्रयोग विज्ञान अथवा ज्ञान सामान्य के अर्थ में भी किया है। क्रम दर्शन के पंचवाह पद की व्याख्या करते समय व्योमवामेश्वरी, खेचरी प्रभृति समष्टि शक्तियों को और अंतःकरण, वहिःकरण के माध्यम से बहने वाली व्यष्टि शक्तियों को संविद्देवीचक्र के रूप में मान्यता दी गई है।
Darshana : शाक्त दर्शन

संवित्

1. शुद्ध चैतन्य। परप्रमातृ तत्त्व। समस्त भावजगत संवित् में ही संवित् के ही रूप में रहता है। जो कुछ भी जिस भी रूप में आभासित होता है वह सभी कुछ संवित् के ही कारण वैसा आभासित होता है क्योंकि संवित् जो कि शुद्ध एवं परिपूर्ण प्रकाश है उसके बिना और कुछ भी नहीं है और भासमान सारा प्रपंच उसी का बाह्य आकार है। (तन्त्र सार पृ. 5, 6 ई .प्र. वि. 2 पृ. 140, 141)।
2. प्रकाश एवं विमर्श का परम सामरस्यात्मक अनुत्तर तत्त्व। देखिए परासंविता अनुत्तर संवित्।
3. शुद्ध असीम एवं परिपूर्ण प्रकाश। पृथ्वी से लेकर सदाशिव पर्यंत सभी तत्त्वों का एकघन स्वरूप। (इ.प्र.वि. 2 पृ. 131)।
4. चैतन्य। अपने आपको अहंरूपतया और समस्त विषयों को इदंरूपतया तथा नीलपीतादिरूपतया प्रकाशित कर सकने वाली चेतना।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संवेग

योगसूत्र 1/21 में ‘तीव्रसंवेग’ शब्द (तीव्रसंवेगवान् के अर्थ में) है। भाष्य में संवेग का अर्थ नहीं बताया गया है। सूत्र कहता है कि तीव्र संवेगवान् का समाधिलाभ आसन्न होता है। वाचस्पति ने ‘संवेग’ का अर्थ ‘वैराग्य’ किया है, जो सुसंगत नहीं लगता। विज्ञानभिक्षु इसका अर्थ ‘उपाय के अनुष्ठान में शीघ्रता’ करते हैं। ‘संवेग’ का यह अपूर्ण अर्थ है। संभवतः ‘संवेग’ का अर्थ है – क्रिया का हेतुभूत दृढ़तर संस्कार जिसके कारण कोई अनुष्ठान तीव्र रूप से एवं सहजतया किया जा सके। यह अर्थ आयुर्वेदसूत्र ग्रन्थ (अज्ञातकर्तृक) (4/3) में दिया गया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संवेदन

आन्तर बोध के अर्थ में संवेदन का प्रयोग प्रायः मिलता है; द्र. स्वबुद्धिप्रचारसंवेदन (व्यासभाष्य 4/19); स्वबुद्धिसंवेदन (योगसूत्र 4/22); प्रचार संवेदन (3/38)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संवेदन

इंद्रियों के साथ विषय के संपर्क से नील, पीत, घट आदि बाह्य विषयों का, मन से सुख दुःख आदि का तथा केवल संवित् ही के बल से अपने आपका जो अनुभव प्राणी को होता है उसे संवेदन कहते हैं। अन्य दर्शनों में इसे ‘प्रत्यक्ष’ कहते हैं। परंतु प्रत्यक्ष केवल इंद्रियजन्य ज्ञान ही होता है जबकि संवेदन सुषुप्ति दशा में भी होता है जहाँ इंद्रियों का सहयोग संभव ही नहीं है। अतः संवेदन का क्षेत्र प्रत्यक्ष से कुछ अधिक विशाल है। देखिए स्वसंवेदन।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सवेद्य सुषुप्ति

देखिए सुषुप्ति।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संशय

संशय योगविघ्नों में एक है (योगसू. 1/30)। दो परस्पर भिन्न कोटियों का ज्ञान होना और किसी एक कोटि का निश्चय न होना संशय है; जैसे दूरस्थ किसी अस्पष्ट पर लम्बे पदार्थ को देखकर यह सोचना कि यह खूंटा है या कोई पुरुष है। संशय विपर्यय से भिन्न है, क्योंकि विपर्यय में एक ही कोटि (जो वस्तुतः नहीं है) का निश्चयात्मक ज्ञान होता है। ‘बुद्धि आत्मा है या नहीं’ – इस प्रकार का ज्ञान अध्यात्मक्षेत्रीय संशय है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संसार वृक्ष

संसार एक ऐसा आदिवृक्ष है, जिसकी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार, ये आठ शाखायें हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार रस हैं। दश इन्द्रियाँ जिसके पत्ते हैं, जिस पर जीव और ईश्वर रूप दो पक्षी हैं, सुख और दुःख रूप दो फल हैं तथा देहवर्ती नव द्वार ही जिसके कोटर हैं।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

संस्कार

चित्त में कोई भी क्रिया होने पर उसके अनुरूप जो भाव चित्त में (विधारिणी शक्ति के द्वारा) सूक्ष्म रूप से रह जाता है, वह संस्कार कहलाता है। कर्म करते रहने पर उसमें जो दक्षता उत्पन्न होती है, वह इस संस्कार के कारण ही होती है। योगशास्त्र का मुख्य विषय चूंकि वृत्तिरोध है, अतः योगियों ने ज्ञानसंस्कार (वृत्तिजनित संस्कार) पर ही विशेषतया विचार किया है। संस्कार को चित्त का दर्शनवर्जित (साक्षात् जिसका ज्ञान संभव न हो) धर्म या अपरिदृष्ट धर्म माना गया है। यही कारण है कि संस्कार के कार्य को देखकर संस्कार की सत्ता का अनुमान किया जाता है।
संस्कार के विषय में योगशास्त्र में जो मुख्य-मुख्य बातें कही गई हैं, वे ये हैं – (1) वृत्ति से संस्कार और संस्कार से तदनुरूप वृत्ति का उद्भव त्रिगुण स्वभाव के कारण नियत रूप से तब तक सदैव चलता रहेगा, जब तक चित्त का निरोध न हो। (2) वृत्तिरोध होने मात्र से संस्काररोध नहीं होता, संस्काररोध के लिए पृथक् प्रयत्न करना पड़ता है। (3) योगशास्त्रोक्त कौशल से चित्त को वृत्तिहीन कर संस्कारयुक्त रूप से रखा जा सकता है। यह अवस्था संस्कारशेष-निरोध कहलाती है। (4) यद्यपि लौकिक व्यक्ति के लिए वृत्तियाँ ही साक्षात् ज्ञात होती हैं, संस्कार नहीं, पर योगी के लिए संस्कार भी साक्षात्कारयोग्य पदार्थ है; अपने संस्कारों का साक्षात्कार करके योगी अपने अतीत जन्मों को जान सकते हैं (योगसूत्र 3/18)। (5) संस्कारानुकूल वृत्तियों का उद्भव जितना बढ़ता जायेगा, संस्कार का बल भी उतना ही बढ़ता जायेगा। (6) पूर्वसंस्कार के अधीन होकर साधारण प्राणी को प्रायः सभी कर्म करने पड़ते हैं, इस वशीभूतता के कारण प्राणी को ऐसे अनेक कर्म करने पड़ते हैं, जिनसे दुःख की वृद्धि होती है, इसको संस्कारहेतुक दुःख कहा गया है।
वृत्ति और संस्कार दोनों चित्त के धर्म हैं। कैवल्य में दोनों की अत्यन्त निवृत्ति होती है। संस्कारों को दो भागों में बाँटा गया है – कर्माशय तथा वासना (द्र. कर्म, कर्माशय एवं वासना शब्द)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संस्कारदुःखता

सब कुछ दुःखप्रद है’, इस मत को सिद्ध करने के लिए जो युक्तियाँ योगसूत्र (2/15) में दी गई हैं, यह उनमें एक है। संस्कारदुःख = संस्कारहेतुक दुःख = सुख-दुःख-संस्कार-जनित दुःख। चूंकि संस्कार के कारण यह दुःख होता है, अतः यह संस्कारदुःख कहलाता है। युक्ति का स्वरूप यह है – सुख-दुःख के अनुभाव से उनके संस्कार होते हैं; इन संस्कारों से तदनुरूप स्मृतियाँ उठती हैं; इन स्मृतियों के द्वारा राग-द्वेष उद्बुद्ध होते हैं; उनसे पुनः तदनुरूप प्रवृतियाँ होती हैं। ये प्रवृत्तियाँ दुःख को उत्पन्न करती हैं; क्योंकि कर्म के विपाक से जो वासना होती है, वह जीव को दुःखकर कर्म में प्रवृत्त करती है। वस्तुतः ‘संस्कार-दुःख’ शब्द में संस्कार का मुख्य अर्थ ‘वासना’ है, कर्माशय नहीं – यह टीकाकारों ने स्पष्टतया दिखाया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सहजमाट

देखिए ‘माट’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

संहत्यकारित्व

यह वह युक्ति है जिसके बल पर व्यक्त-अव्यक्त से भिन्न अपरिणामी चिद्रूप पुरुष की सत्ता प्रमाणित की जाती है। जो पदार्थ संहत (अनेक अवयवों से निर्मित वस्तु जो अपने अवयवों द्वारा किसी प्रयोजन को निष्पन्न करती है) होता है, वह अन्य किसी के द्वारा प्रयोजित होता है – यह इस युक्ति का स्वरूप है। यह युक्ति सांख्यकारिका (17), सांख्यसूत्र (1/66), योगसूत्र (4/24), व्यासभाष्य (2/20) के अतिरिक्त शंकरादि आचार्यों के द्वारा भी प्रयुक्त हुई है। जिस प्रकार अनेक अवयवों द्वारा निर्मित शय्या ‘शयन करना’ रूप प्रयोजन को निष्पन्न करती है, जिस प्रयोजन का सम्बन्ध किसी अन्य वस्तु से है (अन्य कोई प्राणी ही उस पर सोता है, शय्या स्वयं नहीं सोती); उसी प्रकार महत्तत्त्व (जो अन्तिम व्यक्त पदार्थ है) संहत होने के कारण (त्रिगुण से निर्मित होना ही उसकी संहतता है) अपने से भिन्न किसी पदार्थ के प्रयोजन को निष्पन्न करता है, अर्थात् महत्तत्त्व स्वयं दुःखी या सुखी नहीं होता, पुरुष ही सुखी-दुःखी होता है – ऐसा पूर्वाचार्यों ने कहा है। त्रैगुणिक चित्त पुरुषरूपी स्वेतर पदार्थ के भोग-अपवर्ग रूप प्रयोजन को निष्पन्न करता है (योगसूत्र 4/24)।
व्याख्याकारों ने यह भी कहा है कि जो वस्तु जिस स्वेतर वस्तु के प्रयोजन को निष्पन्न करती है, वह वस्तु यदि संहत हो तो वह भी परार्थ होगी; अतः संहतपरार्थत्व-युक्ति से सिद्ध होने वाली ‘पर’ वस्तु अवश्य ही असंहत होगी। यही कारण है कि संहत पदार्थ (व्यक्त बुद्धि या अव्यक्त प्रकृति जो त्रिगुणात्मक होने के कारण संहत है) की परार्थता के कारण जो पुरुष रूप पदार्थ की सत्ता निश्चित होती है, वह असंहत वस्तु है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सहस्रार चक्र

आज्ञाचक्र के ऊपर महानाद की और इसके ऊपर शंखिनी नामक नाडी के शिखर भाग के शून्य स्थान में ब्रह्मरन्ध्र स्थित विसर्ग के नीचे सहस्रदल पद्म की स्थिति मानी जाती है। इस अधोवक्त्र सहास्रार पद्म के दल प्रातःकालीन सूर्य की किरणों के समान कमनीय कान्ति वाले हैं। इसमें अकारादि क्षकारान्त सभी वर्ण विराजमान हैं। सहस्रार पद्म में पचास-पचास दलों की पच्चीस आवृतियाँ होती हैं। प्रत्येक पचास दलों की आवृति में पचास वर्णों की स्थिति मानी जाती है। इस सहस्रार चक्र की कर्णिका में निष्कलंक चन्द्रमण्डल निरन्तर प्रकाशित रहता है। इस चन्द्रमण्डल के मध्य में त्रिकोण और त्रिकोण के मध्य में परबिन्दु की स्थिति मानी गई है। कुछ आचार्यों के मत से सहस्रार स्थित इस त्रिकोण के बाहर अ, क और थ के क्रम से सोलह-सोलह वर्णों की तथा त्रिकोण के भीतर ह, क्ष और ळ वर्णों की स्थिति रहती है। इस बिन्दु स्थान में ही हंसपीठ पर भगवान् परमशिव निवास करते हैं। परमशिव के नीचे परमहंस नामक अन्तरात्मा की स्थिति मानी गई है। इस सहस्रार कमल की कर्णिका में शैवों के अनुसार शिव, वैष्णवों के अनुसार विष्णु, शाक्तों के अनुसार शक्ति का निवास है। इस स्थान में अपने इष्टदेवता का साक्षात्कार कर लेने के उपरान्त साधक पुनः संसार के आवागमन के चक्र में कभी नहीं पड़ता और उसमें सृष्टि और संहार करने की भी सामर्थ्य आविर्भूत हो जाती है (श्रीतत्त्वचिन्तामणि, षट्चक्र-प्रकरण, पृ. 6)।
Darshana : शाक्त दर्शन

सहस्रांश

वीरशैव दर्शन में चिच्छक्‍ति से क्रियाशक्‍ति पर्यन्त षड्‍विध शक्‍तियों की उत्पत्‍ति को बताते समय चिच्छक्‍ति के सहस्रांश से पराशक्‍ति की, पराशक्‍ति के सहस्रांश से आदिशक्‍ति की, आदिशक्‍ति के सहस्रांश से इच्छाशक्‍ति की और इसी प्रकार ज्ञानशक्‍ति तथा क्रियाशक्‍ति की भी उत्पत्‍ति बताई गई है। यहाँ पर ‘सहस्रांश’ का अर्थ है हजारवाँ भाग, अर्थात् एक पूर्ण वस्तु में समान परिमाण के हजार भाग करने पर, उनमें एक भाग जितना परिमाण का होता है, उसे ‘सहस्रांश’ कहते हैं (वा.शु.तं. 1/24-26)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

संहार कृत्य

विश्व को अपने में विलीन कर लेने की पारमेश्वरी लीला। परमेश्वर की अपने विश्वोतीर्ण रूप में अपने विश्वमय रूप को एकरस कर देने की लीला। प्रमेय जगत् को उसके संवित् स्वरूप मूलरूप में समा लेने की लीला। अपने संवित् स्वरूप में अपने ही स्वातंत्र्य से अपने आनंद के लिए प्रतिबिंबतया अवभासित हो रहे संपूर्ण सूक्ष्म एवं स्थूल सृष्ट प्रपंच को पुनः अपने अपने कारणभूत तत्त्वों में विलीन करते हुए अंततोगत्वा सभी तत्त्वों को एकरूप बनाकर अपने शुद्ध संवित् स्वरूप में एकरस कर देने की परमेश्वर की इस लीला को संहार कृत्य कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संहारचक्र

संहारचक्र में ग्यारह कलाओं का कार्य देखने में आता है। जितने भाव आत्मस्वरूप से पृथक् होकर विक्षिप्त हैं, उनको फिर आत्मप्रकाश में वासनारूप से अवस्थापित करना ही ‘संहार’ शब्द का अर्थ है। ग्यारह संहार शक्तियाँ अन्तःकरण के समष्टिरूप अहंकार को तथा बाह्य दस इन्द्रियों को ग्रास करके स्फुरित होती हैं। यहाँ अहंकार ही प्रमाता, इन्द्रियाँ प्रमाण तथा इन्द्रियों के विषय रूप समस्त ग्राह्य वस्तुएँ प्रमेय हैं। जो कलाएँ इन प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय को भीतर ग्रास करके प्रकाशित होती हैं, वे ही आत्मरूपी भगवान् की संहारिणी शक्तियाँ हैं। इन्हीं ग्यारह शक्तियों के संबंध के कारण परमेश्वर एकादश रुद्र संज्ञा को प्राप्त करते हैं (महार्थमंजरी, पृ. 99-100)।
Darshana : शाक्त दर्शन

साक्षात् उपाय

प्रकाशात्मक स्वरूप तथा विमर्शात्मक स्वभाव की परिपूर्ण सामरस्यात्मक अपनी संवित् रूपता को आत्मसाक्षात्कार द्वारा साक्षात् पहचानने का एकमात्र उपाय बनने के कारण शांभव उपाय को साक्षात् उपाय कहा जाता है। यही उपाय जब परिपूर्णता को प्राप्त कर जाता है तो अनुपाय कहलाता है। (तन्त्रालोकविवेक1-142)। अन्य सभी उपाय इसी उपाय के द्वारा पूर्ण साक्षात्कार पदवी तक पहुँचा सकते हैं। इस कारण से वे परंपरा उपाय हैं और यह साक्षात् उपाय है। (देखिए शांभव उपाय)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

साक्षात्कार

किसी वस्तु का साक्षात् ज्ञान। इंद्रिय और विषय के परस्पर साक्षात् संबंध से जिस साक्षात्कार रूप ज्ञान का उदय होता है उसे इंद्रिय – संवेदन या निर्विकल्प संवेदन कहते हैं। मानस साक्षात्कार से सुख, दुःख, आश्चर्य, घृणा, स्नेह आदि का संवेदन होता है। ये प्रत्यक्ष साक्षात्कार हैं।
तुर्या दशा में प्राणी को अपने चिन्मय स्वरूप का स्वयमेव जो संवेदन होता है उसे अपरोक्ष साक्षात्कार कहते हैं। यह साक्षात्कार साक्षात् ही होता है। अतः इसे परोक्ष नहीं कह सकते। यह इंद्रियों से या मन से नहीं होता है। अतः इसे प्रत्यक्ष भी नहीं कहा जा सकता। इसीलिए इसे अपरोक्ष कहते हैं। आत्म साक्षात्कार जब भी होता है अपरोक्ष ही होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

साक्षी

सांख्य में पुरुष को साक्षी कहा गया है (सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य, सांख्यकारिका 19)। साक्षी उस प्रकाशक को कहते हैं जो किसी करण की सहायता के बिना ही अपने विषय को प्रकाशित करता है। बाह्य या आन्तर इन्द्रिय की सहायता से बुद्धि विषयप्रकाशन करती है, अतः बुद्धि विषय की साक्षी नहीं है। पुरुष के द्वारा वृत्तिरूप ज्ञान का जो प्रकाशन होता है, उसमें किसी करण की अपेक्षा नहीं है, अतः पुरुष वृत्तियों के साक्षी हैं। इसी दृष्टि से पुरुष को चित्तसाक्षी या बुद्धिसाक्षी माना जाता है क्योंकि पुरुष और बुद्धि या चित्त के बीच में अन्य कोई पदार्थ नहीं है – दोनों में अव्यवधान है। कई आचार्यों का मत है कि पुरुष बुद्धि के साक्षी हैं, अन्य करणों के द्रष्टा हैं। पुरुष का यह साक्षित्व उसके सदा वृत्ति-ज्ञातृत्व-स्वभाव एवं अपरिणामिता के कारण हैं – यह व्याख्याकारों का कहना है। ‘साक्षी’ शब्द गौण अर्थ में भी प्रयुक्त होता है (द्र. सांख्यसूत्र 1/161 की टीकाएँ)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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