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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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समरस-भक्‍ति

देखिए ‘भक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

समाकर्ष

समीचीन आकर्ष समाकर्ष है। अथवा निश्चय का हेतु भूत आकर्ष समाकर्ष है। आकर्ष का अर्थ है – अपने स्थान से च्युत किया जाना। यह आकर्ष निश्चय का हेतु होने से समाकर्ष कहा जाता है। जैसे – असद्वा इदमग्र आसीत्, तद्धैक आहुः असदेवेदमग्र आसीत्, अव्याकृत मासीत्, तमआसीत् इत्यादि श्रुतियों में “असत्-अव्याकृत-तम आदि पद अपने अर्थ से च्युत कर दिए जाते हैं और केवल ब्रह्म की सद्रूपता निश्चित या सिद्ध की जाती है। प्रकृत में यही समाकर्ष है (अ.भा.पृ. 507)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

समाधि

योग के आठों अंगों में समाधि अन्तिम है। यह समाधि कभी-कभी योगशब्द से भी अभिहित होती है; समाधि -विशेष योग है (द्र. योग शब्द)।
समाधि में एकाग्रता की पराकाष्ठा होती है। योगशास्त्रोक्त प्रकृत समाधि की अवस्था में शारीरिक-क्रियाओं का अत्यन्त रोध हो जाता है (श्वास-प्रश्वास, रक्त का संचरण आदि बन्द हो जाते हैं)। यदि ऐसा रोध न हो तो वह समाधि नहीं है। यह निरोध योगशास्त्रीय उपाय द्वारा यदि हो तो वह शास्त्रीय समाधि है; यदि कृत्रिम उपायों द्वारा हो तो समाधि भी कृत्रिम है। यमादि अवर अंगों के अभ्यास के बिना समाधि अधिगत नहीं होती। समाधि चित्त का धर्म है और चित्त की प्रत्येक भूमि में इस धर्म का उदय हो सकता है। ध्यान जब अभीष्ट अर्थमात्र का प्रकाशक होता है, और ध्यानकारी जब अपने ज्ञातृत्वस्वरूप को भूल-सा जाता है, तब वह अवस्था समाधि कहलाती है (योगसूत्र 3/3)। समाधि में जिस प्रकार अस्थैर्य या विक्षेप का अशेष क्षय होता है, उसी प्रकार ज्ञानशक्ति का असाधारण उत्कर्ष होता है। अस्थैर्यक्षय के कारण समाधिसिद्ध व्यक्ति में असाधारण बल या शक्ति का आविर्भाव होता है और ज्ञानशक्ति के उत्कर्ष के कारण अलौकिक तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है। ग्राह्य, ग्रहण एवं ग्रहीता के अन्तर्गत सभी ज्ञेय वस्तु समाधि के विषय हो सकते हैं।
यह कहा गया है कि समाधि में जो विक्षेपक्षय या निरोध है उस निरोध की प्रकृति के भेद से समाधि के कई भेद किए गए हैं, ‘भवप्रत्यय’ आदि भेद निरोध-आश्रित भेद हैं। समाधि में जो ज्ञान का उत्कर्ष है, उसके भेद से समापत्तियों का भेद किया गया है – यह विशेषतया ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समाधि

1. स्वतंत्रतापूर्वक बिना किसी अन्य वस्तु या स्थिति के प्रभाव से अपनी ही इच्छाशक्ति के बल से जागते हुए ही सुषुप्ति की अवस्था में प्रवेश करके उसी में कुछ समय के लिए ठहरना समाधि कहलाती है। इस तरह से समाधि सुषुप्ति का एक उत्कृष्टतर प्रकार है। इसके निकृष्ट प्रकार निद्रा, मद, मूर्च्छा आदि होते हैं।
2. शैवयोग के समावेशरूपी उत्कृष्ट अंग को भी कभी कभी समाधि कहा जाता है और समावेशयुक्त योगी को समाहित चित्त कहा जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समाधि भाषा

समाधि में ऋषियों द्वारा स्वयं अनुभव कर जो कहा गया हो, वह समाधि भाषा है। इसमें ऋषि स्वानुभूत विषय का प्रतिपादन करते हैं (त.दी.नि.पृ. 26)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

समाधिपरिणाम

जिस समय चित्त में सर्वार्थता (विक्षिप्तता) का क्षय तथा एकाग्रता (एक निश्चित आलम्बन में चित्त को स्थिर रखना) का उदय (वृद्धि) होता है, उस समय चित्त का जो परिणाम होता है, उसका नाम समाधि-परिणाम है। सर्वार्थता और एकाग्रता चित्तरूप एक ही धर्मी के धर्म हैं; इन दोनों धर्मों में एक ही चित्त अन्वित रहता है। सर्वार्थता का क्षय जैसे-जैसे होता जाएगा, एकाग्रता की वृद्धि वैसे-वैसे होती जाएगी। यह समाधिपरिणाम चित्त की अवस्था-विशेष है, अतः वह शाश्वत नहीं होता। द्र. योगसूत्र 3/11।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समान

पाँच वायुओं में यह है (योगसूत्रभाष्य 3.39)। आहार्य द्रव्य का पाक हो जाने पर जो रस बनता है, उसका समनयन करना (= नाड़ी में रसों को ले जाना) समान नामक वायु का मुख्य व्यापार है। भुक्त आहार्य पदार्थों को शरीर के उपादान के रूप में परिणत करना समान का मुख्य व्यापार है, नाडी में रसों को ले जाना मात्र नहीं। प्राण चूंकि शरीरधारण-शक्ति है, अतः यह कहना अधिकतर युक्त है कि देह के उपादाननिर्माण की शक्ति का जो अधिष्ठान है, उसका विधारण (निर्माण-वर्धन-पोषण ही विधारण है) करना समान का व्यापार है। नाभी से शुरू कर हृदय-पर्यन्त प्रदेश समान का मुख्य स्थान है, ऐसा माना जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समान

प्राण की पाँच वृत्तियों में से वह वृत्ति जो सुषुप्ति में काम करती है। समान वृत्ति में विषयत्यागमयी प्राणवृत्ति और विषयग्रहणमयी आपान वृत्ति दोनों एकरूपतया समरस हो जाती हैं। समान वह प्राणना व्यापार है जिसमें प्रश्वास निःश्वास रूपी प्राण और अपान दोनों विलीन होकर नाभि मण्डल के आसपास मण्डलाकार गति से विचरण करते हुए योगियों के अनुभव का विषय बनते हैं। उच्चार योग में समान प्राण और विश्रांति से ब्रह्मानंद नामक आनंदभूमिका की अभिव्यक्ति हो जाती है। इसी प्राण के द्वारा शरीर के अंगप्रत्यंग में रस, रुधिर आदि धातुओं का समीकरण संपन्न होता है। जठराग्नि का प्रज्वलन भी समान के ही द्वारा होता रहता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, खं 2, पृ. 245)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समानाभिहार

जिन हेतुओं से वस्तु के विद्यमान रहने पर भी उसकी उपलब्धि नहीं होती, समानाभिहार उनमें एक है (द्र. सांख्यकारिका 7)। इसका अर्थ है – समगुण, सदृश या समानजातीय पदार्थ के साथ मिल जाना। उदाहरणार्थ, मेघ से गिरे जल -बिन्दु जलाशय में गिरने पर पृथक् रूप से नहीं दीखते। जलाशय-स्थित जल एवं मेघजात जल की सजातीयता ही इस अनुपलब्धि का हेतु है। यह समानाभिहार ‘अर्थान्तर’ नामक दोष (= उपलब्धि-व्याघातकारी तत्त्व) में आता है (जयमङ्गलाटीका, सां. का. 7)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समापत्ति

योगसूत्र (1/41) में समापत्ति और उसके भेदों (1/42 -44) का स्पष्ट विवरण उपलब्ध होता है। सूत्रकार का कहना है कि अभीष्ट यानी ध्येय विषय में (जैसा कि आगे कहा जायेगा) सर्वविक्षेपशून्य एकाग्रभूमिस्थित चित्त की जो तत्स्थता (ध्येयसंलग्नता) एवं तदजनता (ध्येय का आकार ग्रहण कर लेना) होती है, वह समापत्ति है। इस अवस्था में ध्येयमात्र ही निर्भासित होता है – ध्येयसम्बन्धी कोई काल्पनिक ज्ञान नहीं रहता।
संप्रज्ञातसमाधि (1/17 योगसूत्रोक्त) और समापत्ति एक ही पदार्थ है – ऐसा कई व्याख्याकार कहते हैं। अन्यों का कहना है कि संप्रज्ञातसमाधि से उत्पन्न प्रज्ञा का नाम समापत्ति है। संप्रज्ञातसमाधि का लक्षण बताने वाले सूत्र में उन आलम्बनों का उल्लेख है जिनका आश्रय कर समापत्ति होती है। यह मत ही संगत प्रतीत होता है। समापत्ति प्रत्यक्षवृत्ति है – कुछ व्याख्याकारों ने स्पष्टतः ऐसा कहा है। यह समापत्ति संप्रज्ञातसमाधि में ही होती है – अन्य प्रकार की समाधियों में नहीं।
ध्येय विषय के अनुसार ज्ञान में भेद होता है। अतः समापत्ति के तीन भेद किए गए हैं, क्योंकि सभी ध्येयविषय, ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीता – इन तीन भेदों में विभक्त होते हैं। इस प्रकार ग्राह्यविषयक, ग्रहणविषयक एवं ग्रहीता-विषयक समापत्तियाँ होती हैं। (ग्राह्य=भौतिक, भूत एवं भौतिक; ग्रहण = बाह्य एवं आभ्यन्तर इन्द्रिय; ग्रहीता=अहंबोध रूप बुद्धितत्त्व तथा अहंकार)। इस समापत्ति के सवितर्का, निर्वितर्का, सविचारा एवं निर्विचारा भेद हैं; द्र. सविर्तका आदि शब्द। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि बौद्धशास्त्र में भी समापत्तियों की चर्चा है, पर वह योग से कुछ भिन्न है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समावेश

काश्मीर शैव दर्शन के साधना क्रम में पर तत्त्व के साथ एकीभाव हो जाने की अवस्था को समावेश कहते हैं। इस अवस्था में साधक अपनी जीवरूपता को भुलाकर अपनी शुद्ध असीम एवं परिपूर्ण संवित्स्वरूपता में प्रवेश करता है। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा 3-2-12)। त्रिक आचार में भिन्न भिन्न साधनाओं में समावेश की ही प्रधानता रहती है, तथा समावेश की अवस्था में समाविष्ट होना ही उनका लक्ष्य भी होता है। समावेश की अवस्था में स्थिति प्राप्त कर लेने पर साधक जीवन्मुक्त हो जाता है तथा इसके पुनः पुनः अभ्यास से इसी जन्म में उसे अपनी परमेश्वरता का भी अनुभव हो जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2, पृ. 232)।
– (आणव)
आणव उपाय के अभ्यास से होने वाला शिवभाव का समावेश (देखिए आणव समावेश)।
– (तुर्य)
समावेश की वह अवस्था जिसमें देहादि के अभिमान का सूक्ष्मतर रूप से कोई न कोई अंश विद्यमान तो रहता है, परंतु सभी देह आदि जड़ पदार्थ भी संविद्रूपता से ओतप्रोत हो जाते हैं। इस अवस्था में स्थिति होने पर भी साधक जीवन्मुक्त हो जाता है (भ. 2, पृ. 258; ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2, पृ. 231)।
– तुर्यातीत
समावेश की वह अवस्था जिसमें देहाभिमान किसी भी अंश में विद्यमान नहीं रहता है। यह भी जीवन्मुक्त की अवस्था होती है। (वही)।
– (शाक्त)
शाक्त-उपाय से होने वाला शिवभाव का समावेश। देखिए शाक्त समावेश
– शांभव
शांभव-उपाय से होने वाला शिवभाव का समावेश। देखिए शांभव समावेश।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समावेश

समावेश, समापत्ति, समाधि – ये सब शब्द पर्यायवाची हैं। समाधि के अर्थ में समापत्ति शब्द का प्रयोग बौद्ध साहित्य में भी मिलता है। समावेश दशा में व्यक्ति अपने बाह्य स्वरूप को भूल जाता है और अपने इष्टदेव के स्वरूप में समाविष्ट (लीन) हो जाता है। समावेश का लक्षण और उसके भेदों का, विशेष कर शाम्भव, शाक्त और आणव समावेशों का, निरूपण तन्त्रालोक के प्रथम आह्निक (पृ. 205-255) में विस्तार से मिलता है। आणव, शाक्त और शाम्भव नामक उपायों का सहारा लेकर साधक आणव, शाक्त और शाम्भव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। भगवद्गीता (9/23 तथा 12/3-5) में बताया गया है कि अन्य देवताओं की उपासना करने से और अक्षर ब्रह्म की उपासना करने से भी भगवत्पद की ही प्राप्ति होती है, किन्तु अन्य उपायों के अनुष्ठान में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी तरह से आणव प्रभृति विभिन्न उपायों का सहारा लेने पर भी साधक को एक ही परम पद की प्राप्ति होती है। फल की प्राप्ति में कोई भेद नहीं रहता। उपायों के अनुष्ठान में ही तरतमभाव रहता है।
उपायों की भिन्नता में शक्तिपात के तीव्र, मध्य, मन्द आदि भेदों को ही कारण माना गया है। ऐसा कहा जा सकता है कि मन्द शक्तिपात होने पर आणव उपाय का, मध्य शक्तिपात में शाक्त उपाय का और तीव्र शक्तिपात में शाम्भव उपाय का सहारा लेने में साधक समर्थ होता है। इन सबका प्रयोजन स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना है। अनुपाय प्रक्रिया से भी वही स्वात्मस्वरूप प्रकाशित होता है और आणव उपाय से भी। इस प्रकार आलम्बन का भेद होने पर भी समावेश दशा में कोई भेद नहीं रहता। आणव समावेश, शाक्त समावेश और शाम्भव समावेश दशा एक ही है। उपायों के भेद के कारण समावेश दशा में भेद आरोपित कर लिया जाता है। इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए अभिवनगुप्त ने तन्त्रसार (पृ. 43) में कहा है – “नैषां परफलविधौ कापि हि भिदा”।
Darshana : शाक्त दर्शन

समीप

सान्‍निध्य।

पाशुपत साधक का चित्त जब विषयों के प्रति काफी इच्छुक होते हुए भी रूद्रतत्व में ही लगा रहे अर्थात् चित्‍तवृत्‍तियों का सतत प्रवाह रूद्र तत्व से विचलित न होने पाए, वह अवस्था समीप कहलाती है। इस तरह से समीप योगधारण की एक स्थिर ध्यानमयी साधना के अभ्यास का नाम है। इस अभ्यास से चित्‍त शुद्‍ध हो जाता है और साधक रूद्र सामीप्य और रूद्र सायुज्य के प्रति आगे बढ़ता जाता है। (ग.का.टी.पृ.15)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

समुच्छलन

परमेश्वर के परिपूर्ण आनंद के उन्मेष की दशा। शुद्ध एवं परिपूर्ण परमशिव में जब स्वातंत्र्य के विलास से अपने ही आनंदात्मक स्वरूप एवं स्वभाव को अपने अभिमुख करते हुए देखने की अतिसूक्ष्म सी उमंग उठती है तो उसे ही समुच्छलन कहते हैं। इसे स्पंद, स्फूर्ति, घूर्णि आदि भी कहा जाता है। इसी समुच्छलन के प्रभाव के कारण शिव से लेकर पृथ्वी पर्यंत समस्त सृष्टि की अभिव्यक्ति होती है। (स्वा.द. 2-9, 10)। यह परिपूर्ण आनंद रस की छलकन जैसी वह दिव्यातिदिव्य पारमेश्वरी क्रिया है जो परमेश्वर की परमेश्वरता को स्फुटतया अभिव्यक्त करती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समुत्क्रमण दीक्षा

देखिए प्राणोत्क्रमण दीक्षा।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सम्पराय

परलोक सम्पराय है। अथवा सम्=सम्यक, पर=पुरुषोत्तम, अय=ज्ञान। अर्थात् जिससे पर पुरुषोत्तम सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो, वह भक्ति मार्ग सम्पराय है (अ.भा.पृ. 1060)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सम्पातलय

कर्म का लय सम्पातलय है अथवा कर्माशय का लय सम्पातलय है। कर्म को या कर्माशय को सम्पात कहा गया है, क्योंकि वह पात का, बंधन का विशिष्ट कारण है। इस प्रकार बंधकारणीभूत कर्म की या कर्माशय की निवृत्ति ही सम्पातलय है (अ.भा. 841, 1308)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सम्प्रयोग

योगशास्त्र में ‘संप्रयोग’ शब्द दो प्रसंगों में मुख्यतया प्रयुक्त होता है – (1) इष्टदेवतासंप्रयोग (द्र. योगसूत्र 2/44) तथा (2) विषयसंप्रयोग। प्रथम प्रसंग में संप्रयोग का अर्थ है – दर्शन करना अर्थात् इष्टदेवता का दर्शन करना एवं उनसे मन्त्रादि की प्राप्ति करना। विषयसंप्रयोग (द्र. व्यासभाष्य 1/15, 1/30 आदि) का अर्थ है – विषयप्राप्ति या विषय का सन्निकर्ष। विषयसंप्रयोगजन्य जो गर्ध (=अभिलाषा) है वह अविरति नामक अन्तराय है, यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सम्बोध

किसी विषय का साक्षात्कार संबोध कहलाता है। योगसूत्रोक्त 2/39 में ‘जन्मकथन्तासंबोध’ शब्द में इसका इसी अर्थ में प्रयोग है। सम्यग्ज्ञान के अर्थ में भी यह शब्द योगग्रन्थों में प्रयुक्त होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संयद्वाम

आनन्दात्मक सभी कर्मफलों का एकमात्र उपजीव्य (स्रोत) संयद्वाम है। अथवा सभी सुखों का घनीभूत जो अपवर्ग रूप फल है, उसका प्रदाता ब्रह्म संयद्वाम है। संयद्=प्रदाता, वाम=सुख, यह व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है (अ.भा.पृ. 318)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

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