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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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सदाशिव

इच्छाशक्‍ति की अंतरंगभूत ज्ञान-शक्‍ति से संयुक्‍त परशिवांश ही उपासकों के अनुग्रहार्थ जिस ध्यानगम्य सूक्ष्म साकार स्वरूप को धारण करता है, उसे ‘सदाशिव’ कहते हैं। यह शक्‍ति का प्रथम उन्मेष है। जैसे जल में भिगोया गया चना अंकुरित होने की प्रक्रिया में अपनी पूर्व अवस्था से विलक्षण अवस्था को धारण करता है, उसी प्रकार ‘शक्‍तित्व’ का ज्ञानांश के प्राधान्य से होने वाला सृष्‍ट्‍युन्मुख ‘इदंता’ रूप यह प्रथम स्फुरण ही ‘सदाशिव-तत्व’ है। यह शिव की शुद्‍ध सृष्‍टि के अंतर्गत है (शि.मं. पृष्‍ठ 35)।

यह अपने नाम के अनुरूप उपासकों को सदा मंगल प्रदान करने वाला है। पाँच ‘सादाख्य’ ही इस सदाशिव के पाँच मुख हैं। ये चार दिशाओं में चार और एक उर्ध्व दिशा में हैं। इनमें ‘कर्म-सादाख्य’ पूर्व दिशा का, ‘कर्तृसादाख्य’ दक्षिण दिशा का, ‘मूर्तसादाख्य’ पश्‍चिम दिशा का, ‘अमूर्त सादाख्य’ उत्‍तर दिशा का और ‘शिवसादाख्य’ ऊर्ध्वदिशा का मुख कहलाता है। ‘सदाशिव’ का कर्मसादाख्य नामक पूर्व दिशा का मुख स्थूल और साकार है। इसके भी पाँच मुख हैं। इन्हीं मुखों से शैवतंत्र के सिद्‍धान्तागमों की उत्पत्‍ति होती है। वस्तुत: यह कह सकते हैं कि ‘सदाशिव-तत्व’ पाँच सादाख्यों का समष्‍टि स्वरूप हैं अर्थात् ‘सदाशिव-तत्व’ से ही सादाख्यों का स्फुरण होता है।

Darshana : वीरशैव दर्शन

सदाशिव तत्त्व

अभेद के भीतर के धीमे से अवभास वाली भेदाभेद दशा। वह दशा जिसमें परिपूर्ण एवं शुद्ध प्रकाश विमर्शात्मक ‘अहं’ के स्वरूप के भीतर ही प्रमेयता अर्थात् ‘इदंता’ के अंश का धीमा सा संवदेन होता है और फिर भी ‘अहम्’ का अंश ही प्रधानतया चमकता रहता है। इस दशा में प्रमाता के भीतर उसकी शुद्ध संवित् ‘अहम् इदम्’ अर्थात् ‘मैं यह हूँ’, इस रूप में चमकने लगती है। विश्व की इसी दशा को सदाशिवतत्त्व कहा जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2 पृ. 191)। इस तत्त्व में परमेश्वर की ज्ञानशक्ति की स्फुट अभिव्यक्ति मानी गई है। (शिवदृष्टिवृत्ति पृ. 37)। अहम् अंश प्रधान भेदाभेद दृष्टिकोण वाले मंत्रमहेश्वर प्राणी इसी तत्त्व में ठहरते हैं। इस तत्त्व के अधिपति सदाशिव भट्टारक हैं। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, 2 पृ. 192, 193)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सदाशिव दशा

देखिए सदाशिव तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सदाशिव भट्टारक

सदाशिव तत्त्व पर शासन करने वाले तत्त्वेश्वर। प्रमातृ अंश में ही ‘इदंता’ का धीमा सा आभास होने पर भी ‘अहम् इदम्’ अर्थात् ‘मैं यह हूँ’ इस प्रकार की भेदाभेद की ही दृष्टि से देखने वाले मंत्रमहेश्वर प्राणियों के उपास्य देव। (तन्त्र सार पृ. 74, 75, 94)। अपने में सतत रूप से शुद्ध ‘अहम्’ अंश की प्रधानता के कारण सदाशिव भट्टकार ‘इदंता’ से स्फुट हुए भेद को अपने में ही शांत करते हुए सदैव अपने अभेद के आनंद से आप्लावित रहते हैं। इस प्रकार सृष्टि के विशेष कार्यों को ‘इदंता’ अंश प्रधान ईश्वर भट्टारक ही स्फुटतया करते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सद्‍भक्‍ति

देखिए ‘भक्‍ति’ शब्द के अंतर्गत ‘श्रद्‍धाभक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सद्‍योजात

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत सूत्र के कौडिन्य भाष्य के अनुसार ‘सद्योजात’ शब्द में विग्रह करके तीन भिन्‍न – भिन्‍न शब्द बनकर ईश्‍वर की तीन शक्‍तियों का अर्थ निकलता है। विग्रह इस प्रकार से है- सन् + आद्य + अजात, अर्थात् सद्य इस पद में दो अर्थ हैं सन् (सत्‍ता) तथा आद्य (आदिकारण), अतःजिसक सत्‍ता सदा व सर्वदा रहती है, जिसकी सत्‍ता अनादिकाल से है तथा जो जन्ममरण रहित (अजात) है, वह परमसत्‍ता सद्योजात कहलाती है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 52,53)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सद्योजात

स्वच्छंदनाथ (देखिए) के पाँच मंत्रात्मक रूपों में से तीसरा रूप। इस रूप में आकर शिव विशेष प्रकार के शैव शास्त्रों का उपदेश करता है। प्रक्रिया मार्ग की दृष्टि से साधना के क्रम में सदाशिव तत्त्व को इच्छा शक्ति की अभिव्यक्ति मान लेने पर सद्योजात को सदाशिव तत्त्व तथा ज्ञानशक्ति का स्फुट रूप माना गया है। (तं.आ.वि. 1-18)। स्वच्छंदनाथ के पाँच मुखों में से पश्चिमाभिमुख चेहरे का नाम भी सद्योजात है। सद्योजात मुख का वर्ण शुक्ल माना गया है। इसकी अवस्था शून्य संवेदनात्मक होती है। यहाँ समस्त प्रपंच अज्ञात अवस्था में ही पड़ा रहता है। यह रौद्री दशा प्रधान अवस्था है। (मा. वि. वा., 1-249 से 251, 255. 259, 266, 267)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सद्योनिर्वाण दीक्षा

देखिए प्राणोत्क्रमणदीक्षा।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सद्विद्या

देखिए विद्या (शुद्ध)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संनिपात

लौकिक समस्त व्यवहार संनिपात है। अर्थात् “तू, मैं” इत्यादि बुद्धि तथा मन इन्द्रिय आदि पर आश्रित समस्त व्यवहार संनिपात है (अ.भा.पृ. 137)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सन्

मुक्‍त जीव का एख लक्षण।

पाशुपत दर्शन के अनुसार मुक्‍त जीव निश्‍चल स्थिति में रहता है अर्थात् साधक समस्त आंतरिक व बाह्य, सूक्ष्म व स्थूल क्रियाओं से विरत होकर तथा चित्‍त को रूद्र में लगाकर अचल तथा स्थिर स्थिति को धारण करता है। उसी स्थिर स्थिति को सन् (निष्क्रिय) कहा गया है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 138)।

इस स्थिति पर पहुँचकर साधक को कोई योगाभ्यास भी नहीं करना होता है अतः उसे निष्‍क्रिय कहा गया है। (ग.का.टी.पृ. 16)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सन्तोष

पंचविध नियमों में सन्तोष एक है (योगसू. 2/32)। संतोष का स्वरूप भाष्य में इस प्रकार कहा गया है – ‘सन्निहित साधन से अधिक वस्तु ग्रहण करने की इच्छा का न होना’। सन्निहित साधन से जितना अर्थ सिद्ध होता है, उसके पूर्ण तृप्तिकारक न होने पर भी मन को क्षुब्ध न करना – प्राप्त वस्तु में ‘यह पर्याप्त है’ ऐसा बोध रखना – सन्तोष है। योगाभ्यासी की दृष्टि में ‘अधिक वस्तु ग्रहण करने की अनिच्छा’ का तात्पर्य है – शरीर को धारण मात्र करने के लिए आवश्यक वस्तु से अधिक वस्तु का ग्रहण न करना (जैसा कि मनु ने संन्यासप्रकरण में कहा है – प्राणयात्रिकमात्रः स्यात्, 6/57)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सप्त तत्त्व धारणा

तत्तव भेदन नामक योग की एक धारणा। छः तत्त्वों को साधना का आलंबन बनाते हुए उन्हें अपने शुद्ध संवित् स्वरूप सातवें तत्त्व में विलीन करने में सहायक बनने वाली आणवोपाय की तत्त्वाध्वा नामक धारणा। इस धारणा में अकल, मंत्रमहेश्वर तथा मंत्रेश्वर नामक तीन प्रमातृ तत्त्वों को उनकी तीन शक्तियों सहित साधना का आलंबन बने हुए मंत्र प्रमाता के स्वरूप में ही एकरूपता से देखते हुए इस समस्त प्रपंच को अपनी शुद्ध संवित्स्वरूपता का ही विस्तार समझना होता है और क्रम से उन्हें अपने इस शुद्ध स्वरूप में विलीन करना होता है। इस अभ्यास की परिपक्वता पर साधक को अपनी शिवस्वरूपता का समावेश हो जाता है। इस धारणा को सप्तमी विद्या भी कहते हैं (तं. आ 10-111 से 113, 125, 126)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सप्‍ताचार

क्रियाचार, ज्ञानाचार भावाचार, सत्याचार, नित्याचार, धर्माचार और सर्वाचार इन सात प्रकार के आचारों को ‘सप्‍ताचार’ कहा गया है। ये सात आचार अंतरंग की शुद्‍धि के साधन माने जाते हैं। वीरशैव संत-साहित्य में इनका विवरण इस प्रकार है –

क. क्रियाचार
जैसे क्षुधा, तृष्णा आदि शरीर के स्वाभाविक धर्म होते हैं, उसी प्रकार वीरशैव धर्म में प्रतिपादित स्‍नान, भस्मधारण, अष्‍टविध एवं षोडशविध उपचारों से गुरु, लिंग और जंगम की पूजा आदि करना यदि साधक का स्वभाव बन जाता है, तो उसे ‘क्रियाचार’ कहते हैं।

ख. ज्ञानाचार
शिवभक्‍तों एवं शिवज्ञानियों में अनन्य श्रद्‍धा रखकर उनकी वाणी (वचनशास्‍त्र) का अध्ययन, उन शिवभक्‍तों के द्‍वारा अनुभूत “मैं शिवस्वरूप हूँ” इस शिवानुभव को प्राप्‍त कर लेना ही ‘ज्ञानाचार’ कहलाता है।

ग. भावाचार
अज्ञानावस्था के काम, क्रोध आदि दुर्गुणों के स्वरूप को समझ के, उन्हें त्यागकर सदा सद्‌गुणों से मुक्‍त होने से साधक के अंतःकरण में जिस परिशुद्‍ध भावना का उदय होता है, उसे ‘भावाचार’ कहा गया है।

घ. सत्याचार
लेने-देन व्यवहार में आशा आदि से युक्‍त होकर कदापि असत्य न बोलना, दूसरों को देने वाले सदुपदेशों का स्वयं आचरण करना तथा स्वयं किए हुए वायदे का प्राणसंकट होने पर भी परिपालन करना ‘सत्याचार’ कहलाता है।

ड. नित्याचार
हठयोग से प्राप्‍त होने वाली अणिमा, महिमा आदि सिद्‍धियों की अभीप्सा न करके सहजरूप से प्राप्‍त उपयोग्य वस्तुओं को शिवप्रसाद समझकर उसी से सन्तृप्‍त होना ही ‘नित्याचार’ है।

च. धर्माचार
शिव की अर्चना से प्राप्‍त ‘पादोदक’ (चरणामृत) तथा ‘प्रसाद’ के अतिरिक्‍त ऐहिक एवं पारलौकिक किसी प्रकार के फल की अपेक्षा न करना ही ‘धर्माचार’ कहलाता है।

छ. सर्वाचार
उपर्युक्‍त सभी आचारों का पालन करते हुए, भक्‍त, महेश्‍वर, प्रसादी, प्राणलिंगी, शरण तथा ऐक्य इन छः साधनाजन्य अवस्थाओं को प्राप्‍त करके लिंगांग-सामरस्य-रूप मोक्ष को प्राप्‍त करना ही ‘सर्वाचार’ है। (च.ब.व. 1410; पं.प्र.पृष्‍ठ 58-60; व.वी.व. पृष्‍ठ 275-276)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

संप्रज्ञातसमाधि

अभ्यास और वैराग्यपूर्वक वृत्तिनिरोध का अभ्यास करते रहने पर जब कुछ काल पर्यन्त अनभीष्टवृत्ति को निरुद्ध करने की शक्ति उत्पन्न होती है, तब चित्त में योगशास्त्रोक्त उपायविशेष की सहायता से जो समाधि आविर्भूत होती है, वह संप्रज्ञातसमाधि कहलाती है। चूंकि यह समाधि एकाग्रभूमि चित्त में होती है, अतः यह ‘योग’ पद से अभिहित होती है (क्षिप्त-मूढ-विक्षिप्त-भूमि में उत्पन्न समाधि ‘योग’ पद से अभिहित नहीं होती)।
जिन उपायों के माध्यम से संप्रज्ञात -समाधि निष्पन्न होती है, वे चार हैं, वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता, जो उत्तरोतर अधिक सूक्ष्म हैं (द्र. योगसूत्र 1/17)। स्थूल आलम्बन को लेकर जो समाधि होती है, वह ‘सवितर्क’ संप्रज्ञात है; इसी प्रकार सूक्ष्म आलम्बन से युक्त समाधि सविचार-संप्रज्ञात है (ये ‘वितर्कानुगत-विचारानुगत’ भी कहलाते हैं)। बाह्य-आभ्यन्तर-इन्द्रियरोध-जनित आनन्द को आलम्बन के रूप में लेकर जो समाधि होती है, वह सानन्द (आनन्दानुगत) संप्रज्ञात है; इसी प्रकार बुद्धिरूप अस्मिता का आलम्बन लेकर जो समाधि होती है वह सास्मित (अस्मितानुगत) संप्रज्ञात कहलाती है। आलम्बन से युक्त रहने के कारण ये सभी समाधियाँ सबीज कहलाती हैं। संप्रज्ञातसमाधि से जात प्रज्ञा का नाम समापत्ति है। (यह ज्ञातव्य है कि समाधिप्रक्रिया एवं समाधिज प्रज्ञा का विशदीकरण अयोगियों द्वारा नहीं हो सकता और अयोगी टीकाकारों ने भाषाज्ञान-मात्र के बल पर जो व्याख्या की है, उससे कुछ भी विशेष बात ज्ञात नहीं होती)। योगशास्त्र का कहना है कि सास्मित-समाधि-सिद्ध योगी देहत्याग के बाद (उपयुक्त संस्कार रहने पर) प्रजापति होकर ब्रह्माण्ड-सृष्टि करने में समर्थ होते हैं। इन समाधियों से क्लेश-संस्कारों का अत्यन्त नाश नहीं होता, अतः पुनरावृत्ति की संभावना रहती ही है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संबंध (गुरु शिष्य)

शास्त्रों के तत्त्वज्ञान की परंपरा शिव से लेकर मानवों तक चलती आ रही है। इसके प्रवाह की छः सीढ़ियां मानी गई है। प्रकाश रूप शिव के तत्व का विमर्शन विमर्श रूपिणी शक्ति किया करती है। यह कोई भेद प्रधानगुरु शिष्य संबंध तो नहीं, परंतु फिर भी कहने मात्र के लिए इसे पर संबंध कहा गया है। यह पर नामक संबंध शेष पाँच स्तरों के संबंध में ओतप्रोत भाव में रहता है। पाँचों के रूप में वस्तुतः यही चमकता रहता है। चार संबंध प्रायः देवगणों में या देवतुल्य शिवयोगियों में स्फुरित होते हैं और पाँचवा संबंध लौकिक प्राणियों में। वे पाँच स्तरों के गुरु शिष्य संबंध इस प्रकार हैं – महानसंबंध, अवांतर या अंतराल संबंध, दिव्य संबंध, दिव्यादिव्य संबंध तथा इतरेतर संबंध। (यथास्थान देखिए)। (पटलत्रि.वि., टि. 0 पृ. 12)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सबीज समाधि

जिस समाधि में ‘बीज’ रहता है, वह सबीज समाधि कहलाती है। पूर्वाचार्यों ने ‘बीज’ को प्रधानतः आलम्बन के अर्थ में लिया है। कई व्याख्याकार कहते हैं कि ग्राह्य-विषयक जो चार प्रकार की समापत्ति हैं (जो संप्रज्ञात समाधि के क्षेत्र में आते हैं) वही सबीज हैं। इन व्याख्याकारों के अनुसार इन चार ग्राह्य-विषयक समापत्तियों के अतिरिक्त चार अन्य समापत्तियाँ भी हैं, जिनके विषय ग्रहीता और ग्रहण (इन्द्रियाँ) हैं। दूसरे व्याख्याकार कहते हैं कि ग्रहीता, ग्रहण और ग्राह्य (अर्थात् भूत-तन्मात्र-पाँच भौतिक पदार्थ) में जो समापत्तियाँ होती हैं, वे सब सबीज हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

समना (स्)

स्वच्छंद तंत्र के उद्योत के अनुसार वह सूक्ष्म अवस्था, जहाँ मन का मनन धर्म किसी न किसी अंश में विद्यमान ही रहता है। इसी कारण समना को अति शुद्ध प्रकार की अनुभव दशा भी कहा गया है। (स्वच्छन्दतंत्र उद्योत खं. 2 पृ. 166, 169)। तंत्रालोकविवेक के अनुसार अनाश्रित शिव (देखिए) भी जहाँ विलीन हो जाता है उसे समना अवस्था या सामनस्य पद / सामानस पद कहा गया है। इस पद या अवस्था तक अकल्पकाल की गणना की जा सकती है (तन्त्रालोकविवेकखं. 5, पृ. 257 60 )
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समयदीक्षा (समयाचार, समयी)

क्रिया प्रधान आचारमयी दीक्षा। इस दीक्षा में मंत्रोपदेश, वेषभूषा, दिनचर्या आदि बाह्य नियमों के पालन की प्रधानता होती है। इसके द्वारा साधक में उत्कृष्टतर दीक्षाओं को प्राप्त करने की योग्यता आ जाती है। समय दीक्षा के नियमों का पालन करने वाले साधक को समयी कहा गया है। उसके द्वारा पालन किए जाने वाले अनुशासन को ही त्रिक प्रक्रिया में समयाचार कहा गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

समयमत

वसिष्ठ, सनक, शुक, सनन्दन और सनत्कुमार द्वारा रचित संहिताएँ शुभागमपंचक के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा प्रदर्शित तान्त्रिक साधना का मार्ग समयाचार के नाम से प्रसिद्ध है। समयाचार का अभिप्राय है आन्तर वरिवस्था में अभिरुचि। समय मत में समय अर्थात् सादाख्य तत्त्व की सपर्या आन्तर सहस्रदल कमल में की जाती है, बाह्य पीठ प्रभृति में नहीं। श्रीचक्र को वियच्चक्र भी कहा जाता है। दहराकाश और बाह्याकाश में भी इसकी पूजा होती है, अतः इसको वियच्चक्र कहा जाता है। इस मत में दहराकाश, अर्थात् हृदय स्थित अवकाश में श्रीचक्र की पूजा की जाती है। इसी को समयपूजा कहते हैं। पाँच शक्तिचक्र और चार वह्निचक्रों के संयोग से श्रीचक्र बनता है। स्वाभिमुख त्रिकोणपरम्परा को शक्ति तथा ऊर्ध्वमुख त्रिकोणपरम्परा को वह्नि कहा जाता है। समय मत में यही स्थिति मान्य है। इस मत में सृष्टिक्रम से श्रीचक्र की रचना की जाती है। शांकर मत के अनुयायी इसी विधि से श्रीचक्र की पूजा करते हैं। सौन्दर्यलहरी की टीका में लक्ष्मीधर ने इस मत का विस्तार से निरूपण किया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

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