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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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लिंग-स्थल

घ. शिवलिंग
आदि-शक्‍ति के सहस्रांश से उत्पन्‍न शक्‍ति को ‘इच्छाशक्‍ति’ कहते हैं। इच्छाशक्‍ति का पर्याय नाम ‘विद्‍याकला’ है। इस विद्‍याकला से संयुक्‍त वह स्थल-रूप परशिव ही ‘शिवलिंग’ नाम से अभिहित होता है। सूक्ष्म साकार-स्वरूप का होने से यह ‘मूर्त सादाख्य’ का आश्रय कहलाता है। शिव के अघोरमुख से इसकी अभिव्यक्‍ति मानी जाती है। इस लिंग के उपासक अंग (जीव) को ‘प्रसादी’ कहते हैं। इस शिवलिंग-निष्‍ठ विद्‍या-कला के द्‍वारा उपासक की अविद्‍या निवृत्‍त हो जाती है और उसको विद्‍या की प्राप्‍ति होती है, जिससे वह साधक माया के कार्यभूत शरीर आदि से भिन्‍न अपने आत्मतत्व को जान लेता है (अनु. सू. 3/31,40; वी.आ.चं.पृष्‍ठ 40; चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद 3/29)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंग-स्थल

ड. गुरु-लिंग
इच्छाशक्‍ति के सहस्रांश से उत्पन्‍न शक्‍ति को ‘ज्ञानशक्‍ति’ कहते हैं और उसका पर्याय नाम ‘प्रतिष्‍ठा-कला’ है। इस प्रतिष्‍ठा कला से संयुक्‍त वह स्थल-रूप परशिव ही ‘गुरुलिंग’ नाम से अभिहित किया जाता है। इसे कर्तृसादाख्य का आश्रय माना जाता है। शिव के वामदेव-मुख से इस गुरु-लिंग की अभिव्यक्‍ति मानी जाती है। इस गुरु-लिंग के उपासक अंग (जीव) को ‘महेश्‍वर’ कहते हैं। गुरु-लिंग-निष्‍ठ प्रतिष्‍ठा-कला के द्‍वारा उपासक के मन में शिव के प्रति अनुराग की प्रतिष्‍ठा होती है (अनु.सु. 3/32,41,42; वी.आ.चं. पृष्‍ठ 40; चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद 3/28)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंग-स्थल

च. आचार-लिंग
ज्ञानशक्‍ति के सहस्रांश से उत्पन्‍न शक्‍ति ही ‘क्रियाशक्‍ति है और उसका पर्याय नाम ‘निवृत्‍ति-कला’ है। इस निवृत्‍ति कला से संयुक्‍त वह स्थलरूप परशिव ही ‘आचार-लिंग’ कहलाता है। इसे कर्म-सादाख्य का आश्रय माना जाता है। शिव के सद्‍योजात मुख से इस ‘आचार-लिंग’ की अभिव्यक्‍ति होती है। इस आचार-लिंग के उपासक अंग (जीव) को ‘भक्‍त’ कहते हैं। आचार-लिंग-निष्‍ठ निवृत्‍ति-कला के द्‍वारा उपासक कर्मभोग से निवृत्‍त हो जाते हैं और वह गुरु-लिंग आदि की उपासना की योग्यता प्राप्‍त कर लेता है। (अनु. सू. 3/33, 42,43, वी.आ.चं. पृष्‍ठ 40; चं.ज्ञा.आ. क्रियापद 3/28)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंगधारी

चिह्न को धारण करने वाला।

हर धर्म के अपने – अपने कुछ चिह्न विशेष होते हैं, जिनसे यह पहचाना जाता है कि अमुक संन्यासी अमुख धर्म से संबंधित है। ये चिह्न भिन्‍न-भिन्‍न धर्मों में भिन्‍न – भिन्‍न होते हैं। पाशुपत धर्म में भस्मस्‍नान, भस्मशयन, अनुस्‍नान तथा निर्माल्यधारण पाशुपत योगी के चिह्न कहे गए हैं और इन चिह्नों को धारण करने वाला योगी लिङ्गधारी कहलाता है। पाशुपत साधना की प्रारंभिक भूमिकाओं में लिंगधारी बनना आवश्यक होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 12)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

लिंगपरिणाम

योगसूत्र में गुणों के जो चार पर्व कहे गए हैं, लिंगरूप परिणाम उनमें से एक है (योगसू. 2/19)। यह लिंग महत्तत्त्व या बुद्धि भी कहलाता है जो त्रिगुण का प्रथम विकार है। (लिंग के उपादानभूत त्रिगुण अलिंग कहलाते हैं)। महत् को लिंग (= व्यंजक चिह्न) कहना साभिप्राय है क्योंकि व्यक्त महत् में पुरुष और प्रकृति दोनों का लिंग है – इसमें त्रिगुण का लिंग रूप जाड़्धर्म है तथा पुरुष का लिंग विषयप्रकाशन-सामर्थ्य है। इस लिंग में व्यक्तता की पराकाष्ठा है और यह अहंकार का साक्षात उपादान है। यह लिंग ही व्यावहारिक आत्मा है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

लिंगसर्ग

इस सर्ग का उल्लेख सां. का. 52 में मिलता है। व्याख्याकार वाचस्पति ने लिंगसर्ग को तन्मात्रसर्ग कहा है। सामान्यतया ‘लिंग’ शब्द सूक्ष्मशरीर का वाचक है, पर प्रस्तुत स्थल में लिंगसर्ग को तन्मात्रसर्ग के अर्थ में लेना युक्तिसंगत है – ऐसा विभिन्न टीकाकारों ने कहा है। किसी-किसी व्याख्या के अनुसार महत् आदि तत्त्वों का सर्ग ‘लिंगसर्ग’ है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

लिंगांग-संयोग

देखिए ‘लिंगांग-सामरस्य’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंगांग-सामरस्य

वीरशैव-दर्शन में मोक्ष को ‘लिंगांग-सामरस्य’ कहते हैं। यहाँ पर शिव को ‘लिंग’ और जीव को ‘अंग’ कहा गया है। शिव और जीव का परस्पर समरस हो जाना ही लिंगांग-सामरस्य’ है। समरसता की प्राप्‍ति के लिए इस दर्शन में ‘सती-पति’ भावना की आवश्यकता बतायी गयी है, अर्थात् शिव को ‘पति’ और अपने को ‘सती’ मानना चाहिये। साधक की साधना मैं जैसे-जैसे प्रगति होती जाती है, वैसे-वैसे उसके मन में शिव के प्रति प्रेम का आविर्भाव होता है। यही प्रेमभाव प्रगाढ़ होकर साधक में ‘सती-भाव’ को जाग्रत् करता है। जैसे अपने पर अपना प्रेम निर्व्याज रहता है, उसी प्रकार सती-भाव-युक्‍त साधक भी शिव से निर्व्याज प्रेम करता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि साधक के मन में शिव के साथ अभेद-भावना का अंकुर उत्पन्‍न हो जाता है। इस अभेद-बोध से ही साधक को शिव के आनंद-स्वरूप का अनुभव होने लगता है। शिव के आनंदस्वरूप का अनुभव करता हुआ साधक जब उस आनंदस्वरूप परशिव से अपने पृथक् अस्तित्व को भूल जाता है, तब वह शिव के साथ समरस हो जाता है। इसी को ‘लिंगांग-सामरस्य’ कहते हैं। जैसी जल की जल के साथ और ज्योति की ज्योति के साथ एकाकारता होती है, उस कोटि का यह सामरस्य होता है। यही मुक्‍ति है। इसी को ‘अंग-लिंग-ऐक्य’ कहते हैं। ‘लिंगांग-संयोग’ शब्द भी इसी का पर्याय है (सि.शि. 20/2 पृष्‍ठ 210; क्रि.सा.भाग. 3 पृष्‍ठ 33)।

यहाँ पर ‘लिंग’ और ‘अंग’ का यह संयोग घट और पट के संयोग की तरह न होकर ‘शिखी’ और ‘कर्पूर’ के संयोग की तरह माना जाता है, अर्थात् जैसे अग्‍नि के संयोग से कर्पूर अग्‍नि-स्वरूप ही हो जाता है, अग्‍नि से पृथक् कर्पूर की स्थिति नहीं रह जाती, उसी प्रकार लिंग से संयुक्‍त अंग का भी पृथक् अस्तित्व नहीं रह जाता। यही लिंगांग-संयोग है (अनु. सू. 5/56)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंगाचार

देखिए ‘पंचाचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लिंगायत

देखिए ‘वीरशैव’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

लीला

सृष्‍टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह रूप शिव के पंचकृत्यों को वीरशैव दर्शन में ‘लीला’ कहा जाता है। शिव के इन पंचकृत्यों को ‘लीला’ इसलिये कहा जाता है कि वे उनके संकल्प मात्र से सिद्‍ध होकर विनोद के कारण बनते हैं। जैसे अत्यंत निपुण नट स्वयं ही अनेक रूप धारण करके नाट्‍य का अभिनय करता है, उसी प्रकार शिव अकेला ही अपनी स्वातंत्र्य शक्‍ति से कभी सृष्‍टि, कभी पालन, कभी संहार करता है और कभी सृष्‍टि जीवों को अपने तिरोधान और अनुग्रह व्यापार से क्रमशः बद्‍ध और मुक्‍त करता है। शिव अपने किसी प्रयोजन की सिद्‍धि के लिये राग-द्‍वेष से प्रयुक्‍त होकर सृष्‍टि, संहार आदि व्यापार में प्रवृत्‍त नहीं होता है, क्योंकि वह आप्‍तकाम है। अतएव इस व्यापार को ‘लीला’ कहते हैं।

प्राणियों को नाना योनियों में सुख-दुःख देने वाली शिव की इस लीला को ‘वैषम्य’ और ‘नैर्घृण्य’ दोष से युक्‍त भी नहीं माना जाता, क्योंकि वह प्राणियों को तत्‍तत् / कर्मानुरूप सुखी, दुःखी, ज्ञानी और अज्ञानियों के रूप में बनाता है। अपनी लीला के लिये प्राणियों के कर्म की अपेक्षा करने से उसके स्वातंत्र्य की हानि नहीं होती, क्योंकि जैसे कोई चक्रवर्ती राजा अपने ही बनाये नियम के अनुरूप कुशल व्यक्‍तियों को पुरस्कृत करता है, तो दुष्‍ट व्यक्‍तियों को दंड भी देता है। यहाँ अपने ही बनाये नियम की परतंत्रता रहते हुए भी वह स्वतंत्र ही कहलाता है, उसी प्रकार स्वरचित नियम के अनुसार प्राणियों के कर्म की अपेक्षा करने पर भी शिव स्वतंत्र ही रहता है। इस प्रकार स्पष्‍ट हो जाता है कि सृष्टि, संहार आदि व्यापार शिव की ‘लीला’ है (ब्र.सू. 2-1-33,34 श्रीकर. भा.; वी.आ.चं. पृष्‍ठ 28; सि.शि. 1/6 पृष्‍ठ 3)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

लीलाकैवल्य

लीलारूप कैवल्य या लीला रूप मोक्ष लीलाकैवल्य है। ब्रह्म की एकरसता अथवा उसका अन्य धर्म से रहित होना ही केवलता या कैवल्य है। यह केवलता अर्थात् ब्रह्म की शुद्धता लीलात्मिका ही है क्योंकि शुद्ध ब्रह्म लीला विशिष्ट ही होता है, लीला रहित नहीं। अतएव लीला शुद्ध ब्रह्म स्वरूप है और इसीलिए पुष्टि मार्ग में कैवल्य लीला रूप ही है (अ.भा.पृ. 602, 1414, 1422)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

लीलारस

भगवान् की लीलाओं का आनंद या आस्वादन लीलारस है अथवा भगवान् की लीलायें स्वयं ही रस हैं (अ.भा.पृ. 1014)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

लोक

1. शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण चित्प्रकाश (शि.सू.वा.पृ. 21)।
2. देखिए भुवन।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

लोपामुद्रा विद्या

लोपामुद्रा सन्तान और कामराज सन्तान के नाम से त्रिपुरा सम्प्रदाय के दो मुख्य विभाग हैं। लोपामुद्रा सन्तान की प्रवृत्ति अगस्त्य मुनि की पत्नी लोपामुद्रा से मानी जाती है। लोपामुद्रा ने ही सर्वप्रथम इस विद्या को लोक में प्रवृत्ति किया था। इसलिये उन्हीं के नाम से यह विद्या प्रसिद्ध हुई। हादिविद्या का अभिप्राय भगवती त्रिपुरसुन्दरी के उस मन्त्र से है, जिसका आरंभ हकार से होता है। दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ क्रम से यह विद्या आज भी लोक में प्रवृत्त है। प्रपंचसार और सौन्दर्यलहरी में पहले हादिविद्या का ही उद्धार किया गया है। योगिनीहृदय में इसी विद्या की व्याख्या की गई है। ऋजुविमर्शिनी, अर्थरत्नावली, ज्ञानदीपविमर्शिनी, सौभाग्यसुधोदय प्रभृति ग्रन्थों में इस विद्या की दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरु परम्परा सुरक्षित है। तदनुसार दिव्यौघ क्रम में चर्यानाथ, ओड्डनाथ, षष्ठिनाथ और मित्रीशनाथ के नाम आते हैं। सिद्धौघ क्रम में लोपामुद्रा, अगस्त्य, कंकालतापस, धर्माचार्य, मुक्तकेशिनी और दीपकाचार्य हैं। इनमें धर्माचार्य लघुस्तव के तथा दीपकनाथ त्रिपुरसुन्दारी-दण्डक के रचयिता हैं। मानवौघ परम्परा में जिष्णुदेव, मातृगुप्तदेव, तेजोदेव, मनोजदेव, कल्याणदेव, रत्नदेव और वासुदेव के नाम उल्लिखित हैं। ऋजुविमर्शिनीकार शिवानन्द वासुदेव के शिष्य थे। कामकलाविलासकार पुण्यानन्द और उनके शिष्य योगिनीहृदयदीपिकाकार योगी अमृतानन्द भी इसी विद्या परम्परा के प्रमुख आचार्य थे। इस विषय की अधिक जानकारी के लिये “सारस्वती सुषमा” (व. 20, अ. 2, पृ. 13-26) में प्रकाशित ‘त्रिपुरादर्शनस्यापरिचिता आचार्याः कृतयश्च’ शीर्षक निबन्ध देखना चाहिये।
Darshana : शाक्त दर्शन

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