भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

मोक्ष

मोक्ष का शब्दार्थ है मोचन अर्थात् सर्वप्रकार के दुःखों से चिरकाल के लिए मुक्ति। इसी दृष्टि से मोक्ष को ‘दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति’ कहा जाता है। दुःख चूंकि सहेतुक है, अतः हेतु के न रहने पर दुःख का उदय (अभिव्यक्ति) नहीं होगा। मोक्ष में दुःख के हेतु का अभाव होने से दुःखाभाव होता है पर यह मोक्षरूप अवस्था अभाव रूप नहीं है। दुःखाभाव एक अवस्थाविशेष का फल है, जिस अवस्था का वर्णन भावरूप से पूर्वाचार्यों ने किया है। यह अवस्था वस्तुतः ‘द्रष्टा पुरुष का स्वरूपावस्थान’ है (स्वरूप-प्रतिष्ठा या चितिशक्तिः – योगसूत्र 4/34)। इस अवस्था में बुद्धिगत वैषम्य-प्राप्त त्रिगुण साम्यावस्थ हो जाते हैं – इस दृष्टि से भी मोक्षावस्था अभावरूप नहीं है। स्वरूपतः भावरूप होने पर भी अभावरूप से इस अवस्था का प्रतिपादन किया जा सकता है, क्योंकि मोक्ष में पुरुष का वृत्तिसारूप्य नहीं रहता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मोहकारिणी

जो शक्‍ति अपने आश्रय को विपरीत ज्ञान के द्‍वारा मोहित करती है, उसी को मोहकारिणी कहा जाता है। इसको अधोमाया या अविद्‍या भी कहते हैं। यह अविद्‍या शक्‍ति आणव आदि मलत्रय से जीव को आवृत करती है, जिससे कि वह अपने व्यापक स्वरूप को भूलकर अणुता का अनुभव करता है और अनित्य, अशुचि तथा दुःखमय शरीर आदि को नित्य, शुचि और सुखमय मानकर मोह में पड़ जाता है। अतएव इसे मोहकारिणी कहा जाता है। यह ‘स्थूल चित्, अर्थात् अल्पज्ञत्व और स्थूल-अचित्, अर्थात् अल्पकर्तृत्ववती है, अतः जीव भी इससे युक्‍त होने के कारण अल्पज्ञ, अल्पकर्ता, बद्‍ध तथा लिंगांग सामरस्य-ज्ञान-शून्य हो जाता है। इस अविद्‍या के कारण ही जीव अनेक प्रकार के कर्म करता हुआ उन कर्मफलों को भोगने के लिये अनेक प्रकार की योनियों में भ्रमण करता रहता है। इस अविद्‍या के अपने अंश-भेद से अनेक होने के कारण तदुपहित जीव भी अनेक हो गये हैं। इस प्रकार यह मोहकारिणी अविद्‍या शक्‍ति जीव की महिमा को घटाती है (सि.शि. 5/45,47 पृष्‍ठ 70)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मोहजय

काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, भय, त्रास, मद, प्रहर्ष आदि भिन्न भिन्न भावों की अभिव्यक्तियों के मूल में स्थित स्वरूप के आवरक भाव को मोह कहते हैं। (शि.सू.वा.पृ. 49)। इस मूल आसक्ति के भाव पर सम्यक् प्रकार से विजय प्राप्त करने को मोहजय कहते हैं। इससे साधक सुप्रबुद्ध की स्थिति को प्राप्त कर जाता है। इस प्रकार वह शुद्ध विद्या की स्थिति पर पहुँच जाने पर अपनी असंकुचित संवित्स्वरूपता के साक्षात्कार के योग्य बन जाता है। (वही पृ. 50)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App