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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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मायीय-मल

देखिए ‘मल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मालिनी

मातृका का निरूपण अलग से किया गया है। संक्षेप में अकारादि क्षकारान्त वर्णमाला ही लोक में मातृका के नाम से प्रसिद्ध है। इस वर्णमाला का नादि फान्त क्रम शैव और शान्त तन्त्रों में मालिनी कहा जाता है। मालिनीविजय तन्त्र (3/37-41) में यह क्रम मालिनी न्यास के नाम से वर्णित है। इसी के आधार पर अभिनवगुप्त ने तन्त्रसार (पृ. 134-135), परात्रिंशिकाविवरण (पृ. 120-123) और तन्त्रालोक के तृतीय आह्निनक के अन्त में इसका निरूपण किया है। वहाँ मालिनी को शक्ति का तथा मातृका को शक्तिमत् का वाचक माना गया है। मालिनी की विशेषता यह है कि इसमें स्वर और व्यंजन वर्ण परस्पर घुले-मिले हैं। त्रिकहृदय में मालिनी को नादिनी कहा है और इसकी स्थिति शिखान्त में मानी है। मालिनी न्यास से मन्त्रों के सभी दोष दूर हो जाते हैं और गारुड़, वैष्णव प्रभृति सांजन मन्त्र भी निरंजन बनकर मोक्ष की प्राप्ति में सहायक हो जाते हैं। मालिनी का क्रम इस प्रकार है – न ऋ ऋृ लृ लृृ थ च ध ई ण उ ऊ ब क ख ग घ ङ अ व भ य ड ढ ठ झ ञ ज र ट प छ ल आ स अः ह ष क्ष म श अं त ए ऐ ओ औ द फ।
Darshana : शाक्त दर्शन

मालिनी

प्रक्षुब्ध वर्णमाला को मालिनी कहते हैं। मालिनी न से आरंभ होकर फ पर समाप्त हो जाती है। इसके भीतर स्वर और व्यंजन एक प्रक्षुब्ध क्रम में ठहर कर अपना अपना स्थान लेकर बैठे हैं। वर्णमाला के सभी वर्ण न और फ के बीच में प्रक्षुब्ध क्रम से आते हैं। (पटलत्री.वि.पृ. 121, 122)। संपूर्ण विश्व का स्वरूप धारण करने के कारण भी न से फ पर्यंत क्षुब्ध वर्णमाला को मालिनी कहा गया है। (तं.आ.वि. 2 पृ. 192)। मातृका (देखिए) की अपेक्षा मालिनी के अभ्यास से साधक को शांभव समावेश में सद्यः ही स्थिरता प्राप्त हो जाती है और सभी दिव्यातिदिव्य ऐश्वर्य उसमें अभिव्यक्त हो उठते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मिथ्याज्ञान

मल का एक प्रकार।

भासर्वज्ञ के अनुसार मिथ्याज्ञान एक मल है। मिथ्याज्ञान वास्तविक ज्ञान न होकर ज्ञान का आभास मात्र होता है। संशय तथा विपर्यय इसके लक्षण हैं। मिथ्याज्ञान अयथार्थ ज्ञान होता है। इसमें संशय और कालुष्य के बीज होते हैं। अतः वह भ्रामक होता है और इसीलिए मिथ्याज्ञान (झूठा ज्ञान) कहलाता है। मिथ्याज्ञान ही पशु को इस संसृति के चक्‍कर में टिकाए रखता है। मुक्‍ति तभी होती है जब यथार्थ ज्ञान के उदय के साथ ही साथ इस मिथ्याज्ञान का नाश हो जाए। (ग.का.टी.पृ.22)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मुक्तशिव

अकल, मंत्रमहेश्वर, मंत्रेश्वर तथा मंत्र (विद्येश्वर) भूमिकाओं के प्राणी। भेद दृष्टि प्रधान, भेदाभेद दृष्टि प्रधान तथा अभेद दृष्टि प्रधान क्रमशः शिव, रुद्र एवं भैरव नामक शुद्ध सिद्ध पुरुष (भास्करीवि.वा, 1-391, 392)। ये प्राणी अपने को शुद्ध और ऐश्वर्यवान् संवित् स्वरूप तो समझते हैं परंतु फिर भी कुछ समय के लिए शिव के साथ सर्वथा अभेदभाव को प्राप्त नहीं करते हैं। अभेदभाव में सर्वथा शिवमय बन जाने तक ये प्राणी मुक्तशिव कहलाते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मुक्ति

अपने विषय में शिवभाव का दृढ़तापूर्वक अभिमनन ही मुक्ति है। निश्चयपूर्वक और विश्वासपूर्वक यह ज्ञात हो जाना कि मैं वस्तुतः शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण परमेश्वर ही हूँ। संपूर्ण विश्व को अपनी ही शक्तियों का विलास समझना। (नो.पं.द., 11-13; ई. प 9. वि.2 पृ. 129, 130)।
मुक्ति अशरीर
देखिए विदेह मुक्ति।
मुक्ति जीवन
देखिए जीवनमुक्ति।
मुक्ति विदेह
अशरीर मुक्ति। अपने शिवभाव का दृढ़तापूर्वक पूर्ण निश्चय हो जाने के अनंतर देह त्याग देने पर प्राप्त होने वाली सर्वथा अभेदमयी मुक्ति। इस अवस्था में विदेह मुक्त परिपूर्ण परमेश्वरता को प्राप्त कर लेता है। उसकी पृथक् सत्ता कोई रहती ही नहीं, प्राक्तन् पृथक् सत्ता ही सर्वथा असीम बनकर शिवसत्ता के रूप में चमकने लग जाती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मुक्ति-आभास

प्रलयाकल या विज्ञानाकल की अवस्था को प्राप्त कर लेने पर जो प्राणी उसी अवस्था को वास्तविक मुक्ति समझने लगते हैं उन्हें वास्तविक मुक्ति तो प्राप्त होती नहीं है परंतु वे यही समझते हैं कि वे मुक्त हो गए हैं। उनकी इस स्थिति को मुक्ति आभास कहते हैं। मायाशक्ति के प्रभाव से ये उसी दशा को मुक्ति समझकर उसी के प्रति अनुरक्त हो जाते हैं जो दशा वस्तुतः मुक्ति की दशा नहीं होती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मुदिता

चार परिकर्मों में मुदिता एक है (द्र. योगसूत्र 1/33)। पुण्यकारी व्यक्तियों के प्रति मुदिता (= हर्ष, प्रीति) की भावना (= चित्त में बार-बार निवेश) करने से अन्य के पुण्य को देखकर मन में स्वभावतः जो असूया आदि भाव उत्पन्न होते हैं, वे नहीं होते। पुण्यवान् के प्रति मुदिताभाव का पोषण करने पर पुण्याचरण की वृद्धि करने की इच्छा होती है – यह भी मुदिताभावना का एक फल है। पुण्य की ओर यह प्रवृत्ति योगी के लिए हानिकारक नहीं होती, क्योंकि योगी में फलकामना नहीं होती है। मुदिता-भावना से चित्त प्रसन्न होता है और ‘स्थिति’ को प्राप्त करने के लिए चेष्टा करता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मुद्रा

इसका साधारण अर्थ है छाप, मोहर। योग में इसका अर्थ होता है विशेष अंगविन्यास, विशेष रूप से हाथ और अंगुलियों की निश्चित स्थिति। अधिक व्यापक रूप से इसका अर्थ होता है शरीर के कुछ अवयवों और इन्द्रियों पर विशेष नियन्त्रण, जिससे कि ध्यान और समाधि में सहायता मिलती है। जैसे कि भैरवी मुद्रा के अभ्यास से साधक जीवनमुक्त दशा को प्राप्त कर लेता है।
स्वच्छन्दतन्त्र (4/375) प्रभृति ग्रन्थों में मुद्रा को क्रिया शक्ति का विलास माना गया है। योगिनीहृदय (1/57) की टीका में अमृतानन्द कहते हैं कि परा संवित ही क्रिया शक्ति के रूप में विश्व को मोद (सुख) से भर देती है और सारे दुःखों का नाश कर देती है। उक्त दोनों गुणों के आधार पर संविन्निष्ट क्रिया शक्ति ही मुद्रा के नाम से अभिहित होती है। अन्यत्र बताया गया है कि ग्रह प्रभृति के दोषों से यह साधक को मुक्त कर देती है, उसके पाशजाल को काट देती है। इस तरह मोचन और द्रावण गुणों के आधार पर इसको मुद्रा कहा जाता है। तंत्रालोक (32/3) में कहा गया है कि देह के माध्यम से देही आत्म को स्वरूपावबोध का सुख देने के कारण इसको मुद्रा कहते हैं।
नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका के रचयिता विद्यानन्द बाह्य और आभ्यन्तर के भेद से मुद्रा के दो प्रकार बनाते हैं। अंगुलियों के विन्यास के आधार पर प्रदर्शित की जाने वाली मुद्रा बाह्य तथा बंध के नाम से प्रसिद्ध मुद्रा आभ्यन्तर कही जाती है। ऋजुविमर्शिनीकार खेचरी मुद्रा के प्रकरण में त्रिविध मुद्राओं का निरूपण करते हैं। स्वच्छन्दतन्त्र (2/103) में भी त्रिविध मुद्रा का उल्लेख है, किन्तु उनके नाम शिवानन्द प्रदर्शित नामों से भिन्न है। क्षेमराज ने बताया है कि ये त्रिविध विभाग मनोजा, बाग्भवा और देहोद्भवा के नाम से शास्त्रों में वर्णित हैं। तन्त्रालोक (32/9) और उसकी टीका विवेक में चतुर्विध मुद्रा प्रतिपादित है – करजा, कायिकी, विलापाख्या और मानसी।
नित्याषोडशिकार्णव के तृतीय पटल में अंगुलियों के विशेष प्रकार के विन्यास के आधार पर प्रदर्शित की जाने वाली दशविध करजा मुद्राओं का वर्णन मिलता है। इस प्रकार की मुद्राएँ प्रायः सभी तन्त्र ग्रन्थों में वर्णित हैं। परशुराम कल्पसूत्र के परिशिष्ट (पृ. 608-652) में प्रायः शताधिक मुद्राओं का विवरण मिलता है। भगवान् राम की उपासना में प्रयुक्त ज्ञान मुद्रा भी वहाँ वर्णित है। संस्थान विशेष का अनुसरण करने वाली कायिकी मुद्राओं का बन्ध अथवा मुद्रा के नाम से विवरण मिलता है। हठयोगप्रदीपिका के तृतीय उपदेश में कुण्डलिनी शक्ति को जगाने के लिये दस मुद्राओं का वर्णन किया गया है। तंत्रालोक (32/5-6) में बताया गया है कि करंकिणी, क्रोधना, भैरवी और लैलिहाना मुद्रा खेचरी के ही प्रपंच हैं। ये पाँच मुद्राएँ विज्ञानभैरव, चिद्गगनचन्द्रिका, महार्थमंजरी प्रभृति ग्रन्थों में वर्णित हैं। वहाँ बताया गया है कि करंकिणी मुद्रा पाँच भौतिक देह को परम आकाश में विलीन कर देती है, इसके साधक ज्ञानसिद्ध कहलाते हैं। क्रोधनी मुद्रा पृथ्वी से लेकर प्रकृति पर्यन्त चौबीस तत्त्वों को मन्त्रमय शरीर में विलीन कर देती है, इसके साधक मन्त्रसिद्ध कहलाते हैं। भैरवी मुद्रा अपने स्वरूप में सारे जगत को विलीन कर लेती है, इसके साधक मेलापसिद्ध कहे जाते हैं। लैलिहाना मुद्रा सारे जगत का अपने पूर्ण विमर्शमय स्वरूप में बार-बार आस्वादन करती रहती है, इसके साधक शक्तिसिद्ध कहलाते हैं। खेचरी मुद्रा शक्ति, व्यापिनी आदि स्थानों में सदा विचरण करने वाली है। इसके साधक शाम्भवसिद्ध कहे जाते हैं। इनका विलापाख्य तथा मानस विभाग में समावेश होगा। कुछ बन्ध तथा मुद्राओं का भी आभ्यन्तर अथवा मानस विभाग में समावेश होगा।
महार्थमंजरीकार (पृ. 110) में वेष-विन्यास को भी मुद्रा के अन्तर्गत माना है। यामुनाचार्य आगमप्रामाण्य में पाशुपत मत में प्रसिद्ध कर्णिका, रुचक, कुण्डल, शिखामणि, भस्म और यज्ञोपवीत नामक छः मुद्राओं का तथा कपाल और खट्वाङग नामक उपमुद्राओं का उल्लेख करते हैं। इनका उक्त वेषविन्यासात्मक मुद्रा में ही समावेश किया जा सकता है।
वैष्णव सम्प्रदाय में शंख, चक्र आदि से शरीर को अंकित किया जाता है। इसको भी वहाँ मुद्रा पद से ही अभिहित किया गया है। तप्त मुद्रा और शीतल मुद्रा के नाम से यह दो प्रकार की मानी जाती है। अग्नि में तपे हुए चक्र आदि के ठप्पों से शरीर पर जो चिन्ह दागे जाते हैं, उन्हें तप्त मुद्रा और चन्दन आदि से शरीर पर जो छाप दिये जाते हैं, उन्हें शीतल मुद्रा कहते हैं। रामानुज सम्प्रदाय में तप्त मुद्रा का विशेष प्रचार है। पंचमकार के अन्तर्गत भी मुद्रा का उल्लेख है। वहाँ खाद्य अन्न विशेष को, अर्थात् विशेष प्रकार के अदूद या चने को मुद्रा कहा गया है। शैव, शाक्त तथा बौद्ध तन्त्रों में इनके भिन्न-भिन्न अर्थ हैं। शक्तिसंगमतन्त्र (2/63/21-45) में अंक, बीज, बीजक, मन्त्र और नाम के भेद से पंचविध मुद्राएँ वर्णित हैं। तदनुसार मोहर और अंगूठी को भी मुद्रा कहा जाता है।
तन्त्रतन्त्र (21/80) में बताया गया है कि मन्त्र, मुद्रा और ध्यान की सहायता से स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति होती है। अद्वैत दृष्टि के प्रतिपादक तन्त्र ग्रन्थों में सब कुछ स्वात्मा का स्वरूप माना जाता है। तदनुसार मुद्रा भी परासंवित् का ही विस्फार है। शिवानन्द के अनुसार बोधगमन में विचरण करने वाली इस स्थिति का वर्णन नहीं किया जा सकता, किन्तु क्षेमराज ने तन्त्रसद्भाव प्रभृति ग्रन्थों की सहायता से इसको समझाने का प्रयत्न किया है। खेचरी मुद्रा की व्याख्या में इसका विवरण देखना चाहिये।
अशिवनी मुद्रा का उल्लेख कर देना भी यहाँ आवश्यक है। “तान्त्रिक वाङमय में शक्ति दृष्टि” नामक ग्रन्थ में बताया गया है कि इसका अभ्यास प्राण शक्ति के संकोच और विकास के लिये किया जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मुद्रा

1. आनंद प्रदान करने वाला हाथ, अंगुलियों तथा शरीर आदि का संस्थान विशेष, चित्त की विशेष स्थिति तथा वाणी की विशेष वृत्ति।
2. साधक को उसकी परस्वरूपता के आवेश में सहायक बनकर उसे आनंदाप्लावित करने वाली विशिष्ट स्थिति। (तं.आ. 32-)।
3. परमशिव की चैतन्य रूपी अपार संपदा को साधक के चित्त में स्फुटतया अंकित करने में सहायक बनने वाला विशिष्ट शारीरिक सन्निवेश।
4. आणव आदि तीनों मलों को पूर्णतया शांत करके साधक को परसंविद्रूपता का साक्षात्कार करवाने में सहायक बनने के कारण पर स्वरूप का प्रतिबिंब रूप विशिष्ट आसन आदि। (स्व.तं.उ.पटल2 पृ. 60)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मुद्रावीर्य

मुद्रा के अभ्यास से सहज में ही प्राप्त हुआ सामर्थ्य अर्थात् शुद्ध स्वरूप का प्रकाश। खेचरी मुद्रा के सतत अभ्यास से भेदनिष्ठ समस्त मायीय प्रपंच से उत्पन्न क्षोभ के पूर्णतया शांत हो जाने पर अपनी शुद्ध संविद्रूपता की अभिव्यक्ति हो जाती है। यह अभिव्यक्ति मंत्रवीर्य (देखिए) स्वरूपा होती है। इसे ही मुद्रावीर्य भी कहते हैं। (शि.स.वि.पृ. 29)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मुर्च्छा

मोह, मौर्ख्य, अनुद्योग, अविद्या, अविवेक आदि। शरीर, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि के प्रति अहंता के भाव को अभिव्यक्त करने वाली जड़ता अर्थात् अतीव संकोच को प्राप्त हुआ ज्ञान। (शि.स.वा. पृ. 76, 77)। शुद्ध संविन्मयी चेतना को अपना आप न समझते हुए इन उपरोक्त जड़ पदार्थो को ही अपना आप समझना। यह परमेश्वर की मायाशक्ति का एक विशेष प्रभाव होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मूढ़भूमि

व्यासभाष्य (1/1) में चित्त की जिन पाँच भूमियों का उल्लेख है, मूढ़भूमि (भूमि – चित्त का धर्मविशेष) उनमें द्वितीय है। जिस अवस्था में चित्त सहजरूप से मुग्ध (विचारशून्य) की तरह रहता है, वह मूढ़भूमि है। यह तमःप्रधान अवस्था है। इस भूमि में अवस्थित चित्त तत्त्वजिज्ञासा से शून्य एवं प्रवल मोह के वशीभूत रहता है। ऐसे चित्त में भी एक प्रकार की समाधि हो सकती है, जो योग की दृष्टि में व्यर्थ ही होती है, क्योंकि इस समाधि में तत्त्वज्ञान का उदय नहीं होता तथा यह विक्षेप के द्वारा आसानी से नष्ट हो जाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मूर्त सादाख्य

देखिए ‘सादाख्य’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मूर्ति

पाशुपत विधि में दीक्षा का एक अंग।

दीक्षा के समय महादेव के लिङ्ग विशेष की उचित स्थिति, में, उचित दिशा में स्थापना मूर्ति कहलाती है। उपास्य रूप में लिंग या शिवमूर्ति कहलाती है। उपास्य रूप में लिंग या शिवमूर्ति की स्थापना की जाती और दीक्षित साधक उसकी पूजा विधिपूर्वक करता है। उस मूर्ति के समीपस्थ दक्षिणभाग का नाम भी मूर्ति है। (ग.का.टी.पृ.9)

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मूल रूप

पुरुषोत्तम शब्द का वाच्यार्थ भूत-नित्यानंदैक स्वरूप, सदा प्रकटीभूत है अलौकिक धर्म जिसमें, ऐसा नित्य सर्वलीला युक्त कृष्णात्मक पर ब्रह्म ही मूल रूप है (प्र.र.पृ. 48)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

मूलप्रकृति

मूलभूत प्रकृति मूलप्रकृति है। मूलभूत कहने का अभिप्राय यह है कि कुछ ऐसी भी प्रकृतियाँ हैं, जो इस प्रकृति के कार्यरूप हैं तथा यह प्रकृति अन्य किसी पदार्थ की विकाररूप नहीं हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्त्व आदि तीन गुणों की जो साम्य-अवस्था है, वही मूल प्रकृति है, क्योंकि अन्य सब प्रकृतियाँ (महत्त्त्व, अहंकारतत्त्व तथा पाँच तन्मात्र) इस प्रकृति का ही साक्षात् या परम्पराक्रम से विकारभूत हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मूलाधार चक्र

अन्य चक्रों का यह मूल आधार है, अतः इसे मूलाधार चक्र कहा जाता है। यह सुषुम्ना नाडी के मुख से जुड़ा हुआ है। लिंग के नीचे और गुदा के ऊपर कन्द स्थान में यह स्थित है। भूतशुद्धि तन्त्र में बताया गया है कि गुदा से दो अंगुल ऊपर तथा लिंग से दो अंगुल नीचे चार अगुंल विस्तार से पक्षी के अंडे के समान आकार वाले स्थान को कन्द कहा जाता है। कन्द स्थान स्थित मूलाधार पद्म के चार लाल वर्ण वाले पत्र हैं और इन पत्रों पर पूर्व आदि दिशाओं के क्रम से सुवर्ण की आभा वाले यं शं षं सं ये चार वर्ण विराजमान हैं। यह अधोमुख कमल है। इस आधार पद्म में चतुष्कोण पृथ्वी मण्डल स्थित है और इसकी आठों दिशाओं में आठ शूल शोभा पाते हैं तथा इसके मध्य में पीत वर्ण पृथ्वी का बीजाक्षर लं विराजमान है। धरा (पृथ्वी) बीज चार बाहुओं से युक्त और इसी पर आरूढ़ माना जाता है। सृष्टिकर्ता ब्रहमा इसके अधिपति हैं। इस मूलाधार पद्म में डाकिनी शक्ति का निवास है। ब्रहमनाडी के मूल स्थान में मूलाधार पद्म की, कर्णिका के मध्य में विद्युत् के समान प्रकाशमान भगवती त्रिपुरा का त्रिकोण, जिसका कि नाम कामरूप पीठ भी है, विराजमान है। इसके बीच में पश्चिमाभिमुख स्वयंभू लिंग की स्थिति मानी गई है (श्रीतत्त्वचिन्तामणि, षट्चक्रनिरूपण, पृ. 6)।
Darshana : शाक्त दर्शन

मैत्र

पाशुपत साधक का लक्षण।

पाशुपत मत के अनुसार युक्‍त साधक की परिपूर्ण समस्थिति का एक लक्षण मैत्र है। (परसमता मैत्रत्वम् – ग.का.टी.पृ.16) जिस साधक का चित्‍त महेश्‍वर पर ध्यानस्थ हो, जो समस्त भूतों को आत्मरूप समझता हो, इच्छा, द्‍वेष, तथा प्रवृत्‍ति (कुछ भी कार्य करने की इच्छा) से पूर्णरूपेण निवृत्‍त हुआ हो, वह साधक मैत्र कहलाता है। अर्थात् जब साधक पूर्ण समरसता को या समदृष्‍टि को प्राप्‍त करता है तब वह समस्त जगत के प्रति मित्रवत् बनकर रहता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.112)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मैत्री

चतुर्विध परिकर्म में मैत्री का स्थान प्रथम है। जो प्राणी सुखी है (सुख के मूल में धर्माचरण है – ‘धर्मात् सुखम्’) उसके सुख को देखकर मन में प्रसन्नता का भाव लाना मैत्री भावना है। सुखी का सुख देखकर एवं अपने में उस सुख को न देखकर सुखी के प्रति ईर्ष्या, मात्सर्य, द्वेष आदि होते हैं। इनसे चित्त विक्षुब्ध रहता है और वह मैत्री-भावना से दूर हो जाता है। मैत्री में संयम करके योगी मैत्रीबल को प्राप्त करते हैं; (द्र. योगसूत्र 3/23)। इस बल को पाकर योगी किसी भी अपकारक शत्रु के प्रति शत्रुभाव नहीं रखते – उनके मन में शत्रुभाव उत्पन्न ही नहीं होता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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