भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

माट

वीरशैव-संत साहित्य में ‘माट’ शब्द का प्रयोग मिलता है। यहाँ पर पूजा या दान आदि उत्‍तम क्रिया को ‘माट’ कहा गया है। यह ‘उपाधि-माट’, ‘निरुपाधि-माट’ और ‘सहज-माट’ के भेद से तीन प्रकार का होता है। इनके लक्षण इस प्रकार हैं –
Darshana : वीरशैव दर्शन

माट

क. उपाधि माट
किसी फल की अपेक्षा रख कर किये जाने वाले पूजा, दान आदि सत्कर्म ही ‘उपाधि-माट’ कहे जाते हैं। जैसे कि स्वर्ग आदि की अपेक्षा से किया जाने वाला याग और उसमें दिया गया दान ये दोनों क्रियायें उपाधि-माट कहलाती हैं। अन्य दर्शनों में इन्हें ‘सकाम-कर्म’ कहते हैं।
Darshana : वीरशैव दर्शन

माट

ख. निरुपाधि-माट
किसी प्रतिफल की अपेक्षा न करके निष्काम भावना से, ईश्‍वरार्पण बुद्‍धि से किये जाने वाले पूजा, दान आदि सत्कर्म ‘निरुपाधि-माट’ कहे जाते हैं। दर्शनांतर में इन्हीं को निष्काम-कर्म कहते हैं।
Darshana : वीरशैव दर्शन

माट

ग. सहज-माट
उपास्य और उपासक में भेद-बुद्‍धि के बिना सहज और समरस भाव से होने वाली उपासना ‘सहज-माट’ कही जाती है। उसी प्रकार सहज भाव से होने वाली दान क्रिया को भी ‘सहज-माट’ कहते हैं, अर्थात् जैसे अपने ही एक हाथ की वस्तु को दूसरे हाथ में देते समय लेन-देन की भेद-भावना के बिना सहज भाव से वह क्रिया हो जाती है, उसी प्रकार दान देते समय ‘मैं दे रहा हूँ’ और ‘वह ले रहा है’ इस भेद-बुद्‍धि के बिना ही सहज भाव से हो जाने वाली दान क्रिया भी ‘सहज-माट’ कहलाती है (शि.श.को पृष्‍ठ 84)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

माता (तृ)

अपने आप का तथा आंतर और बाह्य विषयों का अवभासन करने वाला संवित्तत्त्व। यह तत्त्व प्रत्येक प्राणी के भीतर ‘अहं’ इस रूप में सदैव प्रकाशमान होता रहता है। प्रमेयों के प्रति समस्त प्रमाणों के व्यापारों को स्वतंत्रतया चलाने वाला तत्त्व प्रमातृतत्त्व कहलाता है। प्रमाता सुषुप्ति में भी चमकता रहता है। माया से अवच्छिन्न ‘अहम्’ को अशुद्ध प्रमाता और उससे उत्तीर्ण को शुद्ध प्रमाता कहते हैं। (तं.आ. 3-125, 126; वही पृ. 129)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

माता (तृ) अपर

देह, प्राण, बुद्धि और शून्य को ही अपना आप समझने वाला मायीय प्रमाता। यह प्रमाता बद्ध प्रमाता होता है। इसको पशु कहते हैं। जीव इसी का नाम है। इसे ही कृशता, स्थूलता आदि का, सुख-दुःख आदि का, भूख प्यास आदि का तथा सर्वशून्यता का अभिमान होता रहता है, परंतु शुद्ध संविद्रूपता का अभिमान नहीं होने पाता।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

माता (तृ) पर

अहम् अस्मि’ अर्थात् समस्त प्रमाण एवं प्रमेय के विभागात्मक भेद से रहित केवल संविद्रूप शुद्ध प्रकाश के ही प्रति ‘मैं हूँ’ इस प्रकार के शुद्ध विमर्श की स्थिति वाला प्रमाता। स्वरूपनिष्ठ। अपने शुद्ध प्रकाशस्वरूप के प्रति सतत रूप से पर अहं परामर्श करने वाला प्रमाता पर प्रमाता कहलाता है। इसको शुद्ध प्रमाता भी कहा गया है (तं.आ.3-125, 126; वही पृ. 129)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मातृका

अकारादि क्षकारान्त वर्णमाला को ही मातृका कहा जाता है। विभिन्न शास्त्रों में यह शब्दराशि, मालिनी, कालिका, भूतलिपि प्रभृति शब्दों से अभिहित होती है। यही सात करोड़ महामन्त्रों की जननी है। सौभाग्यसुधोदय (1/6) में माति, तरति और कायति- इन तीन धातुओं से मातृका पद की निष्पत्ति बताई है। अनाहत मूर्ति, अर्थात् अनाहत नाद मध्यमा वाक् के रूप में यह सारे जगत को अपने में समेटे रहती है। उत्तीर्ण, अर्थात् पश्यन्ती के रूप में यह जगत् से ऊपर उठ जाती है और वैखरी वाणी के रूप में यह नाना नामरूपात्मक प्रपंच का शरीर धारण करती है। इसीलिए इसको मातृका कहा जाता है। तन्त्रसद्भाव नामक ग्रंथ में बताया गया है कि सभी मन्त्र वर्णों से बनते हैं और ये शक्ति से सम्पन्न होते हैं। यह शक्ति मातृका के नाम से शास्त्रों में जानी जाती है, जो कि शिव से अभिन्न है। इस प्रकार परावाक् स्वरूपिणी, अनाहतनादमयी, परमशिव से अभिन्न, 36 तत्त्वों की सृष्टि में कारणभूत परा संवित् को ही तन्त्रशास्त्र में मातृका कहा गया है।
यह मातृका पहले बीज और योनि, अर्थात् स्वर और व्यंजन के भेद से द्विधा विभक्त होती है। इसका दूसरा विभाग वर्गात्मक है। सात, आठ या नौ वर्गों का विधान विभिन्न शास्त्रों में वर्णित है। अक्षरों की संख्या के विषय में भी विभिन्न मत हैं। किन्तु 16 स्वर और 34 व्यंजनों वाला विभाग प्रायः सर्वमान्य है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मातृका

अ से लेकर ह तक या क्ष तक की वर्णमाला को मातृका कहते हैं। इसे अक्षमाला भी कहा गया है। (पटलव्री.वि.टि.पृ. 194)। जिस प्रकार माला से जाप किया जाता है उसी प्रकार मातृका योग का साधक वर्णमाला के एक एक वर्ण पर अवधान को केंद्रित करता हुआ समस्त विश्व को शिव संवित् से परिपूर्ण देखता है। प्रायः अ से लेकर ह पर्यंत वर्णों को ही मातृका में गिना जाता है परंतु कई आचार्यों ने क्ष को भी मातृका में गिना है, जिसे कूट बीज कहा जाता है। (शि.सु.वि.पृ. 31)। (देखिएक्ष)। परात्रिशका विवरण में मातृका को पराभगवती, परावाक्, भैरवी इत्यादि नामों से भी अभिहित किया गया है। (पटलत्री.वि.पृ. 212, 213)। शिवसूत्र वार्तिक में मातृका को शक्ति, देवी, रश्मि, कला, योनिवर्ग तथा माता कहा गया है। (शि.सू.वा.पृ. 7) मातृका का एक एक वर्ण परमशिव की भिन्न भिन्न शक्तियों का द्योतक माना गया है। इसलिए मातृका को विश्वजननी और परमशिव की परा क्रियाशक्ति माना गया है। (वही पृ. 35; तं.आ. 3-232, 233)। शाम्भव योग का अभ्यासी एक ओर से क से लेकर क्ष तक के वर्णों को अपने में प्रतिबिंबित होता हुआ देखता है और साथ ही साथ ऐसा भी अनुभव करता है कि पृथ्वी तत्त्व से लेकर शक्तित्त्व तक का सारा विश्व ही उसकी अपनी ही शक्तियों का प्रतिबिंब है, जो उसके प्रकाश स्वरूप अपने आप में ही दर्पण नगर न्याय से प्रकाशित हो रहा है। यह मातृका उपासना का रहस्य है। छत्तीस तत्त्व मानो अर्थ (रूप) हैं और मातृका के वर्ण उनके नाम हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मानसी सेवा

भगवान् के प्रति भक्त की भक्ति जब व्यसन का स्वरूप धारण कर लेती है, तो वैसी भक्ति भगवान् की मानसी सेवा है (शा.भ.सू.पृ. 1/1/2)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

मानुषसर्ग

सांख्यशास्त्र में प्राणियों को तीन विभागों में बाँटा गया है – देवजाति, तिर्यक्जाति तथा मनुष्यजाति (द्र. सांख्यका. 53)। प्रथमोक्त दो जातियों के अवान्तर विभाग हैं, पर मनुष्यजाति का कोई अवान्तर विभाग नहीं है; युक्तिदीपिका टीका में स्पष्टतया कहा गया है कि मनुष्यजाति के अवान्तर भेदों को मानना युक्ति से उत्पन्न नहीं हो सकता। वर्णभेद के अनुसार जो भेद होते हैं, वे यहाँ अप्रयोज्य हैं। यह भी कहा गया है कि मनुष्य रजःप्रधान होते हैं, अतः उनमें दुःख (दुःखबोध) बहुत परिणाम में होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

माया

सर्वभवन सामर्थ्य रूपा भगवान् की शक्ति माया है। माया शब्द के सामान्यतः चार अर्थ होते हैं, सर्वभवन सामर्थ्य रूप शक्ति, व्यामोहिका शक्ति, ऐन्द्रजालिक विद्या तथा कापट्य या कपटभाव। इनमें प्रथम शक्ति भगवान् की माया है (त.दी.नि.पृ. 88)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

माया तत्त्व

छत्तीस तत्त्वों के अवरोहण क्रम में छठा तत्त्व। भेद दृष्टि का स्फुट आभास कराने वाला तथा संविद्रूपता को आच्छादित करने वाला आवरक तत्त्व। कला से लेकर पृथ्वी पर्यंत संपूर्ण जड़ सृष्टि का उपादान कारण बनने वाला प्रथम जड़ तत्त्व। शैवदर्शन में इसे भी एक वस्तुभूत तत्त्व माना गया है। (तं.सा.पृ. 77)। इस तत्त्व के प्रभाव से जीव अपने आपको शुद्ध संविद्रूप न समझता हुआ शून्य आदि जड़ पदार्थों को ही अपना आप समझता है तथा प्रमाता और प्रमेय में, एक प्रमाता और दूसरे प्रमाता में, एवं एक प्रमेय और दूसरे प्रमेय में भी भेद दृष्टि रखता है। (ईश्वर-प्रत्यभिज्ञावि.खं. 1, पृ. 110)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

माया दशा

सर्वथा भेद की भूमिका। सृष्टि एवं संहार आदि के क्रम में यह तीसरी एवं अंतिम भूमिका होती है। इस भूमिका में महामाया से नीचे माया तत्त्व से लेकर पृथ्वी तत्त्व तक सभी इकत्तीस तत्त्व आते हैं। सर्वथा भेद की भूमिका होने के कारण इस भूमिका के प्राणियों में समस्त विश्व एवं अपने प्रति ‘अहम् अहम्’ अर्थात् ‘मैं मैं हूँ’ तथा ‘इदम् इदम्’ अर्थात् ‘यह यह है’ इस प्रकार की पूर्ण भेदमयी दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। इतना ही नहीं, इस भूमिका में तो प्रमाता प्रमाता में तथा प्रमेय प्रमेय में भी उत्तरोत्तर भेद बढ़ता ही जाता है। (ई.प्र.वि. 1 पृ. 110)। परमशिव इस सर्वथा भेदमयी भूमिका में समस्त प्रपंच को अपनी अपरा देवी नामक शक्ति के द्वारा धारण करता है। (तं.सा.पृ. 28)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

माया प्रमाता

जीव, अण, पशु। मायादशा नामक पूर्णभेद की भूमिका में ठहरने वाला प्रमाता। देखिए माया दशा। यह प्रमाता तीन मलों से बँधा रहता है, जड़ पदार्थों को अपना आप समझता है, अपने को सीमित और अल्पज्ञ तथा अल्पशक्ति समझता है तथा समस्त विश्व को भेदमयी दृष्टि से देखता है। इसे कर्म संस्कार और कर्म वासनाएँ घेर कर रखती हैं। यह संसृति चक्कर में फँसकर गोते खाता रहता है और पूर्ण बंधन का पात्र बना रहता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

माया भूमिका

शुद्ध विद्या से नीचे माया तत्त्व से लेकर पृथ्वी तत्त्व तक के समस्त सूक्ष्म तथा स्थूल प्रपंच को माया भूमिका कहते हैं। इस भूमिका में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय इन तीनों में परस्पर सर्वथा भेद ही अभिव्यक्त होता रहता है। इसीलिए इसे भेद भूमिका भी कहते हैं। इसके विपरीत शुद्ध विद्या क्षेत्र के तीन तत्त्वों वाले भेदाभेदमय प्रपंच को विद्या भूमिका और शक्ति तत्त्व तथा शिव तत्त्व के अभेदमय विस्तार को शक्ति भूमिका कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

माया मल

मायीय मल। प्रमाता के अपने प्रति तथा प्रमेय जगत् के प्रति भेदमय दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करने वाला संकुचित ज्ञान। आणवमल (देखिए) के दोनों प्रकारों द्वारा अभिभूत होने पर प्रमाता में जिस संकुचित ज्ञान से प्रमाता प्रमाता के प्रति, प्रमेय प्रमेय के प्रति तथा प्रमाता प्रमेय के प्रति पूर्ण भेद दृष्टि अभिव्यक्त हो जाती है उसे माया मल या मायीय मल कहते हैं। (ई.प्र.वि. 3-2-5; वही, 1 पृ. 110; शि.स.वि. पृ. 6)। शुद्ध विद्या की दशा में भेदाभेद के दृष्टिकोण का कारण भी माया मल ही बनता है। वस्तुतः आणव, मायीय तथा कार्म नामक तीनों मल पारमेश्वरी माया शक्ति के उत्तरोत्तर विकास हैं परंतु ज्ञान संकोच की भिन्न भिन्न अवस्थाओं के कारण इन्हें ये नाम दिए गए हैं। (ई.प्र.वि. 2, पृ. 221)। आणव मल के प्रथम प्रकार से शुद्ध प्रमाता के परिपूर्ण प्रकाशात्मक स्वातंत्र्य में संकोच आ जाता है। जब यही संकोच अधिक स्थूलता को प्राप्त करता हुआ बहिर्मुखी हो जाता है तो इसी भेदप्रथात्मक बहिर्मुखता को मायीय मल कहा जा सकता है। (देखिएआणव मल)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मायाशक्ति

1. परमेश्वर की परिपूर्ण एवं अनिरुद्ध स्वातंत्र्य शक्ति। इसे पराशक्ति या परा मायाशक्ति भी कहा जाता है। यह परमेश्वर की स्वभावभूत परमेश्वरता ही है। समस्त प्रपंच एवं इसे चलाने वाला सारा शक्ति समूह इसी पराशक्ति में तथा इसी शक्ति के द्वारा परमशेवर में शुद्ध संविद्रूप में चमकता रहता है तथा इसी शक्ति के सामर्थ्य से बाह्य प्रसार को भी प्राप्त करता है। इसी शक्ति को शिव तत्त्व से लेकर शुद्ध विद्या तत्त्व तक की संपूर्ण शुद्ध सृष्टि का साक्षात् कारण माना गया है। (आ.वि. 4-1, 24)।
2. परमेश्वर की ज्ञान, क्रिया तथा माया नामक तीन सर्वप्रमुख शक्तियों में से तीसरी शक्ति। (ई.प्र.वि. 4-1-4)। ये ही तीन शक्तियाँ पशु भूमिका में तीन गुणों के रूप में प्रकट हो जाती हैं। इस तरह से तमोगुण का मूल स्वभाव भूत पारमेश्वरी शक्ति को भी मायाशक्ति कहते हैं। (वही 2, पृ. 254; 3-1-6, 7)।
3. पशुभाव में भी स्वभावभूत ऐश्वर्य को प्रकाशित करने वाली पराशक्ति ही जब शुद्ध स्वरूप को आच्छादित करने वाली बन जाती है तो उसे भी मायाशक्ति करते हैं। इस शक्ति से प्रभावित जीव पूर्ण भेद दृष्टि वाला बन जाता है, अपने-आपको शुद्ध संविद्रूप न समझता हुआ शून्य, बुद्धि या शरीर रूपी जड़ पदार्थ को ही अपना आप समझने लग जाता है। यही शक्ति माया तत्त्व नामक प्रथम जड़ तत्त्व को अवभासित करने वाली मानी गई है। (वही 3-1-7,8)। माया शक्ति की उत्तरोत्तर अभिव्यक्तियों में इस तत्त्व में रहनेवाले प्राणियों में भेद दृष्टि इतने अधिक विस्तार को प्राप्त कर जाती है कि वे एक प्रमाता और दूसरे प्रमाता में और एक प्रमेय तथा दूसरे प्रमेय में भी पूर्ण भेद दृष्टि रखने लगते हैं। (वही 1 पृ. 110)। इस तरह से काश्मीर शैव दर्शन में ‘माया’ शब्द के कई अर्थ लिए गए हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मायीय अंड

देखिए विद्या कला।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मायीय मल

देखिए माया मल।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App