भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

मर्यादा

प्रयत्न से साध्य शास्त्र विहित ज्ञान एवं भक्ति की साधना मर्यादा है तथा इससे प्राप्त होने वाली मुक्ति मर्यादा मुक्ति है एवं इस मर्यादा से मिश्रित पुष्टिभक्ति मर्यादा पुष्टिभक्ति है। ऐसी भक्ति के उदाहरण भीष्म पितामह प्रभृति हैं (अ.भा.पृ. 1.067)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

मल

शिव की संकुचित शक्‍ति को ‘मल’ कहते हैं। इसे ‘अविद्‍या’ भी कहा जाता है। यह ‘आणव’, ‘मायीय’ और ‘कार्म’ भेद से तीन प्रकार का होता है। ये तीनों मल अनादि हैं। इन अनादिमलों से आवृत शिव का अंश ही संसारी जीव कहलाता है – (श.वि.द. पृ. 90,91; सि.शि. 5/34 पृष्ठ 63)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मल

क. आणव-मल
शिव की इच्छा-शक्‍ति का संकुचित स्वरूप ही ‘आणवमल’ है। इसके आवरण से जीव में ‘मैं अणु हूँ’ यह भावना उत्पन्‍न होती है और वह अपने व्यापक स्वरूप को भूलकर अपने को शिव से भिन्‍न मानने लगता है। इस प्रकार जीव में अणुता का आरोप करके शिव और जीव में भेद-बुद्‍धि को उत्पन्‍न करने वाला मल ही ‘आणव-मल’ है। (श.वि.द. पृष्‍ठ 90,91)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मल

ख. मायीय-मल
जिस शक्‍ति से संयुक्‍त होकर शिव सर्वज्ञ कहलाता है, उस ज्ञानशक्‍ति का संकुचित स्वरूप ही ‘मायीय-मल’ है। इसे ‘अज्ञान’ भी कहते हैं। वीरशैव दर्शन में अज्ञान का अर्थ ज्ञानाभाव अथवा भावरूप अज्ञान नहीं है, किंतु ‘संकुचित ज्ञान’ ही ‘अज्ञान’ कहलाता है। इसके आवरण से जीव में ‘मैं अल्पज्ञ हूँ’ यह भावना उत्पन्‍न होती है। इस ‘मायीय-मल’ के कारण ही यह जीव शरीर से भिन्‍न अपने अस्तिव को भूलकर शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझने लगता है और पत्‍नी, पुत्र आदि में ‘ये मेरे हैं’ इस भाव से युक्‍त होकर उनमें ही मोहित रहता है। इस प्रकार जीव में अल्पज्ञ भाव को उत्पन्‍न करके उसे संसार में मोहित करने वाला मल ही ‘मायीय-मल’ कहलाता है (श.वि.द.पृ. 91)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मल

ग. कार्म-माल
शिव की क्रियाशक्‍ति ही संकुचित होकर ‘कार्म-मल’ कहलाती है। यह जीव को आवृत करके उसमें ‘मैं किंचित् कर्ता हूँ’ इस भावना को उत्पन्‍न करता है। इस कार्म-मल के कारण ही जीव पुण्य और पाप कर्मो को करता हुआ स्वकृत कर्मों के फलों को भोगने के लिये मनुष्‍य आदि नानायोनियों में भ्रमण करता रहता है। इस प्रकार जीव से पुण्य-पाप कर्मों को कराकर उनके फलों के उपभोग के लिये जीव को नानायोनियों में भ्रमण कराने वाला मल ही ‘कार्म-मल’ के नाम से अभिहित होता है (श.वि.द.पृ. 91; सि.शि. 5/47, 48 पृष्‍ठ 70-71)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मल

अशुद्‍धि।

पाशुपत साधक आत्मा के जिन भावों का क्षय करने के लिए साधना, जप व तप करता है, वे मल कहलाते हैं (ग.का.टी.पृ.4)। मल पाँच प्रकार के होते हैं- मिथ्याज्ञान, अधर्म, सक्‍ति हेतु, च्युति तथा पशुत्व (ग.का.8)। मलों के कारण पशु संसृति के बंधन में पड़ा रहता है। अतः मुक्‍ति को पाने के लिए मलों को धो डालना परम आवश्यक होता है। इसीलिए मलों को भी गणकारिका में शास्‍त्र के प्रतिपाद्‍य विषयों में गिना गया है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मल

तत्त्वप्रकाशकार भोजदेव ने 18वीं कारिका में मल का लक्षण बताया है कि मल एक है और वह अनेक प्रकार की शक्तियों से मुक्त है। यह पुरुष की ज्ञान और क्रिया शक्ति को उसी तरह से ढक लेता है, जैसे कि भूसी चावल को और कालिमा तांबे को ढके रहती है। इस तरह से द्वैतवादी शैवों के यहाँ मल जीव में रहने वाला एक द्रव्यविशेष माना गया है। अद्वैतवादी शैव और शाक्त दर्शनिक ऐसा नहीं मानते। वे संसृति के अनादि कारण अज्ञान को ही मल मानते हैं। यह मल तीन प्रकार का होता है – आणव, मायीय और कार्म। अणु (जीव) गत अज्ञान ही उसके परमार्थ स्वरूप को ढक लेता है। इसी को आणव मल कहते हैं। माया शक्ति के अधीन मल मायीय तथा पुण्य और पाप कर्मों की वासना से उत्पन्न मल कार्म मल कहलाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मल

अज्ञान। समस्त बंधन एवं संसृति का मूल कारण बननेवाला सीमित ज्ञान। (मा.वि.तं. 1-23)। अज्ञान को ज्ञान का पूर्ण अभाव नहीं माना गया है। एक निर्जीव पदार्थ संसार में अज्ञ होता हुआ भी संसृति के चक्कर में नहीं आता है। जगत को भेदमयी दृष्टि से देखने के, अपने को जड़, देह, प्राण आदि समझने के तथा समस्त कर्मबंधन के मूल में वही संकुचिता ज्ञान रूपी मल कार्य करता है, इस प्रकार शुद्ध स्वरूप को आच्छादित करने वाले संकुचित ज्ञान को ही मल कहा जाता है। (तं.आ. 1-25, 26)।
मल त्रय
मल के आणव, मापीय तथा कार्म नामक तीन प्रकार। (यथास्थान देखिए)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

महत्

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत मत में ईश्‍वर के स्वतंत्र ज्ञानशक्‍ति व क्रियाशक्‍ति संपन्‍न होने के कारण तथा समस्त पशुओं से उत्कृष्‍ट होने पर उसे महत् कहते हैं। पशु, पक्षी, मानव आदि की अपेक्षा देवगणों में बढ़चढ़कर ज्ञान और क्रिया की शक्‍तियाँ होती हैं। उनसे भी अधिक शक्‍तिमान ब्रह्मा, विष्णु आदि होते हैं। परंतु सभी शक्‍तिमानों की शक्‍तियों से बहुत बड़ी शक्‍तियाँ परमेश्‍वर में ही होती हैं। अतः उसे महान् (महत्) कहा जाता है। (फ.सू.कौ.भा.पृ. 127; ग.का.टी.पृ.11)

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

महत् (महान्)

महत् (महान्) बुद्धितत्त्व है; महत् के साथ तत्त्व शब्द को जोड़कर महत्तत्त्व शब्द भी प्रयुक्त होता है। बुद्धि शब्द कभी-कभी ज्ञानवाची के रूप में भी प्रयुक्त होता है, पर महान् सदैव महत्तत्त्व के लिए ही प्रयुक्त होता है। कभी-कभी महान् और बुद्धि (तत्त्व) में अवान्तर भेद भी किया गया है – विषय का सूक्ष्मतम ज्ञाता बुद्धि है और विवेक (प्रकृति-पुरुष-भेद) का सूक्ष्मतम ज्ञाता महान् है। यहाँ वस्तु एक ही है, पर व्यापार के भेद से एक ही वस्तु को दो भागों में बाँट कर दो वस्तु के रूप में दिखाया गया है। महान् में त्रिगुण का सूक्ष्मतम वैषम्य है और यह वैषम्य नष्ट होने पर गुणों का साम्य हो जाता है। ‘मैं ज्ञाता हूँ (अन्तर्बाह्य विषयों का)’ – इस भाव का सूक्ष्मतम रूप ही महान् है। संप्रज्ञातसमाधि का जो चतुर्थ (अर्थात् अस्मितानुगत संप्रज्ञात) भेद है, उसका आलम्बन यह महान् है।
यह महत्तत्त्व सदैव पुरुष के द्वारा प्रकाशित होता है। पुरुष या आत्मा से नित्य ही संयुक्त रहने के कारण महत्तत्त्व को ‘महदात्मा’ भी कहा जाता है। कठोपनिषद् (1/3/13) में जो ‘महति आत्मनि’ वाक्य हैं उसमें इस सांख्यीय महदात्मा का प्रतिपादन है – ऐसा सांख्याचार्यों का कहना है।
महत्तत्त्व में प्रतिष्ठित (महत्तत्त्व का-साक्षात्कारी) जीव हिरण्यगर्भ होकर ब्रह्माण्ड सृष्टि करने में समर्थ होते हैं। महत्तत्त्व रूप उपाधि से युक्त आत्मा (पुरुष) सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान होता है। प्रकृति के सभी व्यक्त विकार महत्तत्त्व के ही स्थूल रूप हैं, अतः वह सभी विकारों में अनुस्यूत रहता है; यही कारण है कि यह महान् कहलाता है। 1/36 योगसूत्र के व्यासभाष्य में जिस ‘अणुमात्र आत्मा’ का उल्लेख मिलता है, वह भी महदात्मा ही है; महत् के परम सूक्ष्मत्व के कारण उसको लक्ष्य कर अणु शब्द का भी प्रयोग किया जा सकता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

महत्तत्त्व

महत्तत्त्व प्रकृति का सांख्योक्त प्रथम विकार है। सभी विकारों का बीजभूत होने के कारण यह ‘महत्’ कहलाता है – ऐसा प्रतीत होता है। (यह शब्द पुल्लिंग है, द्र. सांख्यकारिका 22; पर क्वचित् नपुंसकलिंग में भी प्रयुक्त होता है, द्र. सांख्यसूत्र 2/15)। इसी का नामान्तर बुद्धितत्त्व है। यह व्यावहारिक आत्मभाव का सर्वसूक्ष्म रूप है – ‘अहमस्मि’ बोध से ही यह लक्षित होता है। यह अभिमान से विहीन है। सास्मित समाधि में ही यह तत्त्व साक्षात्कृत होता है। अध्यवसाय महत् का लक्षण है – ऐसा पूर्वाचार्यों ने कहा है। महत्तत्त्व के साक्षात्कारी योगी ऐश्वर्यसंस्कार से युक्त होकर ब्रह्माण्डसृष्टिकारी प्रजापति हो सकते हैं। महत्तत्त्व एवं आत्मा इन दोनों की समष्टि ‘महदात्मा’ कहलाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

महत्व

पाशुपत साधक का लक्षण।

पाशुपत मत में युक्‍त साधक नाना सिद्‍धियों की प्राप्‍ति से बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्‍त कर लेता है, क्योंकि उसमें और सभी जीवों से अधिक ऐश्वर्य होता है (सर्वपशुम्योടभ्यधिकत्वमैश्‍वपर्याति-शयान्ममहतवम् – ग.का.टी.पृ.10)। साधक के इस महत्व के निरुपण से पाशुपत योग के महत्व पर भी प्रकाश पड़ता है। पातंजल योग से केवल दुःखनिवृत्‍ति हो जाती है परंतु पाशुपत योग से परम ऐश्‍वर्य भी प्राप्‍त हो जाता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

महादेव

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत मत में ईश्‍वर का एक नामांतर महादेव आया है। ईश्‍वर के अति उत्कृष्‍ट ज्ञानशक्‍ति संपन्‍न होने के कारण उन्हें महादेव कहा गया है। देव शब्द का अर्थ क्रीडनशील, जयशील, प्रकाशनशील आदि होता है। ये गुण इन्द्र आदि सभी देवगणों में होते हैं। उनसे भी बढ़चढ़कर ब्रह्‍मा, विष्णु आदि पाँच कारणों में होते हैं। परंतु सबसे उत्कृष्‍ट जो देवत्व है वह एकमात्र परमेश्‍वर में ही होता है। इस कारण उसको महादेव कहते हैं। (पा.सू.कौ.भा.पृ.14)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

महादेव

सतत गति से सृष्टयादि कृत्यों द्वारा विश्वमयी क्रीड़ा का अभिनय करने वाला परमेश्वर। देवाधिदेव। परमशिव। महेश्वर। परमशिव सर्वदा, सर्वतः एवं सर्वथा शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संविद्रूप ही है और अपनी इसी संविद्रूपता के कारण वह समस्त प्रपंच को स्वतंत्रतापूर्वक अपने में ही लय और उदय की क्रीड़ा का अभिनय करता रहता है। यही उसके स्वातंत्र्य का विलास है। इसी विलसनशील या क्रीडनशील स्वभाव के कारण उसे महादेव कहा जाता है। (सि.म.र. 38)। प्रायः कैलासवासी शिव के लिए महादेव शब्द का प्रयोग किया जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

महाद्वैत

देखिए परम अद्वैत।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

महान संबंध

जिस दर्शन तत्त्व का स्फुरण परावाणी द्वारा तुर्या के उत्कृष्टतम सोपान पर शिव शक्तिमय प्रकाश विमर्श की उत्कृष्ट स्फुरता के भीतर हुआ, उसी तत्त्व का स्फुरण शिवभट्टारक की अनुग्रहमयी प्रेरणा से सदाशिव भट्टारक को हुआ। शिव भट्टारक की स्फुरता में परावाणी द्वारा स्फुरण हुआ परंतु सदाशिव भट्टारक ने उसका विमर्शन पश्यंती वाणी द्वारा किया। इस तरह प्रश्न रूपी शंका योगी को पश्यंती वाणी में हुई और उसका समाधान उसे उसकी परावाणी के समावेश में हो गया। इस तरह से उत्कृष्टतर योगी ने पश्यंत दशा में प्रश्न की शंका की और परादशा में आरूढ़ होकर समाधान रूप उत्तर के द्वारा उस शंका को शांत किया। शिव और सदाशिव के ऐसे गुरु शिष्य संबंध को महान् संबंध कहते हैं। (पटलत्रि.वि.टि. पृ. 12।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

महानंद

उच्चार योग के अभ्यास से अभिव्यक्त होने वाली आनंद की छः भूमिकाओं में से पाँचवी भूमिका का आनंद। सभी प्रमेय पदार्थों को पूर्ण संघट्टात्मक रूप से शुद्ध प्रकाश रूप में ही देखने के लिए साधक जब समान प्राण पर विश्रांति प्राप्त करके ब्रह्मानंद की अनुभूति प्राप्त कर लेता है तब उसे उदान प्राण पर विश्रांति का अभ्यास करना होता है। इस अभ्यास में वह सभी प्रमाण एवं प्रमेयों से संबंधित सभी विकल्पात्मक आभासों को उदान के तेज में विलीन करके उदान प्राण पर विश्रांति प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में उसे जिस आनंद की अनुभूति होती है उसे महानंद कहते हैं। इसकी अभिव्यक्ति तुर्या की अवस्था में होती है। (तं.सा.पृ. 38; तं.आ. 5-47, 48)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

महापतन

पुष्टि मार्ग में मुक्ति महापतन रूप है क्योंकि मुक्ति भक्ति रस की बहुत बड़ी बाधिका है। “न स पुनरावर्तते” के अनुसार मुक्ति प्राप्त हो जाने पर पुनरावृत्ति नहीं होने से भक्ति रस की आशा भी जाती रहती है (अ.भा.पृ. 1234)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

महापुष्टित्व

भगवत्प्राप्ति के मार्ग में आने वाली बाधाओं को निवृत्त करने हुए भगवत्पाद की प्राप्ति करा देने वाला भगवान् का अनुग्रह महापुष्टित्व है (प्र.र.पृ. 77)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

महाप्रचय (सततोदित)

मालिनीविजय (2/36-45) तथा मन्त्रालोक (10/227-287) में जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत अवस्थाओं का निरूपण पिण्ड, पद, रूप, रूपातीत तथा महाप्रचय अथवा सततोदित अवस्था के रूप में किया गया है। तदनुसार तुरीयातीत अवस्था ही महाप्रचय अथवा सततोदित दशा है। इस अवस्था में पहुँचकर साधक निष्प्रपंच, निराभास शुद्ध, स्वात्मस्वरूप, सर्वातीत, शिवभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह महान् प्रकाशमय अनन्तपद है। सततोदित पद का अभिप्राय यह है कि यह स्वरूप सर्वत्र व्याप्त है, अखण्ड रूप में सर्वत्र सदा प्रकाशित होता रहता है। इसके पर्याय के रूप में शास्त्रों में नित्योदित पद भी प्रयुक्त होता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App