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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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मध्य-तीव्र शक्तिपात

पारमेश्वरी अनुग्रहात्मक अंतःप्रेरणा (देखिएशक्तिपात) का वह प्रकार, जिसके प्रभाव से जीव के सभी प्रकारों के संशयों का पूर्णतया उच्छेद हो जाता है। इस प्रकारके शक्तिपात के पात्र बने जीव को अपनी शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण प्रकाशरूपता का ज्ञान किसी शास्त्र या गुरु की सहायता के बिना स्वयं ही अपनी प्रतिभा से ही हो जाता है। वह उसे समयाचार आदि के तथा योग के अभ्यासों के बिना ही होता है। इसे यदि अपनी शुद्ध शिवरूपता के प्रति कभी कोई संशय हो भी जाए तो उसका निवारण किसी श्रीष्ठ गुरु के संवादमात्र से ही हो जाता है। (तं.आ. 13-131, 132; तन्त्र सार पृ. 120, 121)। ऐसे प्राणी में शिव के प्रति सुनिश्चित शक्ति उत्पन्न हो जाती है, मंत्र सिद्धि प्राप्त होती है, छत्तीस तत्त्वों पर स्वामित्व प्राप्त होता है, कवित्व एवं सभी शास्त्रों पर अधिकार प्राप्त हो जाता है। (तं.आ. 13-214, 215; मा.वि.वा. 2-13 से 16)। शरीर को छोड़ने पर वह अपनी परमेश्वरता को पूरी तरह से प्राप्त करता हुआ परमेश्वर से अभिन्न हो जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मध्य-मंद शक्तिपात

परमेश्वर द्वारा की जाने वाली अनुग्रहात्मक अंतःप्रेरणा (देखिएशक्तिपात) का वह प्रकार, जिसके प्रभाव से प्राणी को अपने वस्तुभूत स्वरूप को पहचानने की अपेक्षा भोगों को भोगने की इच्छा बहुत अधिक होती है। इसलिए योगाभ्यास के बल से एवं भोगों को भोगने की तीव्र इच्छा से देहपात के बाद किसी या उपयुक्त लोक में जाकर कुछ समय तक वहीं अभिमत भोगों का भोग करता है तथा वहीं उसी लोक के अधिष्ठाता से पुनः दीक्षा प्राप्त करके सतत अभ्यास करने पर अपनी शिवरूपता को प्राप्त कर लेता है। (तं.आ. 13-245, 246; तं.आ.वि. 8, पृ. 152)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मध्य-मध्य शक्ति

परमेश्वर द्वारा की जाने वाली अनुग्रहात्मक अंतःप्रेरणा (देखिएशक्तिपात) का वह प्रकार जिसके प्रभाव से प्राणी में अपनी शिवस्वरूपता को प्राप्त करने की उत्कट इच्छा के साथ साथ उत्कृष्ट सिद्धियों के माध्यम से भोगों को भोगने की वासना भी बनी रहती है। अतः उसे सद्गरु से प्राप्त हुए ज्ञान का योगाभ्यास द्वारा दृढ़तर अभ्यास करना होता है। वह योगाभ्यास से प्राप्त हुए भिन्न भिन्न दिव्य लोकाचित भोगों को इसी लोक में भोग करके अंत में देह त्याग कर देने पर शिवरूपता को प्राप्त कर लेता है। (तं.सा.पृ. 123, तं.आ. 137-242, 243)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मध्यधाम

मध्यनाडी सुषुम्ना को शाक्त दर्शन में मध्यधाम कहा गया है। इसी को शून्यातिशून्य पदवी भी कहा जाता है। वस्तुतः मध्यधाम सुषुम्ना को शून्य और शिवतत्त्व को शून्यातिशून्य कहते हैं। मध्यधाम या मध्यदशा को शून्यस्वभाव इसलिये कहा जाता है कि यहाँ ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, प्रमाज्ञा-प्रमाण-प्रमेय आदि त्रिपुटियों की कोई सत्ता नहीं बची रहती। मध्यधाम के लिये शून्यातिशून्य शब्द का प्रयोग लाक्षणिक है। इसका मुख्य प्रयोग शिवतत्व और उसकी अभिव्यक्ति के स्थान द्वादशान्त के लिये ही किया जाता है। सुषुम्ना नामक मध्यनाडी शून्यातिशून्य धाम द्वादशान्त में जाकर लीन हो जाती है, अतः इसको भी शून्यातिशून्य धाम कह दिया जाता है। इस शून्यातिशून्य स्वभाव मध्यधाम में विश्रान्ति ही योगी के लिये उपेय (प्राप्तव्य) है।
हृदय के मध्य में इसका निवास है। यह कमलनाल में विद्यमान अत्यन्त सूक्ष्म तन्तुओं के समान कृश आकार वाली है। इस मध्यनाडी के भीतर चिदाकाशरूप शून्य का निवास है। इससे प्राण शक्ति चारो ओर प्रसार करती है। साधक जब मध्यनाडी की सहायता से चिदाकाश में प्रविष्ट होता है, तब सोम और सूर्य, अर्थात् अपान और प्राण अथवा मन और प्राण सुषुम्ना में अपने आप विलीन हो जाते हैं। प्राण और अपान के मध्यवर्ती धाम सुषुम्ना (मध्यनाडी) में जिसका आन्तर और बाह्य इन्द्रिय चक्र (मन और उससे नियन्त्रित चक्षुरादि इन्द्रियाँ) लीन हो जाता है और जो ऊर्ध्व स्थान और अधःस्थान में विद्यमान अकुल और कुल पद्मों के संपुट के मध्य में भावना के बल से प्रविष्ट हो गया है, अर्थात् ऊर्ध्वगत प्रमाण रूपी पद्म और अधःस्थित प्रमेय रूपी पदम् के मध्य में चिन्मात्र प्रमाता के अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है और इसीलिये चिन्मात्रता के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु में जिसका चित्त संलग्न ही है, वह योगी स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। यहाँ प्रमेय रूप संसार का निमेष और उन्मेष व्यापार पद्मदल के संकोच और विकास के तुल्य है। इसीलिये इसकी पद्मसंपुट से तुलना की गई है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मध्यपिंड

देखिए ‘पिंडज्ञानी’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मध्यमा

शब्दब्रह्म संस्कृत पवन से प्रेरित होकर जब हृदय स्थान में अभिव्यक्त होता है, तो वह निश्चयात्मिका बुद्धि से संयुक्त होकर विशेष रूप से स्पन्दित होने वाले नाद का रूप धारण कर मध्यमा वाक् के रूप में प्रसिद्ध होता है। पश्यन्ती से नवनादात्मक मध्यमा वाणी का उन्मेष होता है। यह नाद की अनाहत अवस्था है। संकेतपद्धति, अर्थरत्नावली, वरिवस्यारहस्य, नेत्रतन्त्रोद्द्योत, स्वच्छन्दतन्त्रोदद्योत प्रभृति ग्रन्थों में धर्मशिव प्रभृति आचार्यों के वचनों के प्रमाण पर अष्टविध तथा नवविध नाद का प्रतिपादन किया गया है। इनकी अभिव्यक्ति वाणी की मध्यमा दशा में होती है। यही नादानुसंधान की स्थिति है। इसको मध्यमा इसलिये कहा जाता है कि यह न तो पश्चन्ती के समान उत्तीर्ण है और न वैखरी की तरह स्पष्ट अवयवों वाली है। उक्त दोनों स्थितियों के मध्य में इसकी स्थिति होने से ही इसको मध्यमा कहा जाता है। नवनादात्मक इस मध्यमा वाणी से ही नववर्गात्मिका वैखरी वाणी अभिव्यक्त होती है। योगिनीहृदय में इसको ज्येष्ठा शक्ति कहा है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मध्यमा वाच् (वाणी)

संविद्रूपा परावाक् ही जब एकमात्र बुद्धि में ही स्थित होती हुई द्रष्ट तथा दृश्य अर्थात् प्रमातृ तथा प्रमेय के बीच की दशा के रूप में प्रकट होती है तो उसे मध्यमा वाणी कहते हैं। इस वाणी के माध्यम से प्रमाता अपने से भिन्न प्रमेयों का पृथक् पृथक् विमर्शन करता है। यह सोच समझ की वाणी है। इस अवस्था में आकर वाच्य तथा वाचक की एवं उनमें परस्पर भेद की अभिव्यक्ति हो गई होती है परंतु वह पूर्णतया स्फुट भी नहीं होती है और बुद्धि के स्तर पर भेद की अभिव्यक्ति के कारण इसे स्फुट भी माना गया है। मानस पूजा में, मनन, स्वप्न तथा इस प्रकार के अंतः विमर्श में इसी वाणी का प्रयोग होता है। (तं.आ.वि. 2, पृ. 255)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मध्यविकास

प्राण और अपान के आधारभूत स्थान आन्तर आकाश हृदय और बाह्य आकाश द्वादशान्त में प्रत्यावृत्ति के अभाव में एक क्षण के लिये प्राण या अपान की वृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है। तब ऐसी प्रतीति होती है कि मानो प्राण और अपान कहीं विलीन हो गये हैं। इस स्थिति को मध्यदशा के नाम से जाना जाता है। इस मध्यदशा का जब विकास किया जाता है, तब धीरे-धीरे साधक की भेद-दृष्टि (दूसरे से अपने को अलग समझने का स्वभाव) घटती जाती है और उसकी बाह्य और आन्तर इन्द्रियाँ अन्तर्मुख होने लगती है। क्रमशः उसका प्राणचार (प्राण और अपान की गति) मध्यनाडी सुषुम्ना में लीन हो जाता है और तब परा शक्ति भैरवी से अभिन्न रूप में विद्यमान भगवान् भैरव का स्वरूप प्रकाशित हो उठता है।
हृदय, कण्ठ, तालु, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में प्राण की गति रहती है और हृदय-कमल, मुख का संकोच-विकास तथा द्वादशान्त- ये अपान की गति के स्थान है। इनमें एक क्षण के लिये प्राण के अस्त हो जाने पर और अपान का उदय न होने पर बिना प्रयत्न के बाह्य कुम्भक की प्राप्ति होती है। इसी तरह से एक क्षण के लिये अपान के अस्त हो जाने पर और प्राण का उदय होने पर बिना प्रयत्न के अन्तःकुम्भक की प्राप्ति होती है। यह मध्यदशा ही परम पद कहलाती है। प्राण-अपान की इस मध्यदशा को योगी ही जान सकते हैं। एक तुटि, लव अथवा क्षण के लिये भी अन्तर्मुख हो जाने पर योगी में इस मध्यदशा का विकास हो जाता है और तब प्राण और अपान की पुनः प्रत्यावृत्ति नहीं होती, अर्थात् वह मुक्त हो जाता है।
यह प्राणात्मक और अपानात्मक शक्ति हृदय से द्वादशान्त तक न तो जायेगी और न द्वादशान्त से हृदय की ओर वापस ही लौटेगी, जबकि मध्यनाडी का धाम (स्थान) विकल्पहानिरूप उपाय से विकसित कर दिया जाए। प्राण और अपान की गति के शान्त हो जाने से, हृदय और द्वादशान्त में प्राण और अपान की अस्पन्द अवस्था में स्थिति हो जाने से मध्यदशा का विकास होने पर साधक अपने स्वरूप को पहचान लेता है, वह साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है। प्रत्यभिज्ञाहृदय के 18वें सूत्र में विकल्पक्षय प्रभृति मध्यदशा के विकास के उपाय बताये गये हैं। स्पन्दकारिका में उन्मेष दशा के नाम से इसका वर्णन किया गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मननशक्‍ति

चिन्तनशक्‍ति।

पाशुपत शास्‍त्र के अनुसार सिद्‍ध साधक में मनन शक्‍ति जागृत हो जाती है। सिद्‍ध साधक या मन्ता के द्‍वारा मन्तव्य (चिन्तनयोग्य ज्ञान) को मनन करने की शक्‍ति मननशक्‍ति कहलाती है; अर्थात् युक्‍त साधक समस्त चिन्तन योग्य ज्ञान को मनन करने की शक्‍ति प्राप्‍त कर लेता है। इससे उसकी अपनी समस्त शङ्काएं शान्त हो जाती हैं तथा वह औरों की शङ्काओं का भी प्रशमन कर सकता है। यह मननशक्‍ति पाशुपत योग साधना का एक फल है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.42)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मनस्

मनस् अथवा मन को ‘अन्तः इन्द्रिय’ (अतःकरण) कहा गया है, क्योंकि शब्दस्पर्शादि रूप बाह्य विषय का ज्ञान साक्षात् मन से नहीं होता, इन्द्रियों के माध्यम से ही होता है। मन आन्तर विषयों का (सुख-दुःख-बोध तथा स्मृति आदि का) करण है। यह मन यद्यपि अहंकार अथवा अस्मिता से ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय की तरह ही उत्पन्न होता है (अतः मन को सोलह विकारों में एक माना जाता है) तथापि इसको इन इन्द्रियों का अधिपति अथवा परिचालक माना गया है। मन के योग के बिना ये इन्द्रियाँ अपना व्यापार करने में समर्थ नहीं होतीं – इस इन्द्रिय -परिचालकत्व के कारण ही मन को उभयात्मक कहा गया है (कारिका 27)। मन का धर्म ‘संकल्प’ माना गया है। ‘संकल्प’ के स्वरूप के विषय में मतभेद हैं। वाचस्पति संकल्प को ‘विशेष्य-विशेषण-भाव रूप से विवेचन’ समझते हैं। यही न्यायशास्त्र का सविकल्प ज्ञान है जिसमें किसी वस्तु का नाम, जाति आदि के साथ ज्ञान होता है। संकल्प, इच्छा, अभिलाषा या तृष्णारूप है – ऐसा भी कोई-कोई व्याख्याकार कहते हैं। संकल्प के विषय त्रैकालिक होते हैं, वर्तमानकालिक नहीं।
मन अन्तःकरण होने पर भी इन्द्रिय है, बुद्धि-अहंकार इन्द्रिय नहीं है। सात्त्विक अहंकार से ज्ञान-कर्मेन्द्रिय एवं मन के आविर्भाव होने के कारण ही मन को इन्द्रिय माना जाता है – यह वाचस्पति आदि कहते हैं। करण के रूप में मन बुद्धि-अहंकार का सजातीय है और इस मन का व्यापार है, संकल्प।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मनस्

प्रक्षुब्ध अवस्था को प्राप्त हुए गुणतत्त्व से प्रकट होने वाला तीसरा अंतःकरण मन। सत्त्वगुण प्रधान अहंकार से प्रकट होने वाला तीसरा अंतःकरण। प्रमेय पदार्थो के विषय में कल्पित तथा संभाव्यमान अनेकों नाम रूपों को अस्फुट रूप से प्रकट होने वाली जीव की मनन तथा संकल्प करने वाली शक्ति को मन कहा जाता है। (ई.प्र.वि. 2, पृ. 212)। मन को इंद्रियों में भी गिना जाता है। इंद्रियों द्वारा या स्वयं गृहीत विषयों के विषय में मन अनेकों अविरुद्ध और अनुकूल नाम रूपों की कल्पना करता है, परंतु निश्चय नहीं करता। निश्चय बुद्धि करती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

मनोजवित्व

कार्यसंपादन में अतीव त्वरितता।

पाशुपत दर्शन के अनुसार सिद्‍ध साधक में उद्‍बुद्‍ध क्रियाशक्‍ति का एक प्रकार मनोजवित्व है। साधक में जब ज्ञानशक्‍ति और क्रियाशक्‍ति उद्‍बुद्‍ध होती हैं तो उसकी इच्छाशक्‍ति इतनी सफल तथा स्वतंत्र हो जाती है कि वह जैसे ही मन में किसी कार्य के फलीभूत होने की इच्छा करता है, वह कार्य तुरंत विचार आते-आते ही फलीभूत होता है। ज्यों ही उसे किसी कार्य को करने की इच्छामात्र होती है, वह कार्य उसी क्षण हो जाता है। (निरतिशय शीघ्रकारित्व मनोजवित्वम् – ग.का.टी.पृ.10, पा.सू.कौ.भा.पृ.44)।)

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मनोजवित्व

इन्द्रियजय होने पर (इन्द्रियजय की पद्धति योगसूत्र 3/48 में कही गई है) आनुषङ्गिक रूप से जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, उनमें मनोजवित्व एक है (योगसूत्र 3/48)। शरीर की वह गति जो मन की गति की तरह वेगवान् हो, मनोजवित्व कहलाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मनोടमन

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत दर्शन में ईश्‍वर को मनोमन नाम से अभिहित किया गया है। सकल (कलाओं सहित) तथा निष्कल (कलाओं रहित) दोनों ही अवस्थाओं में शक्‍तिमान होने के कारण ईश्‍वर को मनोടमन कहा गया है। मन से यहाँ पर अन्तःकरण से तात्पर्य है। पाशुपत दर्शन के अनुसार ईश्‍वर विश्‍वोत्‍तीर्ण तथा विश्‍वमय है। जब वह विश्‍वमय होकर रहता है तो सकल होने के कारण मन (अंतःकरणों) से संपृक्‍त रहने के कारण ‘मन’ कहलाता है। परंतु दूसरे पक्ष में जब वह विश्‍वोत्‍तीर्ण होकर कलाओं से रहित होने पर ‘मन’ से असंपृक्‍त रहता है तो ‘अमन’ कहलता है। तथा इन दोनों पक्षों में समान रूप से रहने के कारण मनोടमन कहलाता है। (पा.सू.कौ.भाऋ पृ. 76)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

मन्त्र

मन्त्र दो अक्षरों से बना है – मन् और त्र् मन् का अर्थ है मनन करना और त्र का अर्थ त्राण। मनन करने से जो त्राण (रक्षा) करे, वह मन्त्र है। मन्त्र उस अक्षर, शब्द या शब्दों के समुदाय को कहते हैं, जिसके उच्चारण और मनन से शक्ति जगती है। स्वच्छन्दतन्त्र (4/375) प्रभृति ग्रन्थों में मन्त्र को ज्ञान शक्ति का विलास माना गया है। इसकी सहायता से साधक संसार सागर से मुक्त होकर शिव पद से संयुक्त हो जाता है।
तन्त्रशास्त्र में मन्त्र के लिये मनु शब्द का भी प्रयोग मिलता है। स्त्री देवता वाले मन्त्रों को महाविद्या कहा जाता है। पिण्ड, कर्तरा, बीज, मन्त्र और माला के भेद से, बीज, कूट, पिण्ड और माला के भेद से तथा सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध और अरि के भेद से मन्त्र नाना प्रकार के होते हैं। वैष्णव आगमों में पद, पिण्ड, बीज और संज्ञा के भेद से इनके चार प्रकार वर्णित हैं। नेत्रतन्त्र (18/10-12) में संपुटित, ग्रथित, ग्रस्त, समस्त, विदर्भित, आक्रान्त, आद्यन्त, गर्भस्थ, सर्वतोवृत्त, युक्तिविदर्भित ओर विदर्भग्रथित- ये ग्यारह विधियाँ मन्त्रों के विन्यास अथवा उच्चारण की बताई गई हैं। शारदातिलक (23/136) में शान्ति, वश्य, स्तम्भन, विवेशण, उच्चाटन और मारण नामक षट्कर्मों की सिद्धि के लिये ग्रथन, विदर्भ, संपुट, रोधन, योग और पल्लव नामक छः प्रकार की मन्त्रविन्यास की पद्धति वर्णित है। टीकाकारों ने इन पारिभाषिक शब्दों के अर्थों को स्पष्ट किया है। तदनुसार उक्त विधियों में मन्त्राक्षरों अथवा मन्त्रों का विशेष स्थितियों में लेखन अथवा उच्चारण किया जाता है।
मीमांसा दर्शन में मन्त्र को ही देवता माना गया है। तन्त्रशास्त्र में भी इस सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है। यहाँ मनु (मन्त्र) अथवा विद्या को उस देवता का विग्रह ही माना जाता है। दस महाविद्याओं के प्रतिपादक शाक्त तन्त्रों में काली, तारा, त्रिपुरा, प्रभृति शब्दों से मन्त्र और देवता दोनों अभिहित होते हैं। निरुक्त में मन्त्रार्थ के ज्ञान की महिमा वर्णित है। तदनुरूप ही तन्त्रशास्त्र में कहा जाता है कि मन्त्रार्थ की भावना के साथ मन्त्र का जप करने से मन्त्रचैतन्य की अभिव्यक्ति होती है, अर्थात् साधक के समक्ष मन्त्रदेवता अपने स्वरूप को प्रकट कर देते हैं। मन्त्रार्थ, मन्त्रचैतन्य प्रभृति शब्दों की निरुक्ति के प्रसंग में ये विषय चर्चित हैं।
मन्त्रस्वरूप, मन्त्रवीर्य, मन्त्रसामर्थ्य, मन्त्र, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रदोष, मन्त्रसंस्कार, मन्त्रसिद्धि प्रभृति विषयों पर तथा मन्त्रदीक्षा के प्रसंग में गुरु, शिष्य, देश, काल, स्थान आदि के विषय में तन्त्रशास्त्र के ग्रन्थों में पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। स्त्रीप्रदत्त तथा स्वप्नलब्ध मन्त्रों की साधनविधि तन्त्रों में वर्णित है। मन्त्रदीक्षा के समय कुलाकुलचक्र, नक्षत्रचक्र, राशिचक्र, नामचक्र, आदि की सहायता से मन्त्र का उद्धार और परीक्षण किया जाता है कि किस व्यक्ति को किसी मंत्र की दीक्षा दी जाय। हुं, फट् आदि अंग मन्त्रों के संयोजन की विधि का जानना भी आवश्यक माना गया है। मन्त्र, मण्डल आदि में जैसे प्रधान देवता के अतिरिक्त आवरण देवताओं का विन्यास विहित है, उसी प्रकार मूल विद्या अथवा प्रधान मन्त्र के भी अंग विद्या अथवा अंग मन्त्रों का शास्त्रों में वर्णन मिलता है। कुलार्णव तन्त्र के तृतीय और चतुर्थ पटल में जैसे प्रासाद अथवा पराप्रासाद मन्त्र का सविशेष महत्व वर्णित है, उसी तरह से तन्त्रशास्त्र के प्रत्येक ग्रन्थ अथवा सम्प्रदाय का अपना मूल (मूख्य) मन्त्र होता है। इसी मूल मन्त्र के अंग के रूप में अन्य मन्त्रों का विनियोग बताया जाता है। उक्त विषयों का विशेष विवरण जिज्ञासुओं को नेत्रतन्त्र, शारदातिलक, प्राणतोषिणी प्रभृति ग्रन्थों में देखना चाहिये।
नेत्रतन्त्र (18/13-14) में कहा गया है कि वही साधक श्रेष्ठ है, जो हृदय और द्वादशान्त में मन्त्र के उन्मेष और विश्रान्ति को जानता है, मन्त्र की शक्ति से परिचित है, उसके ध्यान के स्वरूप और मुद्रा को हृदयंगम कर सका है। तन्त्रालोक (29/83), उत्तरषट्क, अर्थरत्नावली (पृ. 231, 247) प्रभृति ग्रन्थों में उदय, संगम (व्याप्ति) और शान्ति (विश्रान्ति) नामक तीन अवस्थाओं का उल्लेख है। साधक को चाहिये कि वह आधार स्थान में मन्त्र के उदय की स्थिति का, हृदय स्थान में व्याप्ति का तथा ब्रह्मरन्ध्र में मन्त्र की विश्रान्ति दशा का सावधानी से अवलोकन करें। इसके लिये योनिमुद्रा के अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है, जिसका कि निरूपण अलग से किया गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मन्त्र-चैतन्य

जपयज्ञ के अभ्यास के वैखरी वाणी के समस्त आगन्तुक मल जब दूर हो जाते हैं, तब इडा-पिंगला का मार्ग अवरूद्ध होने लगता है और सुषुम्ना पथ उन्मुक्त हो उठता है। इस स्थिति में शब्दशक्ति प्राणशक्ति की सहायता से शोधित होकर सुषुम्ना रूप ब्रह्मपथ का आश्रय लेकर क्रमशः ऊर्ध्वगामिनी होती है। यही शब्द की सूक्ष्म या मध्यमा नामक अवस्था है। इसी अवस्था में अनाहत नाद प्रकट होता है और स्थूल शब्द इस विराट प्रवाह में निमग्न होकर उससे भर जाता है तथा चेतनाभाव धारण कर लेता है। इसी स्थिति को मन्त्रचैतन्य का उन्मेष कहा जाता है। प्राणतोषिणी तन्त्र (पृ. 418-419) में बताया गया है कि मन्त्रार्थ, मन्त्रचैतन्य और योनिमुद्रा को जो नहीं जानता, उसकी तांत्रिक उपासना कभी भी सफल नहीं हो सकती। मन्त्र का अधिष्ठाता देवता ही मन्त्रचैतन्य के नाम से अभिहित होता है। शास्त्रों में बताया गया है कि मन्त्र मणि के समान है और मन्त्रदेवता अर्थात् मन्त्रचैतन्य मणि की प्रभा के समान है।
उत्तरषट्क नामक ग्रन्थ में मन्त्र की पाँच अवस्थाओं का वर्णन किया गया है। उनके नाम हैं- स्पर्शन, अवलोकन, संभाषा, बिन्दुदर्शन और स्वयमावेशन। स्पर्शन का अर्थ मन्त्र के साथ साधक का संबंध है। इसका चिह्न कम्पन है। यह पहले हृदय में उत्पन्न होता है। मन्त्र का साधक को देखना ही अवलोकन है। इसका चिह्न घूनन है। इसकी उत्पत्ति कण्ठ में होती है। मन्त्र का साधक से भाषण संभाषा है। इसका चिह्न स्तोभ है। इस अवस्था में साधक समस्त विद्या और मन्त्रों की कल्पना कर सकता है। बिन्दुदर्शन का अर्थ है मन्त्र की आत्मा का साक्षात्कार। यह साक्षात्कार भ्रूमध्य में होता है। इससे साधक को सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। स्वयमावेशन का अभिप्राय है कि मन्त्र साधक को स्वात्मस्वरूप में समाविष्ट कर लेता है। यही वास्तविक मन्त्रचैतन्य की स्थिति है। यहाँ आकर मन्त्र की साधना फलीभूत हो जाती है। साधक की मन्त्र देवता के साथ समरसता हो जाती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मन्त्रयोग

राजयोग से निम्नस्तर के जिन योगों का उल्लेख है, उनमें से एक मन्त्रयोग है। मन्त्रजप इस योगाभायास में मुख्य है। इस योग का प्रकृत स्वरूप है – निरन्तर (प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में) ‘हंसः’ मन्त्र का जप करना। अभ्यास की उन्नत अवस्था में सुषुम्ना में यह मन्त्र स्वतः उच्चारित होता रहता है – यह उपांशु जप से उन्नततर अवस्था है। ‘हंसः’ मन्त्र का जप विपरीतक्रम से (‘सोहम्’ रूप से) भी किया जाता है। योगबीज आदि ग्रन्थों में इस योग का विशद् परिचय मिलता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

मन्त्रार्थ

मन्त्रजप के साथ मन्त्रार्थ की भावना आवश्यक है। राख में डाली गई आहुति जैसे निष्फल जाती है, इसी तरह से अर्थ के ज्ञान के बिना किया गया मन्त्र का उच्चारण भी व्यर्थ माना जाता है। निरुक्त प्रभृति ग्रंथों में भी अर्थज्ञान की महिमा वर्णित है। शास्त्रों में विविध प्रकार के मंत्रार्थों का विवरण पाया जाता है। भास्करराय ने वरिवस्यारहस्य में 15 प्रकार के मन्त्रार्थों का निरूपण किया है। उनमें भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ और महातत्त्वार्थ – ये छः अर्थ ही प्रधान हैं। योगिनीहृदय के मन्त्रसंकेत प्रकरण में इनका ही निरूपण हुआ है। तदनुसार मन्त्र के अवयवभूत अक्षरों का अर्थ ही भावार्थ है। सर्वकारणकारण पूर्ण परमेश्वर ही सब मन्त्रों के मूल गुरु हैं। उनके मुख से अपने मन्त्र का उद्भव और उसका अवतरण क्रम अथवा परम्परा का ज्ञान सम्प्रदायार्थ है। परमेश्वर, गुरु और निज आत्मा का ऐक्यानुसन्धान निगर्भार्थ है। परमेश्वर निष्कल निरवयव है, गुरु भी वही है। निष्कल परमेश्वर का जो निज आत्मरूप में साक्षात्कार करते हैं, वे ही गुरु हैं। इसलिये गुरु और परमेश्वर अभिन्न हैं। चक्र, देवता, विद्या, गुरु और साधक का ऐक्यानुसन्धान कौलिकार्थ है। मूलाधार स्थित कुण्डलिनी रूपा विद्या ही साधक की स्वात्मा है। इस प्रकार की भावना का नाम रहस्यार्थ है। निष्कल, अणु से अणुतर और महान से महत्तर, निर्लक्ष्य, भावातीत, व्योमातीत परम तत्त्व के साथ प्रकाशानन्दमय, विश्वातीत और विश्वमय, गुरु प्रबोधित, निर्मलस्वभाव स्वकीय आत्मा का ऐक्यानुसन्धान महातत्त्वार्थ है। इन सब अर्थों के ज्ञान से पाशात्मक विकल्पजाल भली-भाँति निवृत्त हो जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

मयूरांडरस-न्याय

देखिए ‘अविभाग-परामर्श’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

मरीचि

शक्ति प्रवाह। सत्त्व, रज तथा तम नामक तीन गुणों के स्पंद का मूलभूत शक्ति स्वरूप प्रवाह। परमेश्वर की ज्ञान, क्रिया तथा माया नामक तीन नैसर्गिक शक्तियाँ जब माया आदि छः कंचुक तत्त्वों से घिर कर क्रमशः सत्त्व, रज तथा तम गुणों के रूप में आकर उन्हीं के रूप में प्रवाहित होती हैं तब इसी गुण रूप प्रवाह या प्रसार को मरीचि कहते हैं। (शि.सू.वा.पृ. 14)
मरीचि निचय
तीन गुणों से उत्पन्न होने वाला इंद्रिय समूह। (वही)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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