भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

भूतभावन

बंध से छुटकारे के लिए जीवों को भगवद् भाव से भावित करने वाले भगवान् भूतभावन कहे जाते हैं। चूंकि भगवान् ही संसार में रहते हुए बंधरहित हैं, अतः भगवद् भाव से भावित जीव भी कृतार्थ हो जाता है। इस प्रकार जीव को कृतार्थ करने वाले भगवान् भूतभावन हैं (भा.सु.वे.प्रे.पृ. 7)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

भूतलिपि

शारदातिलक (7/1-4) में भूतलिपि का परिचय दिया गया है। वहाँ बताया गया है कि यह भूतलिपि अत्यन्त सुयोग्य है। इसकी प्राप्ति परम दुर्लभ है। भगवान् शिव से इसको पाकर मुनिगण सभी कामनाओं को प्राप्त कर सके थे। कामकला विलास (27 श्लो.) में सूक्ष्म और स्थूल भेद से मध्यमा वाणी के दो प्रकार बताये गये हैं। सूक्ष्म मध्यमा नवनादात्मक तथा स्थूल भूतलिपिमयी है। कामकलाविलास में श्रीचक्र स्थित अष्टकोण, प्रथम दशार, द्वितीय दशार और चतुर्दशार चक्रम में 42 वर्णात्मक भूतलिपि का विन्यासक्रम वर्णित है। टीकाकार नटनानन्द ने चेष्टाविशेष से अभिव्यक्त आकार वाली लिपी को भूतलिपि माना है। इसमें नौ वर्ग होते हैं। इनका क्रम यह है :
अ इ उ ऋ लृ प्रथम वर्ग
ए ऐ ओ औ द्वितीय वर्ग
ह य र व ल तृतीय वर्ग
ङ क ख घ ग चतुर्थ वर्ग
ञ च छ झ ज पंचम वर्ग
ण ट ठ ढ ड षष्ठ वर्ग
न त थ ध द सप्तम वर्ग
म प फ भ ब अष्टम वर्ग
श ष स नवम वर्ग
Darshana : शाक्त दर्शन

भूतादि

अहंकार-रूप तत्त्व के (गुणों के आधिक्य के अनुसार) तीन भाग माने गए हैं – सत्त्वप्रधान अंश, वैकृतिक या वैकृत नामक; रजःप्रधान अंश, तेजस नामक तथा तमःप्रधान अंश, भूतादि नामक (द्र. सांख्यकारिका 25)। भूत का साक्षात् उपादान होने के कारण ही ‘भूतादि’ नाम दिया गया है – ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है। जिनका भूतादि-अहंकार तन्मात्र को उद्भूत करता है, वे महैश्वर्यशाली जीव हैं; इनको ब्रह्माण्डाधीश प्रजापति माना जाता है। ऐसा सांख्यविदों का कहना है। प्रत्येक प्राणी में जो भूतादि -अहंकार है, वह तन्मात्र रूप में परिणत नहीं होता – यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भूमि

योगशास्त्र में ‘भूमि’ का कई अर्थों में प्रयोग हुआ है। इसका एक अर्थ ‘चित्तभूमि’ है, जो व्यासभाष्य के अनुसार पाँच प्रकार की है – क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध (द्र. योगसू. 1/1)। ‘भूमि’ का तात्पर्य उस चित्तावस्था से है जो सहज है अर्थात् वह अवस्था जिसमें चित्त संस्कारवश प्रायः रहता है।
संयम के प्रसंग में भी ‘भूमि’ का प्रयोग होता है – भूमियों में संयम करने का विधान किया गया है (योगसू. 3/5)। (भूमि को भूमिका भी कहा जाता है)। सवितर्कभूमि, सविचारभूमि आदि भूमियाँ हैं। योगियों का कहना है कि निम्नभूमि में संयम करने के बाद ही उत्तरभूमियों (उच्च, उच्चतर भूमियों) में संयम करना चाहिए तथा उत्तरभूमियों में जो संयम कर सकता है, उनको निम्नस्थ भूमियों में संयम नहीं करना चाहिए। ‘भूमि’ शब्द प्रान्तभूमि प्रज्ञा के प्रसंग में भी आया है (द्र. योगसू. 2/27), जहाँ वह अवस्थावाची है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भृत्याचार

देखिए ‘पंचाचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

भेदाभेदोपाय

देखिए शाक्त उपाय।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भेदोपाय

देखिए आणव उपाय।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भैक्ष्यम्

भिक्षा द्‍वारा प्राप्‍त किया हुआ अन्‍न।

भैक्ष्य पाशुपत साधक की वृत्‍ति का प्रथम प्रकार है। पाशुपत योग में साधक के जीवन की हर तरह की वृत्‍ति के बारें में उपदेश दिया गया है। उस योग की प्रथम भूमिका में साधक के भोजन के लिए भिक्षा का निर्धारण किया गया है। अतः पाशुपत साधक को भोजन केवल भिक्षा से ही करना होता है उसके अतिरिक्‍ति किसी भी अन्य व्यवसाय से नहीं। उसे शुद्‍धचरित्र गृहस्थों के घर-घर घूमकर भक्ष्य और भोज्य वस्तुओं की भिक्षा लेकर भोजन करना होता है। भिक्षा भी अधिक नहीं लेनी होती है। अपितु एक बार मांगने पर पात्र में जितनी भिक्षा (पात्रागतम्) मिल जाए, बस उसी से काम चलाना होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 118)

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

भैरव

अभिनवगुप्त ने तन्त्रलोक (1/95-100) में बृहस्पतिपाद कृत शिवतनुशास्त्र के श्लोकों को उद्धृत कर बताया है कि इनमें अन्यर्थ नामों से भगवान भैरव की स्तुति की गई है। ‘भया सर्वं रवयति’ (श्लो. 127) विज्ञानभैरव के इस श्लोक और उसकी व्याख्या में भी ‘भैरव’ पद की व्युत्पत्ति बताई है। क्षेमराज ने विज्ञानोद्द्योत के मंगल श्लोक में भैरव की स्तुति की है। इन सबका अभिप्राय यह है कि भैरव इस विश्व का भरण, रवण और वमन करने वाले हैं। वे इस संसार का भरण-पोषण करते हैं और वे ही इसकी सृष्टि और संहार भी करते हैं। ऐसा करके वे स्वयं पुष्ट होते हैं, प्रसन्न होते हैं। भगवान शिव ही भैरव है। वे अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति रूपी तूलिका से इस संसार को चित्रित करते हैं और इसके बाद वे स्वयं ही इसको देखकर प्रसन्न होते हैं। ये संसारी जीवों को अभयदान करने वाले हैं। संसारी जीवों के आक्रन्द (छटपटाहट) के कारण भी ये ही हैं और त्राहि-त्राहि पुकारने वाले भक्त जनों के हृदय में प्रकट होकर उनका उद्धार भी ये ही करते हैं, अर्थात् निग्रह और अनुग्रह ये दोनों भगवान् भैरव के ही व्यापार हैं। इसलिये यह पंचकृत्यकारी कहलाता है। यह कालका भी काल है। इसलिये इसको कालभैरव कहते हैं। यह कालवंचक योगियों के चित्त में समाधि दशा में स्फुरित होता है और अज्ञानी जीवों के हृदय में भी बाह्य और आन्तर इन्द्रियों (करणों) की अधिष्ठात्री देवियों (खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी) के रूप में, जो कि संविद्देवीचक्र के नाम से प्रसिद्ध है, प्रकट होता है। भगवान् भैरव का स्वरूप महाभयानक भी है और परम सौम्य भी। यही भैरव 64 भैरवागमों का तथा अन्य अनेक शैव और शाक्त आगमों का अवतारक है। शाक्त पीठों में सर्वत्र देवी के दर्शन के पहले भैरव की अर्चना की जाती है। केवल वैष्णव देवी का मन्दिर ही इसका अपवाद है। वहाँ देवी का दर्शन कर लेने के उपरान्त ही भैरव का दर्शन किया गया है। दस विद्याओं के दस भैरवों का, असितांग प्रभृति आठ भैरवों का तथा मन्थान प्रभृति भैरवों का वर्णन शक्तिसंगम प्रभृति तन्त्र ग्रन्थों (3/11/253-254) में मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

भैरव

1. विश्व का भरण, रमण एवं वमन करने वाला तथा ऐसा करने पर भी अपने अखंडित संवित्स्वरूपता में ही सतत रूप से आनंदाप्लावित रहनेवाला पर-भैरव परमशिव (शि.सू.वा.पृ.8)।
2. भाव, उद्योग, उन्मेष आदि शब्दों से इंगित सतत स्फुरणशील शार्व तत्त्व। (वही पृ.9)।
3. संसरणशील प्राणियों को अभय प्रदान करने वाला। (स्व.तं.उ. 1 पृ. 3)।
4. संसार का संहार करने के कारण त्रास का कारण बना हुआ तथा इस त्रास से उत्पन्न हुए क्रंदन से जो अत्यधिक भयानक घोष वाला है और इस प्रकार के भयावह घोष से जो सतत रूप से चमकता रहता है। (वही)।
5. सांसारिक प्राणियों को अपने स्वरूप का साक्षात्कार करवाने वाली खेचरी, गोचरी आदि संवित्स्वरूपा शक्तियों का स्वामी। (वही.पृ.4)।
6. संसार का संहार करते रहने के कारण भीषण बने हुए रूप वाला।
7. चौसठ अभेद प्रधान आगमों के उपदेश करने वाले मंत्र कोटि के देवता। (भास्करीवि.तं. 1-390, 391)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भैरव-आगम

अभेद दृष्टि को लेकर भैरवों द्वारा कहे गए चौंसठ अभेद प्रधान शैव आगम। (मा.वि.वा. 1-390 से 92)। पंच मंत्रों की विविध प्रकार से सम्मिलित दृष्टियों को लेकर के दिव्य शरीरों में प्रकाट होकर अभेद दृष्टि की प्रधानता को अपना कर शैवदर्शन के सिद्धांतों और प्रक्रियाओं का उपदेश करने वाले मंत्र स्तर के स्वच्छंदनाथ के चौंसठ अवतार शरीर भैरव कहलाते हैं। उन्हीं के द्वारा उपदिष्ट आगम शास्त्र भैरव आगम हैं जिनकी संख्या चौसठ है तथा जो आठ आठ के आठ वर्गों में बँटे हैं। वर्तमान युग में उनमें से एक स्वच्छंद आगम ही शेष रहा है; रुद्रयामल के अनेकों खंड मिल रहे हैं; शेष सभी लुप्तप्राय हैं। उनके केवल नाम मिलते हैं और किसी किसी से उद्धृत पंक्तियाँ मिलती हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भैरवी

पर संवित्स्वरूप भैरव की पराशक्ति। क से लेकर क्ष पर्यंत समस्त योनि स्वरूपा शक्ति वर्गों की अदिष्ठात्री तथा इन सभी का संहार करने पर भैरव में अभिन्न रूप से ठहरने वाली परादेवी। माहेश्वरी, ब्राह्मी आदि आठ शक्तियों का मातृवर्ग इसी पराशक्ति का रश्मि रूप प्रसार माना गया है। ये आठ शक्तियाँ अ से लेकर क्ष पर्यंत भिन्न भिन्न मातृका वर्गों की अधिष्ठात्री शक्तियों के रूप में विश्व का समस्त व्यवहार चलाती हैं। इन सभी के संघट्ट रूप परम सामरस्य को भैरवी कहते हैं। (स्वं.तं. 1-32 से 36; मा. वि. तं. 3-14)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भैरवी (शाम्भवी) मुद्रा

दृष्टि जब निमेष (पलकों को बन्द करना) और उन्मेष (पलकों को खोलना) इन दोनों व्यापारों से शून्य होकर बाहर की ओर लगी हो और अवधान क्रिया बाहर की ओर न जाकर अन्तः स्थित आत्मा को अपना लक्ष्य बनावे, अर्थात् इन्द्रिय तो बाहर की तरफ खुली हो, किन्तु चित्त भीतर की ओर पलटा हुआ हो तो यह अवस्था भैरवी अथवा शाम्भवी मुद्रा के नाम से शास्त्रों में अभिहित है। इस अवस्था में प्रविष्ट हो जाने पर योगी दर्पण में बनते-बिगड़ते हुए नाना प्रकार के प्रतिबिम्बों की भाँति चिदाकाश में उदित और विलीन हो रहे बाह्य पदार्थों और आन्तर भावों को, अर्थात् समस्त विकल्पों को, निमीलन और उन्मीलन समापत्ति (समाधि) के बीज में अवधान रूपी चरणि से जलाई गई ज्ञानाग्नि के द्वारा भस्म कर अपने समस्त करण चक्र (इन्द्रिय समूह) को आलंबन के अभाव में अपने स्वरूप में ही विस्फारित (विस्तीर्ण) कर लेता है। उस समय ऐसी प्रतीति होती है, मानो ये इन्द्रियाँ अपने अद्भुत स्वरूप को आँखें फाड़ कर देख रही हों।
इस निर्विकल्प अवस्था में प्रवेश कर लेने पर साधक भैरव स्वरूप हो जाता है, अर्थात् उसको अपने वास्तविक स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा हो जाती है, प्राण और अपान की गति के शान्त हो जाने से हृदय और द्वादशान्त में प्राण और अपान की अस्पन्द अवस्था में स्थिति हो जाने से, मध्यदशा का विकास होने पर साधक अपने भैरवीय स्वरूप को पहचान लेता है, वह साक्षात भैरव स्वरूप हो जाता है। भैरवी मुद्रा के सहारे विषयों को देखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है और इस तरह से अनालोचनात्मक पद्धति से भावों का परित्याग हो जाता है। ‘स्पर्शान्त कृत्वा’ (5/27) प्रभृति गीता के श्लोक में इसी स्थिति का वर्णन मिलता है। क्रम दर्शन में प्रदर्शित पाँच मुद्राओं में भी यह वर्णित है। इसका विशेष विवरण खेचरी मुद्रा के प्रसंग में दिया गया है। हठ योग प्रभृति के ग्रन्थों में शाम्भवी मुद्रा के नाम से यह अभिहित है।
Darshana : शाक्त दर्शन

भोक्ता

निर्गुण अपरिणामी पुरुष को जिस प्रकार ज्ञाता, अधिष्ठाता कहा जाता है, उसी प्रकार भोक्ता भी कहा जाता है। ‘भोग रूप क्रिया से जो विकारी होता है’ इस अर्थ में पुरुष भोक्ता नहीं हैं, क्योंकि पुरुष (तत्त्व) अपरिणामी हैं। भोग बुद्धि-व्यापार या बुद्धिधर्म है, वह बुद्धि में ही रहता है। स्वप्रकाश पुरुष बुद्धिस्थ भोग का भी प्रकाशक (निर्विकार रूप से) है, इस दृष्टि से ही पुरुष भोक्ता है – भोगकारी के अर्थ में नहीं। जिस प्रकार चिति (पुरुष) को चितिशक्ति कहा जाता है, उसी प्रकार भोक्ता को भोक्तृशक्ति भी कहा जाता है, जैसा कि पंचशिख के वाक्य में (अपरिणामिणी हि भोक्तृशक्तिः – – -; 2/20 व्यासभाष्य के उद्धृत) देखा जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भोग

दो पुरुषार्थों में भोग अन्यतम है (दूसरा अपवर्ग है)। व्यासभाष्य में कहा गया है कि इष्ट और अनिष्ट रूप से गुणस्वरूप (अर्थात् त्रैगुणिक वस्तु) का अवधारण करना भोग है (व्यासभाष्य 2/18)। यह भी कहा गया है कि यह भोग भोक्ता पुरुष और भोग्य बुद्धि की एकीभावप्राप्ति होने पर ही संभव होता है (व्यासभाष्य 2/6)। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि भोग एक प्रकार का ज्ञान (भ्रान्तज्ञान) है। यह भोग विषयदृष्टा के पार्थक्यज्ञान से शून्य विषय -ज्ञान है, अतः योगदृष्टि में हेय है। भोग की समाप्ति अपवर्ग में होती है; अपवर्ग भी जब समाप्त हो जाता है तब चित्त का शाश्वत निरोध (=अव्यक्तभावप्राप्ति) हो जाता है। ‘सुख-दुःख-बोध’ के अर्थ में भी भोग शब्द प्रयुक्त होता है, जैसा कि योगसूत्र (2/13) के ‘जात्यायुभोगाः’ अंश में देखा जाता है। इस भोग का आश्रय होने के कारण शरीर को भोगाधिष्ठान कहा जाता है (व्यासभाष्य 2/5)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भोगविपाक

भोगरूप विपाक = भोगविपाक। विपाक = कर्मफल। कर्माशय के जो तीन विपाक होते हैं, उनमें भोग एक है (योगसू. 2. 13)। भोग का अर्थ है – विषयाकारा चित्तवृत्ति। योगशास्त्र कहता है कि ऐसा भी दृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय होता है जो भोग का ही हेतु होता है (इसका नाम एकविपाकारम्भी कर्माशय है), अथवा आयु और भोग दोनों का ही हेतु होता है (इसका नाम द्विविपाकारम्भी कर्माशय है)। यदि इस विपाक का हेतु पुण्य हो तो फल सुख होता है और यदि हेतु अपुण्य हो तो फल दुःख होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भोगांग

देखिए ‘अंग’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

भोगायतन

भोग का अर्थ है – सुख-दुःख का अनुभव। यह अनुभव शरीरी आत्मा का होता है (वस्तुतः सुख-दुःख का प्रत्यक्ष सम्बन्ध बुद्धि से ही है; निर्गुण आत्मा में सुख-दुःख का आरोपमात्र किया जाता है)। भोग की शरीर-सापेक्षता के कारण शरीर (स्थूल-सूक्ष्म) को भोग का आयतन (= आश्रय) कहा जाता है। सांख्यसूत्र (5/114; 6/60) में इस दृष्टि से भोगायतन शब्द का प्रयोग भी किया गया है। भोगायतन को भोगाधिष्ठान भी कहा जाता है (व्यासभाष्य 2/5)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भौतिकसर्ग

भौतिक = पंचभूतविकार; पर ‘भौतिक सर्ग’ के प्रसंग में भौतिक का अर्थ है – भूतनिर्मित शरीर (शरीर चूंकि शरीरी क्षेत्रज्ञ के बिना नहीं रहता, अतः ‘भौतिक सर्ग’ वस्तुतः देही आत्मा के भेदों को लक्ष्य करता है)। सांख्य के अनुसार देहधारी जीवों की चौदह योनियाँ ही भौतिक सर्ग हैं (सांख्यका. 53) – देवयोनि आठ प्रकार की, तिर्यक्-योनि पाँच प्रकार की तथा मनुष्ययोनि एक प्रकार की है। ये जीव सत्त्व-रजः-तमः के प्राधान्य के अनुसार ऊर्ध्वलोक-मध्यलोक-अधोलोक के निवासी होते हैं – यह ज्ञातव्य है। पाँच भूतों के परस्पर संमिश्रण से जो स्थूल वस्तु बनती है, वह भी भौतिक कहलाती है (घट आदि पदार्थ भौतिक अर्थात् पाँच भौतिक हैं) भौतिक पदार्थों की सर्ग (= सृष्टि) – इस अर्थ में भी ‘भौतिकसर्ग’ शब्द प्रयुक्त होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भ्रान्तिदर्शन

नौ अन्तरायों में यह एक है (द्र. योगसू. 1/30)। स्वरूपतः यह विपर्यय ज्ञान ही है। संशय-ज्ञान से विपर्ययज्ञान में अन्तर है। संशय में दोनों ही कोटियों का ज्ञान होता है, यथा – यह स्थाणु (खूँटा) है या पुरुष है। विपर्यय में एक पदार्थ अन्य पदार्थ के रूप में ज्ञात होता है। योग का अन्तराय-रूप जो भ्रान्तिदर्शन है, वह योगसाधन-सम्बन्धी या तत्वस्वरूप-सम्बन्धी होता है। सत्त्वगुणजात आनन्द निर्गुण आत्मा में है या आत्मा आनन्दरूप है – यह एक भ्रान्तिदर्शन है। इसी प्रकार अनिद्रारोग को निद्राजय के रूप में समझना भी भ्रान्तिदर्शन है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App