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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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भस्मशयन

पाशुपत विधि का एक अंग।

पाशुपत विधि के अनुसार शारीरिक पवित्रीकरण के लिए भस्मशयन करना होता है। रात्रि में भस्मशय्या को छोड़कर कहीं और शयन करना विधि-विरुद्‍ध है। पाशुपत योगी के लिए रात्रि को भस्मशय्या पर ही शयन करना अतीव आवश्यक है। वह जब कभी लेटे तो उसे भस्म में ही लेटना होता है। उससे उसका शरीर सदा पवित रहता है। मन की पवित्रता भी उससे बढ़ती है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.8)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

भस्मस्‍नान

पाशुपत विधि का एक अंग।

पाशुपत विधि के अनुसार भस्मस्‍नान विधि का एक आवश्यक अंग है। योगी को जल की अपेक्षा भस्म से ही शारीरिक पवित्रीकरण के लिए स्‍नान करना होता है। शरीर पर भस्म मलना ही भस्मस्‍नान होता है जिससे शरीर पर लगे स्‍निग्ध द्रव, तेल अथवा लेप या स्वेदजनित दुर्गन्ध आदि दूर हो। भस्मस्‍नान दिन में तीन बार पूर्वसन्ध्या, अपराह्नसन्ध्या तथा अपरसन्ध्या अर्थात् दिन के तीन विशेष पहरों में करना होता है। यदि किसी आगंतुक कारण से पवित्रता में भंग आए तो तब भी उसे पुन: भस्मस्‍नान करना होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.9)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

भाव

सांख्य में तीन प्रकार की सृष्टि मानी गई है – तत्त्वसृष्टि, भूतसृष्टि तथा भावसृष्टि। भाव का अभिप्राय धर्म आदि आठ भावों से है (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य तथा उनके विरोधी अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य) (द्र. सांख्यकारिका 43, 52)। ये भाव त्रयोदश करणों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन, अहंकार और बुद्धि) में आश्रित रहते हैं। ये भाव शरीर के उपादान कारणों से भी संबन्धित हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि विशेष प्रकार के शरीर धर्म -ज्ञानादि के साधन में विशेषतः उपयोगी होती हैं।
इन आठ भावों को सांसिद्धिक और वैकृतिक नामक दो भागों में बाँटा गया है (द्र. सांख्यका. 43)। सांसिद्धिक भाव वे हैं जो जन्म के साथ ही प्रकट होते हैं (पुरुषान्तर से उपदेश-ग्रहण के बिना)। ये प्राकृतिक भी कहलाते हैं। वैकृत भाव वे हैं जो साधनबल से क्रमशः प्रकट होते रहते हैं। कपिल मुनि प्रथम प्रकार के भाव के मुख्य उदाहरण हैं।
कुछ व्याख्याकार भावों के तीन प्रकार बताते हैं – सांसिद्धिक, प्राकृतिक तथा वैकृत (या वैकृतिक)। जन्म के साथ उत्पन्न होने वाले सांसिद्धिक; कुछ आयु बीतने पर आकस्मिक रूप से उत्पन्न होने वाले प्राकृतिक (इसमें पुरुषान्तर से उपदेश की आवश्यकता नहीं है); पुरुषान्तर से उपदेश लेकर साधन करने पर जो धर्मादि उत्पन्न होते हैं, वे वैकृतिक हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भाव

सात प्रकार के आचारों के समान ही तन्त्रशास्त्र के ग्रन्थों में त्रिविध भावों का भी विशद वर्णन मिलता है। ये हैं- पशुभाव, वीरभाव और दिव्यभाव। जन्मकाल से सोलह वर्ष तक पशुभाव, इसके बाद पचास वर्ष तक वीरभाव और पचास वर्ष के पश्चात् मनुष्य दिव्यभाव में रहता है। भावत्रय से अन्ततः भावै की सिद्धि होती है। ऐक्यभाव से साधक कुलाचार में प्रतिष्ठित होता है और इस कुलाचार के द्वारा ही मानव देवमय बन पाता है। भाव एक मानव धर्म है। मन ही मन सर्वदा उसका अभ्यास किया जाता है। दिव्य और वीर ये दो महाभाव हैं, पशुभाव अधम है। वैष्णव को पशुभाव से पूजा करनी चाहिये। शक्ति मन्त्र में पशुभाव भीतिजनक है। दिव्य और वीर भाव में वस्तुतः अन्तर नहीं है, किन्तु वीरभाव अति उद्धत है। रुद्रयामल में बताया गया है कि पशुभाव स्थित साधक किसी एक सिद्धि को प्राप्त कर सकता है। किन्तु कुलमार्ग अर्थात् वीरभाव स्थित योगी अवश्य ही सब प्रकार की सिद्धियों का अधिकारी हो जाता है। महाविद्याओं के प्रसन्न होने पर ही वीरभाव की प्राप्ति होती है और वीरभाव के प्रसार से ही दिव्यभाव प्रकट होता है। वीरभाव और दिव्यभाव को ग्रहण करने वाले साधक वाञ्छाकल्पतरुलता के स्वामी हो जाते हैं, अर्थात् जब जो चाहे सो प्राप्त कर सकते हैं।
(क) दिव्यभाव
कुब्जिकातन्त्र प्रभृतति में दिव्यभाव का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि यह विश्व देवतामय है। समस्त जगत स्त्रीमय और पुरुष भगवान् शिव है। इस प्रकार अभेद भाव से जो चिन्ता करता है, वह देवतात्मक या दिव्य है। उसको चाहिए कि वह नित्य स्नान, नित्य दान, त्रिसन्ध्या जप-पूजा, निर्मल वसन परिधान, वेदशास्त्र, गुरु और देवता में दृढ़ आस्था, मन्त्र और पितृ-पूजा में अटल विश्वास, बलिदान, श्राद्ध और नित्य कार्य का नियमित आचरण, शत्रु-मित्र में समभाव रखते हुए अन्य किसी के भी अन्न का ग्रहण न करे। शरीर यात्रा के लिये केवल गुरुनिवेदित अन्न स्वीकार करे। कदर्थ और निष्ठुर आचरण का परित्याग कर दिव्यभाव से सदा परमेश्वर की उपासना में निरत रहे। उसको सदा सत्य बोलना चाहिये। जो कभी असत्य का सहारा न ले वह साधक दिव्यभाव में स्थित माना जाता है। सत्ययुग और त्रेता के प्रथमार्ध तक दिव्यभाव की स्थिति मानी जाती है। दिव्यभाव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस भाव के द्वारा साधक समस्त विश्व को परमशिव और उसकी पराशक्ति के रूप में ही देखता है तथा अपनी आहार-विहार आदि सभी क्रियाओं को शिवशक्ति की पूजा ही समझता है।
(ख) पशुभाव
कामाख्यातन्त्र में पशुभाव का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि जो पंचतत्व को स्वीकार नहीं करते और न उसकी निन्दा ही करते हैं, जो शिवोक्त कथा को सत्य मानते हैं, पाप कार्य को निन्दनीय समझते हैं, वे ही पशुनाम से प्रसिद्ध हैं। जो प्रतिदिन हविष्य का आहार करते हैं, ताम्बूल नहीं छूते, ऋतु स्नाता अपनी स्त्री के सिवा अन्य किसी भी स्त्री को कामभाव से नहीं देखते, परस्त्री के कामभाव को देखकर उसका साथ त्याग देते हैं, मत्स्य-मांस का सेवन कभी नहीं करते, गन्धमाल्य, वस्त्र आदि धारण नहीं करते, सर्वदा देवालय में रहते हैं और आहार के लिये घर जाते हैं, पुत्र और कन्याओं को अतिस्नेह दृष्टि से देखते हैं, ऐश्वर्य को नहीं चाहते, जो है उससे सन्तुष्ट रहते हैं, धन होने पर सदा दरिद्रों की सहायता करते हैं, कभी कृपणता, द्रोह और अहंकार नहीं दिखाते और जो कभी क्रोध नहीं करते, वे सब जीव पशुभाव में स्थित माने जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों को दीक्षा नहीं देनी चाहिये। इनकी कभी मुक्ति नहीं होती।
रुद्रयामल में लिखा गया है कि जो प्रतिदिन दुर्गापूजा, विष्णुपूजा और शिवपूजा करता है, वही पशु उत्तम है। शक्ति के साथ शिव की पूजा करने वाला भी उत्तम है। केवल विष्णु की पूजा करने वाला मध्यम और भूत-प्रेत आदि की उपासना करने वाला अधम है। शिव, शक्ति, विष्णु आदि की पूजा करने के बाद यक्षिणी आदि की सेवा करने वाला, ब्रह्मा, कृष्ण, तारक ब्रह्म प्रभृति की पूजा करने वाला साधक भी श्रेष्ठ माना जाता है।
(ग) वीरभाव
पिच्छिलातन्त्र प्रभृति में वीरभाव का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि इस भाव में शक्ति या मद्य, मत्स्य, मांस, मुद्रा और मैथुन के बिना पूजा नहीं की जाती। स्त्री का भग पूजा का आधार है। यहाँ स्वर्ण अथवा रजत का कुश बनाया जाता है। कलियुग में मुख्य द्रव्यों के अभाव में अनुकल्प का भी विधान है। अथवा मानस भावना से ही सारी विधियाँ पूरी की जा सकती हैं। स्नान, भोजन, स्वकीया अथवा परकीया स्त्री, मद्य, मांस, स्वयंभू कुसुम, भगपूजन प्रभृति सभी विधियाँ यहाँ मानसिक भावना द्वारा ही सम्पन्न की जाती हैं। कलिकाल में मनुष्य संशयों से ग्रस्त रहता है। वह वास्तविक वीरभाव का अधिकारी नहीं हो सकता। अतः मानस भावना से ही उसको अपने इष्टदेव की उपासना करनी चाहिये। निशंक वीर ही वीर या दिव्यभाव का अधिकारी होता है। पंचमकार साधन, श्मशानसाधन, चितासाधन जैसी क्रियाएँ दिव्य या वीरभाव स्थित साधक के द्वारा ही सम्पन्न की जा सकती हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

भावना

भावना का अर्थ वह शुद्‍ध मानसिक चेष्‍टा है, जिसका विषय शिव ही होता है, अर्थात् शिवविषयक मानसिक व्यापार का नाम है भावना। इसी को अनन्य-श्रद्‍धा भी कहते हैं। इसका आलंबन शुद्‍ध होने से यह भावना भी शुद्‍ध कहलाती है और यही जीव को मुक्‍त कराती है। आलंबन के अशुद्‍ध होने पर वही भावना संस्रति (संसार) का कारण बनती है। अतः वीरशैव आचार्यों ने पूजा आदि कर्म करते समय शुद्‍ध भावना की आवश्यकता बताई है। यह शुद्‍ध भावना एक ऐसी चीज है, जिसकी सहायता से भावुक व्यक्‍ति अत्यंत सूक्ष्म और इंद्रियों के लिये अगोचर परशिव का भी साक्षात्कार कर सकता है।

पूजा आदि धार्मिक कृत्य करते समय आराध्य शिव के प्रति अनन्य श्रद्‍धा रूप भावना रहने पर ही वह पूजा श्रेष्‍ठ और फलदायी मानी जाती है। भावना के बिना केवल यंत्रवत् शारीरिक क्रिया होने पर उस पूजा का कोई मूल्य नहीं होता, चाहे वह कितनी ही बड़ी पूजा क्यों न हो। भावनायुक्‍त पूजा छोटी होने पर भी उसका फल महान् होता है और वही शिव के लिए प्रिय भी होती है।

यह भावना पूजा प्रभृति कर्म करते समय रहने पर ‘श्रद्‍धा’ और ज्ञान के साथ रहने पर ‘निदिध्यासन’ कहलाती है। श्रद्‍धारूप भावना से भावुक को शिव की कृपा प्राप्‍त होती है और निदिध्यासन-रूप भावना से ध्याता शिवस्वरूप होता है (सि.शि. 16/1-4 पृष्‍ठ 93,94; सि.शि. 17/2-5 पृष्‍ठ 115-116)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

भावना

भावनोपाय, ज्ञानयोग, शाक्त उपाय, ज्ञानोपाय, शाक्तयोग। ज्ञानयोग का वह अभ्यास, जिसमें साधक शुद्ध विकल्पों के माध्यम से यह अंतः परामर्श करता रहता है कि समस्त प्रपंच के संपूर्ण भावों एवं पदार्थों में एक ही पर तत्त्व विद्यमान है; सारा प्रपंच उसी परतत्त्व में संवित् रूप में ही रहता है; पर तत्त्व और उसमें (साधक में) मूलतः कोई भेद नहीं है; जो कुछ भी है वह उसी पर तत्त्व का अंतः या बाह्य रूप है; इत्यादि। इस प्रकार के शुद्ध विकल्पों द्वारा प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय में कोई भी भेद न मानकर उन्हें विकल्प बुद्धि के द्वारा ही संवित् रूप समझने तथा इस तरह से स्वात्मशिवता को ही सर्वत्र देखने के अभ्यास को भावना या भावनोपाय कहा जाता है। (शि.दृ. 7-5, 6)। देखिए शाक्त उपाय।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भावफल

सांख्यशास्त्र में आठ भाव माने जाते हैं – धर्म-अधर्म, ज्ञान-अज्ञान, वैराग्य-अवैराग्य तथा ऐश्वर्य-अनैश्वर्य। इन आठों के जो फल हैं, वे भावफल हैं। इन फलों का उल्लेख सांख्यकारिका 844-45 में है, यथा – धर्म का फल है – ऊर्ध्वलोकों (सत्त्वप्रधान लोकों) में गमन; अधर्म का फल है – अधोलोक (तमः प्रधान निरयलोक) में गमन; ज्ञान का फल है – अपवर्ग (कैवल्य); अज्ञान का फल है – बन्धन; वैराग्य का फल है – प्रकृतिलय, अर्थात् आठ प्रकृतियों में चित्त का लीन हो जाना या तन्मय हो जाना (द्र. योगसूत्र 1/19 भी) जो तत्त्वज्ञानहीन केवल वैराग्य से होता है; अवैराग्य का फल है – संसार में बार-बार जन्म ग्रहण करते रहना; ऐश्वर्य का फल है – इच्छा का अनभिधात = बाधाहीनता; अनैश्वर्य का फल है – अभीष्ट अर्थ की अप्राप्ति (अर्थात् अप्राप्ति के कारण मन के क्षोभ आदि)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भावलिंग

देखिए ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत ‘लिंग’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

भावसर्ग

सांख्यशास्त्र में दो प्रकार के सर्ग माने गए हैं – लिङ्गसर्ग एवं भावसर्ग (सांख्यकारिका 52)। (कहीं-कहीं लिङ्गसर्ग के लिए ‘भूतसर्ग’ शब्द भी प्रयुक्त होता है)। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य (बुद्धितत्त्व के चार सात्त्विक रूप) एवं अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य (बुद्धितत्त्व के चार तामस रूप) – ये आठ ‘भाव’ या ‘रूप’ कहलाते हैं (द्र. सांख्यकारिका 23, 43)। इन आठ पदार्थों की सृष्टि भावसर्ग है। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि सांख्य में कहीं-कहीं तत्त्व, भाव एवं लिङ्ग नामक त्रिविध सर्ग माने गए हैं (युक्तिदीपिका 21)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भावाचार

देखिए ‘सप्‍ताचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

भासाचक्र

भासा या महाप्रतिभा भगवान् की स्वातन्त्र्यरूपा चिति शक्ति का ही नामान्तर है। इसी के गर्भ में पंचकृत्यमय अनन्त वैचित्र्य निहित है। यह सर्वातीत होने पर भी सबकी अनुग्राहिका पराशक्ति है। जिस प्रकार दर्पण में नगर आदि दृश्य प्रपंच प्रतिभासित होते हैं, उसी प्रकार इस स्वच्छ चित्मयी पराशक्ति की भित्ति में भी प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयात्मक समस्त जगत प्रतिबिम्ब की भाँति स्फुरित हो उठता है। यही निर्विकल्प परम धाम है। सृष्टि आदि समस्त चक्र इसी में प्रतिबिंब रूप से स्फुरित होते हैं। इसी को सप्तदशी कला कहा जाता है। यह स्वातन्त्र्यशक्ति रूपा संविद् देवी संकोच और विकास दोनों प्रणालियों से नाना रूप में प्रतिभात होती है। पचास मातृका रूपी वर्णमाला इसी का विकास है। सृष्टि, स्थिति, संहार अनाख्या और भासा पाँच चक्र ही क्रम दर्शन में पञ्चवाह महाक्रम के नाम से प्रसिद्ध हैं। सृष्टि से लेकर अनाख्या पर्यन्त चार चक्रों की पूजा क्रम-पूजा के नाम से तथा भासा चक्र की पूजा अक्रम-पूजा के नाम से शास्त्रों में वर्णित है। इसका विशेष विवरण महार्थमंजरी प्रभृति क्रम दर्शन के ग्रन्थों में देखना चाहिये।
Darshana : शाक्त दर्शन

भुवन

तत्त्वों के स्थूल रूपों को भुवन कहते हैं। भुवनों को लोक भी कहा जाता है। भुवनों की संख्या भिन्न उपासना क्रमों में भिन्न भिन्न मानी गई है जो सूक्ष्मतर तथा स्थूलतर विश्लेषणों के आधार पर ठहरी रहती है। त्रिकशास्त्र के विशिष्ट गुरुओं ने इस संख्या को एक सौ अठारह माना है। तंत्रालोक आदि ग्रंथों में भुवन अध्वा की धारणा में इनका विस्तार से वर्णन किया गया है। (तं.सा.पृ. 66-68)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भुवन अध्वन्

आणवोपाय की देशाध्वा नामक धारणा का वह मार्ग, जिसमें प्रमेय अंश प्रधान भुवन नामक स्थूलतर देश को साधना का आलंबन बनाकर अपने शिवभाव के समावेश को प्राप्त करने के लिए अभ्यास किया जाता है। छत्तीस तत्त्वों के भीतर ही एक सौ अठारह भुवनों की कल्पना की गई है। भुवन अध्वा के अभ्यास में तत्त्वों के इन्हीं स्थूल रूपों को क्रम से आलंबन बनाना होता है। (तं.सा.पृ. 111)। इस योग से उन उन भुवनों को अपने ही भीतर देखने का अभ्यास करना होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भुवनज्ञान

योगसूत्र (3/26) में कहा गया है कि सूर्य अर्थात् सूर्यद्वार (=सुषुम्नानाडी) में संयम करने पर (तथा आचार्यों द्वारा उपदिष्ट अन्य प्रकार के संयम से भी) भुवन (अर्थात् भुवन-विन्यास) का साक्षात् ज्ञान होता है, अर्थात् विभिन्न द्वीप, लोक, पाताल, नरक आदि का संस्थान (इस ब्रह्माण्ड में) कैसा है, इसका प्रत्यक्ष ज्ञान संयमकारी के चित्त में उदित होता है। ब्रह्माण्ड में विभिन्न लोकों का सन्निवेश कैसा है – इसका एक लघु विवरण व्यासभाष्य (3/26) में मिलता है। व्यासभाष्योक्त विवरण अंशतः बौद्ध ग्रन्थों में भी मिलता है और इन ग्रन्थों में शब्द प्रयोगों में भी साम्य है। पुराणों के भुवन -कोश-प्रकरण में भी ऐसा विवरण मिलता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भूचरी

वामेश्वरी शक्ति से अधिष्ठित वे शक्तियाँ, जो भू अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप आदि पंचात्मक मेयपद पर ही विचरण करती रहती हैं। इस पंचात्मक मेयपद का आभोग करती हुई आश्यानी भाव से तन्मयता प्राप्त करती रहती हैं। ये शक्तियाँ प्रबुद्ध साधक के लिए चित्प्रकाशरूपतया आभासित होती रहती हैं और सामान्य साधक के लिए सभी ओर से भेद का ही प्रसार करती रहती हैं। (स्पंदकारिकासं.पृ. 20, 21)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भूत

सांख्य के तत्त्वों में भूततत्त्व सबसे स्थूल है। भूत से पुनः कोई तत्त्व आविर्भूत नहीं होता, यद्यपि भूतों के धर्म, लक्षण और अवस्था नामक तीन परिणाम होते हैं (व्यासभाष्य 2/19)। भूतों के परस्पर संमिश्रण से ही भौतिक जगत् बनता है। जो तन्मात्र के लिए भूत शब्द का प्रयोग करते हैं, वे भूत के लिए महाभूत शब्द का व्यवहार करते हैं – यह ज्ञातव्य है।
भूत पाँच हैं – शास्त्रानुसार इनका स्वरूप यह है – आकाश = शब्द-गुण-युक्त जड़ परिणामी, बाह्य द्रव्य; वायु = स्पर्श-(शीत -ऊष्ण)-गुणक बाह्य द्रव्य; तेजस्=रूपगुणक बाह्यद्रव्य; अप् या जल= रसगुणक बाह्य द्रव्य; पृथ्वी या क्षिति = गन्धगुणक बाह्य द्रव्य।
क्षिति में शब्दस्पर्शादि पाँच गुण हैं; अप् या जल में गन्ध को छोड़ कर चार गुण हैं; तेज में गन्ध-रस को छोड़कर तीन गुण हैं; वायु में स्पर्श-शब्द हैं और आकाश में शब्दगुण ही है – यह मत भी प्रचलित है। हमारी दृष्टि में यह मत भूततत्त्व को लक्ष्य नहीं करता है। यह व्यावहारिक दृष्टि है। इस विषय में विशेष विवरण के लिए स्वामी हरिहरानन्द आरण्यकृत पातंजल योगदर्शन द्रष्टव्य।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

भूतकंचुकी

पृथ्वी आदि से बने हुए इस स्थूल शरीर रूपी चोले (कंचुक) को धारण करने वाला ज्ञानी साधक जब तक प्रारब्ध कर्म के भोगों को पूरा नहीं कर पाता है तब तक वह इस संसार से छुटकारा न पाता हुआ यहीं जीवन्मुक्त की अवस्था में निवास करता रहता है परंतु उसे यह निश्चय हुआ होता है कि वह शुद्ध और परिपूर्ण संवित्स्वरूप ही है तथा यह पंच भौतिक शरीर उसका एक चोला मात्र ही है, वास्तविक स्वरूप नहीं है। इस तरह से शरीर को कंचुकवत् मानने वाला जीवन्मुक्त योगी। (शि.सं.वा.पृ. 84)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भूतकैवल्य

पंचभौतिक सृष्टि के सभी प्रकार के प्रभाव से मुक्त होकर केवल अपने शुद्ध चिदानंद स्वरूप में स्थिति। शैवी साधना के क्रम में नाडी संहार (देखिए) कर लेने पर भूतजय (देखिए) हो जाता है। भूतजय से साधक पंचभौतिक सृष्टि पर स्वातंत्र्य प्राप्त करके उसमें स्वेच्छा से विचरण करने की सामर्थ्य को प्राप्त कर लेता है। परंतु जब वह भूतजय से प्राप्त ऐश्वर्य को भी छोड़कर केवल अपनी शुद्ध संविद्रूपता में सहज ही प्रवेश कर जाता है तो उसकी उस अवस्था को भूत कैवल्य कहते हैं। (शि.सू.वा.पृ. 48; वही टि. पृ. 47)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भूतजय

पंच महाभूतों पर विजय प्राप्त कर लेना। साधक शैवी साधना के अभ्यास से सभी वृत्तियों को इडा आदि तीन नाडियों में शांत करने के पश्चात् शांत हुई वृत्तियों सहित तीनों नाडियों को ब्रह्मरंध्र रूपी चिदाकाश में विलीन करके नाडी संहार (देखिए) करता है। नाडी संहार हो जाने पर पृथ्वी आदि धारणाओं का अभ्यास करता हुआ पंच भौतिक सृष्टि पर विजय प्राप्त कर लेता है। इसे ही भूतजय कहते हैं। इससे साधक पंच भैतिक विश्व में स्वच्छंद रूप से विहार करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। (श.सू.वा.पृ. 48; वही टि.पृ. 47)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

भूतपृथक्त्व

सभी तत्त्वों पर पूर्णतया अधिकार प्राप्त हो जाने पर उन्हें स्वतंत्र रूप से संयोजन तथा वियोजन करने की सामर्थ्य का प्राप्त होना। शैवी साधना के अभ्यास से नाडी संहार (देखिए), भूतजय (देखिए) तथा भूतकैवल्य (देखिए) में स्थिति हो जाने पर साधक अपने शुद्ध स्वरूप में आनंदाप्लावित होकर रहता है। इस स्थिति में स्थिरता आने से छत्तीस तत्त्वों पर तथा उनकी भिन्न भिन्न प्रकार की पदार्थ रचना पर उसे स्वातंत्र्य प्राप्त हो जाता है। इस स्वातंत्र्य से वह किसी भी पदार्थ या तत्त्व का संघटन या विघटन कर सकता है तथा सभी तत्त्वों को अपनी शुद्ध संविद्रूपता में समरस करके पारमेश्वरी अखंडित स्वातंत्र्य को प्राप्त कर सकता है। छत्तीस तत्त्वों पर उसकी ऐसे सामर्थ्य को भूतपृथक्त्व कहते हैं। (शि.सू.वा.पृ. 48)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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