भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

प्रत्यक्षप्रमाण

सांख्य -योग में स्वीकृत तीन प्रमाणों में यह एक है। सांख्यकारिका में इसका लक्षण है – प्रतिविषय-अध्यवसाय (5)। विषय के साथ इन्द्रिय का संपर्क होने पर जो अध्यवसाय (निश्चय) होता है, वह प्रत्यक्ष है। पूर्वाचार्य कहते हैं कि विषय (स्थूल-सूक्ष्म) के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष होने पर बुद्धिगत तमोगुण का अभिभव होने के साथ-साथ सत्त्वगुण का जो स्फुरण होता है, वह प्रत्यक्ष प्रमाण है, जो चित्तवृत्तिविशेष ही है। इसके साथ चेतन पुरुष का जो संबंध (अर्थात् चेतन में समर्पण) है, वह प्रत्यक्षप्रमा कहलाता है। यह प्रत्यक्ष संशय, विपर्यय और स्मृति से भिन्न है। सांख्यसूत्र (1/89) में भी यही मत प्रतिपादित हुआ है। कारिका में प्रत्यक्ष के लिए ‘द्रष्ट’ शब्द प्रयुक्त हुआ है।
योगसूत्र (1/7) का कहना है कि प्रत्यक्ष में विषयगत विशेषधर्म प्रधानतया भासमान होता है। इस प्रमाण से उत्पन्न होने वाली प्रमा को ‘पौरुषेय चित्तवृत्तिबोध’ कहा जाता है। उदाहरणार्थ ‘यह घट है’ ऐसा निश्चय (घटाकारा चित्तवृत्ति) प्रत्यक्ष प्रमाण है और ‘मैं घट जान रहा हूँ’ यह प्रत्यक्ष प्रमा है। बुद्धि में प्रतिबिम्बित होने के कारण बुद्धि के साथ पुरुष की अभिन्नता होती है। और इस प्रकार निर्धर्मक पुरुष में ज्ञानादिधर्मों का उपचार होता है; यही कारण है कि प्रमा को पौरुषेय कहा जाता है।
प्रमाणों में प्रत्यक्ष प्रमाण सर्वाधिक बलवान् है। लौकिक प्रत्यक्ष की तुलना में योगज प्रत्यक्ष अधिकतर बलशाली है। समाधि प्रत्यक्षों में निर्विचारा समापत्ति उच्चतम है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रत्यक्षाद्वैत

वेदांत आदि अद्वैत शास्त्रों की प्रक्रियाओं में या तो समाधि की अवस्था में अद्वैतता का साक्षात्कार होता है या शरीर के छूट जाने पर अशरीर मुक्ति की दशा में। परंतु शैवशास्त्र की प्रक्रियाओं में इन दो दशाओं के अतिरिक्त सांसारिक व्यवहार की इस जगत् रूपिणी दशा में भी अद्वैत तत्त्व का साक्षात्कार हो सकता है। तद्नुसार एक उत्कृष्टतर शिवयोगी अपनी बाह्य इंद्रियों से सर्वत्र एकमात्र शिवरूपता को ही देखता है। जिस तरह से एक योग्य स्वर्णकार की पैनी दृष्टि बीसों प्रकारों के अलंकारों में एकमात्र स्वर्ण की ही शुद्धि के स्तरों की दशाओं को देखा करती है, अलंकारों के बाह्य आकारों की ओर उसकी अवधान दृष्टि जाती ही नहीं, उसी तरह से ऐसा योगी सांसारिक विषयों के बाह्य आकार की ओर अपने अवधान को न लगाता हुआ सर्वत्र एकमात्र शुद्ध और परिपूर्ण शिवता को ही अपने अवधान की दृष्टि से देखा करता है। इस प्रकार से देखे जाने वाले अद्वैत को आ. अभिवनगुप्त के पिता आ. नरसिहंगुप्त ने प्रत्यक्षाद्वैत कहा है। (मा.वि.वा. 1-760 से 764)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रत्यभिज्ञा

पहले जाने हुए, पर आगे विस्मृत हुए अपने परिपूर्ण ऐश्वर्ययुक्त संविदात्मक शुद्ध स्वरूप का पुनः स्मरणात्मक ज्ञान। परमेश्वर अपने स्वातंत्र्य से अपने ही आनंद के लिए जीव रूप में प्रकट होता हुआ अपने वास्तविक स्वरूप और स्वभाव को भुला डालता है। ऐसी अवस्था में आने के अनंतर जीव को जब कभी पुनः अपने परिपूर्ण आनंदात्मक शुद्ध स्वरूप की पहचान हो जाती है तो उसे प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। समस्त व्यावहारिक ज्ञान बहिर्मुखी होता है, परंतु प्रत्यभिज्ञा अपने अंतर्मुखी स्वस्वरूप का साक्षात्कार करवाने वाली होती है। यही इसकी प्रतीपता है जो प्रति उपसर्ग से द्योतित होती है। (ई.प्र.वि.खं. 1, पृ. 19-20)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रत्यय

चित्त की दो अवस्थाएँ हैं – ज्ञात या लक्षित अवस्था तथा अज्ञात या अलक्षित अवस्था। ज्ञात अवस्था प्रत्यय कहलाती है। चूंकि चित्त -वृत्तियाँ सदा ही ज्ञात रहती हैं (सदाज्ञाताश्चित्तवृत्तयः, योगसूत्र 4/18), अतः वृत्ति प्रत्यय कहलाती है। संस्कार अलक्षित अवस्था में रहते हैं, अतः वे प्रत्ययात्मक नहीं हैं, (द्र. व्यासभाष्य 3/9)। विषयाकार चित्तवृत्ति का जो अनुभवांश है, उसके लिए विशेषतः प्रत्यय शब्द का प्रयोग होता है, जैसा कि 1/11 सूत्र के व्यासभाष्य से ज्ञात होता है। प्रत्यय संस्कारजनित होता है और संस्कार न रहने पर प्रत्यय उत्पन्न नहीं होते हैं। कारण के अर्थ में ‘प्रत्यय’ शब्द का प्रयोग कई योगसूत्रों में मिलता है (द्र. 1/10; 1/18; 1/19; 1/20 आदि)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रत्ययैकतानता

प्रत्ययों की एकतानता ध्यान का स्वरूप है। प्रत्यय = ध्येयरूप आलम्बन से संबन्धित चित्तवृत्ति; एकतानता = एकाग्रता = सदृश प्रवाह। आलम्बन संबन्धी वृत्तियों की धारा जब इस प्रकार अखण्ड प्रतीत हो मानो एक ही वृत्ति उदित हुई है – तब वह एकतानता है – ऐसा पूर्वाचार्यों का कहना है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रत्यवमर्श

अपने शुद्ध एवं परिपूर्ण स्वरूप का विमर्श। अपने परिपूर्ण अहं के बारे में किया गया परामर्श। शिवशक्ति की परिपूर्ण सामरस्यात्मक अपनी संविद्रूपता का विमर्शन। अह्मात्मक असांकेतिक पर परामर्श। (तं.आ. 3-235; वही वि.पृ. 224)। व्यवहार में अवमर्श प्रायः बाह्य विषयों का या अधिक से अधिक सुख दुःख आदि आभ्यंतर भावों का ही हुआ करता है। जैसे यह नील है, यह पीत है, मैं सुखी हूँ, मुझे आश्चर्य हो रहा है इत्यादि। परंतु चेतना की अंतर्मुखी गति से उसे उल्टा (प्रतीय) अपने ही स्वरूप का अहंरूपतया भी विमर्शन होता ही रहता है। इसी अंतर्मुखी स्वात्म विमर्शन को प्रत्यवमर्श कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रत्याहार

अष्टांग योग में प्रत्याहार का स्थान पंचम है; षडंग योग की जो गणना मिलती है, उसमें भी प्रत्याहार गिना जाता है। कई योगग्रन्थों में प्रत्याहार को ‘विषयों से इन्द्रियों को प्रयत्नपूर्वक हटा लेना’ कहा गया है। इस ‘हटा लेना’ मात्र को पतंजलि ने प्रत्याहार नहीं कहा। उनके अनुसार ‘शब्दादि विषयों से चित्त जब प्रतिनिवृत्त होता है जब इन्द्रियों के भी निवृत्त होने पर उनकी चित्त-स्वरूप के अनुकरण-सदृश जो अवस्था होती हैं वह प्रत्याहार है (2/54)। अनुकरण-सदृश कहने का गूढ़ अभिप्राय है। व्याख्याकारगण कहते हैं कि जिस प्रयत्न से चित्त निरुद्ध होता है, उससे इन्द्रियाँ भी निरुद्ध होती हैं, इस प्रकार निरोध-अंश में चित्त और इन्द्रियों में समता है। चित् निवृत्त होकर ध्येय विषय का अवलंबन करता है, पर इन्द्रियाँ विषय-निवृत्त होने पर भी ध्येय का अवलंबन नहीं करतीं – यह दोनों में भेद है। इस समता एवं भेद के कारण ही पतंजलि ने 2/54 सूत्र में ‘इव’ (अर्थात् ‘स्वरूपानुकार की तरह’) का प्रयोग किया है। प्रत्याहार के दृढ़ अभ्यास से इन्द्रियों की वश्यता पूर्णमात्रा में होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रथमकल्पिक

योगियों के चार प्रकारों में यह प्रथम प्रकार है (द्र. व्यासभाष्य 3/51)। प्रथमकल्पिक वह योगाभ्यासी है जिसमें अध्यात्मज्ञान अर्थात् योगाभ्यास से उत्पन्न अत्नर्दृष्टि, का आरम्भ मात्र हुआ है। कहीं-कहीं प्राथमकल्पिक पाठ भी मिलता है (द्र. विवरणटीका)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रधान

सत्त्व-रजः-तमः नामक तीन गुणों के समुदाय को अर्थात् उनकी साम्यावस्था को ‘प्रधान’ कहा जाता है – ‘प्रधीयतेस्मिन् इति प्रधानम्’ – सभी व्यक्त अनात्म वस्तु इसमें अवस्थित हैं, अतः यह प्रधान कहलाता है। गुणों का यह साम्यावस्था-रूप प्रधान, अलिंग, अव्यक्त आदि नामों से भी अभिहीत होता है। (वैषम्यावस्थ त्रिगुण के लिए प्रधान शब्द का व्यवहार नहीं होता)। प्रधान परार्थ है अर्थात् पुरुष के लिए प्रवर्तित होता है; यह हेतुहीन, परिणामी -नित्य, सर्वव्यापी, एकसंख्यक, अनाश्रित, उपादानकारणशून्य, निरवयव तथा स्वतन्त्र है – गुणसाम्यरूप प्रधान किसी चेतन के अधीन नहीं हैं। इस प्रधान की स्थिति एवं गति नामक दो अवस्थाएँ हैं (द्र. व्यासभाष्य 2/30)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रधान तत्त्व

देखिए प्रकृति तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रधानजय

प्रधानजय नामक सिद्धि का उल्लेख योगसूत्र 3/48 में है। अष्ट प्रकृति एवं सोलह विकारों पर आधिपत्य करना ही प्रधानजय है। प्रधानजय का नामान्तर प्रधानवशित्व है जिसका उल्लेख व्यासभाष्य (3/1) में हुआ है। इस विभूति से कामनाओं की समाप्ति हो जाती है और विषयों के प्रति कोई आकर्षण नहीं रह जाता। काय एवं इन्द्रियों का यथेच्छ् निर्माण भी इस विभूति के कारण ही हो सकता है (द्र. योगवार्त्तिक एवं तत्त्ववैशारदी 3/18)। प्रधानजयी जीव का उल्लेख व्यासभाष्य 3/26 में है। अपने सर्ग काल में अर्थात् जिस ब्रहमाण्ड में वे हैं उस ब्रहमाण्ड के स्थितिकाल में, ये प्रधानजयी जीव अपनी इच्छा के अनुसार गुणत्रय को प्रवृत करा सकते हैं – ऐसा व्याख्याकारगण कहते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रबुद्ध

जब देहात्मवाभिमान रूपी द्वैतपरक अज्ञान (देखिए) का साधना द्वारा नाश हो जाता है तो साधक अपने पशुभाव को भूलकर अपनी शुद्ध संविद्रूपता का आवेश लेने लगता है। ऐसी अवस्था में पहुँच जाने पर वह प्रबुद्ध कहलाता है। (स्व.तं.पटल 3-128, 129)। ऐसी अवस्था ईश्वर के शक्तिपात से ही सुलभ होती है। ईश्वर के शक्तिपात से ही जीव में सद्गुरू के पास जाने की प्रेरणा प्राप्त होती है। गुरु की आज्ञा के अनुसार सतत अभ्यास से उसके मोहपाशों का क्षय हो जाता है। इस प्रकार वह प्रबुद्ध की अवस्था को प्राप्त करता हुआ आगे सुप्रबुद्ध बनने के योग्य बन जाता है। (स्व.वि.पृ. 8, 9, 56)। प्रबुद्ध ज्ञानी को और सुप्रबुद्ध पूर्णज्ञानी को कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रभुशक्ति

परमशिव की सर्वत्र अखंडित रूप से चमकने वाली परिपूर्ण स्वातंत्र्य शक्ति। (शि.सू.वा.यपृ. 48; तं.आ. 0 6-53)। देखिए स्वातंत्र्य शक्ति।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रभूत

प्रभूत = प्रकृष्ट भूत = स्थूलभूत या महाभूत। क्षिति (पृथ्वी), अप् (जल), तेजः, मरुत् (वायु) और व्योम (आकाश) में शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध गुणों के यथाक्रम पाँच, चार (गन्धवर्जित), तीन (गन्ध-रसवर्जित), दो (गन्ध-रस-रूप-वर्जित) एवं एक गुण (शब्द) ही हैं – ऐसा जब माना जाता है तो वह प्रभूत का स्वरूप होता है। यह प्रभूत भूत (तत्त्व) से स्थूल है। प्रभूत को कोई-कोई ‘पंचीकृत भूत’ समझते हैं। इस दृष्टि के अनुसार क्षिति या पृथ्वी में अर्धांश गन्ध है और बाकी अर्धांश में अन्य चार गुण समान परिमाण में हैं। अप् या जल का अर्धांश रस है, बाकी अर्धांश में अन्य चार गुण हैं। इस प्रकार तेजः, वायु और आकाश के विषय में भी समझना चाहिए। प्रभूत का उल्लेख सांख्यकारिका (का. 39) में है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रभ्वनिंगितार्थ त्याग

प्रभु द्वारा असंकेतित जो विषय है, उसका परित्याग प्रभ्वनिंगितार्थ त्याग है। पुष्टिमार्ग में भगवान् द्वारा भक्त अंगीकृत हो जाता है। वैसी स्थिति में उस भक्त द्वारा तीन गुण अपनाए जाते हैं – स्नेह, त्याग और भजन। इनके अतिरिक्त अन्य गुण प्रभ्वनिंगितार्थ हैं। अतः प्रभु द्वारा अनिंगित -असंकेतित होने से उक्त तीनों गुणों से अतिरिक्त सभी विषय परित्याग करने योग्य हैं (अ.भा.पृ. 1306)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

प्रमा

प्रमाण के फल को प्रमा कहते हैं। प्रमाण प्रकाश रूप होता है और उसी की विमर्शरूपता को प्रमा या प्रमिति कहते हैं। शैव दर्शन में इसे स्वात्मविश्रांति के रूप में ठहराया गया है। तदनुसार प्रमाण के द्वारा जब प्रमाता प्रमेय के विषय में निश्चय कर लेता है कि यह अमुक वस्तु है और अमुक स्वभाव की है तो तदनंतर उसे एक या संतोषमयी विमर्शात्मिक स्वात्मविभ्रांति का उदय हो जाता है जिसमें प्रमेय और उसका निश्चय दोनों ही प्रमाता के स्वरूप में ही समा जाते हैं। उसका आकार यह होता है – अमुक वस्तु को मैंने जान लिया या अमुक वस्तु के विषय में मैं ज्ञानवान हो गया। प्रमाण के व्यापार में प्रमेय के स्वरूप और स्वभाव के निश्चय की प्रधानता होती है कि यह अमुक वस्तु है। परंतु प्रमा की अवस्था में उस निश्चयात्मक ज्ञान के स्वामी अहंरूपी आत्मा ही की प्रधानता होती है; प्रमेय की या प्रमाण की नहीं। ऐसी प्रमातृ विश्रांति को प्रमा कहते हैं। प्रमा तभी तक प्रमा बनी रहती है जब तक किसी अन्य प्रमाण से उसकी यथार्थता बाधित न हो जाए। बाधित हो जाने पर उसका प्रमाभाव पूर्वकाल से लेकर ही उखड़ जाता है। (देखिएप्रमाण)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रमाण

प्रमाणसम्बधी विचार सांख्ययोग का एक मुख्य विषय है। प्राचीनतम ग्रन्थों (जैसे षष्टितन्त्र) में प्रमाण सम्बन्धी जो विचार था, वह उन ग्रन्थों का नाश हो जाने के कारण जाना नहीं जा सकता। तत्त्वसमास-सूत्र में ‘त्रिविधं प्रमाणम्’ (21) इतना ही कहा गया है; इसकी व्याख्याएँ भी अर्वाचीन हैं तथा भिक्षु आदि की व्याख्या का ही अनुसरण करती हैं। योगसूत्र (1/7), सांख्यकारिका (4-5) तथा सांख्यसूत्र (1/87) में प्रमाण -सम्बन्धी जो सांख्यमत हैं, वह टीकाकारों की दृष्टि के अनुसार यहाँ संक्षेपतः दिखाया जा रहा है। प्रमेय पदार्थों की सिद्धि (सत्ता का निश्चय) प्रमाण से होती है – यह माना जाता है (द्र. कारिका 4)।
प्रमाण के विषय में सूक्ष्मदृष्टि से विचार वाचस्पति ने तत्त्वकौमुदी -टीका में किया है। प्रमा का जो करण है, वह प्रमाण है। यह प्रमा (सम्यक्ज्ञान) दो प्रकार का है – मुख्य तथा गौण। गौण प्रमा इन्द्रिय अर्थ सन्निकर्षजन्य होती है। यह असन्दिग्ध, अविपरीत एवं अनधिगतविषयक चित्तवृत्ति है। मुख्य प्रमा को पौरुषेय बोध कहते हैं, जो चित्तवृत्ति का फलभूत है; यह पौरुषेयबोध पुरुष में उपचरित होता है, यद्यपि यह भी बुद्धि की ही वृत्ति है। गौण प्रमा का करण है सन्निकर्षयुक्त इन्द्रिय; उसी प्रकार मुख्य प्रमा का करण है – चित्तवृत्ति। सांख्यकारिका एवं योगसूत्र में चित्तवृत्ति -विशेष को ही प्रमाण माना गया है। यह प्रमाणरूप चित्तवृत्ति अध्यवसाय ही है; युक्तिदीपिका के अनुसार यह प्रमाण का प्रमारूप फल पुरुषाश्रित है।
अनधिगत अर्थ का अवधारण प्रमा है; यह बुद्धि – पुरुष दोनों का धर्म भी हो सकता है, अथवा किसी एक का। द्र. सांख्यसूत्र 1/87। इस सूत्र की व्याख्या में भाष्यकार ने उपर्युक्त दोनों प्रकार की प्रमा का उल्लेख किया है तथा इन्द्रियसन्निकर्ष को गौण प्रमाण एवं बुद्धिवृत्ति को मुख्यप्रमाण कहा है। भिक्षु चूंकि इन्द्रिय-सन्निकर्ष को गौण प्रमाण कहते हैं; अतः चक्षु आदि इन्द्रियाँ उनके मत में परम्परया ही प्रमाण हैं। सांख्यकारिका की माठरवृत्ति, गौडपादभाष्य, जयमङ्गला-टीका में प्रमाण पर साधारण बातें कही गई हैं। युक्तिदीपिकाकार कहते हैं कि प्रमाण वस्तुतः एक है; एक ही बुद्धिवृत्तिरूप प्रमाण उपाधिभेद से तीन प्रकार की हो जाती है। 1/7 योगसूत्र की व्याख्या में वाचस्पति ने प्रमा -प्रमाण के विषय में जो कहा है, वह तत्त्वकौमुदी में कथित मत ही है; सांख्यभाष्य में प्रतिपादित मत ही 1/7 योगसूत्रीय भिक्षुटीका में मिलता है।
प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम के भेद से यह प्रमाण त्रिविध है (द्र. प्रत्यक्ष आदि शब्द)। उपमान, अर्थापत्ति, संभव, अभाव, ऐतिह्य आदि प्रमाणों का अन्तर्भाव इन तीन प्रमाणों में हो जाता है, जैसा कि सांख्यकारिका (4-5) की व्याख्या में व्याख्याकारों ने दिखाया है। प्रमाण चूंकि अध्यवसायरूप है, अतः सभी प्रकार के जीवों में प्रमाण -रूप चित्तवृत्ति है; भले ही हमारी लौकिक दृष्टि में सभी प्राणियों में विद्यमान प्रमाणवृत्ति का स्फुट ज्ञान न होता हो।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रमाण

1. देखिए सूर्य।
2. लौकिक – उस ऐंद्रियिक संवेदन, मानस बोध, अनुमान, शाब्द बोध आदि वस्तु को व्यवहार में प्रमाण कहते हैं जिसके द्वारा किसी प्रमेय के स्वरूप की व्यवस्था हो जाए कि यह अमुक वस्तु है या उसके स्वभाव की व्यवस्था हो जाए कि यह ऐसी या वैसी वस्तु है। प्रमाण रूप ज्ञान क्षणिक होता है। उसका प्रति क्षण उदय और लय होता रहता है। उसके संस्कार प्राणी में अंकित होकर रहते हैं। एक एक प्रमाण रूप ज्ञान का विषय एक एक वस्तु होती है जिसके लिए एक एक शब्द का प्रयोग किया जाता है। प्रमाण तभी तक प्रमाणरूपतया स्मृति के क्षेत्र में ठहरता है जब तक उसकी अपनी मान्यता किसी और बलवान् प्रमाण से बाधित न होने पाए। बाधित हो जाने पर उसकी प्रमाणता पूर्वकाल से ही उखड़ जाती है। प्रमाण वस्तु के और उसकी विशेषताओं के प्रकाश को कहते हैं और उनके विमर्श को प्रमा कहते हैं।
माया क्षेत्र में ही प्रमाण का प्रशासन चलता है। माया से ऊपर जो परमेश्वर रूप मूल तत्त्व है वह कभी भी लौकिक प्रमाणों का विषय नहीं बन सकता है। वह तो स्वयं अपने ही प्रकाश से प्रकाशमान बना रहता है। शास्त्रज्ञान और योगाभ्यास भी उसे प्रकाशित नहीं कर सकते। ये उपाय साधक को उस स्थिति पर पहुँचा सकते हैं जहाँ वह स्वयं अपने वास्तविक स्वभावभूत परमेश्वरता के रूप में स्वयं अपने ही प्रकाश से चमकता रहता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रमाण संकर

एक विषय में अनेक प्रमाणों का सांकर्य होना अर्थात् मिल जाना प्रमाण संकर है। जैसे, साक्षात्कार के प्रति शब्द को भी जनक मानने में प्रत्यक्ष और शब्द दोनों प्रमाणों का संकर हो जाता है। एक दूसरे के अभाव में रहने वाले दो धर्मों का किसी एक स्थान में समावेश हो जाना संकर है। इसके अनुसार प्रत्यक्ष और शब्द इन दोनों प्रमाणों का सांकर्य हो जाता है। क्योंकि अत्यंत असत् आकाशपुष्प आदि अर्थ में प्रत्यक्ष प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं है, किन्तु शब्द प्रमाण वहाँ भी ज्ञान का जनक होता है, जैसा कि “अत्यंतासत्यापि ह्यर्थे ज्ञानं शब्दः करोतिहि” ऐसा कहा गया है (एवं शब्द प्रमाण का प्रयोग हुए बिना भी प्रत्यक्ष प्रमाण से घटादि वस्तु का ज्ञान होता है। किन्तु ‘तत्त्वमसि’ वाक्य स्थल में शब्द प्रमाण प्रयुक्त शाब्दत्व धर्म और प्रत्यक्ष प्रमाण प्रयुक्त साक्षात्कारत्व धर्म इन दोनों का एक जगह समावेश स्वीकार करने से प्रमाण संकर हो जाता है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

प्रमाता

शैव और शाक्त दर्शन में प्रमाता के सात भेद किये गये हैं। ये हैं – शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, मन्त्र, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल। शिव और शक्ति तत्त्व मिलकर शिव प्रमाता का रूप धारण करते हैं। इसकी स्थिति राजा के समान है। सदाशिव मन्त्रमहेश्वर, ईश्वर मन्त्रेश्वर और शुद्धविद्या मन्त्र के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनकी स्थिति अधिकारी राजपुरुष की सी है। विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल जीवों पर ये शिव प्रमाता रूपी राजा के प्रतिनिधि होकर शासन करते हैं। मायीय, कार्म और आणव- ये तीन प्रकार के मल माने गये हैं। इनमें से मायीय मल से आवृत विज्ञानाकल, दो मलों से आवृत प्रलयाकल और तीनों मलों से आवृत सकल प्रमाता कहे जाते हैं। ये सभी भेद परिमित प्रमाता के हैं। प्रथम चार भेद शुद्धि सृष्टि के और अन्तिम तीन अशुद्ध सृष्टि के अन्तर्गत हैं। अशुद्ध सृष्टि के प्रमाताओं को ही अपने मलीय आवरणों को हटाने के लिये उपायों का सहारा लेना पड़ता है।
विरुपाक्षपंचाशिका की 41-44 कारिकाओं में अप्रबुद्ध, प्रबुद्धकल्प, प्रबुद्ध, सुप्रबुद्धकल्प और सुप्रबुद्ध नामक पाँच प्रकार के प्रमाताओं का विवेचन किया गया है। स्पन्दकारिका (श्लो. 17, 19-20, 25, 44) में भी अप्रबुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध प्रमाताओं का स्वरूप वर्णित है।
Darshana : शाक्त दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App