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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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प्रकृतिविकृति

सांख्यीय पच्चीस तत्त्वों में सात ऐसे हैं, जो प्रकृतिविकृति कहलाते हैं। ये हैं – अहंकार तथा पाँच तन्मात्र (शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध)। चूंकि ये सात अन्य तत्त्वों के उपादान हें, अतः प्रकृति कहलाते हैं, तथा ये किन्हीं तत्त्वों के कार्य भी हैं, अतः विकृति (विकार) भी कहलाते हैं। उदाहरणार्थ – महत्ततत्व अहंकार की प्रकृति (उपादान) है, अहंकार पाँच तन्मात्रों की प्रकृति है; पंचतन्मात्र पंचभूतों की; इसी प्रकार महत् प्रकृति की विकृति (= विकार, कार्य) है, अहंकार महत् की, तन्मात्र अहंकार की। इस प्रकार उपर्युक्त सात तत्त्व प्रकृतिविकृति कहलाते हैं (द्र. सांख्यकारिका 3)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रचारसंवेदन

परशरीरावेश (दूसरे के शरीर में प्रवेश) नामक सिद्धि के दो उपायों में से यह एक है (योगसूत्र 3/38)। प्रचार का अर्थ है – नाडी; प्रचार में संयम करना प्रचारसंवेदन है। चूंकि नाडीमार्ग से ही कोई दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकता है, अतः उपर्युक्त सिद्धि के लिए प्रचार में संयम करना आवश्यक होता है – यह व्याख्याकारों का कहना है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रच्छर्दन

कोष्ठगत वायु (यहाँ कोष्ठ = उरोगुहा है, क्योंकि श्वास-वायु फुफ्फुस से ही सम्बन्धित है) का दोनों नासिकापुटों के द्वारा निष्कासन करना (योगशास्त्रीय प्रयत्नविशेष के बल पर) प्रच्छर्दन कहलाता है (द्र. योगसूत्र 1/34; भाष्य भी)। किसी-किसी व्याख्याकार के अनुसार एक-एक नासिकापुट से भी प्रच्छर्दन-क्रिया की जा सकती है, जिस प्रच्छर्दन (विधारण के साथ) के द्वारा चित्त ‘स्थिति’ की ओर अग्रसर होता है, वह एक निश्चित प्रकार के प्रयत्न के द्वारा अभ्यसनीय है, जो गुरुपरंपरागम्य है। प्रर्च्छदन के लिए कभी-कभी प्रश्वास शब्द भी प्रयुक्त होता है (द्र. 2/49 व्यास भाष्योक्त प्रश्वासलक्षण)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रज्ञा

प्रज्ञा’ को योगशास्त्र में ‘उपायप्रत्यय’ के रूप में माना गया है (योगसूत्र 1/20)। इस सूत्र से यह भी ज्ञात होता है कि यह प्रज्ञा समाधि से उत्पन्न होती है। भाष्यकार ने प्रज्ञा को प्रज्ञाविवेक कहा है, जो प्रज्ञा के स्वरूप को दिखाता है। प्रत्येक वस्तु में त्रिगुण का सन्निवेश कैसा है, यह जानकर वस्तु के स्वरूप की अवधारण करना प्रज्ञा है। इससे वस्तु को यथार्थ रूप से जाना जाता है (येन यथार्थ वस्तु जानाति, भाष्य 1/27 तथा 2/45)। यही कारण है कि बुद्धि-पुरुषभेद-ज्ञान भी प्रज्ञा ही कहलाता है। इस प्रज्ञा की ही एक उत्कृष्ट अवस्था ‘ऋतंभरा’ है (द्र. योगसूत्र 1/48)। जिस प्रकार अज्ञान का संस्कार होता है, उसी प्रकार प्रज्ञा का भी संस्कार होता है। ये संस्कार ही व्युत्थान -संस्कार को अभिभूत करता है। परवैराग्य के द्वारा इस प्रज्ञा-संस्कार का भी निरोध होता है। समाधिज प्रज्ञा के एक सप्तधाविभाग का उल्लेख 2/27 योगसूत्र में मिलता है। इसको ‘प्रान्तभूमि’ प्रज्ञा कहते हैं। द्र. प्रान्तभूमिप्रज्ञा, प्रज्ञाज्योति एवं आलोक शब्द।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रज्ञाज्योति

प्रज्ञाज्योतिः योगियों के चार प्रकारों में से तीसरा है (द्र. व्यासभाष्य 3/51)। इस प्रकार के योगी भूतजयी एवं इन्द्रियजयी होते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रज्ञालोक

संयम-जय (संयम पर आधिपत्य या संयम का स्थैर्य) होने पर प्रज्ञा-लोक (= समाधिजात प्रज्ञा का प्रकर्ष) होता है (योगसूत्र 3/5)। संयम के विकास के साथ-साथ प्रज्ञा का भी प्रकर्ष या वैशद्य (= अधिकतर सूक्ष्मार्थ -प्रकाशन) होता रहता है। ज्ञानशक्ति का स्थैर्य होने के कारण वह ध्येय विषय में प्रतिष्ठित हो जाती है, अतः संयम से प्रज्ञा का उत्कर्ष होता है। (आलोक यहाँ तेजसपदार्थ-विशेष नहीं है; आलोक=प्रकाशन -सामर्थ्य है – आ = चारों ओ; लोक = लोकन = अवलोकन।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रणव

प्रणव’ का अर्थ ओंकार है (योगसू. 1.27, 28)। चूंकि इसके द्वारा सम्यक् रूप से स्तुति की जाती है, अतः ओंकार प्रणव कहलाता है (प्रणूयते अनेनेति प्रणवः) – ऐसा व्याख्याकार कहते हैं। प्रणव को अनादिमुक्त ईश्वर का वाचक माना गया है। व्याख्याकार कहते हैं कि इस सर्ग की तरह अतिक्रान्त सर्गों में भी प्रणव ईश्वर का वाचक था और आगे भी रहेगा। प्रायेण यह माना जाता है कि प्रणव सार्ध -त्रिमात्र है अर्थात् प्रणव में 3 1/2 मात्राएँ हैं। प्रणव का जप (ध्वनि का उच्चारण) एवं प्रणवार्थ की भावना (= चिन्तन) से ईश्वर का प्रणिधान करना सहज होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रणव कला

प्रणव की बारह कलाओं का विवेचन स्वच्छन्द तन्त्र (4/254-286) में एकादशपदिका प्रकरण में और तैत्रतन्त्र के 21 वें अधिकार (पृ. 285-296) में मिलता है। विज्ञानभैरव के टीकाकार शिवोपाध्याय ने 42वें श्लोक की व्याख्या में बताया है कि अकार की नाभि में, उकार की हृदय में, मकार की मुख में, बिन्दु की भ्रूमध्य में, अर्धचन्द्र की ललाट में, निरोधिनी की ललाट के ऊर्ध्व भाग में, नाद की शिर में, नादान्त की ब्रह्मरन्ध्र में, शक्ति की त्वक् में व्यापिनी की शिखा के मूल में, समना की शिखा में और उन्मना की स्थिति शिखा के अन्तिम भाग में है। इनमें से बिंदु से लेकर उन्मना पर्यन्त 9 कलाओं का प्रणव के समान कामकला प्रभृति बीजाक्षरों, नवात्म प्रभृति पिण्ड मन्त्रों तथा ह्रींकार (शाक्त प्रणव), हूंकार (शैव प्रणव), प्रभृति बीज मन्त्रों के उच्चारण में भी होता है। योगिनीहृदय के दीपाकारोSर्धमात्रश्व से लेकर तथोन्मनी निराकारा (1/28-35) पर्यन्त श्लोकों में इनका आकार, स्वरूप, उच्चारण काल और स्थान वर्णित है। योगिनीहृदय के आधार पर यह विषय वरिवस्यारहस्य में भी प्रतिपादित है। इस ग्रन्थ के (अड्यार लाइब्रेरी, मद्रास) संस्करण के अन्त में दिये गये एक चित्र में इनके आकार को दिखाया गया है।
योगिनीहृदय के अनुसार बिन्दु का स्वरूप दीपक के समान प्रभास्वर है। ललाट में गोल बिंदी के रूप में इसकी भावना की जाती है और उसका उच्चारण काल अर्धमात्रा है। ‘अर्धमात्रास्थिता’ (1/74) प्रभृति दुर्गा सप्तशती के श्लोक की व्याख्या (गुप्तवती) में भास्करराय ने “अनुच्चार्या अर्धचन्द्रनिरोधिन्यादि-ध्वन्यष्टकरूपा” ऐसा कहकर अर्धमात्रा में ही सबकी स्थिति मानी है। हस्व स्वर का उच्चारण काल ‘मात्रा’ कहलाता है। इसका आधा काल बिन्दु के उच्चारण में लगता है। अर्धचन्द्र का आकार बिन्दु के आधे भाग के जैसा होता है। दीपक के समान प्रभास्वर स्वरूप के अर्धचन्द्र की भावना बिन्दु स्थान ललाट में ही कुछ ऊपर की ओर की जाती है। इसका उच्चारण काल मात्रा का चतुर्थ भाग है। निरोधिका (निरोधिनी) का आकार तिकोना है। यह चाँदनी के समान चमकता है। इसका उच्चारण काल मात्रा का आठवाँ भाग है। उज्ज्वल मणि के समान कान्ति वाले नाद का आकार दो बिन्दु और उसके बीच में खिंची सीधी रेखा के समान है। इसका उच्चारण काल मात्रा का सोलहवाँ भाग है। विद्युत के समान कांति वाले नादान्त का आकार हल सरीखा है और इसकी बाईं तरफ एक बिन्दु रहता है। इसका उच्चारण काल मात्रा का बत्तीसवाँ भाग है। दो बिन्दुओं में से बायें बिन्दु से एक सीधी रेखा खींचने पर शक्ति की आकृति बनती है। व्यापिका (व्यापिनी) का आकार बिन्दु के ऊपर बने त्रिकोण का सा है। एक सीधी रेखा के ऊपर और नीचे बिन्दु बैठा देने से समना का और एक बिन्दु के ऊपर सीधी रेखा खींचने से उन्मना का आकार बनता है। शक्ति से लेकर समना पर्यन्त कलाओं का स्वरूप द्वादश आदित्यों के एक साथ उदित होने पर उत्पन्न हुए प्रकाश के समान है। शक्ति का उच्चारण काल मात्रा का 64 वाँ भाग, व्यापिका का 128 वाँ भाग, समना का 256 वाँ भाग और उन्मना का 512 वाँ भाग होता है। अन्य आचार्यों के मत से उन्मना कला मन से अतीत होती है। अतः इसका कोई आकार नहीं होता। विज्ञानभैरव के 42 वें श्लोक के ‘शून्या’ शब्द से उन्मनी का बोध कराया गया है।
माण्डूक्यकारिका (1/29) में प्रणव (ऊँकार) को अमात्र और अनन्तमात्र कहा गया है। भाष्यकार शंकराचार्य ने बताया है कि तुरीयावस्थापन ऊँकार अमात्र माना जाता है और अन्य अवस्थाओं में इसकी अनन्त मात्राएँ होती हैं। इन्हीं मात्राओं का तन्त्रशास्त्र में प्रणव कला के रूप में वर्णन है। निष्कल, निष्कलसकल और सकल के भेद से भी योगिनीहृदय (1/27-28) प्रभृति ग्रन्थों में इनका वर्णन मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

प्रणव कला

प्रणव परमेश्वर का वाचक है। प्रणव की उपासना में परमेश्वरता की सूक्ष्म सूक्ष्मतर विशेषताओं का साक्षात्कार होता है। प्रणव की ध्वनि की उत्तरोत्तर गूंज के अभ्यास के साथ ही साथ योगी उन सभी विशेषताओं का साक्षात्कार क्रम से करता जाता है। उस क्रम में सूक्ष्मतर उच्चारण काल के विभाग की कलना भी होती है। परब्रह्म की उन विशेषताओं का साक्षात्कार कराने वाली प्रणव की ध्वनि की गूंज की उन सूक्ष्मतर कलाओं को प्रणव की कलाएँ कहा जाता है। वे कलाएँ बारह हैं जो क्रम से – अकार, उकार, मकार, बिंदु, अर्धचंद्र, निरोधी, नाद, नादांत, शक्ति, व्यापिनी, समता और उन्मना हैं। बिंदु का काल आधी मात्रा है और उससे आगे वाली कलाएँ उत्तर उत्तर आधे – आधे काल की होती हैं। इस प्रकार के सूक्ष्म सूक्ष्मतर काल-विश्लेषण के सामर्थ्य का उदय शिवयोगी में ही होता है। अंतिम कला उन्मना ब्रह्म की वह विशेषता है जहाँ काल की कलना ही सर्वथा विलीन हो जाती है और अकालकलित शिवतत्त्व ही चमकता हुआ शेष रह जाता है। (स्व.तं. 9.4-225, 256)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रतिज्ञा दृष्टांतानुपरोध

श्रुति में निर्दिष्ट प्रतिज्ञा और दृष्टांत का बाध न होना प्रतिज्ञा दृष्टांतानुपरोध है। “उत तमादेशम प्राक्ष्यः येनाश्रुतं श्रुंत भवति” इत्यादि वचन प्रतिज्ञा का बोधक है। क्योंकि उक्त वाक्य में उस तत्त्व को बताने की प्रतिज्ञा की गयी है, जिसके जानने से अश्रुत भी श्रुत हो जाता है। एवं “यथैकेन मृत् पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं भवति” इत्यादि श्रुति वचन दृष्टांत का बोधक है। अर्थात् यदि ब्रह्म को जगत की प्रकृति न माना जाए तो श्रुत्युक्त प्रतिज्ञा और दृष्टांत बाधित हो जायेंगे। इस प्रसंग से ब्रह्म जगत् की प्रकृति (उपादान कारण) भी है, यह अवगत होता है (अ.भा.पृ. 530)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

प्रतिपक्षभावना

पाँच यम (अहिंसा आदि) एवं पाँच नियम (शौच आदि) के विरोधी हिंसा-अशौच आदि (वितर्कों) में जब चित्त में रुचि उत्पन्न हो तब प्रतिपक्षभावना (‘प्रतिपक्षभावन’ शब्द का भी प्रयोग होता है) करनी चाहिए – यह योगशास्त्र (2/33) की मान्यता है। हिंसा आदि चाहे स्वयंकृत हों, चाहे अन्य द्वारा कारित हों, चाहे अनुमोदित हों, वे दुःख और अज्ञान रूप फल को उत्पन्न अवश्य करेंगे, अतः वे आचरणीय नहीं हैं – ऐसी चिन्ता ही प्रतिपक्षभावना का मुख्य स्वरूप है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रतिप्रसव

प्रसव (= सृष्टि, जन्म) का विरोधी = प्रतिप्रसव। इसका नामान्तर है ‘प्रलय’ अर्थात् अपने कारण में लीन हो जाना। किसी सीमित काल के लिए लीन हो जाना या चिरकाल के लिए लीन हो जाना – दोनों ही प्रतिप्रसव हैं। ‘प्रत्यस्तमय’ शब्द भी कहीं-कहीं ‘प्रतिप्रसव’ के लिए प्रयुक्त होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रतिबन्ध

सांख्यसूत्र (1/100) में ‘प्रतिबन्ध’ शब्द का अर्थ ‘व्याप्ति’ (=नियत -साहचर्यनियम) है। लिङ्गदर्शन से प्रतिबन्ध की स्मृति होने पर पक्ष में साध्य की अनुमिति होती है, जैसे पर्वत (पक्ष) में धूम (लिङ्ग) को देखने पर ‘जहाँ धूम है वहाँ अग्नि है’ इस व्याप्ति का स्मरण होकर पर्वत में अग्नि की अनुमिति होती है। सांख्ययोग के ग्रन्थों में अन्यत्र कहीं भी इस शब्द का प्रयोग न रहने पर भी न्याय के ग्रन्थों में यह शब्द व्याप्ति-अर्थ में बहुशः प्रयुक्त हुआ है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रतिबिंबवाद

वह वाद, जिसके अनुसार संपूर्ण विश्व परमशिव की शुद्ध एवं परिपूर्ण संविद्रूपता में दर्पण प्रतिबिम्ब न्याय से चमकता हुआ ठहरता है। जो कुछ भी जिस भी रूप में आभासित होता है वह उसी संविद्रूपता में आभासित होता है। इस प्रकार उससे भिन्न रूप में बाह्यरूपतया कुछ भी स्थित नहीं है। (तें.आ.वि.खं. 2, पृ. 32)। जिस प्रकार दर्पण में कोई भी प्रतिबिंब विपरीत रूप में प्रकट होता है, अर्थात् दायाँ बायाँ दिखाई देता है तथा बायाँ दायाँ दिखाई देता है, उसी प्रकार यह संपूर्ण विश्व भी परमशिव के प्रकाश रूप दर्पण में प्रतिबिंबित होता हुआ विपरीततया ही प्रकट होता है। यह वस्तुतः शुद्धि ‘अहं’ स्वरूप चिद्रूपप्रमता है, परंतु ‘इदं’ के रूप में अचिद्रूपतया और प्रमेयरूपतया दीखता है। यही इस प्रतिबिंब की प्रतीयता या उल्टापन है। यही भेदावभासन की प्रक्रिया है। समस्त विश्व को उसी के प्रतिबिंब के रूप में समझना मोक्ष है तथा भेद के रूप में समझना बंधन है। वस्तुतः दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही वस्तु के प्रतिबिंब की दर्पण से भिन्न कोई अलग सत्ता नहीं है। उसी प्रकार परमशिव की संविद्रूपता में प्रतिबिंबित हो रहे समस्त विश्व की संविद्रूपता से भिन्न कोई अलग सत्ता नहीं है। दर्पण एक जड़वस्तु है, परंतु संवित् चेतना है, प्रकाश और विमर्श का परिपूर्ण सामरस्य है। दर्पण किसी बिंब रूप वस्तु के सामने आने पर ही प्रतिबंब को ग्रहण कर सकता है; उसके बिना नहीं। परंतु संवित् एक चिद्रूप तथा स्वतंत्र दर्पण है, अतः अपनी ही शक्तियों के प्रतिबिंबों को अपने ही भीतर प्रकट करता रहता है। उसी की शक्तियों के प्रतिबिंब छत्तीस तत्त्वों के रूप में प्रमेयतया प्रकट होते रहते हैं और उसी की इच्छा से ऐसा होता रहता है। (वही पृ. 30; तं.आ. 3-4 से 8)। इस प्रकार शैव दर्शन के अनुसार परमशिव ही इस प्रतिबिंब न्याय से अपनी परिपूर्ण स्वातंत्र्य शक्ति द्वारा बिम्ब एवं प्रतिबिंब आदि के चित्र विचित्र रूपों में सतत रूप से अवभासित होता रहता है। (वी.पृ. 12)। इस तरह से जगत की सृष्टि प्रतिबिंब न्याय से ही हुआ करती है। ऐसा सृष्टि सिद्धांत ही शैवदर्शन का प्रतिबिंबवाद है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रतिष्ठा कला

तत्वों के सूक्ष्म रूपों को कला कहते हैं। एक एक कला कई एक तत्त्वों को व्याप्त कर लेती है। जल तत्त्व से लेकर पृथ्वी तत्त्व तक की समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म सृष्टि को व्याप्त करने वाली कला को प्रतिष्ठा कला कहते हैं। इस कला पर समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म प्रपंच प्रतिष्ठित हो कर रहता है। (तं.सा.पृ. 109)। प्रतिष्ठा कला को प्राकृत अंड भी कहते हैं। (तं.सा.पृ. 110)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रतिष्‍ठा कला

देखिए ‘कला’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

प्रतिष्ठित स्पंद

देखिए सामान्य स्पंद।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रतीकालंबन

ब्रहमत्व की भावना से रहित प्रतीकमात्र जिसकी उपासना का विषय है, वह प्रतीकालंबन उपासक है अर्थात् सिद्धांत में श्रुतियाँ सर्वत्र ब्रह्मत्व रूप से ही उपासना का विधान करती हैं क्योंकि सभी उपास्य भगवद् विभूति रूप होने से शुद्ध ब्रह्मरूप हैं। किन्तु प्रतीकालंबन उपासकों की मान्यता के अनुसार उन उपास्यों में ब्रह्मत्व ज्ञान किए बिना भी की गयी उपासना को श्रुतियाँ सफल तो बताती हैं किंतु वे उपास्य ब्रह्मरूप हैं, ऐसा नहीं बतातीं। इस प्रकार की मान्यता वाले उपासक प्रतीकालंबन कहे गए हैं। इनके अनुसार प्रतीक की अपने रूप में उपासना भी निरर्थक नहीं हैं।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

प्रतीकोपासना

अतद्रूप की तद्रूप में उपासना प्रतीकोपासना है। जैसे, ‘मनो ब्रह्म इत्युपासीत’ यहाँ ब्रह्म भिन्न मन की ब्रह्म रूप में उपासना प्रतिकोपासना है तथा इस प्रकार प्रतीक का आलंबन कर ब्रह्म की उपासना करने वाले उपासक प्रतीकोपासक हैं (अ.भा.पृ. 1259)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

प्रत्यक्-चेतन

योगग्रन्थों में ‘प्रत्यक्चेतन’ शब्द ही प्रमुखतः प्रयुक्त होता है (क्वचित् ही प्रत्यक्चेतना शब्द प्रयुक्त हुआ है)। योगसूत्र 1/29 में यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। वाचस्पति के अनुसार विपरीत भाव का बोद्धा प्रत्यक् है; यह चेतन (अपरिणामी कूटस्थ ज्ञाता पुरुष) का विशेषण है, अतः प्रत्यक्चेतन का अर्थ होगा अचित् दृश्य का ज्ञाता अर्थात् अविद्यावान् पुरुष। भिक्षु कहते हैं कि प्रत्येक वस्तु में जो अनुस्यूत है, वह प्रत्यक् है, अर्थात् परमात्मा प्रत्यक् है। यह अर्थ वर्तमान सूत्र में अप्रयोज्य है – यह कई व्याख्याकारों ने भली-भांति दिखाया है। प्रत्यक्चेतन प्रत्यगात्मा भी कहलाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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