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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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पिण्ड

मालिनीविजय तन्त्र (2/36-45) तथा तन्त्रालोक (10/227-287) में जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत अवस्थाओं का निरूपण पिण्ड, पद, रूप, रूपातीत तथा महाप्रचय अथवा सततोदित अवस्था के रूप में किया गया है। यहाँ जीवात्मा को पिण्ड बताया गया है। पिण्ड, अर्थात् शरीर को ही जीवात्मा मानने वाला यह जीव अबुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध के भेद से चार प्रकार का होता है। मालिनीविजय में कुलचक्र की व्याप्ति के (19/30-48) और शिवज्ञान के प्रसंग (20/1-7, 18-26) में भी पिण्ड पद का विवरण मिलता है। जैन तन्त्र ग्रन्थ ज्ञानार्णव के 34 वे प्रकरण में पिण्डरूप ध्यान का वर्णन है। वहाँ इस ध्यान में पाँच प्रकार की धारणाएँ बताई गई हैं। योगिनीहृदय (1/42) में वर्णित है कि कन्द, अर्थात् पिण्ड में कामरूप पीठ की स्थिति है। दीपिकाकार ने पिण्ड, अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति का स्थान मूलाधार बताया है। वहीं अन्यत्र (3/94) इसको विघ्नरूप माना है। इसलिये 3/137 की व्याख्या में अमृतानन्द द्वारा उद्धृत एक प्रामाणिक वचन में बताया गया है कि इससे मुक्त होने पर ही वास्तविक मुक्ति मिलती है। कौलज्ञाननिर्णय में एक स्थान पर (पृ. 4) पिण्ड का अर्थ स्थान, दूसरे स्थान पर (पृ. 90) बद्ध आत्मा किया है। वहीं (पृ. 53) यह भी बताया गया है कि इसके आठ भेद होते हैं। आणव उपाय के प्रसंग में भी शब्द की चर्चा आ चुकी है।
Darshana : शाक्त दर्शन

पिधान कृत्य / विलय कृत्य

निग्रह कृत्य / परमेश्वर के सृष्टि, स्थिति आदि पाँच कृत्यों में से एक कृत्य। इसे परमेश्वर के स्वरूप को भुला डालने या छिपा देने की पारमेश्वरी लीला कहते हैं। इस कृत्य के प्रभाव से प्राणी अज्ञान के गर्त में और नीचे चला जाता है, शिष्य दीक्षा को प्राप्त करके भी निष्ठा और विश्वास को खो देता है; गुरु की, शास्त्र की, मंत्र आदि की अवहेलना, निंदा आदि करने लग जाता है। ऐसी प्रवृत्तियों का मूल कारण परमेश्वर का पिधान कृत्य होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पीठ

तन्त्रालोक (15/82-96) और उसकी जयरथ कृत टीका विवेक में बताया गया है कि आन्तर और बाह्य याग की निष्पत्ति के योग्य स्थान को पीठ कहा जाता है। पीठ भी बाह्य और आन्तर के भेद से द्विविध हैं। बाह्य पीठ की स्थिति बाहर देश विशेष में तथा आन्तरपीठ की स्थिति शरीर के भीतर स्थान विशेष में मानी गई है। भगवान् शिव की इच्छा शक्ति ही पीठ के रूप में परिणत होती है। बाह्य और आन्तर पीठस्थानों में उपासना के माध्यम से साधक अपने महतो महीयान संवित् स्वरूप की जानकारी प्राप्त कर सकता है। यह संवित्स्वरूपा शक्ति ही पीठ के रूप में परिणत होती है। शक्ति पीठ से बिन्दुमय और नादमय पीठ की अभिव्यक्ति होती है और ये ही तीन पीठ लोक में कामरूप, पूर्णगिरी और उड्डियान के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं।
पीठों के अतिरिक्त उपपीठ, सन्दोह, उपसन्दोह, क्षेत्र और उपक्षेत्रों का भी इसी क्रम से प्रादुर्भाव होता है। शाम्भव, शाक्त और आणव धाम का तथा पर्वताग्र, नदीतीर और एकलिंग का प्रादुर्भाव भी इन्हीं पीठों से होता है। तन्त्रालोक में कुल मिलाकर 33 या 34 पीठों का वर्णन मिलता है। कौलज्ञाननिर्णय में भी इनमें से कुछ का उल्लेख है। इसी तरह से तन्त्रालोक के 29 वें आह्निक में और बौद्ध सम्प्रदाय के हेवज्रतन्त्र के सप्तम पटल में भी इनका विवरण मिलता है। उक्त विभागों के अतिरिक्त यहाँ मेलापक और उपमेलापक, पीलव और उपपीलव, श्मशान और उपश्मशान के नाम से भी पीठों का विभाग वर्णित है। तन्त्रालोक और कौलज्ञाननिर्णय में तीन-तीन संख्या के क्रम से पीठ, उपपीठ आदि का वर्णन है। वहाँ जालन्धर का पीठ में अन्तर्भाव नहीं किया गया है। हेवज्रतन्त्र में चार-चार की संख्या के क्रम से ये वर्णित हैं। वहाँ जालन्धर का नाम पीठों में परिगणित है। साधनामाला नामक बौद्ध ग्रन्थ में उड्डियान, जालन्धर, कामरूप और श्रीहट्ट नामक चार पीठ उल्लिखित हैं। किन्तु अब बौद्ध तथा शैव-शाक्त सम्प्रदायों में कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओड्डियान नामक चार पीठ प्रसिद्ध हैं। उक्त सभी विभागों के अन्तर्गत वर्णित पीठों की संख्या 32 से 34 तक होती है।
योगिनीहृदय (3/37-43) के पीठन्यास प्रकरण में तथा प्रपंचसार की प्रयोगक्रमदीपिका (पृ. 579) में योगिनीन्यास के प्रसंग में 51 पीठों के नाम चर्चित हैं। ज्ञानार्णव तन्त्र (14/114-123) में यद्यपि 50 ही पीठ वर्णित हैं, किन्तु भास्करराय (सेतुबन्ध, पृ. 213) के अनुसार यहाँ भी 51 ही पीठ मान्य है। शास्त्रों में वर्णित है कि विष्णुचक्र से विच्छिन्न सती के अंग जहाँ जहाँ गिरे, उन स्थानों की पीठ संज्ञा हो गई। इनकी संख्या 51 मानी जाती है।
शारदातिलक की टीका में राघव भट्ट ने अष्टाष्टक, अर्थात् आठ अष्टकों के भेद से भैरव और योगिनियों के समान पीठों की संख्या भी 64 बताई है। वहाँ इनके नाम भी वर्णित हैं। देवीभागवत (7/30/44-50) में इन पीठों की संख्या 108 है। कुब्जिकातन्त्र के 7वें पटल में भी पीठों के शताधिक नाम हैं। डा. दिनेशचन्द्र सरकार ने पीठनिर्णय नामक लघुकाय ग्रन्थ के संपादन के प्रसंग में इस विषय पर विशद विचार प्रस्तुत किये थे। इसके लिये ‘दी शाक्त पीठाज्’ नामक ग्रन्थ देखना चाहिये।
महार्थमंजरीकार (पृ. 83, 95) इस शरीर को ही पीठ मानते हैं। यह स्थूल पीठ है। वृन्दचक्र सूक्ष्म पीठ और पंचवाह पर पीठ है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और पर के भेद से पीठ त्रिविध हैं। इस त्रिविध श्रीपीठ पर इष्टदेव की उपासना की जाती है (पृ. 83-96)।
(क) ओड्याण पीठ
योगिनीहृदय (1/41) में बताया गया है कि प्रकाश और विमर्श की प्रतीक शांता और अंबिका शक्ति के सामरस्य से ओड्याण पीठ की सृष्टि होती है। इसकी स्थिति शरीर में रूपातीत, निरंजन, चिन्मय तत्त्व, अर्थात् चिन्मयता की अभिव्यक्ति के स्थान ब्रह्मरंध्र में हैं। यह तेजस्तत्त्वात्मक है। इसका आकार त्रिकोणात्मक है। यह रक्त वर्ण का है। यह पीठ चितमय है। इस पर लिंग अवस्थित है। इस पीठ की बाह्य स्थिति के विषय में विवाद है। कुछ लोग उड़ीसा में तथा अन्य कश्मीर में इसकी स्थिति मानते हैं। इस पीठ में भगवती त्रिपुरसुन्दरी निवास करती है, अतः अन्तिम पक्ष ही उचित प्रतीत होता है। सिद्ध परम्परा में कश्मीर को मेधापीठ कहते हैं।
(ख) कामरूप पीठ
योगिनीहृदय (1/41) में बताया गया है कि प्रकाश और विमर्श की प्रतीक ज्ञाना और ज्येष्ठा शक्ति के सामरस्य से कामरूप पीठ की सृष्टि होती है। इसकी स्थिति शरीर में कन्द, पिण्ड, कुण्डलिनी के निवास स्थान मूलाधार में है, जो कि सुषुम्णा नाडी का भी मूल स्थान है। यह पृथ्वीतत्त्वात्मक है। इसका आकार चतुरस्त्र और वर्ण पीत है। यह पीठ मनोमय है। इसमें स्वयंभू लिंग अवस्थित हैं। कामरूप पीठ ही कामाख्या पीठ के नाम से भी प्रसिद्ध है। कालिकापुराण प्रभृति ग्रन्थों में इसका विस्तार से वर्णन मिलता है।
(ग) जालन्धर पीठ
योगिनीहृदय (1/41) में बताया गया है कि प्रकाश और विमर्श की प्रतीक क्रिया और रौद्री शक्ति के सामरस्य से जालन्धर पीठ की सृष्टि होती है। इसकी स्थिति शरीर में रूप बिन्दु, अर्थात् भ्रूमध्य में है। यह जलतत्त्वात्मक है। इसका आकार अर्धचन्द्र सदृश है। यह श्वेत वर्ण का है। यह पीठ अहंकारमय है। इसमें बाण लिंग की स्थिति मानी गई है। इस पीठ की अधिष्ठात्री देवी वज्रेश्वरी है। कांगड़ा में इस देवी का मन्दिर है। तन्त्रालोक की टीका में जयरथ ने श्रीशम्भुनाथ के नामोल्लेख के प्रसङ्ग में उसे जालन्धर पीठ का गुरू बताया है (त. असा. वि., खं. 1, पृ. 236)। चम्बा के संग्रहालय में जालन्धर पीठ दीपिका नामक पाण्डुलिपि विद्यमान है। तदनुसार जालन्धर पीठ का केन्द्र कांगड़ा में (वज्रेश्वरी स्थान) है और उसका विस्तार ज्वालामुखी, वैजनाथ (तारा), हडसर (बाला) और त्रिलोकनाथपुर तक है।
(घ) पूर्णगिरी पीठ
योगिनीहृदय (1/41) में बताया गया है कि प्रकाश और विमर्श की प्रतीक इच्छा और वामा शक्ति के सामरस्य से पूर्णगिरी पीठ की सृष्टि होती है। इसकी स्थिति शरीर में पद, हंस, अर्थात् प्राण के उद्भव स्थल हृदय में है। यह वायुतत्त्वात्मक है। इसका आकार वृत्ताकार स्थापित छः बिन्दुओं से बनता है। यह धूम्र वर्ण का है। यह पीठ बुद्धिमय है। इसमें इतर लिंग की स्थिति मानी गई है। कुछ लोग अल्मोड़ा के पास इस पीठ की स्थिति मानते हैं और अन्य कोल्हापुर स्थित महालक्ष्मी पीठ को ही उक्त नाम देते हैं। पूर्णगिरी पीठ की अधिष्ठात्री देवी भगमालिनी है। तदनुसार ही इस पीठ की बाह्य स्थिति निश्चित होनी चाहिये।
Darshana : शाक्त दर्शन

पीठ विभाग

डा. प्रबोध चन्द्र बागची ने अपने ग्रन्थ ‘स्टडीज इन दी तन्त्राज’ (पृ. 3) में ब्रह्मयामल के प्रमाण पर तन्त्रशास्त्र को विद्यापीठ, मन्त्रपीठ, मुद्रापीठ और मण्डलपीठ नामक चार विभागों में बाँटा है। भैरवाष्टक और यामलाष्टक का अन्तर्भाव विद्यापीठ में, योगिनीजाल, योगिनीहृदय, मन्त्रमालिनी, अघोरेशी, अघोरेश्वरी, क्रीडाघोरेश्वरी, लाकिनीकल्प, मारीचि, महामारी, उग्रविद्या गणतन्त्र का भी विद्यापीठ में और वीरभैरव, चण्डभैरव, गुडकाभैरव, महाभैरव, महावीरेश का मुद्रापीठ में समावेश बताया गया है। जयद्रथयामल विद्यापीठ से संबद्ध तन्त्र है। किन्तु स्वच्छन्दतन्त्र को चतुष्पीठ महातन्त्र कहा गया है। इसका अभिप्रायः यह निकाला जा सकता है कि स्वच्छन्दतन्त्र में उन सभी विषयों का समावेश है, जिनका कि वर्णन उक्त चतुर्विध तन्त्रों में मिलता है।
नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका में उद्धृत संकेतपद्धति के एक वचन में ओड्याण पूर्णगिरी, जालन्धर और कामरूप पीठ को क्रमशः आज्ञापीठ, मन्त्रपीठ, विद्यापीठ और मुद्रापीठ बताया गया है। इससे यह तात्पर्य निकाला जा सकता है कि उक्त चतुर्विध तन्त्रों का आविर्भाव इन चतुर्विध पीठों में हुआ था। तन्त्रालोक के 29वें आह्निक (पृ. 114) में भी उक्त चार पीठों में विभक्त शास्त्रों की चर्चा आई है। उससे ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे शैव और वैष्णव आगम ज्ञान, क्रिया, चर्या और योग नामक विभागों में विभक्त हैं, उसी तरह से शाक्त आगम भी विद्या, मन्त्र, मुद्रा और मण्डल विभागों में विभक्त थे, अर्थात् उन शैव वैष्णव और शाक्त आगमों में उक्त विषयों का प्रतिपादन किया गया था। तन्त्रालोक (37/24-25) में यह भी बताया गया है कि विद्यापीठ विभाग के अन्तर्गत आने वाले तन्त्रों में मालिनीविजयोत्तर तन्त्र प्रधान है।
Darshana : शाक्त दर्शन

पुत्रकदीक्षा

यह दीक्षा साधक को सद्यः आगे ले चलने वाली उत्कृष्ट प्रकार की क्रिया-दीक्षा होती है। इसमें बाह्य आचार के नियम ढीले पड़ जाते हैं और आंतरयोग का अभ्यास स्थिर होने लग जाता है। इस दीक्षा का पात्र बना हुआ शिष्य पुत्रक कहलाता है। ऐसा शिष्य उस गुरु के पुत्र तुल्य माना जाता है। (इसी दृष्टि से आ. अभिनव गुप्त ने लक्ष्मण गुप्त को उत्पलज अर्थात् उत्पन्न देव का पुत्र, और उत्पल देव को सोमानंदात्मज कहा है)। यह दीक्षा सभी पाशों से छुटकारा दिलाने वाली है तथा एकमात्र प्रारब्ध कर्म को छोड़कर शेष सभी भूत और भविष्यत् कर्मों का भी शोधन कर देती है। (तं.सा., 155-160)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पुरातनरु

तमिलनाडु प्रदेश में 63 शैवसंत हो गये हैं। इन संतों को ही कन्‍नड़ भाषा में ‘पुरातनरु’ कहा जाता है। इन सबका आविर्भाव-काल नवीं शताब्दी माना जाता है। इनमें अठारह ब्राह्मण, बारह क्षत्रिय, पाँच वैश्य, चौबीस शूद्र, एक हरिजन तथा तीन स्‍त्रियाँ हैं। इस प्रकार इन तिरसठ संतों में सभी वर्णो के स्‍त्री-पुरुष पाये जाते हें। तमिल भाषा में इन्हें ’63 नायनार्’ कहा गया है। बारहवीं सदी में तमिल भाषा के सुप्रसिद्‍ध कवि ‘शेक्‍किलार’ने ‘तिरुत्‍तोण्डार-पुराणम्’ या ‘पेरियपुराणम्’ नामक बृहद् ग्रंथ की रचना की, जिसमें इन 63 संतों का विस्तृत चरित्र पाया जाता है। इस ‘पेरिय पुराणम्’ को तमिल साहित्य का पाँचवाँ वेद कहा गया है।

इन संतों की जीवनी से ज्ञात होता है कि इनमें से कुछ शिवलिंग की पूजा से तथा अन्य गुरुजनों के ज्ञानोपदेश से मुक्‍त हो गये हैं। कर्नाटक के अनेक वीरशैव संत तथा कवियों ने इन शैव संतों की स्तुति की है तथा इनके चरित्र का वर्णन किया है। इससे यह ज्ञात होता है कि वीरशैव संतों पर उन पुरातन शैव संतों का गहरा प्रभाव रहा है। कन्‍नड़ भाषा में इन शैव संतों के चरित्र-प्रतिपादक अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं, उनमें वीरभद्र कवि का ‘अरवत्‍तु-मूवर-पुराण’, निजगुण शिवयोगी का ‘अरवत्‍तुमूरुमंदि-पुरातन-स्तोत्र’, अण्णाजी का ‘सौंदर-विलास’ आदि प्रसिद्‍ध है। उपमन्यु मुनि के ‘भक्‍तिविलास सम्’ नामक संस्कृत ग्रंथ में भी इन सबका चरित्र वर्णित है। (वी.त.प्र. पृष्‍ठ 212-220; द.भा.इ.पृष्‍ठ 320, 328)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

पुरुष

अन्तःकरण अथवा बुद्धि रूप पुरी में निवास करने के कारण निर्गुण बुद्धिसाक्षी आत्मा पुरुष कहलाता है। पुरुष न किसी का कार्य है और न किसी का कारण (‘नप्रकृति-नविकृति’) है। उपनिषदों का निर्गुण आत्मा (उपाधिहीन ब्रह्म) ही सांख्यीय पुरुष है। ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इस कठवाक्य (1/3/11) में जिस पुरुष का प्रतिपादन है, वही सांख्यीय पुरुष है। उपनिषदों के कुछ व्याख्याकार इस पुरुष को एक तथा सुखस्वरूप कहते हैं। सांख्यीय दृष्टि में पुरुष असंख्येय है तथा वह चिद्रूपमात्र है, सुखस्वरूप नहीं है। यह पुरुष स्वरूपतः सर्वज्ञ -सर्वशक्ति नहीं है; उपाधियोग से ही सर्वज्ञ -सर्वशक्ति होता है। अन्तःकरण या चित्त सदैव पुरुष के द्वारा ही प्रकाशित होता है – विषयों का ज्ञाता होता है; उपादान की दृष्टि से अन्तःकरण या चित्त जड़ त्रिगुण का विकार है। इस पुरुष को ही द्रष्टा, चित्ति, चित्तिशक्ति, भोक्तृशक्ति, भोक्ता, चैतन्य आदि शब्दों से कहा जाता है; कहीं-कहीं भोक्ता आदि शब्द पुरुष -प्रकृति -संयोग जीव को लक्ष्य कर भी प्रयुक्त होते हैं।
सांख्ययोगीय दृष्टि में यह पुरुष हेतुहीन, कूटस्थनित्य, व्यापी (=बुद्धिगत सभी विकारों का ज्ञाता), निष्क्रिय, एकस्वरूप (=एकाधिकभावहीन), निराधार, लयहीन, अवयवहीन, स्वतन्त्र, त्रिगुणातीत, असंग, अविषय (बाह्य-आभ्यन्तर इन्द्रियों का), असामान्य अर्थात् प्रत्येक, चेतन, अप्रसवधर्मा, साक्षी, केवल, उदासीन तथा अकर्त्ता है (द्र. सांख्यका. 10, 11, 19)।
सभी बुद्धियों के द्रष्टा (प्रकाशक) के रूप में एक ही पुरुष है – यह सांख्य नहीं मानता। प्रत्येक बुद्धिसत्व के द्रष्टा के रूप में एक-एक पुरुष है – यह सांख्यीय दृष्टि है। इस विषय में सांख्य की युक्तियाँ सांख्यका. 18 में द्रष्टव्य हैं। यदि पुरुष बहु नहीं होते, तो बहु बुद्धियों का आविर्भाव नहीं होता – यह सांख्य कहता है। योगदर्शन (2/20) में पुरुष (चितिशक्ति) को अनन्त (सीमाकारक हेतु न रहने के कारण), शुद्ध (अमिश्रित), दर्शितविषय, अपरिणामी एवं अप्रतिसंक्रम (प्रतिसंचारशून्य) कहा गया है। व्यक्त -अव्यक्त से पृथक् पुरुष की सत्ता जिन युक्तियों से सिद्ध होती है, उनका उल्लेख सांख्यकारिका 17 में है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

पुरुष तत्त्व

देखिए पुंस्तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पुरुषख्याति

पुरुष (तत्त्व) – विषयक ख्याति = पुरुषख्याति अर्थात् पुरुषविषयक प्रज्ञा (योगसू. 1.16)। पुरुष अपरिणामी, कूटस्थ, शुद्ध, अनन्त है तथा त्रिगुण से अत्यन्त भिन्न है – इस प्रकार का पुरुषस्वभाव-विषयक निश्चय ही पुरुषख्याति है। पुरुष (तत्त्व) बुद्धि का साक्षात् ज्ञेय विषय (घटादि की तरह) नहीं होता, अतः उपर्युक्त निश्चय आगम और अनुमान से होता है। पुरुषख्याति से सत्वादि गुणों के प्रति विरक्ति होती है; यह विरक्ति ही परवैराग्य कहलाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

पुरुषज्ञान

योगसूत्र (3/35) में पुरुषज्ञान के लिए जिस संयम का विधान किया गया है, उसका नाम स्वार्थसंयम है (बुद्धिसत्त्व परार्थ है, चित्त-स्वरूप द्रष्टा स्वार्थ है; अतः इस संयम का नाम ‘स्वार्थ संयम’ रखा गया है)। पुरुष (तत्त्व) चूंकि कूटस्थ-अपरिणामी है, अतः वह ज्ञान का वस्तुतः विषय नहीं हो सकता। पुरुष विषयी है; किसी भी प्रमाण से पुरुष साक्षात ज्ञात नहीं होता। अतः पुरुष-ज्ञान का तात्पर्य है – पुरुष के द्वारा चित्तवृत्ति का प्रकाशन होता है – इस तथ्य का अवधारण। चित्त में पुरुष का जो प्रतिबिम्ब है, उस प्रतिबिम्ब में संयम करने पर पुरुष सत्ता का ज्ञान होता है। कोई कहते हैं कि अपने में प्रतिबिम्बित बुद्धिवृत्ति का दर्शन करना ही पुरुष का पुरुषज्ञान है। यह मत कई आचार्यों को मान्य नहीं है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

पुरुषार्थ

जीवन की सार्थकता के लिए मानव द्वारा अर्थ्यमान (प्रार्थित) होने से पुरुषार्थ कहा जाता है। यद्यपि अन्यत्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक चार ही पुरुषार्थ माने गए हैं, किंतु वल्लभ दर्शन के अनुसार भक्ति भी एक स्वतंत्र पंचम पुरुषार्थ है और यह पुरुषार्थों में सर्वोत्कृष्ट है (भा.सु.11टी.स्क.10उ.पृ. 45)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पुरुषार्थ

सांख्ययोग में भोग और अपवर्ग को ‘पुरुषार्थ’ कहा जाता है। ये दो ज्ञान के विशेष प्रकार हैं। इष्ट-अनिष्ट-रूप से विषय का ज्ञान, जिसमें बुद्धिवृत्ति के साथ द्रष्टा का अभेद-प्रत्यय रहता है, भोग है और विषय से पृथक् विषयी, भोक्ता, निर्विकार पुरुष है – ऐसा विवेक अपवर्ग है (द्र. व्यासभाष्य 2/18)। पुरुष के हेतु (प्रयोजन) से ये दो सिद्ध होते हैं, अतः ये पुरुषार्थ कहलाते हैं। भोगापवर्ग ही करण – प्रकृति के मूल में है। जब तक भोगापवर्ग बुद्धि में रहेंगे, तब तक करणवर्ग कर्म करता रहेगा। चित्त का सदा के लिए निरोध होने पर भोगापवर्ग भी समाप्त हो जाते हैं। कुछ व्याख्याकार ‘निर्गुण पुरुष का अभीष्ट हैं’, अतः ये दो पुरुषार्थ कहलाते हैं – ऐसा कहते हैं। यह अशास्त्रीय दृष्टि है, क्योंकि पुरुष (तत्त्व) में इच्छा -संकल्पादि नहीं हैं। ये दो बुद्धिकृत, बुद्धिस्थ होने पर भी पुरुष में आरोपित होते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

पुरुषोत्तमानन्द

मानुषानन्द से लेकर ब्रह्मानन्द तक आनन्द की अनेक श्रेणियाँ हैं। इन सभी आनन्दों का उपजीव्य अर्थात् मूल स्रोत पुरुषोत्तमानन्द है। पुष्टि मार्ग में ब्रह्म से भी ऊँचा स्थान भगवान् पुरुषोत्तम का है। इसीलिए ब्रह्मानन्द से भी श्रेष्ठ पुरुषोत्तमानन्द माना गया है (अ.भा.पृ. 1184)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पुर्यष्टक

योगिनीहृदयदीपिका (पृ. 68, 284, 302) में चित्ति, चित, चैतन्य, चेतनाद्वय, कर्म, जीव कला और शरीर को सूक्ष्म पुर्यष्टक बताया है। स्पन्दकारिका (श्लो. 49) में पंचतन्मात्रा, मन, अहंकार और बुद्धि की समष्टि को पुर्यष्टक कहा गया है। भोजदेव कृत तत्त्वप्रकाश के टीकाकारों ने (पृ. 37-39) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मन, बुद्धि और अहंकार को पुर्यष्टक बताया है। मतान्तर में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, बुद्धिन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय और अन्तःकरण को पुर्यष्टक माना गया है। अन्य आचार्य कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, अन्तःकरण चतुष्टय, प्राणादि पंचक, तन्मात्रपंचक, काम, कर्म और अविद्या का समावेश पुर्यष्टक में करते हैं। अन्य व्याख्याकार सर्ग से लेकर कल्पान्त या मोक्षान्त तक स्थायी, प्रत्येक पुरुष के लिये नियत, पृथ्वी से लेकर कला तत्त्व पर्यन्त त्रिंशतत्त्वात्मक असाधारण स्वरूप वाले सूक्ष्म देह को पुर्यष्टक मानते हैं। सांख्यसंमत सूक्ष्म शरीर से इनकी तुलना की जा सकती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

पुर्यष्टक

सूक्ष्म शरीर। पाँच तन्मात्र तत्त्वों तथा बुद्धि, मन एवं अहंकार की क्रमशः सत्त्व, रज तथा तम – इन तीन वृत्तियों को मिलाकर आठ के समष्टि रूप सूक्ष्म शरीर या लिंग शरीर को पुर्यष्टक कहते हैं। स्थूल शरीर में भी इन आठ की इस समष्टि की समानता होने के कारण इसे भी कहीं कहीं पुर्यष्टक कहा जाता है। (स्पन्दविवृति पृ. 155, 156; ई.प्र.वि.खं. 2 पृ. 237)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पुष्टि

भगवान् का अनुग्रह पुष्टि है। “पोषणं तदनुग्रहः”। प्रयत्न साध्य शास्त्र विहित ज्ञान एवं भक्ति रूप साधन से होने वाली मुक्ति मर्यादा है, तथा इन साधनों से रहितों को स्वरूप बल से होने वाली भगवत्प्राप्ति पुष्टि है। यद्यपि अक्षर प्राप्ति भी मुक्ति है जो ज्ञानियों को प्राप्त होती है तथा भगवत्प्राप्ति भी मुक्ति है जो भक्तों को प्राप्त होती है। इस प्रकार ज्ञान और भक्ति से प्राप्त होने वाली ये दोनों ही मुक्तियाँ मर्यादा कही गयी हैं। किन्तु स्वरूप बल अर्थात् भगवदनुग्रह से होने वाली भगवत्प्राप्तिरूप मुक्ति पुष्टि है (प्र.र.पृ. 74)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पुष्टिपुष्टि

अतिशय भाव को प्राप्त जो भगवदनुग्रह है, उससे साध्य मुक्ति पुष्टि-पुष्टि है। अर्थात् भगवान् में लय मर्यादामार्गीय मुक्ति है तथा भगवान की नित्य लीला में अंतःप्रवेश पुष्टिमार्गीय मुक्ति है। किन्तु पुष्टि मर्यादा को भी अतिक्रान्त करके जिसमें प्रवेश हो जाने पर भक्त के लिए पुष्टिमार्गीय परम तत्त्व अनुभव का विषय बने, वह पुष्टिपुष्टि है। यह भगवान् के अतिशय अनुग्रह से साध्य है (अ.भा.पृ. 1317)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पुष्टिभक्ति

भगवान् के विशेषानुग्रह से उत्पन्न भक्ति पुष्टिभक्ति है तथा भगवदनुग्रह को प्राप्त भक्त पुष्टि भक्त है (प्र.र.पृ. 81)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पुष्टिमार्ग

जिसमें विषय के रूप में विषय का त्याग हो अर्थात् विषय में ममता का विरह हो और विषय को भगवदीय समझ कर ग्रहण किया जाए, वह मार्ग पुष्टिमार्ग है। (प्र.र.पृ. 113)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पुष्टिमार्ग मर्यादा

विहित साधन के बिना ही मुक्ति प्रदान की भगवान् की इच्छा पुष्टिमार्ग की मर्यादा है (अ.भा.पृ. 1314)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

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