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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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परामायाशक्ति

देखिए महामाया (परा); मायाशक्ति (परा)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परावस्था / दशा

शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण ‘अहम्’ की अवस्था। पूर्ण अभेद की अवस्था। पूर्ण अभेद की अवस्था। वह अवस्था, जिसमें परमेश्वर का समस्त शक्ति समूह तथा संपूर्ण सूक्ष्म एवं स्थूल प्रपंच परिपूर्ण सामरस्यात्मक संविद्रूपता में ही चमकता रहता है। इस पूर्ण अभेद की दशा में सभी कुछ परमशिव के ही रूप में परमशिव में ही निर्विभागतया चमकता है। इस अवस्था में विश्व रचना के प्रति किसी भी प्रकार की सूक्ष्मातिसूक्ष्म उन्मुखता भी उभरी नहीं होती है, केवल परिपूर्ण चिन्मात्र प्रकाशरूपता शुद्ध विमर्शात्मकतया असीम और अनवच्छिन्न ‘अहं’ के रूप में चमकती रहती है। (शि.दृ.वृ., पृ.7)। हाँ, समस्त सृष्टि-संहार-लीला का बीज उसी में अनभिव्यक्तता से विद्यमान रहता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परावाच् (वाणी)

शुद्ध तथा परिपूर्ण अहमात्मक परामर्शरूपिणी, असीम, शुद्ध तथा सूक्ष्मतर वाणी। अपनी परिपूर्ण शुद्ध संविद्रूपता का निर्विभागतया सतत प्रत्यवमर्श। जिस वाणी में पश्यंती, मध्यमा तथा वैखरी नामक तीनों वाणियाँ सामरस्य रूप में स्थित रहती हैं तथा जिसमें से अपने भिन्न भिन्न रूपों में अभिव्यक्त होती हैं। इस प्रकार यह तीनों वाणियों की पूर्ण सामरस्य की दशा है तथा शिव शक्ति के संघट्ट रूप परासंवित् में ही चमकती रहती हैं। (तं.आ.वि. 2 पृ. 225)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पराशक्ति

देखिए परादेवी।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पराहंभाव परामर्श

देखिए अहम् परामर्श।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परिकर्म

विक्षिप्त चित्त को समाहित करने के लिए चित्त-प्रसन्नता-कारक मैत्री आदि जिन चार आचरणों का उल्लेख योगसूत्र 1/33 में किया गया है, वे परिकर्म कहलाते हैं। परिकर्म का अर्थ है – ‘एकाग्रता-हेतुक चित्तसंस्कार’ अथवा ‘ऐसे संस्कार का निष्पादक आचरण’। प्रसन्नचित्त ही समाहित हो सकता है (प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते – गीता. 2/65)। इस दृष्टि से ये परिकर्म उपदिष्ट हुए हैं। समाधिसाधन की दृष्टि से परिकर्म बाह्य साधन है। परिकर्म से सात्विक शुद्धि होती है – शुक्ल धर्म की वृद्धि होती है और चित्त क्रमशः समाधि के मार्ग में प्रवृत्त होता रहता है। बौद्ध शास्त्र में इस आचरण को ‘ब्रह्मविहार’ कहा गया है। किसी प्राचीन सांख्याचार्य के एक वचन में (4/90 व्यासभाष्य में उद्धृत) मैत्री आदि के लिए ‘विहार’ शब्द प्रयुक्त हुआ है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परिणाम

जब किसी धर्मी (द्रव्य) में वर्तमान धर्म का नाश होकर अन्य धर्म उदित होता है, तब यह परिवर्तन ‘परिणाम’ कहलाता है। जिसका यह परिणाम होता है, वह परिणाम-भेद के कारण भिन्न नहीं होता – वह अवस्थित ही रह जाता है। सुवर्णरूप धर्मी के पिण्डाकार रूप धर्म के स्थान पर जब कुण्डल-रूप अन्य अवस्था उत्पन्न होती है, तब ‘सुवर्ण का परिणाम हुआ’ यह कहा जाता है। परिणाम का स्पष्ट लक्षण 3/13 व्यासभाष्य में इस प्रकार दिया गया है – अवस्थित (अपेक्षाकृत स्थिर) द्रव्य के पूर्व धर्म की निवृत्ति होने पर जो अन्य धर्म का आविर्भाव (उदय) होता है, वह परिणाम है। वास्तविक दृष्टि से परिणाम का अर्थ धर्मपरिणाम ही है। लक्षण -परिणाम और अवस्था -परिणाम नामक जो अन्य दो परिणाम योगशास्त्र में बताए गए हैं, वे धर्मपरिणाम पर आश्रित हैं।
तीनों परिणामों को इस प्रकार समझा जा सकता है – सुवर्ण-रूप धर्मी का जो वलय, कुण्डल आदि परिणाम होता है, वह धर्मपरिणाम का उदाहरण है। सुवर्णपिण्ड में वलयरूप धर्म अनागत रूप में रहता है; वह (स्वर्णकार के द्वारा) वलयरूप धर्म में वर्तमान (उदित) होता है और बाद में वलय नष्ट हो जाता है। यह जो वलय का अनागत-उदित-अतीत हो जाना रूप व्यापार है, यह लक्षण नामक परिणाम है। वर्तमान धर्म की नूतनता और पुरातनता अवस्था-परिणाम हैं। किसी वस्तु का हृस्व-दीर्घादि-रूप होना भी अवस्था-परिणाम है। त्रैगुणिक वस्तु का इस प्रकार परिणत होते रहना उसका स्वभाव है; कोई भी व्यक्ति किसी भी उपाय से किसी भी त्रैगुणिक वस्तु को परिणामहीन नहीं कर सकता। जो परिणाम अनागत (भविष्य) है, वह उपयोगी क्रिया द्वारा उदित (वर्तमान) अवश्य होगा और उदित वस्तु नूतन होने पर भी बाद में पुरातन होगी या उदित पदार्थ बलशाली होने पर भी बाद में उसके बल में परिवर्तन होगा। उदित (वर्तमान) वस्तु बाद में अवश्य नष्ट होगी।
कूटस्थनित्य पुरुष में परिणाम नहीं है, पर गुणत्रयरूपा प्रकृति परिणामशीला है। प्रकृति चूंकि नित्य है, अतः वह ‘परिणामिनी-नित्या’ है। प्रकृति से बुद्धि (महत्) रूप परिणाम जब नहीं होता तब भी उसमें परिणाम होता है (त्रिगुण के चलस्वभाव के कारण)। यह परिणाम ‘सदृश परिणाम’ कहलाता है। महत् आदि परिणाम ‘विसदृश परिणाम’ कहलाते हैं, क्योंकि इनमें तीन गुण असमान परिमाण में रहते हैं। क्रम के अनुसार परिणाम में भेद होता है, जैसे मिट्टी के पिण्डत्व धर्म का क्रम है घटत्वधर्म (योगसूत्र 3/15)। ऐसा क्रम लक्षण और अवस्थापरिणाम में भी होता है। यौगिक दृष्टि से क्रम क्षणिक है; क्षणावच्छिन्न परिवर्तन ही सूक्ष्मतम क्रम है।
ये परिणाम जिस प्रकार भौतिक-भूत-तन्मात्र में हैं, उसी प्रकार इन्द्रिय में भी हैं। उदाहरणार्थ चक्षुरूप धर्मी इन्द्रिय का नील-श्वेत-पीत आदि विषय में जो आलोचन होता है, वह धर्मपरिणाम है; आलोचन रूप धर्म का अनागत-उदित-अतीत होना लक्षणपरिणाम है; और आलोचन का स्फुट-अस्फुट होना अवस्थापरिणाम है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परिणामदुःखता

सभी प्राकृत पदार्थ दुःखप्रद हैं – इसको प्रमाणित करने के लिए योगसूत्र (2/15) में परिणामदुःख-रूप युक्ति सर्वप्रथम दी गई है। परिणाम-हेतुक दुःख = परिणामदुःख। इस युक्ति का तात्पर्य यह है कि जो वर्तमान में सुखकर प्रतीत हो रहा है, वह भी बाद में दुःखकारक अवश्य होगा। व्याख्याकारों का कहना है कि विषयसुख के अनुभवकाल में जो राग नामक क्लेश उत्पन्न होता है उससे बाद में संकल्प होता है जिससे पुनः धर्म-अधर्म रूप कर्म किए जाते हैं। इस कर्म से जो कर्माशय होता है, वह प्राणी को जाति (जन्म = देहग्रहण), आयु और भोग देता है। जब तक देहधारण है तब तक दुःखभोग भी है। विषयभोगकाल में सुखविरोधी दुःख के साधनों के प्रति द्वेष भी होता है और इन साधनों को पूर्णरूप से न छोड़ सकने के कारण प्राणी सुह्यमान भी होता रहता है। इस प्रकार रागकृत कर्माशय के साथ-साथ द्वेष-मोहकृत कर्माशय भी होते रहते हैं। चूंकि सुख स्वयं भविष्यत् दुःख का साधन हो जाता है। अतः सुखेच्छु प्राणी अनिवार्यतः दुःख को भी प्राप्त कहता है – यह परिणामदुःखयुक्ति का सार है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परितापविपाक

कर्माशय के तीन विपाक होते हैं (जाति, आयु और भोग)। यदि इनके मूल में अपुण्य (= पाप) अधिक मात्रा में हो तो उनसे परिताप अर्थात् दुःख की प्राप्ति ही अधिक होती है (योगसू. 2/14)। विपाक के अन्तर्गत जो भोग है, वह सुख-दुःख बोध है, अतः भोग परिताप-रूप फल को उत्पन्न करता है – ऐसा कहना सहसा असंगत प्रतीत हो सकता है। उत्तर यह है कि विपाक के अन्तर्गत भोग का तात्पर्य शब्दादिरूप चित्तवृत्ति यदि अपुण्यहेतुक हो तो वह परितापप्रद होगी – यह सूत्रकार का तात्पर्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परिदृष्टधर्म

चित्तरूप धर्मी द्रव्य के जितने धर्म हैं, वे द्विविध हैं – परिदृष्ट एव अपरिदृष्ट। परिदृष्ट धर्म उसको कहते हैं जो प्रत्ययात्मक हो अर्थात् उपलब्ध हो – प्रत्यक्ष हो – ज्ञातस्वरूप हो। प्रमाणादिवृत्तियाँ सदैव ज्ञात होकर ही उदित होती हैं, अतः वे परिदृष्ट धर्मों में आती हैं। ये परिदृष्ट धर्म द्रव्यरूप हैं, चूंकि ये वृत्तिरूप हैं (वृत्तियाँ द्रव्यरूपा ही मानी जाती हैं)। प्रवृत्ति चूंकि ज्ञातरूपा होती हैं, अतः प्रवृत्ति भी परिदृष्टधर्म में आ सकती हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परिपूर्ण

जो सर्वथा, सर्वतः और सर्वदा शुद्ध एवं असीम बना रहता हुआ प्रत्येक प्रकार के स्थूल तथा सूक्ष्म भावों, अवस्थाओं एवं पदार्थों से पूरी तरह से भरा रहता है। जिसमें किसी भी प्रकार का देशकृत एवं आकारकृत कोई भी संकोच नहीं होता है। काश्मीर शैव दर्शन के अनुसार संपूर्ण बाह्य जगत् संविद्रूप परमशिव में संविद्रूप में ही सदैव स्थित रहता है। जो कुछ भी आभासित होता है, वह उसी संविद्रूपता का ही बाह्य प्रतिबिंब होता है; उससे भिन्न कुछ भी नहीं हो सकता है। अतः विश्वात्मक एवं विश्वोत्तीर्ण दोनों ही रूपों का एकघन स्वरूप अनुत्तर परमशिव ही परिपूर्ण होता है। (म.म.पटलपृ. 37-38)। समस्त विश्व उसमें है अतः वह विश्व से पूर्ण है। फिर समस्त विश्व को वही सत्ता प्रदान करता हुआ विश्व का पूरक भी है। दोनों ही प्रकार की दृष्टियों को लेकर के उसे पूर्ण कहा गया है। परिउपसर्ग उस पूर्णता के सर्वतोमुखी विस्तार का द्योतक है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परिमाण

किसी वस्तु का परिमाण कितना है – इस प्रकार का कोई विचार सांख्ययोग के प्रचलित ग्रन्थों में नहीं मिलता। सांख्यसूत्र में परिमाण-सम्बन्धी उस मत का खण्डन मिलता है जिसमें कहा गया है कि परिमाण चार प्रकार के हैं – अणु, महत्, हृस्व और दीर्घ। सूत्रकार का कहना है कि अणु और महत् परिमाण – ये दो ही भेद स्वीकार्य हैं, क्योंकि हृस्व-दीर्घ परिमाणों का अन्तर्भाव महत्-परिमाण में ही हो जाता है (5/90)। सांख्यकारिका (15) में ‘परिमाण’ का प्रसंग अव्यक्त की सत्ता सिद्ध करने के समय किया गया है। महत् आदि कार्यवस्तु परिमित परिमाण वाले अर्थात् अव्यापी होते हैं। सांख्य सभी व्यक्त पदार्थों को अव्यापी मानता है, अतः कोई भी व्यक्त पदार्थ सर्वव्यापी अर्थात् विभुपरिमाण नहीं है। यह सांख्यीय दृष्टि से कहना होगा।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परिस्पंद

देखिए स्पंद।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परुष

ईश्‍वर का एक नामांतर।

पाशुपत दर्शन के अनुसार ईश्‍वर अपनी स्वतंत्र इच्छाशक्‍ति के अनुसार विविध जीवों व शरीरों की उत्पत्‍ति कर सकता है। अतः पौरूष संपन्‍न होने के कारण पुरुष कहलाता है। (ग.का.टी.पृ.11)। लोक व्यवहार में पुरुष में सृष्‍टि करने की शक्‍ति होती है। इसी समय से परमेश्‍वर को भी पुरुष कहते हैं। वस्तुत: वही एकमात्र परमपुरुष है क्योंकि मूल सृष्‍टि का एकमात्र कारण वही है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

परोक्ष दीक्षा

शिष्य सामने न हो, देशांतर में हो, परलोक में हो, या अगला जन्म ले चुका हो तो उसे जो दीक्षा दी जाती है उसे परोक्ष दीक्षा कहते हैं। जालप्रयोग दीक्षा (देखिए) की तरह यही परोक्ष दीक्षा की जाती है। केवल जीव का आकर्षण और दर्भमयी प्रतिमा में प्रवेशन इस दीक्षा में नहीं किया जाता है। (तं.सा.पृ. 166)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परोक्षवाद

अन्य को लक्ष्य कर अन्य का कथन परोक्षवाद है। अर्थात् किसी के संबंध में प्रत्यक्षतः कुछ न कर दूसरे व्याज से कुछ कहना परोक्षवाद है। जैसे, श्वेतकेतूपाख्यान में जीव को पुरुषोत्तम का अधिष्ठान बताने के उद्देश्य से ही जीव का अक्षर ब्रह्म से अभेद प्रतिपादित किया गया है, न कि जीव अक्षर ब्रह्म से वस्तुतः अभिन्न है। अक्षर ब्रह्म पुरुषोत्तम का अधिष्ठान है, यह पुष्टि मार्ग का सिद्धांत है। ऐसी स्थिति में जीव और अक्षर ब्रह्म को अभिन्न बताने में श्रुति का उद्देश्य यही है कि अक्षर ब्रह्म के समान ही जीव भी पुरुषोत्तम के अधिष्ठान के रूप में बोधित हो। ऐसा नहीं है कि जीव वस्तुतः अक्षर ब्रह्म से अभिन्न है। यही परोक्षवाद है (अ.भा.पृ. 1032)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पर्यायसप्तक

शक्तिसंगम तन्त्र में पर्याय के नाम से तन्त्रों का विभाग किया गया हैं- देश, काल, आम्नाय, विद्या, दर्शन, आयतन और आगम के भेद से पर्याय सात प्रकार के होते हैं। किस देश में कौन सा आचार, क्रम, मार्ग या तन्त्र प्रचलित हैं, सका ज्ञान देश पर्याय से होता है। किस काल में कौन सी विद्या कैसे प्रचलित हुई? उसका स्वरूप क्या है? इन सबका ज्ञान काल पर्याय से होता है। किस आम्नाय में कैसा आचार है? उसका स्वरूप क्या है और उसकी विशेषता क्या है? इन प्रश्नों का समाधान आम्नाय पर्याय में वर्णित है। किस विद्या की उपासना किस आचार से की जाती है? कलियुग में उसका क्या स्वरूप है? उसका फल क्या है? इन सब विषयों का निर्णय विद्या पर्याय में किया गया है। किस दर्शन का क्या आचार है? इसके प्रतिपादक तन्त्र कौन-कौन से हैं? इस बात का निरूपण दर्शन पर्याय में किया गया है। किस आयतन की उत्पत्ति कैसे हुई? किस में कितने तन्त्र हैं? इसका आचार क्या है, इन बातों का निर्णय आयतन पर्याय में किया गया है। किस आगम की उत्पत्ति कैसे हुई? इनका आचार क्या है? मुख्य और अंग मन्त्र कौन-कौन से हैं? इनकी परंपरा कैसी है? इनमें तन्त्र कितने हैं? और इनसे सिद्धि कैसे मिलती है? इन सब विषयों का निरूपण आगम पर्याय में किया गया है।
इस प्रकरण की समाप्ति (4/7/157-160) में देश पर्याय का पूर्वाम्नाय में, काल पर्याय का दक्षिणाम्नाय में, आगम पर्याय का पश्चिमाम्नाय में, दर्शन पर्याय का उत्तराम्नाय में, आयतन पर्याय का पातालाम्नाय में और विद्या पर्याय का ऊर्ध्वाम्नाय में समावेश किया गया है। इसको वहाँ पर्यायाम्नाय भी कहा गया है। इस तरह से उक्त छः पर्यायों में भी आम्नाय पर्याय की अनिवार्य उपस्थिति रहती है, अतः आम्नाय ही इन सब में प्रधान है। तथापि दर्शन और आगम पर्याय का भी अपना निजी स्वरूप सुरक्षित है। इसी तरह से देश और काल के भेद से ही तन्त्रों का भेद होता ही है। दश महाविद्या तथा अन्य विद्याओं के प्रतिपादक स्वतन्त्र तन्त्र ग्रन्थ उपल्बध होते ही हैं। इसलिये उक्त सभी पर्यायों की स्वतन्त्र स्थिति तन्त्रशास्त्र में मान्य हैं और इसका इतना विस्तार से वर्णन किया गया है। इससे तान्त्रिक वाङ्मय की विशालता का भी परिचय मिलता है।
1. देशपर्याय
शक्तिसंगम तन्त्र (4/2/15-33) में कादि और हादि के भेद से 56-56 देशों के नाम गिनाये गये हैं और इनकी सीमा का निर्धारण भी वहीं (3/7/15-72) किया गया है। इन सभी देशों को पुनः पाक्, प्रत्यक्, दक्षिण और उदक् तथा केरल, काश्मीर, गौड और विलास के नाम से चार भागों में बाँटा गया है। अंग से मालव पर्यन्त केरल, मरुदेश से नेपाल तक काश्मीर, सिलहट्ट से सिन्धु पर्यन्त गौड सम्प्रदाय फैला हुआ है। विलास सम्प्रदाय पूरे देश में व्याप्त है। चीन देश में 100 तंत्र और 7 उपतन्त्र, द्रविड देश में 20 तंत्र और 25 उपतन्त्र, केरल में 60 तन्त्र और 50 उपतन्त्र, काश्मीर में 100 तन्त्र और 10 उपतन्त्र, गौड देश में 72 तन्त्र और 16 उपतन्त्रों की स्थिति है। इनके अतिरिक्त ऊर्ध्व दिशा और पाताल में भी सकल और निष्कल के क्रम के अनुसार शाक्त और शैव तन्त्रों की स्थिति बताई गई है। इन सबका विवरण वहीं (4/5/40-73) देखना चाहिये।
2. कालपर्याय
इसका विस्तृत विवरण शक्तिसंगम तन्त्र के चतुर्थ खण्ड के 5-6 पटलों में किया गया है। कादि और हादि उभय मतों में इसका एक ही रूप समान रूप से मान्य है। यहाँ प्रधानतः दस महाविद्या, गणेश, वटुक, प्रभृति दस अवतारों की जयन्तियों का वर्णन करने के बाद बताया गया है कि उचित समय पर ही इन विद्याओं तथा देवताओं की आराधना करनी चाहिये। इसके लिये शकुनविचार भी आवश्यक है। कालपर्याय स्थित तन्त्रों की गणना वहाँ इस प्रकार की गई है –
शाक्त कालपर्याय में 64 तन्त्र, 326 उपतन्त्र, 300 संहिता, 100 चूडामणि, 9 अर्णव, 4 डामर, 8 यामल, 2 सूक्त, 6 पुराण, 1 उपवेद, 3 कक्षपुटी, 2 विमर्षिणी, 8 कल्प, 2 कल्पलता, 3 चिन्तामणि ग्रन्थों का समावेश है।
शैव कालपर्याय में 33 तन्त्र, 325 उपतन्त्र, 3 संहिता, 1 अर्णव, 2 यामल, 3 डामर, 1 उड्डालक, 2 उड्डीश, 8 कल्प, 8 संहिता, 2 चूडामणि, 2 विमर्षिणी, 1 अवतार, 5 बोध, 5 सूक्त, 2 चिन्तामणि, 9 पुराण, 3 उपपुराण, 2 कक्षपुटी, 3 कल्पद्रुम, 2 कामधेनु, 3 सद्भाव, 5 तत्त्व और 2 क्रम तन्त्र समाविष्ट हैं।
वैष्णव कालपर्याय में 75 तन्त्र, 205 उपतन्त्र, 20 कल्प, 8 संहिता, 1 अर्णव, 5 कक्षपुटी, 8 चूडामणि, 2 चिन्तामणि, 2 उड्डालक, 2 उड्डीश, 2 डामर, 1 यामल, 5 पुराण, 3 तत्त्व, 3 बोध, 3 विमर्षिणी तथा एक-एक संख्या के अमृत, तर्पण, कामधेनु और कल्पद्रुम ग्रन्थों की गणना होती है।
सौर कालपर्याय में 30 तन्त्र, 114 उपतन्त्र, 4 संहिता, 2 उपसंहिता, 5 पुराण, 10 कल्प, 2 कक्षपुटी, 3 तत्त्व, 5 विमर्षिणी, 5 चूडामणि, 2 चिन्तामणि, 1 डामर, 1 यामल, 5 उड्डालक, 2 अवतार, 2 उड्डीश, 3 अर्णव तथा एक-एक संख्या के दर्पण और अमृत ग्रन्थों का का समावेश है।
गाणपत्य कालपर्याय में 50 तन्त्र, 25 उपतन्त्र, 2 पुराण, 2 अमृत, 3 सागर, 3 दर्पण, 9 कल्प, 3 कक्षपुटी, 3 विमर्षिणी, 2 तत्त्व, 2 उड्डालक, 2 उड्डीश, 3 चूडामणि, 3 चिन्तामणि, 1 डामर, 1 यामल और और 8 पंचरात्र ग्रन्थ समाविष्ट हैं।
3. आम्नायपर्याय
वहीं सप्तम पटल में इस पर्याय का वर्णन किया गया है। साथ ही प्रत्येक आम्नाय के देवताओं का भी निरूपण मिलता है। आम्नाय पर्याय के तन्त्रों की गणना वहाँ इस प्रकार बताई गई है – पूर्वाम्नाय में 64 तन्त्र और 670 उपतन्त्र हैं। दक्षिणाम्नाय में 400 तन्त्र और 375 उपतन्त्र हैं। कालपर्याय के ही समान यहाँ यामल प्रभृति ग्रन्थ भी होते हैं। पश्चिमाम्नाय में 96 तन्त्र और इतने ही उपतन्त्र होने हैं। उत्तराम्नाय में 925 तन्त्र तथा 364 उपतन्त्र होते हैं। ऊर्ध्वाम्नाय में 64 तन्त्र और 85 उपतन्त्र तथा पातालाम्नाय में 105 तन्त्र और 2100 उपतन्त्र हैं। आम्नाय विभाग को दीक्षाम्नाय भी कहा जाता है। इसी ग्रन्थ के प्रथम खण्ड (1/4/67-69) में पाँच आम्नायों का विवरण मिलता है। वहाँ बताया गया है कि केरल सम्प्रदाय का ऊर्ध्वाम्नाय में, काश्मीर का पश्चिमाम्नाय में, विलास और वैष्णव का दक्षिणाम्नाय में, चैतन्य का पूर्वाम्नाय में और गौड सम्प्रदाय का उत्तराम्नाय में समावेश किया जाता है।
4. विद्यापर्याय
विद्यापर्याय का वर्णन यहाँ (4/7/38-47) समयाम्नाय के नाम से किया गया है। समयाम्नाय को भी यहाँ पुनः षडाम्नाय में विभक्त कर और उनके देवता आदि का वर्णन करते हुए बाद में उनके तन्त्रों और उपतन्त्रों की संख्या बातई गई है, जो कि इस प्रकार है – पूर्वाम्नाय में 10 तन्त्र और 5 उपतन्त्र, दक्षिणाम्नाय में 8 तन्त्र और 9 उपतन्त्र, पश्चिमाम्नाय में 20 तन्त्र और 8 उपतन्त्र, उत्तराम्नाय में 100 तन्त्र और 9 उपतन्त्र, ऊर्ध्वाम्नाय में 20 तन्त्र और 3 उपतन्त्र, पातालाम्नाय में 9 तन्त्र और 2 उपतन्त्र होते हैं।
5. दर्शनपर्याय
दर्शनपर्याय के विवरण में यहाँ (4/7/48-58) बताया गया है कि 100 तन्त्र और 8 उपतन्त्रों से युक्त शाक्त दर्शन पूर्वाम्नाय में, 50 तन्त्र और 5 उपतन्त्रों से युक्त शैव दर्शन दक्षिणाम्नाय में, दक्षिणाचार के प्रतिपादक 36 तन्त्र और 36 ही उपतन्त्रों से अलंकृत वैष्णव दर्शन पश्चिमाम्नाय में, 70 तन्त्र और 3 उपतन्त्रों से मंडित गाणप दर्शन उत्तराम्नाय में, 12 तन्त्र और 10 उपतन्त्रों से संयुक्त सौर दर्शन ऊर्ध्वाम्नाय में तथा 100 तन्त्र और 63 उपतन्त्रों से राजित बौद्ध दर्शन पातालाम्नाय में प्रतिष्ठित है। उक्त विभाग हादिमत के अनुसार है। कादिमत के अनुसार शैव दर्शन पूर्व में, वैष्णव दक्षिण में, गाणप पश्चिम में, सौर उत्तर में और शाक्त दर्शन ऊर्ध्वाम्नाय में प्रतिष्ठित है। यहाँ षडाम्नाय के आधार पर षड्दर्शनों का प्रतिपादन किया गया है। इसी ग्रन्थ के प्रथम खण्ड (3/85-88) में तारा, त्रिपुरा और छिन्नमस्ता के भेद से षड्दर्शनों की गणना की गई है। तदनुसार शाक्त, शैव, गाणपत, सौर, वैष्णव और बौद्ध ये तारा के षड्दर्शन हैं। वैदिक, सौर, शाक्त, शैव, गाणपत्य और बौद्ध ये त्रिपुरा के षड्दर्शन हैं। यहाँ वौष्णव के स्थान पर वैदिक दर्शन का समावेश किया गया है। छिन्ना षड्दर्शन में चान्द्र, स्वायम्भुव, जैन, चीन और नील इन पाँच दर्शनों की ही गणना मिलती है। बौद्ध दर्शन को मिलाकर यह संख्या पूरी की जा सकती है।
6. आयतनपर्याय
आयतनपर्याय का विवरण यहाँ नहीं मिलता है। केवल पंचायतन का उल्लेख (4/7/53) मिलता है। पाँच उपास्य देवताओं के आयतनों (मन्दिरों) का एक स्थान पर समाहार पंचायतन के नाम से प्रसिद्ध है। स्मार्त धर्म में शक्ति, शिव, विष्णु, सूर्य और गणेश में से किसी एक इष्ट देवता को मुख्य मानकर उसके मन्दिर के मध्य में तथा उसके चारों कोनों पर चार अन्य देवताओं के आयतनों की स्थापना विहित है। कृष्णानन्द के तन्त्रसार में भी इनका विवरण मिलता है। आयतन पर्याय में इन्हीं की उपासना के प्रतिपादक शास्त्रों की गणना होनी चाहिये। प्रपंचसार और शारदातिलक ऐसे ही ग्रन्थ हैं। अथवा कादिमत के अनुसार प्रदर्शित दर्शन पर्याय में पाँच ही दर्शन वर्णित हैं। उनका भी पंचायतन विभाग में समावेश किया जा सकता है। इस प्रकारण (4/7/59-156, 161-165) में दिव्याम्नाय, विद्याम्नाय, सिद्धाम्नाय, रत्नाम्नाय (महाम्न्या) मण्डलाम्नाय, रसातलाम्नाय, पंचकृत्याम्नाय, कालिकाम्नाय, बटुकाम्नाय का ही विस्तार से वर्णन किया गया है। दिव्याम्नाय की दो प्रकार की व्याख्या की गई है। वस्तुतः इनका संबंध आम्नाय पर्याय से है। पंचकृत्याम्नाय का वर्णन कुलार्णव तन्त्र (3/41-45) में भी मिलता है। इसका संबंध शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठापित पाँच मठों से भी है, ऐसा यहीं (4/8/75-92) बताया गया है।
7. आगमपर्याय
आयतन पर्याय में प्रदर्शित रत्नाम्नाय (महाम्नाय) का ही यहाँ 4/7/93-94) आगम पर्याय नामक अन्तिम विभाग के रूप में वर्णन है। तदनुसार चीनागम में अक्षोभ्यतन्त्र के साथ 7 तन्त्र, बौद्धागम में 21 तन्त्र और 8 उपतन्त्र, जैनागम में 16 तन्त्र ओर 8 उपतन्त्र, पाशुपतागम में 9 तन्त्र और 6 उपतन्त्र, कापालिकागम में 1 तन्त्र और 4 उपतन्त्र, पाषण्डागम में 3 तन्त्र और 5 उपतन्त्र, पांचरात्रागम में 10 तन्त्र और 7 उपतन्त्र, अघोरागम में 10 तन्त्र और 8 उपतन्त्र, मंजुघोषागम में 20 तन्त्र और 30 उपतन्त्र, भैरवागम में 100 तन्त्र और 70 उपतन्त्र, बटुकागम में 200 तन्त्र और 80 उपतन्त्र, संजीवन्यागम में 3 तन्त्र और 7 उपतन्त्र, सिद्धेश्वरागम में 10 तन्त्र और 8 उपतन्त्र, नीलवीरागम में 17 तन्त्र, मन्त्रसिद्धयागम में 18 तन्त्र, मृत्युंजयागम में 20 तन्त्र और 12 उपतन्त्र, मायाविहारागम में 3 तन्त्र और 5 उपतन्त्र, विश्वरूपागम में 9 तन्त्र और 7 उपतन्त्र, योगरूपागम में 50 तन्त्र और 10 उपतन्त्र, विरूपागम में 7 तन्त्र और 8 उपतन्त्र, यक्षिप्यागम में 5 तन्त्र और 70 उपतन्त्र, निग्रहागम में 10 तन्त्र और 200 उपतन्त्र विराजमान हैं। ”
Darshana : शाक्त दर्शन

पशु

जीव।

पाशुपत दर्शन के अनुसार समस्त चेतन जीव, सिद्‍धों व जीवन्मुक्‍तों को छोड़कर, पशु कहलाते हैं। क्योंकि सामान्यतया ये जीव ऐश्‍वर्यविहीन होते हैं और ऐश्‍वर्यविहीनता ही बंधन होता है। अतः ऐश्‍वर्य और स्वातंत्र्य का अभाव जीव को भिन्‍न-भिन्‍न पाशों के बंधन में बांध देता है और पाशो के बंधनों में बंध जाने के कारण ही जीव पशु कहलाता है। सांख्य दर्शन के तेईस तत्व ही पाशुपत दर्शन में पाश कहलाते हैं। ये पाश कलाएं भी कहलाती हैं। इन कलाओं के बंधन में बंध जाने के कारण जीव परवश हो जाता है, वह स्वतंत्र नहीं रहता है। अस्‍वातंत्र्य ही जीव के बंधन का मुख्य रूप बनकर उसे पशु बना देता है। (पाशुनात् पशव: – पा. सू. कौ. भा. पृ. 5)।

कौडिन्य भाष्य में पशु को तीन प्रकार का बताया गया है- देव, मनुष्य और तिर्यक्। देव ब्राह्म आदि आठ प्रकार के कहे गए हैं। मनुष्य ब्राह्मण आदि विविध तरह के तथा तिर्यक् मृगादि पाँच प्रकार के कहे गए हैं। इन सभी तरह के, पशुओं में कुछ साञ्‍जन (शरीर व इन्द्रिय सहित) तथा कुछ निरञ्‍जन (शरीर व इन्द्रियरहित) होते हैं। (पा.सू.कौ.भा.पृ 147)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

पशु

माया और कंचुकों से मलिन बना हुआ, क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से घिरा हुआ तथा समस्त प्रपंच को भेद दृष्टि से देखने वाला प्रमाता। वस्तुतः अपने ही स्वातंत्र्य से अपने आनंद के लिए अपनी मायाशक्ति तथा उसी से विकसित कला विद्या आदि पाँच आवरक तत्त्वों से घिरा हुआ शुद्ध संवित् स्वरूप परम शिव ही पशु कहलाता है। इस भूमिका पर उतरकर उसकी समस्त ऐश्वर्यशालिनी शक्तियाँ संकोच को प्राप्त कर जाती हैं। इस प्रकार की संकुचित संवित् जब पुर्यष्टक रूप सूक्ष्मतर देह में प्रविष्ट हो जाती है तो उसे ही पशु कहा जाता है। (तं.सा.पृ. 82-3)। इस स्थिति में पहुँचने पर वह कर्मानुसार फल भोग से कलुषित होता रहता है। (ई.प्र. 3-2-3)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पशुत्व

मल का एक प्रकार।

पाशुपत दर्शन के अनुसार पशुत्व, जो पुरुष का गुण है तथा धर्म-अधर्म दोनों से व्यतिरिक्‍त है, पंचम प्रकार का मल है। पुरुष की ज्ञानशक्‍ति व क्रियाशक्‍ति में जो संकोचरूपी बंधन पड़ता है, वही पशुत्व होता है, जिससे पुरुष बंधन में पड़ा रहता है। असर्वज्ञत्व, अपतित्व आदि पशुत्व के भेद भी गिने गए हैं। इस तरह का ऐश्‍वर्यहीनता रूप बंधन ही पशुत्व है और वही संसार तथा जन्ममरण का अनादि कारण है। (ग.का.टी.पु.23)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

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