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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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पर शिव

देखिए परम शिव।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परचित्तज्ञान

योगसूत्र (3/19) कहता है कि प्रत्यय में संयम करने पर परचित्त की ज्ञान रूप सिद्धि होती है। योगी की अपनी चित्तवृत्ति प्रत्यय है, अर्थात् योगी अपने चित्त को शून्यवत् करके परचित्तगत भाव को जान सकते हैं (यह प्रक्रिया गुरुमुखगम्य है)। कोई-कोई कहते हैं कि प्रत्यय का अर्थ परचित्त ही है, अर्थात् पर के प्रत्यय में संयम करने पर परचित्त का ज्ञान होता है। पर का चित्त किस स्थिति में है (अनुरक्त है, या विद्विष्ट है या भीत है, इस प्रकार) – यह ज्ञान पहले उदित होता है। परचित्त का आलम्बन क्या है – इसको जानने के लिए पृथक् संयम करना पड़ता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परजंगम

देखिए ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत ‘जंगम’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

परंपरा मोक्ष

कर्म से सिद्ध होने वाला मोक्ष परंपरा मोक्ष है, क्योंकि कर्म से साक्षात् मोक्ष नहीं होता है। कर्म का विधान करने वाली श्रुतियाँ भी परंपरा मोक्ष को ही कर्म का फल निश्चित करती हैं। साक्षात् मोक्ष तो ज्ञान और भक्ति से ही होता है (अ.भा.पृ. 1198)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

परब्रह्म

बृहत् होने के कारण असीम तथा बृहंक होने के कारण संपूर्ण विश्व को विकास में लाने वाला तथा व्याप्त करने वाला पर तत्त्व। सूक्ष्म रूप से सब कुछ को व्याप्त करते हुए अनंत चित्र विचित्र रूपों में स्वयं चमकने वाला परमेश्वर। भैरव। देखिए भैरव। परब्रह्म शुद्ध चिन्मय है। परंतु उसके भीतर समस्त विश्व की सृष्टि करने वाला वीर्य सदा विद्यमान रहता है। उस वीर्य की उच्छलन क्रिया से वह विभोर होकर रहता है। उसकी उसी क्रिया से शिव से पृथ्वी तक के तत्त्वों के उदय और लय हुआ करते हैं। अतः वह आकाश की तरह सर्वथा शांत न होकर चिच्चमत्कार से भरा रहता है। उसी से वह विश्व का बृंहण या विकास करता है और यही उसकी ब्रह्मता है। (पटलत्री.वि.पृ. 221)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परम-अद्वैत

पराद्वैत। महाद्वैत। परमाद्वय। वह दृष्टि, जिसमें किसी भी प्रकार का द्वैत शेष रह ही नहीं सकता। इसके अनुसार द्वैत, द्वैताद्वैत, अद्वैत, बंधन, मुक्ति, जड़, चेतन आदि प्रत्येक प्रकार की भेदमय अवस्थाएँ एकमात्र परिपूर्ण शुद्ध संवित् रूप में ही चमकती हैं। भेद केवल कल्पना मात्र है। परम शिव ही परिपूर्ण शुद्ध संवित् स्वरूप है। उसी के स्वातंत्र्य से एवं उसके अपने ही आनंद की लीला से उसी में सभी कुछ उसी के रूप में चमकता है। (तं.आ. 2-16 से 19)। शिवदृष्टि के अनुसार सभी कुछ शिवमय है। एक जड़ पदार्थ एवं परमशिव में स्वभावतः कोई भेद नहीं है। जो कुछ भी जिस भी रूप में है वह सभी शिवमय ही है। एक जड़ पदार्थ भी उतना ही परिपूर्ण परमेश्वर है जितना स्वयं परमशिव है। सब कुछ पूर्ण परमेश्वर ही है। उससे भिन्न या अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। ऐसा सिद्धांत ही पराद्वैत या परम-अद्वैत है। (शि.दृ. 5-105 से 109)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परमशिव

अनुत्तर संवित्। प्रकाश और विमर्श का परम सामरस्यात्मक परतत्त्व। वह सैंतीसवां तत्त्व, जिसमें शिव से लेकर पृथ्वी पर्यंत सभी छत्तीस तत्त्वों का उसी की स्वेच्छा से समय समय पर लय और उदय होता रहता है तथा ऐसा होने पर भी जो सर्वथा एवं सर्वंदा शुद्ध, असीम तथा परिपूर्ण ही बना रहता है। परशिव। परमेश्वर। प्रकाशात्मक ज्ञानस्वरूपता तथा विमर्शात्मक क्रियास्वरूपता का परिपूर्ण सामरस्य। (म.म.पटलपृ. 34-37, ई.प्र.वि. 4-1-14)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परमाणु

सांख्ययोगग्रन्थों में कदाचित् परमाणु और अणु शब्द प्रयुक्त होते हैं। सांख्यीय परमाणु त्रैगुणिक (त्रिगुणविकारभूत व्यक्त पदार्थ) है, अतः यह नित्य, निरवयव, निष्कारण नहीं हो सकता। परमाणु पाँच प्रकार के हैं। विज्ञानभिक्षु ने यहाँ इन परमाणुओं का स्वरूप इस प्रकार दिखाया है – पृथ्वीपरमाणु वह ग्राह्य पदार्थ है जो मूर्ति (= काठिन्य) – समानजातीय शब्दादितन्मात्रों से उत्पन्न होता है। यह स्थूलपृथ्वी की परम सूक्ष्म अवस्था है। जलपरमाणु वह ग्राह्य पदार्थ है जो गन्धतन्मात्र को छोड़कर चार तन्मात्रों (जो स्नेहजातीय हैं) से उत्पन्न होता है। इससे महाजल आदि होते हैं। तेजःपरमाणु वह ग्राह्य पदार्थ है जो गन्ध-रस तन्मात्र को छोड़कर शेष तीन तन्मात्रों (जो उष्णता-जातीय हैं) से उत्पन्न होता है; इससे महातेजः आदि होते हैं। वायु-परमाणु वह ग्राह्य पदार्थ है जो गन्ध-रस-रूप तन्मात्रों को छोड़कर शेष दो तन्मात्रों (जो सततसंचरणशीलता-जातीय है) से उद्भूत होता है। अहंकारांशसहकृत शब्दतन्मात्र से आकाशपरमाणु उत्पन्न होता है। ‘परमसूक्ष्म’ के अर्थ में भी परमाणु शब्द (जो विशेषण है), प्रयुक्त होता है। द्र. योगसूत्र 1/40।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परशरीरावेश

दसूरे के शरीर में अपने को प्रविष्ट करने की क्षमता परशरीरावेश कहलाता है। संयम विशेष के बल से ऐसा किया जा सकता है। योगसूत्र कहता है कि बन्धकारण का शैथिल्य होने से अथवा प्रचार संवेदन से परशरीरावेश रूप सिद्धि उद्भूत होती है (3/38)। कर्माशय बन्ध का कारण है। नाडीमार्ग में चित्त का संचार किस रूप से होता है – इसका अनुभव करना प्रचार संवेदन है। योगी अपने चित्त को दूसरे के शरीर में निक्षिप्त करते हैं; चित्ताधीन इन्द्रियाँ चित्त का अनुसरण करती हुई परशरीर में प्रविष्ट हो जाती हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

परा देवी

1. पराशक्ति, कौलिकी शक्ति, आनंदशक्ति, पराविसर्गशक्ति, हृदय। संपूर्ण परापरा तथा अपरा शक्ति समूहों को अभिव्यक्त करने वाली निरतिशय स्वातंत्र्य के ऐश्वर्य से परिपूर्ण तथा इस ऐश्वर्य के चमत्कार को उल्लसित करने वाली तथा इस उल्लास से संपूर्ण शुद्ध तथा अशुद्ध सृष्टि को अभिव्यक्त करने वाली परमशिव की नैसर्गिक स्वभावरूपा अनुत्तराशक्ति। (तं.आ.आ. 3-66 से 70)।
2. अभेदमयी शक्ति दशा में जिस शक्ति के द्वारा परमेश्वर समस्त प्रमातृ गणों और प्रमेय समूहों को धारण करता हुआ वहाँ के समस्त प्रमातृ व्यापारों की कलना को निभाता है उसकी उस शक्ति को भी परा देवी कहते हैं। द्वादश महाकाली देवियों में इस परादेवी का उल्लेख आता है। यह भी कई एक कालियों के रूपों में प्रकट होती हुई प्रमातृ-प्रमेय-प्रमाणमय व्यापारों की कलना को चलाती रहती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परा भट्टारिका

पारमेश्वरी पराशक्ति को परा भट्टारिका कहा जाता है। भट्टारक पारमैश्वर्य से संपन्न अधिकार देवाधिदेवों को कहते हैं, जैसे ईश्वर भट्टारक, सदाशिव भट्टारक, शिवभट्टारक। तदनुसार भगवती पराशक्ति, जो शक्ति तत्त्व पर शासन करती है, उसे परा भट्टारिका कहा जाता है। ज्येष्ठा, रौद्री और वामा नामक भट्टारिकाएँ उसकी अपेक्षा अपर अर्थात् निचली कोटि की देवियाँ हैं। उच्चतम स्थान की देवी परा भट्टारका ही है। इसी को क्रमनय में काली कहा जाता है और श्रीचक्र के उपासक इसी को ललिता त्रिपुर सुंदरी कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परा वाक्

कारण बिन्दु का अभिव्यक्त स्वरूप शब्दब्रह्म कहलाता है और यह मूलाधार में निष्पन्दावस्था में अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है। इसी स्थिति को परा वाक् कहा जाता है। शास्त्रों में नादात्मक अकारादि मातृका वर्णों की चार अवस्थाएँ वर्णित हैं – अनाहतहतोत्तीर्ण, अनाहतहत, अनाहत और हत। इनमें अनाहतहतोत्तीर्ण अवस्था ही परा वाक् है। तन्त्रालोक (5/97-100) में उद्धृत ब्रह्मयामल में नाद को राव कहा गया है। परावाक् स्वरूप अहंविमर्शात्मक राव पश्चन्ती, मध्यमा, वैखरी और इनके स्थूल, सूक्ष्म तथा पर भेदों के कारण नवधा विभक्त हो जाता है। इन सबका आधारभूत परावागात्मक राव दशम है। इस तरह से यह परावागात्मिका राविणी दिव्य आनन्दप्रदायक दस प्रकार के नाद का नदन करती रहती है। इसी से वर्णाम्बिका का पश्यन्ती रूप अभिव्यक्त होता है। परा वाक् को ही सूक्ष्मा और कुण्डलिनी शक्ति भी कहा जाता है। योगिनीहृदय (1/36) में इसको अम्बिका शक्ति कहा गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

परा शुद्ध विद्या

सदाशिव तत्त्व तथा ईश्वर तत्त्व में रहने वाली मंत्रमहेश्वर तथा मंत्रेश्वर प्राणियों के भेदाभेदमय दृष्टिकोण को शुद्ध विद्या या परा शुद्ध विद्या कहते हैं। इन तत्त्वों में रहने वाली प्राणियों में क्रमशः ‘अहम् इदम्’ अर्थात् ‘मैं यह हूँ’ तथा ‘इदम् अहम्’ अर्थात् ‘यह मैं हूँ’ ऐसा भेदाभेदमय दृष्टिकोण बना रहता है। (ई.प्र.वि.2, पृ. 196, 7)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परा संवित्

अनुत्तर संवित्। प्रकाश एवं विमर्श का शुद्ध, एकघन सामरस्यात्मक परस्वरूप। छत्तीस तत्त्वों से उत्तीर्ण तथा छत्तीस तत्त्वों का संघट्टात्मक शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण स्वरूप। काश्मीर शैव दर्शन के अनुसार जो कुछ भी, जहाँ कहीं भी, जिस किसी भी रूप में आभासित होता है, वह सभी कुछ संवित् स्वरूप ही है और संविद्रूप में संविद्रूप बनकर ही चमकता रहता है। परमशिव के ऐसे अनुत्तर स्वरूप को परासंवित् कहते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पराद्वैत

देखिए परम-अद्वैत।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परानंद

आणव उपाय के उच्चार योग में भिन्न भिन्न स्थितियों में विश्रांति के हो जाने पर अभिव्यक्त होने वाली आनंद की छह भूमिकाओं में से तीसरी भूमिका। उच्चार योग की प्राण धारणा में जब साधक को अपने जीवस्वरूप की विषयशून्यता की स्थिति पर पूर्ण विश्रांति हो जाती है तब उसे प्राण और अपान पर विश्रांति का अभ्यास करना होता है। इस अभ्यास में अनंत प्रमेयों को अपान द्वारा प्राण में ही विलीन करना होता है। इसके सतत अभ्यास से साधक जिस आनंद का अनुभव करता है, उसे परानंद कहते हैं। (तं.आ.आ. 5-45, 46)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परापरा देवी

ज्ञान शक्ति शुद्धशुद्ध मार्ग को प्रकाशित करने वाली तथा घोरा मातृ मंडली अर्थात् घोर शक्तियों (देखिए) के अनंत समूहों को अविरत रूप से प्रकट करते रहने वाली पारमेश्वरी शक्ति। ये शक्ति समूह मुक्ति के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले हैं तथा मिश्रित कर्मफल के प्रति आसक्ति उत्पन्न करते हुए जीव को संसार के प्रति ही आसक्त रखने की पारमेश्वरी लीला को निभाते हैं। (तं.आ.आ. 3-74, 75 मा.वि.तं. 3-32)। भेदाभेदमयी विद्या भूमिका के भीतर समस्त प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेयमय व्यापारों की कलना करने वाली तथा इस भूमिका के समस्त प्रपंचों को धारण करने वाली वह पारमेश्वरी शक्ति, जिसके कई एक रूप द्वादश कालियों में गिने जाते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परापरावस्था / दशा

भेदाभेद की अवस्था। वह दशा, जिसमें इदंता का पृथक् विकास नहीं हुआ होता है परंतु उसके प्रति अत्यंत सूक्ष्म उन्मुखता उभर चुकी होती है। इस अवस्था में सदाशिव, ईश्वर तथा शुद्ध विद्या और इन तत्त्वों में रहने वाले मंत्रमहेश्वर, मंत्रेश्वर तथा विद्येश्वर नामक प्राणी एवं उनका भेदाभेदमय दृष्टिकोण आता है। इस अवस्था में परमशिव का चित्, निर्वृत्ति (आनंद) आदि शक्ति पंचक विकासोन्मुख होता है। (शि.दृ.वृ.पृ. 6,7; ई.प्र.वि.2, पृ. 199)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पराभक्ति

ऐसी प्रेममयी और ज्ञानमयी भक्ति जिसमें उपास्य और उपासक का भेद सर्वथा विगलित हो जाता है और उपासक अपने को उपास्य के ही रूप में जानने लगता है। यह शैव दर्शन की समावेशमयी भक्ति है। इसी भक्ति की प्रशंसा उत्पल देव आदि आचार्यो ने की है। इसको ‘ज्ञानस्य परमा भूमि’ ज्ञान की सर्वोच्च भूमि और ‘योगस्य परमादशा’ योग की सर्वोच्च दशा कहा गया है। (ई.प्र. 1-1-1)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

परामर्श – शक्‍ति

देखिए ‘चिच्छक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

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