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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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पंचाचार

ख. सदाचार
जिस आचरण से सज्‍जन तथा शिवभक्‍त संतुष्‍ट होते हैं और जिससे अंतरंग तथा बहिरंग की शुद्‍धि होती है, उसे सदाचार कहते हैं (सू.आ.क्रियापाद. 8/7)। सदाचार में धर्ममूलक अर्थार्जन और उस धन का यथाशक्‍ति गुरु, लिंग और जंगम के आतिथ्य में विनियोग करना, सदा शिवभक्‍तों के साथ रहना आदि विशुद्‍ध आचारों का समावेश किया गया है (चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद. 9/6)।

सदाचार में आठ प्रकार के ‘शीलों’ का भी समावेश किया गया है। वीरशैव संप्रदाय में शिव-ज्ञान की इच्छा की उत्पत्‍ति में कारणीभूत नैतिक आचरणों को ‘शील’ कहते हैं। वे हैं- अंकुरशील, उत्पन्‍नशील, द्‍विदलशील, प्रवृद्‍धशील, सप्रकांडशील, सशाखाशील, सपुष्पशील और सफलशील। इन्हीं को ‘अष्‍टशील’ कहते हैं। इनके लक्षण इस प्रकार हैं –

1. अंकुरशील
गुरु-कृपा प्राप्‍त करके उनसे दीक्षा लेकर अपने शरीर को शुद्‍ध कर लेना तथा इष्‍टलिंग की पूजा आदि करना ही ‘अंकुरशील’ कहलाता है। शील की प्रथम अवस्था होने से इसे ‘अंकुरशील’ कहा गया है।

2. उत्पन्‍नशील
जब साधक स्वयं दीक्षित होकर पूजा आदि में प्रवृत्‍त हो जाता है और उसी प्रकार अपने पुत्र आदि परिवार के लोगों को भी प्रवृत्‍त कराता है तब उसे ‘उत्पन्‍नशील’ कहते हैं।

3. द्‍विदलशील
भस्म, रुद्राक्ष आदि को, जो कि शिव के अलंकार कहे जाते है, सदा शरीर पर धारण करना ही ‘द्‍विदलशील’ है।

4. प्रवृद्‍धशील
शिव के माहात्म्य को सुनकर उसका मनन करना ही ‘प्रवृद्‍धशील’ कहलाता है। साधक की भक्‍ति की वृद्‍धि में यह कारण होता है।

5. सप्रकांडशील
अपने इष्‍टलिंग की पूजा किये बिना अन्‍न, जल आदि का सेवन न करना ही ‘सप्रकांडशील’ कहा जाता है।

6. सशाखाशील
इष्‍टलिंग के अनिवेदित पदार्थो का सेवन नन करना ही ‘सशाखाशील’ है।

7. सपुष्पशील
शिव को समर्पित वस्तुओं को, जिन्हें प्रसाद कहते हैं, न त्यागना, अर्थात् शिवप्रसाद की अवज्ञा न करना ही सपुष्पशील है।

8. सफलशील
गुरु, लिंग और जंगम में, जो वीरशैव धर्म में पूजनीय है, भेद-बुद्‍धि को त्यागकर, उनको शिवस्वरूप समझकर उनकी आराधना करना ही ‘सफलशील’ कहलाता है।

इस प्रकार इन आठ ‘शील’ नामक अंगों से युक्‍त यह आचार ही ‘सदाचार’ है (चं. ज्ञा. आ. क्रियापाद 9/19-31)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार

ग. शिवाचार
सृष्‍टि, स्थिति, संहार आदि पंचकृत्यों को करनेवाले शिव को ही अपना अनन्य रक्षक मानना ‘शिवाचार’ कहलाता है (चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद 9/7)। शिवाचार में द्रव्य, क्षेत्र, गृह, भांड, तृण, काष्‍ठ, वीटिका, पाक, रस, भव, भूत, भाव, मार्ग, काल, वाक् और जन इन सोलह पदार्थो को शिवशास्‍त्रोक्‍त विधि से शुद्‍ध कर लेने का विधान है।

इन सोलह पदार्थो की शुद्‍धि के लक्षण शास्‍त्रों में इस प्रकार वर्णित हैं- शिवभक्‍त के हाथ से प्राप्‍त फल, मूल आदि का ग्रहण करना और अभक्‍त के हाथ से प्राप्‍त होने पर उसे भस्म-प्रेक्षण विधि से शुद्‍ध कर लेना द्रव्यशुद्‍धि है। अपने खेत के चारों कोनों में नंदि-अंकित एक-एक शिला की स्थापना करना क्षेत्रशुद्‍धि है। घर के महाद्‍वार पर शिवलिंग को उत्कीर्ण कराना गृहशुद्‍धि है। उसी प्रकार अपने उपयोग के बर्तनों पर भी शिवलिंग को उत्कीर्ण कराना ‘भांड-शुद्‍धि’ कहलाती है। गाय, बैल आदि को खिलाए जाने वाले घास को भस्म-प्रेक्षण से शुद्‍ध कर लेना ‘तृण-शुद्‍धि’ है और इसी प्रकार जलाने की लकड़ियों को भी भस्म-प्रेक्षण से शुद्‍ध कर लेना ‘काष्‍ठ-शुद्‍धि’ है। केवल शिवभक्‍त के हाथ से ताम्बूल ग्रहण करना ‘वीटिका-शुद्‍धि’ कहलाता है। शिवदीक्षा-संपन्‍न व्यक्‍ति के बनाये भोजन को ग्रहण करना ‘पाक-शुद्‍धि’ है। केवल गोरस का सेवन करना ‘रसशुद्‍धि’ है। पुनर्जन्म के कारणीभूत काम्यकर्मो को त्यागकर निष्काम कर्म करना ही ‘भवशुद्‍धि’ है। सभी प्राणियों में दया रखना ‘भूतशुद्‍धि’ है। सभी कामनाओं को त्यागकर मन में सदा शिव का ही चिंतन करना ‘भावसुद्‍धि’ है। मार्ग में किसी प्राणी की हिंसा किये बिना सावधानी से चलना ‘मार्गशुद्‍धि’ है। शास्‍त्रोक्‍त ब्रह्म मुहूर्त में शिवलिंग की पूजा करना ‘कालशुद्‍धि’ हे। मुख से अनृत, पुरुष, बीभत्स तथा दांभिक वचनों का प्रयोग न करना ‘वाकशुद्‍धि’ है। सदा सज्‍जनों के सहवास में रहना ‘जनशुद्‍धि’ है। इस प्रकार अपने दैनिक जीवन में उपर्युक्‍त सोलह प्रकार की शुद्‍धियों को अपने आचरण में लाना ही ‘शिवाचार’ है (चं. ज्ञा. आ. क्रियापाद 9/32-50)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार

घ. गणाचार
इस आचार में कायिक, वाचिक तथा मानस 64 प्रकार के शीलों का अर्थात् उत्‍तम आचरणों का समावेश किया गया है। उनमें प्रमुख हैं- शिव या शिवभक्‍तों की निंदा न सुनना, यदि कोई निंदा करता है, तो उसको दंडित करना; दंडित करने की सामर्थ्य न रहने पर उस स्थान को त्याग देना; इंद्रियों से शास्‍त्र-निषिद्‍ध विषयों का सेवन न करना; मन से निषिद्‍ध भोग का संकल्प भी न करना; किसी पर क्रोधित न होना; धन आदि का लोभ त्याग देना; संपत्‍ति आने पर भी मदोन्मत्‍त न होना; शत्रु और अपने पुत्र में विषमता को त्यागकर समता भाव रखना; निगमागम-वाक्यों में श्रद्‍धा रखना; काया, वाचा, मनसा कदापि प्रमाद नहीं करना; अनुपलब्ध वस्तुओं का व्यसन छोड़कर प्राप्‍त वस्तुओं से ही संतुष्‍ट रहना; पंचाक्षरी मंत्र का सदा मन में जप करना, ‘सोടहं’ भाव से शिव का चिंतन करना, विश्‍व के समस्त प्राणियों को शिव के ही अनंत रूप समझना। इस प्रकार के 64 शीलों (आचरणों) का समष्‍टि-स्वरूप ही ‘गणाचार’ कहलाता है। इस गणाचार के पालन से साधक के त्रिकरण (शरीर, मन, वाणी) परिशुद्‍ध हो जाते हैं- और उसे शिव सायुज्‍य की प्राप्‍ति हो जाती है (सि.शि. 9/36,37 पृष्‍ठ 148; चं.ज्ञा.आ. क्रियापाद. 9/51-123)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार

ङ भृत्याचार
शिव-भक्‍त ही इस पृथ्वी में श्रेष्‍ठ हैं और मैं उनका भृत्य अर्थात् दास हूँ, ऐसा समझकर उनके साथ विनम्रता से व्यवहार करना ही ‘भृत्याचार’ कहलाता है (चं. शा. आ. क्रियापद 9/9)। ‘भृत्यभाव’ और ‘वीरभृत्य भाव’ के भेद से यह भृत्याचार दो प्रकार का है। अपने को गुरु, लिंग तथा जंगम का सेवक समझकर श्रद्‍धा से निरंतर उनकी सेवा में तत्पर रहने की भावना को ‘भृत्य-भाव’ कहते हैं। जिस भाव से युक्‍त साधक गुरु को तन, अपने इष्‍टलिंग को मन तथा जंगम को अपना सर्वस्‍व अत्यंत आनंद से समर्पित कर देता और उसके प्रतिफल पारलौकिक सुख से निःस्पृह होकर केवल मोक्ष की अभिलाषा रखता है, उसे ‘वीरभृत्य-भाव’ कहते हैं। इस वीरभृत्यभाव के साधक को ‘वीरभृत्य’ कहा जाता है। यही शिवानुग्रह को प्राप्‍त करता है। (चं. ज्ञा. आ. क्रियापाद 9/124-126)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार्य

वीरशैव धर्म के संस्थापक पाँच आचार्यो को ‘पंचाचार्य’ कहते हैं। ये पंचाचार्य ही वीरशैवों के गोत्र प्रवर्तक हैं। आगमों की मान्यता है कि इन पंचाचार्यों ने प्रत्येक युग में शिव के सद्‍योजात, वामदेव, अद्‍योर, तत्पुरुष और ईशान मुखों से प्रकट होकर वीरशैव धर्म की स्थापना की है। प्रत्येक युग में इनके नाम भिन्‍न-भिन्‍न होते हैं। कृतयुग में इनके नाम इस प्रकार थे- एकाक्षर-शिवाचार्य तथा द्‍वयक्षर शिवाचार्य, त्र्यक्षरशिवाचार्य, चतुरक्षर-शिवाचार्य तथा पंचाक्षर-शिवाचार्य (सु.पं.पं. प्र. पृष्‍ठ 2)।

त्रेतायुग में- एकवक्‍त्र शिवाचार्य, द्‍विवक्‍त्र शिवाचार्य, त्रिवक्‍त्र शिवाचार्य, चतुर्वक्‍त्र शिवाचार्य और पंचवक्‍त्र शिवाचार्य (सु.पं.पं.प्र. पृष्‍ठ2)।

द्‍वापरयुग में- रेणुक शिवाचार्य, दारुक शिवाचार्य, घंटाकर्ण शिवाचार्य, धेनुकर्ण शिवाचार्य एवं विश्‍वकर्ण शिवाचार्य (सु.पं.पं.प्र. पृष्‍ठ 2)।

कलियुग में- रेवणाराध्य, मरुलाराध्य, एकोरामाराध्य, पंडिताराध्य और विश्‍वाराध्य (वी.स.सं. 1/26-34)। कलियुग के इन पंचाचार्यों का आविर्भाव पाँच शिवलिंगों से माना जाता है। उन सबका विवरण इस प्रकार है-

Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार्य

1. रेवणाराध्य
रेवणाराध्य ने कोनलुपाक (आंध्र) क्षेत्र के सोमेश्‍वरलिंग से प्रादुर्भूत होकर धर्मप्रचार के लिये बालेहोन्‍नूर (कर्नाटक) में एक मठ की स्थापना की, जो कि ‘रंभापुरी पीठ’ के नाम से प्रसिद्‍ध है। ये ही ‘वीरगोत्र’ ‘पंडिविडिसूत्र’ के प्रवर्तक हैं। इनकी शाखा को ‘रेणुका शाखा’ कहते हैं और इनका सिंहासन ‘वीर सिंहासन’ कहलाता है (वी.स.सं. 1/37-39; हिं. पृष्‍ठ 695-696; वी.म. पृष्‍ठ 1)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार्य

2. मरुलाराध्य
अवंतिकापुरी (मध्यप्रदेश) के वटक्षेत्र के सिद्‍धेश्‍वरलिंग से, अर्थात् भगवान् के वामदेव मुख से, मरुलाराध्य जी प्रकट हुये। कहते हैं कि वे अवंती के राजा से अनबन हो जाने के कारण बल्लारी जिले (कर्नाटक) के एक गाँव में जाकर बस गये। इनके बसने के कारण उस गाँव का नाम भी उज्‍जयिनी पड़ गया। यहाँ पर एक मठ की स्थापना हुई, जिसे उज्‍जयिनी पीठ कहते हैं। इस पीठ के आचार्य मरुलाराध्य जी वृष्‍टि सूत्र और नंदिगोत्र के प्रवर्तक हैं। इनकी शाखा को ‘दारुक शाखा’ कहते हैं और इनका सिंहासन ‘सद्‍धर्म सिंहासन’ के नाम से प्रसिद्‍ध है। उज्‍जैन (मध्य प्रदेश) में भी इनका एक शाखा मठ बहुत दिन तक अस्तित्व में रहा (वी.स.सं. 1/40-43; हिं.पृष्‍ठ 695-696; वी.म.पृष्‍ठ 26-28)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार्य

3. एकोरामाराध्य
द्राक्षाराम क्षेत्र के रामनाथ लिंग से, अर्थात् भगवान् के अघोर मुख से, एकोरामाराध्य जी प्रकट हुये और उन्होंने उत्‍तराखंड के श्री केदारेश्‍वर के पास ओखीमठ (उ.प्र.) में एक पीठ की स्थापना की। इसे ‘केदारपीठ’ कहते हैं। इस पीठ के मूल आचार्य एकोरामाराध्य ‘भृङ्गिगोत्र’ और ‘लंबनसूत्र’ के प्रवर्तक हैं। इनकी शाखा का नाम घंटाकर्ण (शंकुकर्ण) है। इनके सिंहासन को ‘वैराग्य सिंहासन’ कहते हैं (वी.स.सं. 1/44-46)। यह केदारपीठ भी अत्यंत प्राचीन है। इसकी प्राचीनता का प्रमाण एक ताम्र शासन है, जो उसी पीठ में मौजूद है। हिमवत् केदार में महाराजा जनमेजय के राज्यकाल में स्वामी आनंदलिंग जंगम वहाँ के मठ के जगदगुरु थे। उन्हीं के नाम जनमेजय ने मंदाकिनी, क्षीरगंगा, सरस्वती आदि नदियों के संगम के बीच जितना क्षेत्र है, जिसे ‘केदारक्षेत्र’ कहते हैं, इसका दान इस उद्‍देश्य से किया कि ओखीमठ के आचार्य गोस्वामी आनंदलिंग जंगम के शिष्‍य श्री केदार क्षेत्र वासी श्री ज्ञानलिंग जंगम इसकी आय से भवान् केदारेश्‍वर की पूजा-अर्चा किया करें। उन्होंने सूर्यग्रहण के अवसर पर श्री केदारेश्‍वर को साक्षी करके अपने माता-पिता की शिवलोक-प्राप्‍ति के लिये उन्हें इस क्षेत्र के पूरे अधिकार समेत दान दिया। यह दान महाराज जनमेजय ने मार्गशीर्ष अमावस्या सोमवार को युधिष्‍ठिर के राज्यारोहण के नवासी बरस बीतने पर प्लवंगनाम संवत्सर में किया। अतः केदारेश्‍वर का यह मठ पाँच हजार बरसों से अधिक पुराना है। टेहरी नरेश इस पीठ के शिष्य हैं। इस पीठ के जगद्‍गुरु को ‘रावल’ उपाधि से संबोधित किया जाता है। टेहरी नरेश इनके पट्‍टाधिकार के समय तिलकोत्सव समारंभ में उनको यह ‘रावल’ उपाधि देते हैं (हि. पृष्‍ठ 695-696; वी.म. पृष्‍ठ 29-32)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार्य

4. पंडिताराध्य
श्रीशैलम् (आंध्र) के मल्लिकार्जुन लिंग से, अर्थात् भगवान् के तत्पुरुष मुख से, पंडिताराध्य प्रकट हुये और श्रीशैलम् में ही उन्होंने एक पीठ की स्थापना की। इस पीठ को श्रीशैलपीठ कहते हैं। यह पंडिताराध्य ‘वृषभगोत्र’ तथा ‘मुक्‍तागुच्छ’ सूत्र के प्रवर्तक हैं। इनकी शाखा को ‘धेनुकर्णशाखा’ कहते हैं और इनका सिंहासन ‘सूर्य सिंहासन’ नाम से प्रसिद्‍ध है (वी.स.सं. 1/47-50; हि. पृष्‍ठ 695-696; वी.म. पृष्‍ठ 33-34)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचाचार्य

5. विश्‍वाराध्य
श्री काशीक्षेत्र (उत्तर प्रदेश) के विश्‍वनाथ से, अर्थात् भगवान् के ईशानमुख से, जगद्‍गुरु विश्‍वाराध्य जी प्रकट हुये और उन्होंने काशी में ही एक पीठ की स्थापना की, जिसे ‘ज्ञानपीठ’ कहते हैं। वह आजकल ‘जंगम वाड़ीमठ’ के नाम से प्रसिद्‍ध है। यह विश्‍वाराध्य ‘स्कंदगोत्र’ और ‘पंचवर्णसूत्र’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। इनकी शाखा को ‘विश्‍वकण ‘शाखा’ कहते हैं। इनका सिंहासन ‘ज्ञानसिंहासन’ के नाम से प्रसिद्‍ध है (वी.स.सं. 1/51-54; वी.म. पृष्‍ठ 35)। काशी का यह जंगमवाड़ी मठ भी अत्यंत प्राचीन है। इस मठ के ‘मल्लिकार्जुनजंगम’ नामक जगद्‍गुरु के समय में उस समय के काशी के राजा जयनंददेव ने विक्रम संवत् 631 में प्रबोधिनी एकादशी को भूमि दान किया था। इस तरह यह ताम्र शासन चौदह सौ तीन वर्ष प्राचीन है। हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब आदि मुगल राजओं के दानपत्र भी इस मठ में मौजूद हैं।

नेपाल देश में ‘भक्‍तपुर’ में भी इसका एक शाखा-मठ है। वहाँ भी वह जंगमवाड़ी मठ के नाम से ही प्रसिद्‍ध है। उस मठ के लिये भी विक्रम संवत 692 ज्येष्‍ठ सुदी अष्‍टमी के दिन नेपाल के राजा विश्‍वमल्ल ने श्री मल्लिकार्जुन यति को भूमिदान किया था। शिला पर उत्कीर्ण वह दानपत्र उसी मठ में आज भी उपलब्ध है (हिं. पृष्‍ठ 695-696)।

उपर्युक्‍त ये पंचाचार्य वीरशैवों के प्रधान गुरु माने जाते हैं। इन्हें महाचार्य या जगद्‍गुरु भी कहते हैं। वीरशैवों के दीक्षा, विवाह आदि धार्मिक तथा सामाजिक कार्य इन्हीं महाचार्यो की साक्षी में संपन्‍न किये जाते हैं। (वी. स.सं. 1-55-63)। कर्नाटक, आंध्र तथा महाराष्‍ट्र में प्रायः प्रत्येक गाँव में एक एक मठ है, जो इन पंचाचार्यो में से किसी एक की शाखा से संबंध रखता है। उन शाखा मठों के अधिकारियों को ‘आचार्य’ या ‘पट्‍टाधिकारी’ कहते हैं।

Darshana : वीरशैव दर्शन

पंचात्मक भगवान्

भगवान् अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास, चातुर्मास्य, पशुयाग और सोमयाग, यह पाँच यज्ञ स्वरूप हैं। “यज्ञो वै विष्णुः” यह वचन इसी का समर्थक है (त.दी.नि.पृ. 130)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

पंचार्थ

पाँच कोटियों वाला, पाँच वर्गों वाला।

पाशुपत सूत्र के व्याख्याता कौडिन्य (राशीकार) ने पाशुपत दर्शन को पाँच वर्गों या कोटियों में विभाजित किया है। ये पाँच वर्ग हैं- कार्य, कारण, योग, विधि और दुःखान्त। इन्हीं पाँच कोटियों को पंचार्थ कहते हैं तथा पाशुपतसूत्र कौडिन्य भाष्य को पंचार्थ भाष्य के नाम से भी अभिहित किया जाता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 1,2)। इस भाष्य में पाशुपत दर्शन के इन पाँच प्रतिपाद्य विषयों का विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

पति

स्वामी। शिव।

पाशुपत दर्शन में इस जगत के सृष्‍टिकर्ता व स्थितिकर्ता को पति कहा गया है। जो पशुओं अर्थात् समस्त जीवों (अर्थात् उनके सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरों) की सृष्‍टि करता है तथा उनकी रक्षा करता है, वह पति कहलाता है। पति विभु है, वह अपरिमित ज्ञानशक्‍ति व क्रियाशक्‍ति से संपन्‍न है। अपनी इस अपरिमित तथा व्यापक शक्‍ति से पति इस जगत का सृष्‍टि व स्थिति कारण बनता है। पति की ही शक्‍ति से समस्त पशुओं (जीवों) का इष्‍ट, अनिष्‍ट, शरीर, स्थान आदि निर्धारित होते हैं। अर्थात् पति ही समस्त विश्‍व का एकमात्र संचालक है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.5)। पशु अथवा जीव के समस्त कार्यों पर स्वामित्व ही पति (ईश्‍वर) का पतित्व होता है। (ग.का.टी.पृ 10)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

पति प्रमाता

समस्त प्रपंच को अभेद दृष्टि से देखने वाला प्रमाता। पूर्ण अभेद एवं भेदाभेद दृष्टिकोण वाले दोनों प्रकार के प्रमाता। इनमें से कोई प्रमेय तत्त्व को आत्मरूपतया ही देखते हुए केवल ‘अहं’ इसी का सतत विमर्श करते हैं और कोई उसे स्वशरीर तुल्य समझते हुए ‘अहमिदम्’ या ‘इदमहम्’ इस प्रकार का विमर्श करते हैं। दोनों प्रकार के शुद्ध प्राणी पति कोटि में गिने जाते हैं। इस प्रकार शिवतत्त्व से लेकर शुद्ध विद्या तत्त्व तक के अकल, मंत्रमहेश्वर और मंत्रेश्वर इन सभी प्राणियों को पति प्रमाता कहा जाता है। ये समस्त विश्व को अपने ही शुद्ध संवित् रूप में देखते हैं तथा इन्हें अपनी ही ज्ञान, क्रिया नामक शक्तियों का प्रसार मानते हैं। (ई.प्र. 3-2-3; 4-1-4)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पद

मालिनीविजय (2/36-35) तथा तन्त्रालोक (10/227-287) में जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत अवस्थाओं का निरूपण पिण्ड, पद, रूप, रूपातीत तथा महाप्रचय अथवा सततोदित अवस्था के रूप में किया गया है। यहाँ मन्त्र को पदस्थ बताया गया है और इसके गतागत, सुविक्षिप्त, संगत और सुसमाहित नामक चार भेद माने गये हैं। मालिनीविजय में कुलचक्र की व्याप्ति (19/30-48) और शिवज्ञान के प्रसंग (20/1-7, 18-26) में भी इस विषय का विवरण मिलता है। जैन ग्रन्थ ज्ञानार्णव के 35वें प्रकरण में पदस्थ ध्यान वर्णित है। इसमें वर्ण और मन्त्रों की ध्यानविधि बताई गई है। योगिनी हृदय (1/42) में बताया गया है कि पद में पूर्णगिरी पीठ की स्थिति है। दीपिकाकार ने इसकी व्याख्या की है कि पद अर्थात् हंस – वाण का आधार हृदय है। वहीं अन्यत्र (3/94) इसको विघ्नरूप माना है। इसीलिये 3/137 की व्याख्या में अमृतानन्द द्वारा उद्धृत एक प्रामाणिक वचन में बताया गया है कि पद से मुक्त होने पर ही वास्तविक मुक्ति मिलती है। कौलज्ञाननिर्णय में एक स्थान पर (पृ. 4) पद का अर्थ ध्यान तथा अन्यत्र (पृ. 90) माया से विमोहित जीव किया है। वहीं (पृ. 53) यह भी बताया गया है कि इसके आठ भेद होते हैं। आणव उपाय के प्रसंग में इस शब्द की चर्चा आ चुकी है।
Darshana : शाक्त दर्शन

पद-अध्वन्

आणवोपाय की कालाध्वन् नामक धारणा में आलंबन बनने वाला तीसरा मार्ग। इस धारणा में प्रमाण अंश की प्रधानता रहती है। इस उपाय में साधक मंत्रों के समाहार रूप तथा प्रमाणस्वरूप पद को अपनी धारणा का आलंबन बनाते हुए इसके समस्त स्वरूप को दृढ़तर भावना द्वारा अपने शुद्ध स्वरूप से व्याप्त कर लेता है। इसके सतत् अभ्यास से साधक को अपने शिवभाव का आणव समावेश हो जाता है। (तं.सा.पृ. 47, 61, 112)। काल एक अमूर्त काल्पनिक तत्त्व है। इसे क्रिया क्षणों द्वारा मापा जाता है। उनमें भी सूक्ष्मतर क्रिया क्षण जानने की क्रिया में प्रकट होते हैं। जानना सदा सशब्द होता है क्योंकि शब्द के माध्यम से ही जानने का आभासन होता है। शब्द के तीन रूप होते हैं। उसके सूक्ष्मतर रूप को वर्ण, सूक्ष्म रूप को मंत्र और स्थूल रूप को पद कहते हैं। पद का ही आश्रय पदाध्वन् योग में लिया जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पदस्थ

1. प्राण से एकरूपता प्राप्त कर लेने पर योगी की दशा। अपने वास्तविक शुद्ध एवं परिपूर्ण संविदात्मक स्वरूप को पहचानने के प्रत्येक प्रमेयात्मक अध्वन् अर्थात् मार्ग का आधार मूलतः प्राण ही बनता है। इस प्रकार सभी संकल्पों एवं विकल्पों का आश्रयस्थान भी प्राण ही है। संकल्पों और विकल्पों को इस प्रकार जानने तथा इनके आश्रयस्थान प्राण से एकरूपता प्राप्त करने को पद कहते हैं। ऐसी एकरूपता पर स्थिति हो जाने पर योगी को पदस्थ कहते हैं। इस प्रकार प्राण से एकात्मकता प्राप्त कर लेने पर संकल्पों से भी एकात्मकता प्राप्त हो जाती है। (तं.आ.आ. 1.-254, 255)।
2. योगियों की शाब्दी परंपरा में स्वप्न दशा में ठहरे हुए योगी को भी पदस्थ कहते हैं और स्वप्न दशा का भी एक नाम पदस्थ है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पदार्थ-विपर्यास

पदार्थों के स्वाभाविक धर्मों का अन्यथा हो जाना, जैसे अग्नि का अपने स्वाभाविक उष्णत्व को त्यागकर शीतल हो जाना। कोई योगी जब अणिमादियुक्त होते हैं तब वे अपने अलौकिक शक्ति के बल पर भौतिक पदार्थों के स्वभाव में विपर्यास कर सकते हैं या नहीं – यह प्रश्न उठता है। योगशास्त्र का कहना है (द्र. व्यासभाष्य 3/45) कि समर्थ योगी पदार्थों के धर्मों का विपर्यास (= अन्यथाभाव) नहीं कर सकते, क्योंकि इस ब्रह्माण्ड के पदार्थधर्म प्राक्सिद्ध हिरण्यगर्भ के संकल्प के अनुसार हैं, अतः ब्रह्माण्डवासी कोई सिद्ध पुरुष उन धर्मों का अन्यथात्व नहीं कर सकते।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

पर तत्त्व

छत्तीस तत्त्वों (देखिए) से उत्तीर्ण तथा इन सभी का परिपूर्ण सामरस्यात्मक अनुत्तर तत्त्व। (देखिएपरम शिव)। इसे सैंतीसवें तत्त्व के रूप में माना गया है। छत्तीस तत्त्वों का उदय इसी में से होता है और उनका लय भी इसी के भीतर होता है। वह इसी की स्वभावभूत इच्छा के बल से उसी के अनुसार होता है। इसी को परिपूर्ण परमेश्वर कहा जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

पर भैरव

देखिए भैरव (1)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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