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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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प्राण

1. प्राण, अपान आदि पाँच प्राणों में से प्रथम प्राण। विषयों का उत्सर्ग करने वाली जीवनवृत्ति जो जाग्रत् और स्वप्न दशाओं में चलती रहती है। हृदय से उठकर बाह्य द्वादशांत तक संचरण करने वाली प्रश्वास वायु। (ई.प्र.वि.सं. 2 पृ. 244-245)।
2. खात्मा अर्थात् शून्य प्रमाता (देखिए) भेद की ओर उन्मुख होता हुआ जिस प्रथम परिणाम को प्राप्त होता है उसे ही प्राण, स्पंदी, ऊर्मिक, स्फुरता आदि कहा जाता है। सृष्टि क्रिया के प्रति उन्मुख बने हुए संवित् तत्त्व के प्रथम परिणाम को प्राण कहा जाता है। इसे प्राणन शक्ति और जीवन शक्ति भी कहा जाता है इसी शक्ति से युक्त पदार्थ को प्राणी कहा जाता है। प्राण, अपान आदि पाँचों प्राणों में यही प्राणशक्ति स्पंदित होती है। इस प्रकार इन पाँच प्राणों को व्याप्त करके ठहरने वाला मूल प्राण। (तं.आ.आ. 6-11 से 14)। यह जीवनशक्ति अकल से लेकर सकल तक सभी प्राणिवर्गो में भिन्न भिन्न प्रकारों से जीवन व्यापारों को चलाती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्राण कुण्डलिनी

अनच्क कला की और आणव उपाय की व्याख्या के प्रसंग में प्राण शक्ति के संबन्ध में कहा जा चुका है। इसको कुण्डलिनी इसलिए कहते हैं कि मूलाधार स्थित कुण्डलिनी की तरह इसकी भी आकृति कुटिल होती है। जिस प्राण वायु का अपान अनुवर्तन करता है, उसकी गति इकार की लिखावट की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होती है। अतः प्राण शक्ति अपनी इच्दा से ही प्राण के अनुरूप कुटिल (घुमावदार) आकृति धारण कर लेती है। प्राण शक्ति की यह वक्रता (कुटिलता=घुमावदार आकृति) परमेश्वर की स्वतन्त्र इच्छा शक्ति का ही खेल है। प्राण शक्ति का एक लपेटा वाम नाड़ी इडा में और दूसरा लपेटा दक्षिण नाडी पिंगला में रहता है। इस तरह के उसके दो वलय (घेरे) बनते हैं। सुषुम्ना नाम की मध्यनाडी सार्ध कहलाती है। इस प्रकार यह प्राण शक्ति भी सार्धत्रिवलया है। वस्तुतः मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में ही प्राण शक्ति का भी निवास है, किन्तु हृदय में उसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति होने से ब्राह्मणवशिष्ठ न्याय से उसका यहाँ पृथक उल्लेख कर दिया गया है। इसका प्रयोजन अजपा (हंसगायत्री) जप को सम्पन्न करना है। इस विषय पर विज्ञानभैरव के 151 वें श्लोक की व्याख्या में पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।
भर-पेट भोजन-पानी पाने से मोटी अक्ल के आरामतलबी आदमी का शरीर की नहीं, प्राण शक्ति भी मोटी हो जाती है। बाद में सद्गुरु का उपदेश पाकर जब वह योगाभ्यास में लग जाता है, कुम्भक प्रभृति प्राणायामों का अभ्यास करता है, तो धीरे-धीरे उनके शरीर के मोटापे के साथ ही प्राण शक्ति भी कृश होती जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है। शोत्र, चक्षु, नासिका, मुख, उपस्थ प्रभृति प्राण और अपान आदि वायुओं के निकलने के मार्गों को रोक देने पर वायु की गति ऊपर की ओर उठने लगती है। मूलाधार में अथवा हृदय में विद्यमान प्राण शक्ति पद्धति के अनुसार सुषुम्ना मार्ग के अथवा मध्यदशा के विकास के कारण द्वादशान्त तक जाते-जाते अत्यत्न सूक्ष्म होकर अन्त में प्रकाश में विलीन हो जाती है। आधार से लेकर द्वादशान्त पर्यन्त क्रमशः धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ रही इस प्राण शक्ति के द्वादशान्त में प्रविष्ट हो जाने पर स्वात्मस्वरूप का अनुभव होने लगता है। योगशास्त्र की परिभाषा में इसको पिपीलस्पर्श वेला कहा जाता है, जिसमें कि प्राण के ऊपर उठते समय जन्माग्र से लेकर मूल, कन्द प्रभृति स्थानों का स्पर्श होने पर उसी तरह की अनुभूति होती है, जैसी कि देह पर चींटी के चलने से होती है। इसी अवस्था में योगी इसकी परीक्षा कर पाते हैं कि प्राण आज अमुक स्थान से चल कर अमुक स्थान तक उठा। इस स्थिति तक पहुँच जाने पर योगी का चित्र परम आनन्द से भर जाता है और वह इसी अन्तर्मुख वृत्ति में रम जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

प्राण प्रमाता

माया से संकुचित संवित् को अपना वास्तविक स्वरूप मानने वाला प्रमेय, प्रमाण आदि के प्रपंच के आभास से रहित प्रमाता। आकाश तुल्य शून्य प्रमाता ही अपनी शून्यता को दूर करने के प्रति उन्मुख होता हुआ और अपने को ग्राह्य विषय से भरना चाहता हुआ जब सुखमयता, भारीपन, हल्कापन आदि भावों का अत्यंत अस्फुट अनुभव करता हुआ आभासित होता है तो ऐसी अवस्था में उसी को प्राण प्रमाता कहा जाता है। इसे प्राण प्रलयाकल भी कहते हैं। यह सवेद्य सुषुप्ति का प्राणी होता है। (तं.आ.वि.खं. 4 पृ. 10)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्राण प्रलयाकल

प्राण में ही विश्रांत भाव से ठहरने वाले प्राणी। देखिए प्रलयाकल।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्राण योग (उच्चार/ध्वनि)

देखिए उच्चारयोग एवं ध्वनि योग।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्राण सुषुप्ति

देखिए सवेद्य सुषुप्ति।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्राणउच्चार/धारणा

देखिए उच्चार योग।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्राणलिंग

देखिए ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत ‘लिंग’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

प्राणलिंगार्चना

हृदय की द्‍वादश कमल कर्णिका में ज्योतिस्वरूप से विराजमान शिवविग्रह को ‘प्राणलिंग’ कह गया है और उसकी अर्चना ही ‘प्राणलिंगार्चना’ कहलाती है। इस ज्योतिर्मय प्राणलिंग के भावना-गम्य होने से उसकी अर्चना भी भावनामय वस्तुओं से ही की जाती है। वह इस प्रकार है- प्राणलिंग के अभिषेक के लिये क्षमा (सहनशीलता) ही जल है, नित्यानित्य वस्तुओं का विवेक ही उसे पहनाने का वस्‍त्र कहलाता है। सर्वदा सत्य बोलना ही उस लिंग के अलंकरणीय आभरण है। वैराग्य यही उसे पहनाने की पुष्पमाला है। चित्‍त के शांत हो जाने पर समाधि का लग जाना गंध-समर्पण है। निरहंकार-भावना ही अक्षत है। दृढ़ श्रद्‍धा ही धूप और आत्मज्ञान हो जाना ही दीप है। भ्रांति का निवृत्त हो जाना ही नैवेद्‍य बताया गया है। लौकिक व्यवहार में मौन हो जाना ही घंटानाद कहलाता है। विषय का समर्पण ही ताम्बूल है, अर्थात् प्रमेय वस्तुओं का प्रमाण रूप ज्ञान में, उस प्रमाण रूप ज्ञान का प्रमातृरूप आत्मा में और उस आत्मा का ज्योतिस्वरूप प्राणलिंग में लय का चिंतन करना ही विषय-समर्पण रूप ताम्बूल कहलाता है। यह प्रपंच शिव से भिन्‍न है, इस प्रकार की भेद-बुद्‍धि की निवृत्‍ति हो जाना ही प्रदक्षिणा है। उपासना करने वाली उस बुद्‍धिवृत्‍ति का भी अंत में उस ज्योतिर्लिंग में लय हो जाना ही नमस्कार-क्रिया है। वीरशैवदर्शन में इस उपर्युक्‍त भावनाओं से प्राणलिंग की अर्चना बताई गयी है। इसका तात्पर्य यह है कि साधक की बहिर्मुख बुद्‍धिवृत्‍तियों का निरोध होकर उसके अंतःकरण में उपर्युक्‍त सद्‍गुण, सद्‍ज्ञान और सद्‍भावनओं का उदय होना ही प्राणलिंग की अर्चना है। अतएव इस प्राणलिंग की अर्चना के लिये कोई निश्‍चित समय नहीं है। जब-जब साधक के मन में ये भावनायें उठती रहती हैं तब-तब यह प्राणलिंग अर्चना होती रहती है। (सि.शि. 12/3-8 पृष्‍ठ 6, 7; वी.आ.चं. पृष्‍ठ 456)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

प्राणलिंगि-स्थल

देखिए ‘अंगस्थल’ शब्द के अंतर्गत ‘प्राणलिंगी’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

प्राणापान

ऊपर हृदय से बाह्य द्वादशान्त तक जाने वाला प्राण और नीचे बाह्य द्वादशान्त से हृदय तक जाने वाला जीव नामक अपान, यह प्राण शक्ति का उच्चारण है। प्राण शक्ति इनका निरन्तर उच्चारण करती रहती है, अर्थात् प्राण और अपान के रूप में स्पन्दित होती रहती है। स्वच्छन्दतन्त्र (7/25-26) में प्राण और अपान को प्राण शक्ति का विसर्ग और आपूरण व्यापार बताया गया है। तदनुसार प्राण का अर्थ है श्वास छोड़ना और अपान का अर्थ है श्वास लेना। पालि बौद्ध वाङ्मय में इसके लिये आनापान (आश्वास-प्रश्वास) शब्द प्रयुक्त है। किन्तु वहाँ इनके अर्थ के विषय में विवाद है। आचार्य नरेन्द्र देव अपने ग्रन्थ बौद्ध-धर्मदर्शन में आश्वास-प्रश्वास शब्द पर टिप्पणी करते हैं- विनय की अर्थकथा के अनुसार ‘आश्वास’ साँस छोड़ने को और ‘प्रश्वास’ साँस लेने को कहते हैं। लेकिन सूत्र की अर्थ कथा में दिया हुआ अर्थ इसका ठीक उल्टा है। आचार्य बुद्धघोष विनय की अर्थ कथा का अनुसरण करते हैं। उनका कहना है कि बालक माता की कोख से बाहर आता है तो पहले भीतर की हवा बाहर निकलती है और पीछे बाहर की हवा भीतर प्रवेश करती है। तदनुसार आश्वास वह वायु है, जिसका निःसारण होता है और प्रश्वास वह वायु है, जिसका कि ग्रहण होता है। सूत्र की अर्थकथा में किया हुआ अर्थ पातंजल योगसूत्र के व्यासभाष्य के अनुसार है (पृ. 81)। योगभाष्य (पृ. 81) में वायु के आचमन (ग्रहण) को श्वास और निःसारण को प्रश्वास बताया गया है।
विज्ञानभैरव के ‘ऊर्ध्वे प्राणः’ प्रभृति श्लोक में प्राण और अपान शब्द का बुद्धघोष प्रदर्शित अर्थ ही स्वीकृत है। ऊर्ध्व और अधः शब्द का अर्थ पहले और बाद में किया जाना चाहिये। पहले प्राण बाहर निकलता है और बाद में अपान का प्रवेश होता है। अपान को जीव इसलिये कहा जाता है कि प्राण के बाहर निकलने के बाद अपान जब शरीर में पुनः प्रविष्ट होता है, तभी यह बोध हो सकता है कि शरीर में जीवात्मा विद्यमान है। अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव कहा जायेगा। अपान के कारण ही शरीर में जीवात्मा की स्थिति बनी रहती है, अतः स्वाभाविक है कि अपान को जीव के नाम से जाना जाय।
स्वच्छन्दतन्त्र (7/25-26) भी इसी स्थिति को मान्यता देता है। भगवद्गीता (5/27) की श्रीधरी टीका में प्राण और अपान के लिये उच्छवास और निश्वास शब्द प्रयुक्त हैं। लोक व्यवहार में संकेत (शक्ति=समय) के अनुसार शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं। कभी-कभी वे परस्पर विरोधी अर्थों में भी प्रयुक्त होने लगते हैं। जैसा कि प्राण और अपान तथा उनके पर्यायवाची श्वास-प्रश्वास शब्दों के विषय में देखने को मिलता है। इन शब्दों का हृदय स्थित प्राण वायु और पायु स्थित अपान वायु से कोई संबंध नहीं है, किन्तु प्राण शक्ति की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से ही इनका संबंध है। प्राण शक्ति की प्राण, अपान प्रभृति पाँच या दस वृत्तियाँ भी इनसे भिन्न हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

प्राणायाम

योग के आठ अंगों में प्राणायाम चतुर्थ है। ‘प्राणायाम’ शब्दगत ‘प्राण’ शब्द अवश्य ही श्वासवायु का वाचक है। आयाम का अर्थ निरोध है। अतः प्राणायाम का मुख्य अर्थ ‘श्वासक्रिया का रोध’ है। यह रोध योगशास्त्रीय उपाय द्वारा यदि हो तभी प्राणायाम योगांग होता है, अन्यथा नहीं।
हठयोगशास्त्र एवं पातंजल योगशास्त्र में प्राणायाम की प्रक्रिया सर्वथा एकरूप नहीं है। हठयोगीय प्राणायाम प्रधानतः वक्षसंचालनपूर्वक किया जाता है; पातंजल प्राणायाम उदरसंचालनपूर्वक। नासिका के सदैव दोनों छिद्रों द्वारा रेचनपूरण करना पातंजल प्रक्रिया है; हठयोग में मुख्यतया व्यासभाष्य 2/50 में तथा अन्य योगग्रन्थों में विस्तारतः मिलता है। प्राणायामाभ्यास में शरीर को ऋजु रखना आवश्यक है – वक्ष, कण्ठ एवं शिर को एक रेखा में रखना चाहिए। प्राणायामी को मिताहार आदि कई विषयों पर ध्यान देना चाहिए।
प्राणायाम यद्यपि वायु -आश्रित क्रिया है, पर इस क्रिया के माध्यम से ज्ञानविशेष का अभ्यास किया जाता था। यही कारण है कि इस अभ्यास से प्रकाश के आवरण का क्षय होता है (योगसूत्र 2/52)। हठयोगीय प्राणायामों में भी अंशतः यह लाभ होता है, यद्यपि उन प्राणायामों का मुख्य लाभ शारीरिक है (हठप्राणायाम के लिए स्वामी कुवलयानन्द कृत ‘प्राणायाम’ नामक ग्रन्थ दृष्टव्य है)।
रेचन-पूरण-विधारण का काल शनैः-शनैः बढ़ाया जा सकता है। वायु के आगमन-निर्गमन इतनी अल्पमात्रा एवं सूक्ष्मता के साथ किए जा सकते हैं कि नासाग्रस्थित तूला भी कंपित नहीं होती। प्राणायाम का अभ्यास देश, काल और संख्या के परिदर्शन के साथ किया जाता है; इस परिदर्शन का विवरण सारतः एकतर नासापुट से रेचनपूरण किए जाते हैं। हठयोग में प्राणायाम के जिन मुख्य आठ भेदों का उल्लेख मिलता है (उज्जायी, शीतली आदि), वे पातंजल दृष्टि में व्यर्थप्राय हैं (यद्यपि शारीरिक दृष्टि से उनकी जो निजी सार्थकता है, उसके विरोध में पातंजल शास्त्र का कुछ भी कहना नहीं है)। प्राणायाम-क्रिया सर्वथा वैज्ञानिक है; यथाविधि आचरित होने पर इससे शास्त्रोक्त लाभ होते ही हैं।
प्राणायाम प्रक्रिया में पूरण या पूरक का अर्थ है – नासा द्वारा धीरे-धीरे वायु का ग्रहण करना; रेचन या रेचक का अर्थ है – अत्यन्त धीरता के साथ पूरित वायु को छोड़ना। रेचन या पूरण के बाद तत्काल वायु का पूरण या रेचन न करने पर वायु का जो विधारण होता है, वह कुम्भक कहलाता है। पातंजल शास्त्र में बाह्यवृत्ति का अर्थ है – रेचनोत्तर वायु का ग्रहण न करके अवस्थित रहना; आभ्यन्तरवृत्ति का अर्थ है – पूरणोत्तर वायु का त्याग न कर अवस्थित रहना; स्तम्भवृत्ति का अर्थ है – रेचन-पूरण कर ध्यान न देकर श्वास-प्रश्वास का निरोध करना।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्राणायाम

प्राण की पूरक, कुंभक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभाविक रूप से बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील रहती हैं। हृदय स्थित कमलकोश में प्राण का उदय होता है। नासिका मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चलकर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है। यह बाह्य आकाश योगशास्त्र में बाह्य द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है। प्राण की इस स्वाभाविक गति को रेचक कहते हैं। बाह्य द्वादशान्त में अपान का उदय होता है और नासिका मार्ग से चलकर यह हृदयस्थित कमलकोश में विलीन हो जाता है। अपान की यह स्वाभाविक आन्तर गति पूरक कही जाती है। प्राण बाह्य द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षण मात्र के लिये स्थिर होकर बैठता है। यही प्राण की कुंभक अवस्था है। बाहर और भीतर दोनों स्थलों में निष्पन्न होने से इसके बाह्य और आन्तर ये दो भेद होते हैं। इस तरह से प्राण शक्ति की ये चार क्रियाएँ बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील हैं। अर्थात् प्राण और अपान की यह चतुर्विध गति पुरुष के प्रयत्न के बिना निरन्तर स्वाभाविक रूप से चलती रहती है। पुरुष जब अपने विशेष प्रयत्न से मध्यदशा के विकास के द्वारा क्रमशः अथवा एकदम इसकी गति को रोकता है, इस पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना चाहता है, तो प्राण और अपान की गति की यह अवरोध प्रक्रिया योगशास्त्र में प्राणायाम के नाम से जानी जाती है।
तन्त्रशास्त्र में भूतशुद्धि और प्राण प्रतिष्ठा की विधियाँ प्रसिद्ध हैं। ‘देवो भूत्वा दैवं यजेत्’ स्वयं देवता बनकर इष्टदेव की आराधना करे, इस विधि वाक्य के अनुसार साधक अपने देह में स्थित पाप पुरुष का, मल का शोष और दाह संपन्न कर देवत्वभावना को आप्यायित करता है। वायु बीज के उच्चारण के साथ का प्राणायाम का अभ्यास करने से शोषण, अर्थात् मल का नाश हो जाता है। अग्नि बीज के उच्चारण के साथ प्राणायाम का अभ्यास करने से दाह, अर्थात् वासनाओं का भी उच्छेद हो जाता है। सलिल बीज के उच्चारण के साथ प्राणायाम का अभ्यास करने से शरीर आप्यायित हो उठता है, ज्ञानरूपी अमृत से नहाकर पवित्र हो जाता है, देवतामय बन जाता है। इस प्रकार शोषण, दाहन और आप्यायन की सम्पन्नता के लिये भी प्राणायाम की उपयोगिता तन्त्रशास्त्र में मानी गई है।
Darshana : शाक्त दर्शन

प्राणोत्क्रमण दीक्षा

यह दीक्षा शिष्य को सद्यः शिव के साथ एक कर देती है। शिष्य के मरणक्षण को गुरु अपने ज्ञान बल से जान लेता है। तब मरणक्षण से जराभर पहले ब्रह्मविद्या के मंत्रों का उच्चारण करते करते शिष्य के प्राणों का पादांगुष्ठ से लेकर ब्रह्मरंध्र तक क्रम से पहुँचाकर उस द्वार से उनका उत्क्रमण करा देता है। तदनंतर शिष्य की आत्मा को मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति, कंचुक आदि पाशों में से ऊर्ध्व संक्रमण करवाता हुआ ब्रह्म विद्या के उन्हीं मंत्रों की सहायता से उसे माया के भी पार ले जाकर तथा शुद्ध विद्या के क्षेत्र से पार करा कर शिवशक्ति स्वरूप परमेश्वर के साथ उसे एक कर देता है। इस दीक्षा का विधान तंत्रालोक के तीसवें आह्मिक में विस्तारपूर्वक बताया गया है। इस दीक्षा को सद्योनिर्वाणदीक्षा या समुत्क्रमणदीक्षा भी कहते हैं। (स्व.तं., खं. 2, पृ. 94)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रातिपदावस्था

पाशुपत साधक क एक अवस्था।

पाशुपत मत के अनुसार साधक को साधना की प्रथम अवस्था में अपनी जीविका भिक्षावृत्‍ति से चलानी होती है, गुरु के चरणों में निवास करना होता है। साधना की यह अवस्था प्रातिपदावस्था या प्रथम अवस्था कहलाती है। इस अवस्था में साधक हाथों तथा भिक्षापात्र का शोधन करके, मंत्रों का उच्‍चारण करके देवता और गुरु से आदेश लेकर किसी ग्राम में किसी धर्मार्जित धन का उपयोग करने वाले गृहस्थी के घर से भिक्षा मांग कर लाए, उसे देवता को और गुरु को निवेदन करके, उनसे आदेश लेकर सारी भिक्षावस्तुओं को एक साथ मिलाकर खाए। ऐसे भिक्षाव्रत का पालन प्रातिपदावस्था में करना होता है। (ग.का.टी.पृ.4)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

प्रातिभ

योगसूत्र में कहा गया है कि पुरुषज्ञान (अर्थात् बुद्धि का पुरुष-सत्ता-निश्चय अथवा बुद्धिगत पुरुष-प्रतिबिम्ब का आलम्बन) के लिए स्वार्थसंयम आवश्यक है। पुरुषज्ञान होने से पहले जिन छः सिद्धियों का आविर्भाव होता है, उनमें प्रातिभ प्रथम सिद्धि है (3/36)। इस सिद्धि से सूक्ष्म, व्यवहित, दूरस्थ, अतीत एवं अनागत वस्तुओं का ज्ञान होता है। किसी-किसी के अनुसार 3/36 सूत्रोक्त प्रातिभ आदि सिद्धियाँ पुरुष -साक्षात्कार के बाह्य फल हैं जो कामना के बिना भी उत्पन्न होती हैं।
एक अन्य प्रातिभ ज्ञान भी है (योगसू. 3/33), जो विवेकज ज्ञान (योगसू. 3/54) का पूर्व रूप है। इस प्रातिभ नामक सिद्धि से अतीतानागतज्ञान, पूर्वजातिज्ञान, सर्वभूतरुतज्ञान आदि (जो 3/33 सूत्र से पहले उक्त हुए हैं) भी सिद्ध होते हैं, यह 3/33 का तात्पर्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रातिभ ज्ञान

बिना शास्त्र अध्ययन के, बिना दीक्षा के और बिना योगाभ्यास के स्वयमेव अनायास ही उदय होने वाला ज्ञान। ऐसा ज्ञान प्रायः मध्य तीव्र शक्तिपात का पात्र बने हुए साधक में स्वयमेव उदित होता है। उसे समय दीक्षा, अभिषेक, याग, व्रत आदि की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उसे न तो शिष्य ही कहा जा सकता है और न गुरु ही। उसके लिए एक और ही परिभाषा है – ‘शिष्ट’। कभी तो प्रातिभ ज्ञान सद्यः सुदृढ़ हो जाता है, परंतु कभी गुरु और शास्त्र की सहायता से ही दृढ़ता को प्राप्त कर जाता है। प्रातिभ ज्ञान के पात्र के विषय में यह माना जाता है कि शिव की शक्तियाँ उसे स्वयमेव उत्कृष्ट ज्ञान की दीक्षा देती हैं। उसी से उनमें ज्ञान का उदय हो जाता है। परंतु वह दीक्षा एक अंतः प्रेरणामयी दीक्षा होती है, कोई वैधी दीक्षा नहीं होती है। अतः उन्हें भी उस बात का कुछ पता ही नहीं चलता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रान्तभूमिप्रज्ञा

समाधिजात प्रज्ञा के एक उत्कृष्ट रूप का नाम ‘प्रान्तभूमि’ है। (‘प्रान्त है भूमि जिसकी’ वह प्रान्तभूमि है; प्रान्त = चरम, भूमि (= अवस्था)। यह प्रज्ञा सात प्रकार की है जैसा कि योगसूत्र 2/27 के भाष्य में विस्तार के साथ दिखाया गया है। इस प्रज्ञा के दो भाग हैं – कार्यविमुक्ति तथा चित्तविमुक्ति। प्रथम भाग में चार प्रकार की प्रज्ञा होती है, जो यथाक्रम हेय, हेयहेतु हान और हानोपाय से सम्बन्धित हैं (हेय आदि शब्द द्रष्टव्य)। द्वितीय चित्तविमुक्ति भाग में तीन प्रकार की प्रज्ञा होती है, प्रथम – बुद्धि की चरितार्थता के विषय में; द्वितीय – गुणविकारभूत बुद्धि आदि के स्वकारण में लय के विषय में; तथा तृतीय – गुणसंबंधातीत पुरुष की सत्ता के विषय में। इस सप्तविध प्रज्ञा से युक्त योगी जीवन्मुक्त कहलाते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्राप्‍ति

तप का तृतीय लक्षण।

पाशुपत साधक को जब योग साधना में लाभसंबंध होता है, अर्थात् उसको ऐश्‍वर्य प्राप्‍ति होने पर सिद्‍धियों की उपलब्धि होती है, तो वह प्राप्‍ति कहलाती है। प्राप्‍ति के हो चुकने पर एक तो उसमें अपरिमित ज्ञानशक्‍ति उबुद्‍ध होती है और दूसरे असंभव को भी संभव बनाने की क्रिया सामर्थ्य उसमें प्रकट हो जाती है। इस तरह से वह शिवतुल्य बन जाता है। (ग.का.टी.पृ.15)

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

प्राप्ति

यह अष्टसिद्धियों में एक है (द्र. व्यासभाष्य 3/45)। ‘पृथ्वी में रहकर ही हाथ की उंगली द्वारा चन्द्रमा को छूना’ अथवा ‘पाताल में रहकर ब्रह्मलोक को देखना’ प्राप्ति-सिद्धि का एक उदाहरण है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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