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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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प्रमाता (तृ) (पारमार्थिक)

समस्त प्रमाओं में स्वातंत्र्यपूर्वक विहरण करने वाला तथा उनके उदय और लय को करने वाला, समस्त प्रमारूपी नदियों का एकमात्र विश्रांति स्थान रूपी समुद्रकल्प परिपूर्ण संवित्स्वरूप परमेश्वर। प्रमातृ पद में तृ प्रत्यय कर्तृत्व का द्योतक है और कर्तृत्व स्वातंत्र्य का नाम है। परिपूर्ण स्वातंत्र्य एकमात्र परमेश्वर में ही है। अतः वही वस्तुतः एकमात्र प्रमाता है। शेष सभी लौकिक तथा अलौकिक प्रमातृगण उसी के आकार भेद हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रमाता (तृ) (व्यावहारिक)

शुद्ध एवं परिपूर्ण संवित् ही जब अपने स्वातंत्र्य से प्रमाण तथा प्रमेय के भेद का दहन करने वाली चिद्रूप वह्नि (देखिए) का रूप धारण करती है तो उस अवस्था में पहुँचने पर उसके इस परिमित रूप को ही प्रमाता कहते हैं। (तं.आ. 3-123, 124)। शैवदर्शन में सात प्रकार के प्रमाता माने गए हैं : अकल, मंत्रमहेश्वर, मंत्रेश्वर, मंत्र (विद्येश्वर) विज्ञानाकल, प्रलयाकल तथा सकल। (यथास्थान देखिए)। ये प्रमाता प्रमेयों को विविध दृष्टियों से देखते हैं, जानते हैं और उनके विषय में निश्चय करते हैं। मंत्र, मंत्रेश्वर आदि उनका विमर्शन मात्र करते हैं। दर्शन, निश्चय आदि माया के क्षेत्र में ही होते हैं। शुद्ध विद्या में और शक्ति क्षेत्र में केवल विमर्शन ही होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रमाद

योगसूत्रोक्त (1/30) नौ अन्तरायों में प्रमाद एक है। भाष्यानुसार इसका स्वरूप है – समाधि के साधनों का अभावन (= न करना)।
‘प्रमाद’ का शाब्दिक अर्थ है – प्रच्युति। अतः प्राप्त कर्त्तव्य से विमुख होना ही प्रमाद है (द्र. गीता 14/9 का शांकरभाष्य)। विरोधी विषय का संग ही मुख्यतया प्रमाद का हेतु होता है। चेष्टा न करने पर भी समाधि स्वतः सिद्ध हो जायेगी – यह समझकर यमादि अंगों का अभ्यास न करना योगक्षेत्र का प्रमाद है। आत्मज्ञान -प्राप्ति में प्रमाद कितना बाधक है, यह मुण्डक उप. 3/2.4 (न च प्रमादात् तपसो वाप्यलिङ्गात्) से जाना जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रयत्नशैथिल्य

जिन उपायों से आसन का अभ्यास दृढ़ होता है, उनमें से यह एक है (योगसूत्र 2/47)। आसन में बैठकर शरीर के अवयवों को ढीला छोड़ देना ही इस अभ्यास का स्वरूप है। इसमें यह देखना पड़ता है कि इस शैथिल्य के कारण शरीर में टेढ़ापन न हो जाए। आसन में बैठने पर शरीर के विभिन्न अंगों में जो पीड़ा या अस्वस्थता का बोध होता है (विशेषतः दुर्बलपेशी वालों में) वह प्रयत्नशैथिल्य से नष्ट हो जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रलय

पारमेश्वरी लीला की वह भूमिका, जिसमें समस्त बाह्य प्रपंच माया में पूर्णतया विलीन हो जाता है। (तं.सा.पृ. 55)। इस प्रलय के करने वाले अधिकारी भगवान् अनंतनाथ हैं।
प्रलय अवांतर
पारमेश्वरी लीला की वह भूमिका, जिसमें सारी त्रिगुणात्मक सृष्टि, समस्त कार्यतत्त्व और करण तत्त्व मूल प्रकृति में विलीन हो जाते हैं। (तं.सा.पृ. 54-5) इस प्रलय को भगवान् श्रीकंठनाथ करते हैं।
प्रलय महा
पारमेश्वरी लीला की वह भूमिका, जिसमें सदाशिव तत्त्व (देखिए) तक का समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म प्रपंच शक्ति में विलीन हो जाता है तथा अंततः शक्ति का भी शिव में लय हो जाता है। (तं.सा.पृ. 55-6)। इस प्रलय को अनाश्रित शिव ही स्वयं करते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रलयाकल

प्रलयकेवली। प्रलयकाल तक ही अकल अर्थात् कला से और उसके विस्तार से रहित रहने वाले प्राणी। सुषुप्ति में ठहरने वाले प्राणी। इन प्राणियों में आणवमल के दोनों प्रकारों की अभिव्यक्ति होने के कारण इनके प्रकाशात्मक स्वरूप तथा विमर्शात्मक स्वभाव, दोनों में ही संकोच आ जाता हे। परिणामस्वरूप ये प्राणी शून्य, प्राण, बुद्धि आदि जड़ पदार्थे में से किसी एक को अपना वास्तविक स्वरूप समझने लगते हैं। अपने क्रिया स्वातंत्र्य के अत्यधिक संकोच हो जाने के कारण ये शून्य गगन की जैसी स्थिति में तब तक सुषुप्त हो कर पड़े रहते हैं जब तक भगवान् श्रीकंठनाथ इन्हें नई प्राकृत सृष्टि के समय जगाते नहीं। इनमें कार्ममल भी सुषुप्त होकर ही रहता है। सवेद्य सुषुप्ति में रहने वाले प्राणियों में मायीय मल का भी प्रभाव रहता है। (ई.प्र.वि.2, पृ. 225)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्रवाह पुष्टि भक्ति

केवल भगवान् के लिए उपयोगी क्रियाओं में निरत जनों की वह भक्ति प्रवाह पुष्टि भक्ति है, जो अहन्ता ममता रूप संसार प्रवाह से मिश्रित हो। इसके उदाहरण निमि श्रुतिदेव प्रभृति हैं। (दृष्टव्य – चतुर्विध पुष्टि भक्ति की परिभाषा) (प्र.र.पृ. 83)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

प्रवृत्ति

त्रिगुण के प्रसंग में प्रवृत्ति का अर्थ है – ‘क्रिया’, जो रजोगुण का शील है (सांख्यकारिका 12)। योगसूत्र (2/18) में शब्दतः क्रिया को रजोगुण का शील कहा गया है। इस क्रियास्वभाव के कारण ही रजोगुण को ‘प्रवर्तक’, ‘उद्घाटक’ कहा जाता है (व्यासभाष्य 4/31)। सांख्यकारिका (13) में इसको ‘उपष्टम्भक’ कहा गया है, जिसका अर्थ है – प्रवर्तक। प्रवर्तन के अर्थ में ‘प्रवृत्ति’ का अर्थ ‘परिणत होना’, ‘परिणाम प्राप्त करना’ है – ‘इच्छा’, ‘संकल्प’ आदि के साथ इस प्रवृत्ति का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। ‘विषयों की ओर अन्तःकरण का जाना’ इस अर्थ में भी ‘प्रवृत्ति’ शब्द प्रयुक्त होता है। यह इच्छा के बाद उत्पन्न होती है जो चेष्टाविशेष है। कुछ सांख्याचार्यों का मत है कि जिस प्रकार बुद्धि का धर्म है ‘प्रख्या’ (विज्ञानरूप वृत्ति), उसी प्रकार संकल्पक मन का धर्म है, प्रवृत्ति, जो पाँच प्रकार की है – संकल्प, कल्पना, कृति, विकल्पन एवं विपर्यस्त -चेष्टा।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रशान्तवाहिता

व्यासभाष्य (1/13) में अवृत्तिक चित्त की प्रशान्तवाहिता को ‘स्थिति’ कहा गया है। चित्त के पूर्णतः वृत्तिहीन होने पर उसका प्रवाह संभव नहीं होता; अतः किसी-किसी के अनुसार अवृत्तिक का अर्थ है – राजस -तामस वृत्ति से शून्य अर्थात् अभीष्ट सात्विक वृत्ति से युक्त। अतः सात्विक वृत्ति की धारा ही प्रशान्तवाहिता है – यह सिद्ध होता है। ‘वाहिता’ कहने पर यह ध्वनित होता है कि यह सात्त्विक वृत्ति हर्ष-शोक आदि रूप तरंगों से रहित है। अन्य व्याख्याकारों के अनुसार अवृत्तिक चित्त का अपने में परिणत होते रहना (वृत्ति का उत्पादन न करके) ही प्रशान्तवाहिता है। यह अधिक संगत व्याख्या है। निरोधावस्थ चित्त की प्रशान्तवाहिता का उल्लेख योगसूत्र 3/10 में है। यहाँ प्रशान्तवाहिता का अर्थ है – व्युत्थान -संस्कार रहित निरोध -संस्कारों का प्रवाह।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रश्वास

कोष्ठगत (कोष्ठ यहाँ उरोगुहा है) वायु का जो स्वाभाविक बहिर्गमन या निःसारण होता है, वह प्रश्वास है। योगशास्त्र में प्राणायामप्रक्रिया में प्रश्वास का विशिष्ट स्थान है, क्योंकि प्रश्वासपूर्वक जो गति-अभाव (=बाह्य वायु का न लेना) है, वह बाह्यवृत्ति नामक प्राणायाम कहलाता है। पातंजल योगसंमत प्राणायाम में उदरसंचालन-पूर्वक श्वास-प्रश्वास करने की पद्धति स्वीकृत हुई है (हमारी परंपरागत मान्यता यही है); वक्ष को संचालित कर श्वास-प्रश्वास करने की पद्धति हठयोगसंमत प्राणायाम के लिए हैं। उद्घात आदि के साथ भी श्वास -प्रश्वास का सम्बन्ध है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रसंख्यान

प्रसंख्यान क्लेशक्षयकारक ध्यानविशेष का नाम है, जैसा कि व्यासभाष्य के विभिन्न वाक्यों से ज्ञात होता है (द्र. प्रसंख्यानेन ध्यानेन हातव्याः 2/11; प्रसंख्यानाग्निना प्रतनूकृतान् क्लेशान्, 2/2)। इस ध्यान से विषयों के दोष ज्ञात होते हैं – यह भी कहा जाता है (1/15 भाष्य)।
यह प्रसंख्यान विभूति-प्राप्ति का भी हेतु है। योगियों का कहना है कि प्रसंख्यान-हेतुक जो सिद्धियाँ होती हैं, उन पर वितृष्णा होने पर (अर्थात् सिद्धि के प्रति व्यर्थता की बुद्धि होने पर) साधक में ‘विवेकख्याति’ की पूर्णता होती है, जिससे ‘धर्ममेघसमाधि’ की प्राप्ति होती है। विवेकख्याति की यह पूर्णता ‘पर-प्रसंख्यान’ कहलाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रसव

प्र + सू धातु (अदादिगण) का अर्थ है – जन्म देना। अतः प्रसव शब्द का ‘जन्म’ अथवा ‘जन्म देने की क्रिया’ अर्थ होता है। प्रसव और अप्रसव शब्द का प्रयोग में व्यासभाष्य में कई स्थलों पर मिलता है। योगसूत्र में प्रसवविरोधी भाव के लिए ‘प्रतिप्रसव’ शब्द प्रयुक्त हुआ है (2/10, 4/34)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्रसाद

देखिए ‘अष्‍टावरण’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

प्रसाद-लिंग

देखिए ‘लिंग-स्थल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

प्रसादिस्थल

देखिए ‘अंगस्थल’ शब्द के अंतर्गत ‘प्रसादी’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

प्रसुप्त

अस्मिता आदि चार क्लेशों की वह अवस्था ‘प्रसुप्त’ कहलाती है जिसमें वे तब तक व्यापार या कार्य न कर सकें जब तक कोई उद्बोधक उपस्थित न हो (द्र. व्यासभाष्य 2/4)। (प्रसुप्त-अवस्था ‘प्रसुप्ति’ शब्द से भी अभिहित होती है)। यह बीजभाव है, अंकुर-रूप में आने से पूर्व की अवस्था है – ऐसा उपमा की भाषा से कहा जाता है। यह अनभिव्यक्त अवस्था है। प्रबल योगाभ्यास से क्लेशों की ऐसी अवस्था की जा सकती है। इस अवस्था में क्लेश क्रियाशक्ति से सर्वथा शून्य नहीं हो जाता – क्लेश शक्तिरूप अवस्था में रहता है, पर कार्योन्मुख भी रहता है। विदेह और प्रकृतिलीनों में क्लेश प्रसुप्त अवस्था में रहता है – ऐसा पूर्वाचार्यों का कथन है। यह अवस्था क्लेशों की दग्धावस्था नहीं है। प्राकृतिक कारणों से भी यह अवस्था हो सकती है; कुछ क्लेश बाल्यावस्था में अनभिव्यक्त रहते हैं पर यौवनकाल में व्यापारवान् हो जाते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्राकट्य त्रैविध्य

प्राकट्य के अर्थात् अभिव्यक्ति के तीन भेद हैं :
1. अनित्य की उत्पत्ति, जैसे, घट आदि की उत्पत्ति।
2. नित्य और परिच्छिन्न वस्तुओं में परस्पर समागम होना, जैसे, नित्य एवं परिच्छिन्न दो परमाणु परस्पर संबद्ध होकर द्वयणुक रूप में अभिव्यक्त होते हैं।
3. नित्य होता हुआ जो अपरिच्छिन्न (विभु) है, उसका प्रकट होना, जैसे, भगवान् का प्राकट्य।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

प्राकाम्य

अणिमादि अष्ट सिद्धियों में एक (द्र. व्यासभाष्य 3/45)। इसका साधारण लक्षण है – इच्छा का अनभिघात (= बाधा का अभाव), पर इसका वस्तुतः स्वरूप है वह संकल्पशक्ति जिससे किसी एक प्रकार की वस्तु का अन्य प्रकार की वस्तु की तरह उपयोग किया जा सके, उदाहरणार्थ, कठिन भूमि का व्यवहार तरल जल की तरह करना – भूमि में जल की तरह उन्मज्जन -निमज्जन करना। शास्त्र में श्रुत स्वर्गादि में तथा लोकदृष्ट जलादि में बाधाहीन गति का होना प्राकाम्य है – यह कोई-कोई कहते हैं (द्र. योगसारसंग्रह, अ. 3)। प्राकाम्य के स्थान पर ‘प्राकाश्य’ सिद्धि का उल्लेख भी क्वचित् मिलता है (द्र. दक्षिणामूर्ति स्रोत की मानसोल्लासटीका 10/15)। यह मत पातंजल संप्रदाय के आचार्यों में दृष्ट नहीं होता
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

प्राकृत अंड

देखिए निवृत्ति कला।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

प्राण

प्राण’ के विषय में सांख्ययोगीय ग्रन्थों में विशद विवेचन नहीं मिलता। हठयोग आदि के ग्रन्थों में प्राण के अवान्तर भेदों के व्यापार आदि के विषय में बहुविध बातें मिलती हैं, यद्यपि प्राण के मूलस्वरूप को जानने में ये ग्रन्थ सहायक नहीं हैं। प्राण के स्वरूप का कथन सांख्यकारिका 29, सांख्यसूत्र 2/31 (जो कारिकावत् है) तथा योगसूत्र 3/39 के भाष्य में मिलता है। इनके व्याख्यान में व्याख्याकारों में मतभेद हैं। किसी के अनुसार प्राण शरीरान्तर्गत वायुविशेष है और विभिन्न अङ्गों में रहकर विभिन्न प्रकार का व्यापार करने के कारण उनके पाँच भेद हैं। अन्य व्याख्याकार कहते हैं कि प्राण अन्तःकरण की वृत्तिविशेष हैं, जो शरीर को धारण करने में सहायक हैं और स्थानभेद से उनके पाँच भेद होते हैं। यह प्राण वायु-विशेष नहीं है। वायु और उसकी क्रिया प्राण नहीं हैं। यह मत ही संगत प्रतीत होता है, क्योंकि वायुभूत या भौतिक वायु से पृथक् करके ही प्राण का प्रतिपादन सर्वत्र किया गया है। वायुवत् संचार के कारण ही प्राण को ‘वायु’ कहा जाता है। एक मत यह भी है कि ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय की तरह प्राण भी बाह्य इन्द्रिय है, जिसका विषय है – बाह्य विषय को शरीररूप से व्यूहित करना। यह प्राण तमः प्रधान है; ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय क्रमशः सत्वप्रधान एवं रजःप्रधान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्वाचार्यों ने चूंकि प्राण को वृत्तिविशेष माना था, अतः पृथक् तत्व के रूप में प्राण की गणना नहीं की गई। विज्ञान भिक्षु ने यह भी कहा है कि महत्तत्त्व की क्रियाशक्ति प्राण है और यह निश्चयशक्ति -रूप बुद्धि से पहले उत्पन्न होता है (ब्रहम्सूत्रभाष्य 2/4/16)।
प्राण के पाँच भेदों (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) के व्यापार संबंधित प्रविष्टियों के अंतर्गत बताए गए हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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