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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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नेत्रत्रय

भगवान् शिव को त्र्यम्बक कहा जाता है। इनके तीनों नेत्र सदा उन्मीलित रहते हैं, किन्तु जीव दशा में तृतीय नेत्र निमीलित हो जाता है। इसकी स्थिति भाल, अर्थात् भ्रूमध्य में मानी जाती है। क्रम दर्शन में इसको मूर्तिचक्र की संज्ञा दी गई है और दक्षिण तथा वाम नेत्रों को क्रमशः प्रकाशचक्र और आनन्दचक्र कहा जाता है। ये तीनों चक्र क्रमशः प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय भाव के प्रतीक हैं। मूर्तिचक्र में मूर्धना, मोह और समुच्छ्राय की स्थिति रहती है। यह मूर्ति अन्दर और बाहर अहन्ता और इदन्ता के रूप में स्फरित होती हैं जब अहन्ता का भाव प्रबल होता है, तो इदन्ता का भाव तिरोहित हो जाता है और जब इदन्ता का भाव प्रबल होता है, तो अहन्ता का भाव तिरोहित हो जाता है। ये दोनों ही स्थितियाँ मोह के अन्तर्गत आती हैं। इसी प्रक्रिया से प्रमाता अथवा वह्निस्वरूप का परम प्रकाशमय परभैरव की संवित्ति पर्यन्त उत्कर्ष तथा पाषाण प्रभृति जड़ संवित्ति पर्यन्त अपकर्ष, अपनी महती स्वातंत्र्य शक्ति के कारण ही होता है। यही स्वातंत्र्य शक्ति यहाँ मूर्तिचक्र शब्द से बोधित हुई है।
दक्षिण नेत्र प्रकाशचक्र का प्रतीक है। प्रमेय पदार्थ को प्रकाशित करने वाला प्रमाण यहाँ प्रकाशचक्र के नाम से जाना जाता है। यह प्रमाण स्वरूप प्रकाशात्मक सूर्य द्वादशधा विभक्त है। बुद्धि के साथ कर्मन्द्रियाँ तथा मन के साथ बुद्धिन्द्रियाँ मिलकर इस विभाग को पूरा करती हैं। अहंकार की उक्त दोनों स्थतियो में अनुस्यूति रहती है। द्वादशधा विभक्त इस प्रमाण व्यापार से ही सारे प्रमेय प्रकाशित होते हैं। अतः यह प्रमाण व्यापार प्रकाशचक्र के नाम से अभिहित हुआ है।
वामनेत्र आनन्दचक्र का प्रतीक है। स्वात्मस्वरूप परमेश्वर जब इदन्ता के रूप में स्फरित होता है, तो वह प्रमेय (विषय), अर्थात् भोग सामग्री के रूप में प्रकट होकर सर्वत्र आनन्द की सृष्टि करने लगता है। यह सोम (चन्द्रमा) का अंश है। शब्द, स्पर्श आदि सभी वैद्य विषयों का इसमें अन्तर्भाव होता है।
इन्हीं तीन चक्रों से इच्छा, ज्ञान, क्रियात्मक शक्तियाँ, अग्नि, सूर्य, सोम नामक बिन्दु, भूः, भूवः, स्वः नामक व्याहृतियाँ, प्राण, अपान, उदान नामक वायु, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग नामक स्थान; सत्त्व, रज, तम नामक गुण; इडा, पिंगला, सुषुम्ना नामक नाडिया; देवयान, पितृयान और महायान नामक यान; स्थूल, सूक्ष्म, पर नामक अवस्थाएँ; कुल, कौल, अकुल नामक विभाग; मन्त्र, मुद्रा, निरीहा नामक रहस्यों की ही नहीं, त्रित्व संख्या विशिष्ट समस्त पदार्थों की सृष्टि होती है (महार्थमंजरी, पृ. 87-89)।
Darshana : शाक्त दर्शन

नेनहु

यह कन्‍नड़ शब्द है। वीरशैव संत-साहित्य में इसका प्रयोग मिलता है। ‘नेनहु’ शब्द का अर्थ होता है ‘महासंकल्प’, अर्थात् इस विश्‍व की उत्पत्‍ति के पूर्व परशिव में ‘एकोടहं बहु स्यां प्रजायेय’ (मैं अकेला ही अनंतरूप में हो जाऊं) इस प्रकार के जिस ‘महासंकल्प’ का उदय होता है, उसे वीरशैव संतों ने ‘नेनहु’ कहा है। इस संकल्प से ही वह शिव स्वयं अनंतरूपों में हो जाता है। (तों.व.को. पृष्‍ठ 200) इस शब्द का एक दूसरे अर्थ में भी प्रयोग होता है। वह है साधक का चिंतन, अर्थात् निश्‍चल मन से साधक जब शिव का चिंतन करता है, तब उस चिंतन को भी ‘नेनहु’ कहा जाता है। किंतु प्रधानतया यह शब्द शिव के उक्‍त संकल्प के अर्थ में ही रूढ़ है (तों.व.को.पृ. 201)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

नैष्कर्म्य

समस्त ऐहिक और आमुष्मिक उपाधियों से निरपेक्ष होकर भगवान् में ही अंतःकरण को लगा देना नैष्कर्म्य है। लौकिक फल की कामना आदि ऐहिक उपाधि है तथा स्वर्गादि की कामना आदि आमुष्मिक उपाधि है। इनसे रहित होकर भगवदनुरक्ति नैष्कर्म्य है (अ.भा.पृ. 1062, 1240)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

नैष्‍ठिक-भक्‍ति

देखिए ‘भक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

न्यास

तन्त्रशास्त्र में बताया गया है कि साधक स्वयं देवस्वरूप बनकर इष्टदेव की उपासना करे। एतदर्थ भूतशुद्धि, प्राणप्रतिष्ठा, शोष, दाह और आय्यायन विधि के ही समान विविध न्यासों का भी विधान है। देवता अथवा साधक के शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में इष्ट मन्त्र स्थित वर्णों का न्यास किया जाता है। तन्त्र और पुराण वाङ्मय में अनेक प्रकार के न्यासों का विवरण मिलता है। वर्ण विन्यास की पद्धति में अंगन्यास और करन्यास प्रमुख हैं। षडंग न्यास के नाम से ये प्रसिद्ध है। व्यापक न्यास में सिर से पैर तक तथा पैर से सिर तक अपने सम्पूर्ण इष्ट मन्त्र का विन्यास किया जाता है। जीव न्यास की विधि से प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। त्रिपुरा सम्प्रदाय में गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि और पीठ- इन षौढा न्यासों का विधान है। अतर्मातृका और बहिर्मातृका न्यासों का भी यहाँ विस्तार से वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त ऋष्यादि न्यास, सृष्ट्यादि न्यास मन्त्र, मूर्ति, दशांग, पंचाङ्ग, आयुघ, भूषण, श्रीकण्ठ, वशिनी प्रभृति न्यास भी विभिन्न प्रयोजनों के लिये उद्दिष्ट हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

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