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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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निरोधभूमि

चित्त की पाँच भूमियों में निरोधभूमि पंचम है। जब निरुद्ध रहना ही चित्त की सहज अवस्था हो जाता है, तब वह निरोधभूमि की अवस्था है। इस निरोधभूमि में समाधि होने पर वह निरोध समाधि कहलाता है। यह निरोधसमाधि दो प्रकार की है – भवप्रत्यय (यह कैवल्यसाधक नहीं होता) तथा उपायप्रत्यय (यह कैवल्यसाधक होता है)। उपायप्रत्यय निरोधसमाधि का नामान्तर असंप्रज्ञात समाधि है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निरोधलीला

भक्तों को प्रपञ्च की स्फूर्ति से रहित बना देने वाली भगवान् की लीला निरोधलीला है। इस लीला में प्रविष्ट भक्त सारे प्रपञ्च को भूल जाता है और भगवान के लीलारस का साक्षात् अनुभव करता है। (दृष्टव्य त्रिविध निरोध शब्द की परिभाषा) (भा.सु.11टी. पृ. 285)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

निरोधी / निरोधिनी

प्रणव की सूक्ष्मतर उपासना में अवधान दृष्टि में उसकी अत्यंत सूक्ष्म बारह कलाओं को लाना होता है। उनमें से निरोधी छठी कला है। इसका काल एक मात्रा का आठवाँ भाग होता है। बिंदु से आगे की आठों कलाएँ बिंदु का अनुरणन मात्र होती हैं। उस अनुरणन के भीतर अर्धचंद्र, निरोधी आदि कलाओं को अवधान की दृष्टि से साक्षात् पृथक् पृथक् अनुभव में लाना होता है। ऐसी अवधान दृष्टि का उन्मेष शिवयोगियों ही को होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

निर्बयलु

देखिए ‘सर्वशून्य-निरालंब’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

निर्बीजसमाधि

निर्बीजसमाधि वह है जिसमें संप्रज्ञातसमाधिजात प्रज्ञा और प्रज्ञाजात संस्कारों का भी निरोध हो जाता है। बीज का अर्थ क्लेश या आलम्बन है।
इस अवस्था में संस्कारों का भी निरोध हो जाने के कारण क्लेश (जो मुख्यतः मिथ्याज्ञान का वासना रूप है) सर्वथा उत्थानशक्तिशून्य हो जाता है। कोई भी प्राकृत पदार्थ चित्त के आलम्बन के रूप में इस अवस्था में नहीं रहता, अतः इस समाधि का ‘निर्बीज’ नाम सार्थक है। यह निर्बीज समाधि दो प्रकार की है – असंप्रज्ञात और भवप्रत्यय। भवप्रत्यय कैवल्य का अवश्यंभावी साधक नहीं है। किसी-किसी के अनुसार असंप्रज्ञात का ही एक भेद निर्बीज समाधि है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निर्माणचित्त

निर्माणचित्त वह चित्त है जिसको वे योगी निष्पादित कर सकते हैं जो अस्मितामात्र (यह षष्ठ अविशेष है) में समापन्न होने की शक्ति रखते हैं। सास्मित-समाधि सिद्ध योगी ही ऐसे चित्त का निर्माण (अपनी अस्मिता से) कर सकते हैं। ब्रह्मविद्या का उपदेश देने के समय सिद्ध योगी निर्माणचित्त का उपयोग करते हैं, जिससे उनका उपदेश शिष्य के मन को पूर्णतः भावित कर सके। यह चित्त अभीष्ट कार्य के बाद स्वतः निरुद्ध हो जाता है – यह चित्त आशयहीन होता है (योगसूत्र 4/6)। ‘निर्माणचित्त’ शब्द में चित्त का अर्थ मन है, क्योंकि अस्मितामात्र को इसका उपादान कहा गया है।
कोई योगी एक साथ एकाधिक निर्माणचित्त उत्पन्न कर सकते हैं। वे प्रत्येक चित्त के लिए पृथक् -पृथक् शरीर निर्माण भी कर सकते हैं। पर ये सशरीर चित्त योगी के मूल चित्त के अधीन ही रहते हैं। समाधिज निर्माणचित्त की तरह औषधि, मन्त्र आदि से भी निर्माणचित्त का निर्माण किया जा सकता है, पर इन चित्तों में आशय (= वासना) रह जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निर्माल्यम्

पाशुपत विधि का एक अंग।

मूर्ति विशेष पर चढ़ाई हुई पुष्पमाला को निर्माल्य कहते हैं। पुष्पों की माला बनाकर आराध्य देव की मूर्ति पर चढ़ाकर, फिर वहाँ से ग्रहण करके, उसको अपने शरीर पर धारण करना निर्माल्यधारण होता है। निर्माल्यधारण पाशुपत योगी की भक्‍ति की वृद्‍धि में सहायक बनता है और उसके पाशुपत धर्म के अनुयायी होने का चिह्न भी होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 11)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

निर्वाण कला

श्रीतत्त्वचिन्तामणि (6/48-50) में बताया गया है कि अमा कला के भीतर निर्वाण कला स्थित है। यह साधक को मुक्ति प्रदान करने वाली है, अतः इसे निर्वाण कला कहा जाता है। मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण, कैवल्य प्रभृति शब्द पर्यायवाची हैं। निर्वाण कला केश के अग्र भाग के हजारवें भाग से भी सूक्ष्म है, अतएव दुर्ज्ञेय है। यह प्राणियों की चैतन्य शक्ति है। इसी की सहायता से साधक योगी के चित्त में ब्रह्म ज्ञान का उदय होता है। ध्यान में इसका आकार अर्धचन्द्र के समान तिरछा है। इस निर्वाण कला के भीतर निर्वाण शक्ति का निवास है। बिन्दु-स्वरूपा यह निर्वाण शक्ति जीव को सामरस्यावस्था से उत्पन्न परम प्रेम की धारा से सदा आप्यायित करती रहती है। इस निर्वाण शक्ति के मध्य में स्थित सूक्ष्म स्थान में निर्मल शिवपद, परब्रह्म का स्थान है। योगी ही इसका साक्षात्कार कर सकते हैं। यह पद नित्यानन्दमय है। इसी को ब्रह्मपद, वैष्णव परमपद, हंसपद और मोक्षपद भी कहते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

निर्वाण दीक्षा

इस दीक्षा के द्वारा शिष्य के अंतस्तल में गुरु अपनी अनुग्रह शक्ति के द्वारा वास्तविक स्वरूप बोध की ज्योति को जगा देता है। इस दीक्षा को सूक्ष्मा दीक्षा भी कहा जाता। इसमें न तो बाह्य साधन अर्थात् मंत्र, मंडल, मुद्रा, द्रव्य आदि का ही उपयोग होता है और न ही प्राणायाम, प्रत्याहार आदि का अभ्यास ही करना पड़ता है। सयम दीक्षा (देखिए) के बाह्य आचार की भी यहाँ आवश्यकता नहीं रहती है। एक मात्र अनुग्रह ही यहाँ अपने प्रभाव से शुद्ध स्वरूप साक्षात्कार को जगा देता है। इस दीक्षा से साक्षात् शिवभाव की अभिव्यक्ति होती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

निर्विचारा समापत्ति

सूक्ष्म विषय पर जो दो समापत्तियाँ होती हैं, उनमें निर्विचारा एक है। 1/44 व्यासभाष्य में निर्विचारा का स्वरूप इस प्रकार दिखाया गया है – अतीत, अनागत और वर्तमान इन त्रिविध धर्मों से अनवच्छिन्न (सीमित न होकर), सर्वधर्मों का अनुपाती, तथा सर्वप्रकार से युक्त जो समापत्ति होती है, वह निर्विचारा है। सविचारा समापत्ति में कुशलता होने पर ही निर्विचारा समापत्ति होती है। यह समापत्ति शब्दार्थज्ञान के विकल्प से शून्य है। इस समापत्ति का स्पष्टीकरण लौकिक प्रज्ञा से संभव नहीं है। ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीता – इन तीन पदार्थों में यथामय रूप से निर्विचारा समापत्ति हो सकती है। अव्यक्त प्रकृति को लेकर निर्विचारा समापत्ति नहीं होती, पर चित्त लीन होने पर इस लीनावस्था की अनुस्मृतिपूर्वक अव्यक्त-विषयक सविचारा समापत्ति हो सकती है – यह किसी-किसी व्याख्याकार का मत है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निर्वितर्कासमापत्ति

स्थूलविषय में जो दो प्रकार की समापत्तियाँ होती हैं, उनमें निर्वितर्का द्वितीय है, जो सवितर्का से सूक्ष्म है। योगसूत्र में (1/43) कहा गया है कि स्मृति की परिशुद्धि होने पर स्वरूपशून्य की तरह जो पदार्थमात्र-निर्भासक समापत्ति होती है, वह निर्वितर्का है। भाषाव्यवहार के कारण जो विकल्पवृत्ति होती है, उस वृत्ति से शून्य होना ही स्मृतिपरिशुद्धि है। योगी की ज्ञानशक्ति ध्येय विषय में जब इतनी अधिक निविष्ट हो जाती है कि ज्ञान अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को मानो खो देता है, तब वह स्थिति ‘स्वरूपशून्य की तरह’ (स्वरूपशून्या इव) हो जाती है। पदार्थमात्रनिर्भास कहने का तात्पर्य है – सभी प्रकार की काल्पनिक धारणा से सर्वथा शून्य। समापत्ति आदि इस प्रकार के विषय हैं कि लोकिक प्रज्ञा से उनका कुछ भी स्पष्टीकरण नहीं होता। यही कारण है कि निर्विचारा समापत्ति को व्यासभाष्य में यद्यपि निस्तार के साथ समझाया गया है, पर उससे कुछ भी स्पष्ट धारणा नहीं होती। इस समापत्ति के विषय में दो बातें विशेष रूप से ज्ञातव्य हैं – (1) स्थूलविषयक चरम सत्यज्ञान इस समापत्ति के द्वारा होता है; तथा (2) इसमें समाधिज तत्त्वज्ञान भाषाज्ञान की सहायता के बिना होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निर्वृत्ति शक्ति

देखिए आनंद शक्ति।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

निवृत्‍ति कला

देखिए ‘कला’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

निवृत्ति कला

तत्त्वों के सूक्ष्म रूपों को कला कहते हैं। एक एक कला कई एक तत्त्वों को व्याप्त कर लेती है। पृथ्वी तत्त्व को व्याप्त करने वाली कला को निवृत्ति कला कहते हैं। पृथ्वी तत्त्व तक पहुँचने पर ही परमेश्वर की तत्त्वों को विकास में लाने की प्रक्रिया निवृत्त होती है और इसके आगे किसी भी अन्य तत्त्व की सृष्टि नहीं होती है। (त.सा.पृ. 109)। निवृत्ति कला को पार्थिव अंड भी कहते हैं। (तं.सा.पृ. 110)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

निष्कल जप

प्रणवांग अर्थात् ऊँ का परामर्श। जप (देखिए) चार प्रकार का होता है – निष्कल, हंस, पौद्गल तथा शाक्त। निष्कल को सर्वप्रथम एवं सर्वोत्कृष्ट जप माना गया है। यह न तो सशब्द होता है और न उपांशु। पूर्णतया मानस जप होने के ही कारण इसे निष्कल जप कहा जाता है। ऐसा होने के कारण ही इसकी अधिक महत्ता है। (शि.सू.वा.पृ. 68-9)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

निष्कल लिंग

देखिए ‘शून्य’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

निष्काम गति

ब्रह्मानुभूति के अभाव में होने वाली जीव की शुभ गति निष्काम गति है। इसके दो भेद हैं – यम गति और सोम गति। दम्भरहित होकर गृह्य सूत्रों में प्रतिपादित स्मार्तकर्मों के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली गति यम गति है तथा श्रौत कर्मों के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाली गति सोम गति है। ये दोनों ही निष्काम गति हैं और शुभ हैं। ब्रह्मानुभूति से होने वाली गति इससे भी उत्कृष्ट है और वह मुक्ति रूप है (अ.भा.पृ. 852)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

निष्‍ठा भक्‍ति

देखिए ‘भक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

निष्‍ठावस्था

अवस्था का एक प्रकार।
पाशुपत योगी की साधना की पंचमावस्था निष्‍ठावस्था कहलाती है, जिसे सिद्‍धावस्था भी कहा गया है। जिस अवस्था में बाह्य साधना की सभी क्रियाएं पूर्ण रूपेण शांत हो चुकी हों, वह अंतिम अचल अवस्था निष्‍ठावस्था कहलाती है। (ग.का.टी.पृ. 8)। इस अवस्था में साधक को आत्मा का पूर्ण बोध होता है। अतः न ही कोई मल शेष रहता है और न ही किन्हीं उपायों की आवश्यकता रहती है।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

नृत्य

पाशुपत धर्म की विधि का एक अंग।

पाशुपत संन्यासी को भगवान महेश्‍वर को प्रसन्‍न करने के लिए उसकी मूर्ति के सामने नृत्यशास्‍त्रानुसारी नृत्य करना होता है, अर्थात् हाथों पैरों व भिन्‍न – भिन्‍न अंगों का चालन व आकुञ्‍चन रूपी नृत्य गान के साथ-साथ करना होता है। (पा.सू.कौ.भा.पृ.13)। इस नृत्य को शैवधर्म की अनेकों शाखाओं में पूजा का एक विशेष अङ्ग माना जाता रहा है। अब भी दक्षिण में शिवमंदिरों में आरती के समय नृत्य किया जाता है। कालिदास ने भी महाकालनाथ के मंदिर में होने वाले नृत्य का उल्लेख किया है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

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