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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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निजानंद

आणव उपाय के उच्चार योग में प्रथम भूमिका का आनंद। उच्चार योग की प्राण धारणा में जब उस प्राणशक्ति को आलंबन बनाकर अभ्यास किया जाता है जो कि प्राण के उद्गम की अवस्था होती है तो उस प्राणशक्ति पर स्थिति हो जाने से जो आनंद अभिव्यक्त होता है, उसे निजानंद कहते हैं। (तन्त्र सार पृ. 38)। उच्चार योग की इस प्रथम भूमिका में प्राणशक्ति के रूप में प्रमातृ तत्त्व अथवा पुरुष तत्त्व पर ही विश्रांति होने पर निजानंद की अभिव्यक्ति होती है। (तं.आ. 5-44)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नित्याचार

देखिए ‘सप्‍ताचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

नित्यात्मा

आत्मतत्व के साथ शाश्‍वत योग।

पाशुपत मत के अनुसार युक्‍त साधक को आत्मा के साथ निरंतर योग होता है, अर्थात् वह आत्म तत्व के साथ सदैव एकाकार बनकर ही रहता है। सर्वदा चित्‍तवृत्‍ति का आत्मतत्व में ही समाधिस्थ होकर रहना नित्यात्मत्व कहलाता है। (अनुरूध्यमान चितवृत्‍तित्वं नित्यात्मत्वम्- ग.का.टी.पृ. 16)। नित्यात्मत्व अवस्था को प्राप्‍त साधक नित्यात्मा कहलाता है। (पा.सू.पृ. 5.3)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

नित्योदित-शान्तोदित

उदित शब्द का अर्थ है ऊपर गया हुआ, उठा हुआ, उगा हुआ। नित्योदित का अर्थ है जिसका नित्य उदय ही हो। संसार में जिसका उदय होता है, वह अस्त भी हो जाता है। इस प्रकार की उदित वस्तु को शान्तोदित कहते हैं। किन्तु जिसका सदा उदय ही हो, जो कभी अस्त न हो, वह नित्योदित है। स्वसंवित्ति अथवा आत्म चेतना के प्रकाशन की दो स्थितियाँ होती हैं – शान्तोदित और नित्योदित। शान्तोदित वह स्थिति है, जिसमें आत्मचेतना का आविर्भाव होता है, किन्तु फिर उसका तिरोभाव भी हो जाता है। नित्योदित स्थिति में आत्मचेतना का सदा आविर्भाव ही बना रहता है, कभी तिरोभाव नहीं होता। आत्मा तो नित्योदित है ही, उसमें हमारी संवेदना की स्थिति बराबर नहीं रहती। शक्तिसंकोच के सिद्ध हो जाने पर हमारी चेतना की नित्योदित स्थिति हो जाती है। मालिनीविजय (2/36-45) तथा तंत्रालोक (10//277-287) में महाप्रचय अथवा सततोदित दशा के रूप मे इसका वर्णन हुआ है। प्रत्यभिज्ञाहृदय (19-20 सू.) में नित्योदित समाधि और उससे प्राप्त होने वाली पूर्ण समावेश दशा की चर्चा भी इसी विषय को स्पष्ट करती है।
पांचरात्र आगम के ग्रन्थों में पर वासुदेव के स्वरूप को नित्योदित माना गया है। इसमें आविर्भाव और तिरोभाव, काल की कलना तथा परिणाम कुछ भी नहीं है। इसमें परम आनन्द सर्वदा विराजमान रहता है। व्यूह वासुदेव का स्वरूप शान्तोदित माना जाता है। इसका उदय होता है और अस्त भी होता है। सृष्टि आदि व्यापारों की निष्पत्ति, जीवों की रक्षा और उपासकों पर अनुग्रह करने के लिये व्यूह वासुदेव की अभिव्यक्ति होती है। सात्वतसंहिता के अलशिंग भाष्य (1/33-34) में बताया गया है कि ईश्वर की दो दशाएँ हैं – नित्योदित और शान्तोदित। नित्योदित दशा में वह केवल स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है और शान्तोदित दशा में वह अपनी विभूतियों का विस्तार करता है। इस व्याख्या से यह सिद्ध हो जाता है, कि शैव, शाक्त और वैष्णव सभी सम्प्रदायों में प्रयुक्त ये दोनों शब्द सर्वत्र समान अर्थ की ही अभिव्यक्ति करते हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

निद्रा

पाँच प्रकार की वृत्तियों में निद्रा एक है। वृत्ति चित्तसत्व का परिणाम है, अतः वृत्ति वस्तुतः एक प्रकार का ज्ञान है। योगसूत्रोक्त निद्रा सुषुप्ति-अवस्था नहीं है। इस अवस्था में जो ज्ञानवृत्ति रहती है, उसका नाम निद्रा है। जाग्रत् और स्वप्न रूप दो अवस्थाओं का अभाव होता है – तमोगुण के प्राबल्य के कारण। सुषुप्ति अवस्था आने से पूर्व जो तामस आच्छन्न भाव चित्तेन्द्रिय में उद्भूत होता है (जिससे प्राणी सुप्त हो जाता है) उस आच्छन्न भाव या जड़ता का ज्ञान ही निद्रारूप वृत्ति है। यह निद्रारूप ज्ञान विशेष ज्ञान है न निर्विशेष ज्ञान है, जिसका वर्णन ‘मैं कुछ नहीं जानता था’ इस रूप से किया जाता है।
सुषुप्ति-अवस्था में एक प्रकार की ज्ञानवृत्ति रहती है – यह अनुमान से सिद्ध होता है – जैसा कि व्याख्याकारों ने दिखाया हैं चित्तस्थैर्यकारी योगी निद्रावृत्ति का अनुभव प्रत्यक्षादि वृत्तियों की तरह ही करते हैं। मूर्छा आदि अवस्थाओं में भी जिस वृत्ति की सत्ता रहती है – वह भी यह ‘निद्रा’ ही है – यह वर्तमान लेखक का मत है, क्योंकि वह वृत्ति ‘अभावप्रत्ययालम्बना’ है (द्र. योगसूत्र 1/10)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निद्रा

उच्चार योग में अनुभव में आने वाली छः आनंद की भूमिकाओं में से किसी भी भूमिका में प्रवेश करने से पूर्व जिन पाँच बाह्य लक्षणों का उदय होता है, उनमें से चौथा लक्षण। आनंद, उद्भव (प्लुति) तथा कंप इन तीनों लक्षणों के स्फुट होने के पश्चात् जब बहिर्मुखी सभी वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं, तब परिणामस्वरूप ज्यों ही अपने अंतर्मुखी स्वभाव पर विश्रांति होने लगती है, तो जिस लक्षण का उदय होता है उसे निद्रा कहते हैं। साधक अभी अपनी संवित् रूपता में रूढ़ नहीं हुआ होता है अपितु अभी उसमें प्रवेश ही नहीं पा रहा होता है। इसी स्थिति में लगता है जैसे बहुत ही आनंददायक नींद आ रही हो। (तं.सा.पृ. 40; तं.आ.5-104)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

निमेष

1. क्षेमराज के अनुसार वह अवस्था, जिसमें समस्त प्रपंच शांत हो जाता है तथा शिवभाव पूर्णतया चमकने लगता है। उनके अनुसार जब शिवभाव का उन्मेष (देखिए) हो जाता है तो संपूर्ण जगत् का बाह्य रूप शांत हो जाता है और सभी कुछ प्रकाश के ही रूप में चमकने लगता है। (स्व.सं. पृ. 5, 9, 11)।
2. भट्टकल्लट एवं रामकंठ के अनुसार शिवभाव के बहिर उन्मेष से जगत् का उदय होता है तथा अंतः निमेष से जगत् का संहार होता है। (स्पंदकारिकावृ,पृ,. 1; स्पन्दविवृतिपृ. 7)। ईश्वर प्रत्यभिज्ञा के आगमाधिकार में ईश्वर तत्त्व की अवस्था को बहिर् उन्मेष और सदाशिव तत्त्व को अंतर निमेष कहा गया है। (ई.प्र. 3-1-3)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नियत धर्म जीववाद

ब्रह्मवाद का ही एकवेशीवाद नियत धर्म जीववाद है। जैसे, भगवान् ने अपने भोग की निष्पत्ति के लिए अग्नि के विस्फुलिंग (चिंगारी) के समान अपने अंश के रूप में जीवों को बनाया – यह आश्मरथ्य का जीव संबंधी सिद्धान्त है। शरीरादि संघात में प्रविष्ट चैतन्यमात्र अनादिसिद्ध जीव है – यह औडुलोमी आचार्य का मत है। इनके अनुसार साक्षात् चैतन्य ही शरीरादि संघात में प्रविष्ट हुआ जीव है। भगवान् का ही विषय भोक्तृ स्वरूप जीव है – यह काशकत्स्न का जीववाद है। अर्थात् भगवान् ही विषय भोक्ता के रूप में जीव कहलाता है (अ.भा.पृ. 525)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

नियति तत्त्व

नियत कार्यकारण भाव, नियत ज्ञातृज्ञेय भाव, नियत कार्यकर्तृत्व भाव, नियत कर्मफल भोग, नियम आदि को अभिव्यक्त करने वाला संकोचक तत्त्व। माया तत्त्व से विकास को प्राप्त हुए पाँच कंचुक तत्त्वों में से यह चौथा कंचुक तत्त्व है। इस तत्त्व के प्रभाव से पशु प्रमाता की संकुचित ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति और भी संकुचित हो जाती हैं जिसके कारण वह किसी नियत वस्तु को किसी नियत सीमा तक ही जान सकता है और किसी नियत कार्य को किसी नियत सीमा तक ही कर सकता है। इस प्रकार सभी कुछ के विषय में सभी कुछ न जान सकने और सभी कुछ न कर सकने की अति संकुचित अवस्था तक जो तत्त्व पहुँचाता है तथा किसी भी वस्तु या भाव के प्रति प्रमाता की आसक्ति या अनासक्ति के भाव को भी जो तत्त्व किसी विशेष अवधि में ही बाँधकर रखता है और इस तरह से माया प्रमाता की कला के विधा के और राग के क्षेत्रों को भी सीमित बना देता है, उसे नियति तत्त्व कहते हैं। (ई.प्र.वि.2 पृ. 209; तं.सा.पृ. 83)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

नियम

योग के आठ अंगों में नियम द्वितीय है (द्र. योगसूत्र 2/29)। नियम पाँच हैं – शौच, सन्तोष, तपः, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान (योगसूत्र 2/32)। यम मुख्यतया निषेधरूप है (हिंसा न करना, मिथ्या न कहना इत्यादि), नियम मुख्यतया विधिरूप है। वितर्कों के कारण नियम विरोधी भाव (अशौच, असन्तोष आदि) यदि चित्त में न उठे तो नियम स्थैर्य को प्राप्त होता है। इस प्रकार के स्थैर्यप्राप्त नियमों के कुछ असाधारण फल भी हैं; द्र. शौच आदि शब्द।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निरंजन

मुण्डकोपनिषद् (3/1/3) में कहा गया है कि निरंजन परम साम्य को प्राप्त कर लेता है। यहाँ निरंजन पद मुक्त जीव के लिये प्रयुक्त है। पाशुपत मत में पशु (जीव) के दो भेद बताये गये हैं – सांजन और निरंजन। उनमें से शरीर इन्द्रिय आदि से संबद्ध पशु सांजन और इनसे रहित पशु को निरंजन कहा गया है। तिर्यक् आदि के भेद से सांजन पशु के 14 प्रकार और निरंजन पशु के तीन प्रकार वहाँ निर्दिष्ट हैं। इनमें से उक्त मुण्डकोपनिषद् का वाक्य तृतीय प्रकार के निरंजन पशु से ही संबद्ध है। अन्य शैव आगमों में भी इनका उल्लेख मिलता है। वहाँ माया में पड़ा हुआ जीव सांजन और उससे अतीत निरंजन कहा जाता है। उपनिषदों में ही अन्यत्र (त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद्, 7/9) निरंजन पद परब्रह्म के पर्याय के रूप में व्यवहृत है। इस उपनिषद् में वैष्णव सिद्धान्त के अनुरूप ही परब्रहम का निरूपण किया गया है। अन्य वैष्णव आगमों में भी इसी अर्थ में यह शब्द प्रयुक्त है।
नाथ सम्प्रदाय के ग्रन्थों में अपर, पर, सूक्ष्म, निरंजन और परमात्मा नामक पाँच तत्त्व या पद वर्णित हैं। इनमें से निरंजन पद में सहजत्व, सामरस्य, सत्यत्व, सावधानता और सवंगत्व नामक गुणों की स्थिति मानी गई है। ये सब शिव के विविध रूप हैं। बौद्ध शास्त्रों में शून्य अथवा निर्वाण पद को निरंजन कहा जाता है। परवर्ती सन्त साहित्य में नाथ सम्प्रदाय अथवा बौद्ध सम्प्रदाय में मान्य अर्थ में ही इस पद का प्रयोग हुआ है।
गोरक्षनाथ सिद्ध विरचित अमरौघशासन (पृ. 8-9) में काम, विष और निरंजन तत्त्वों की चर्चा है। ब्रह्मदण्ड के मूलांकुर में इनकी स्थिति मानी गई है। इन्हीं तीन तत्त्वों का निरूपण तन्त्रालोक के तृतीयाह्निक (पृ. 112, 115, 170) में भी मिलता है। वहाँ इन तत्त्वों को क्रमशः इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्त्यात्मक माना है। इन शक्तियों के द्वारा अंजित होकर ही ब्रह्म नाना रूपों में प्रकट होता है। इन शक्तियों में समरसता स्थापित कर योगी निरंजन पद में प्रतिष्ठित हो जाता है।
विज्ञानभैरव की टीकाओं में निरंजन पद का अर्थ द्वादशान्त किया गया है। योगिनीहृदय के टीकाकार अमृतानन्द योगी रूपातीत स्थिति को निरंजन पद कहते हैं। हठयोगप्रदीपिकाकार स्वात्माराम योगी निरंजन शब्द को समाधि का पर्याय मानते हैं। इन सब प्रकार के अर्थों में प्रयुक्त होने वाला यह पद सम्प्रति प्रधानतः बौद्ध शास्त्र में स्वीकृत शून्यता अथवा निर्वाण तथा नाथ सम्प्रदाय में अभिमत शिव के निष्कल निरंजन पद के लिये ही व्यवहृत होता है। हिन्दी और मराठी आदि भाषाओं के कवियों ने इन्हीं अर्थों में इस शब्द का प्रयोग किया है। नेत्रतन्त्र (7/38) में भी सूक्ष्म ध्यान के द्वारा निरंजन परम पद की अभिव्यक्ति का उल्लेख मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

निरानंद

आणव उपाय में प्राण धारणा की भिन्न भिन्न स्थितियों के आनंद की छः भूमिकाओं में दूसरी भूमिका का आनंद। पुरुष तत्व या प्रमातृ-तत्त्व पर विश्रांति हो जाने के अनंतर जब उसकी विषयशून्यता पर भी भावना द्वारा सतत अभ्यास किया जाता है तो निरानंद नामक आनंद की दूसरी भूमिका की अभिव्यक्ति होती है। (तं.सा.य पृ. 38; तं.आ. 5-44)। यहाँ विषयशून्यता से प्रमातृ तत्त्व संबंधित सभी विषयों के अभाव से है। इस भूमिका में ऐसी ही शून्यता पर पुनः पुनः अभ्यास करना होता है। जिसकी परिणति निरानंद में होती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

निरालम्ब चित्

वीरशैव संतों ने शून्य तत्व की ‘सर्वशून्य-निरालम्ब’, ‘शून्यलिंग’ और ‘निष्कल-लिंग’ के नाम से तीन अवस्थाओं को माना है। ये तीनों अवस्थाएँ विश्‍व की उत्पत्‍ति की कारणावस्था से परे हैं। जब निष्कल-लिंग में कारणावस्था का उदय होने लगता है, तब उस निष्कल-लिंग से एक प्रकाश निकलता है। इस प्रकाश को ‘चित्’ कहते हैं। इस चित् का कोई अन्य आलम्ब अर्थात् आधार नहीं है, वह स्वतंत्र है। अतः उसे ‘निरालम्ब-चित्’ कहा जाता है। इसको ज्ञानस्वरूप होने से ‘ज्ञान-चित्’ और विश्‍व की उत्पत्‍ति का मूल कारण होने से ‘मूल चित्’ भी कहते हैं।

इस निरालम्ब चित् से सर्वप्रथम ‘अ’, ‘उ’ और ‘म’ इन तीन वर्णो की सृष्‍टि होती है। इन तीनों को ‘नाद’, ‘बिंदु’ और ‘कला’ कहते हैं। चिद्रूप निरालम्ब चित् से उत्पन्‍न होने के कारण ये तीनों भी चिद्रूप ही हैं। अतः इनको चिन्‍नाद, चिद्‍बिंदु, चित्कला कहा जाता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि ‘अ’ कार ही ‘चिन्‍नाद’, ‘उ’ कार ही ‘चिद्बिंदु’ और ‘म’ कार ही ‘चित्कला’ कहा जाता है।

अ, उ, म ये तीनों वर्ण जब अपने कारणीभूत ‘निरालम्ब-चित्’ से संयुक्‍त हो जाते हैं, तब ऊँकाररूपी मूल प्रणव की उत्पत्‍ति होती है। यह ऊँकार उस अखंड ‘चित्’ का एक व्यक्‍त स्वरूप होने से ‘चित् पिंड’ कहा जाता है। इस चित् पिंड को ही वीरशैव संतों ने ‘अनादि-पिंड’ कहा है। इस चित् पिंड में आनंदस्वरूप की भी अभिव्यक्‍ति होती है, अतः उस ऊँकार को ‘चिदानंद’ भी कहते है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि ‘चित् पिंड’, ‘अनादिपिंड’, और ‘चिदानंद’ ये तीनों ऊँकार के ही पर्याय हैं। वीरशैव दर्शन में इस ऊँकार से ही समस्त विश्‍व की सृष्‍टि मानी जाती है। (शि.श.को.पृ. 14,15; तों.व.को.पृ.17)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

निरालम्बनचित्त

जो चित्त आलम्बन से शून्य होता है, वह निरालम्बन कहलाता है। वैराग्य की पराकाष्ठा रूप जो परवैराग्य है, उसके अभ्यास से ही यह आलम्बन-हीनता होती है। चूंकि आलम्बन के कारण ही चित्त सक्रिय होता है (अर्थात् चित्त की सत्ता ज्ञात होती है), अतः जब चित्त आलम्बनहीन हो जाता है तब वह ‘अभाव प्राप्त की तरह’ हो जाता है (अभावप्राप्तमिव, व्यासभाष्य 1/18)। यह निर्बीजसमाधि की अवस्था है। परवैराग्य के बिना अन्य किसी भी उपाय से चित्त की यह अवस्था नहीं हो सकती।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निराशंस

किसी भी प्रकार की आकांक्षा से रहित शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संवित्-स्वरूप परमशिव। किसी भी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा से रहित शुद्ध चैतन्य तत्त्व। आकांक्षा, द्वैत भाव में ही संभव है। परमशिव शुद्ध प्रकाशात्मक शिव तथा शुद्ध विमर्शात्मक शक्ति का परिपूर्ण सामरस्यात्मक अनुत्तर संवित्स्वरूप है, जो पूर्ण अभेद की दशा है। समस्त प्रपंच उसी में उसी के रूप में स्थित है। परमशिव को इसी परिपूर्णता की दृष्टि से निराशंस कहा जाता है। (ई.प्र.वि. 1-1)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

निरुद्ध भूमि

निरुद्ध भूमि पाँच चित्तभूमियों में एक है (द्र. व्यासभाष्य 1/1)। यह प्रत्ययशून्य अवस्था है। व्याख्याकारों ने इस भूमि को ‘निरुद्धसकलवृत्तिक’ तथा ‘संस्कारमात्रशेष’ बताया है। निरोधसमाधि (1/18 योगसूत्र में उक्त) के अभ्यास से जब चित्त सरलता से दीर्घकाल -पर्यन्त प्रत्ययहीन होकर रहने में समर्थ हो जाता है, तब वह अवस्था निरुद्धभूमि कहलाती है। इस निरुद्धभूमि में समाधि होने पर वह असंप्रज्ञात समाधि कहलाती है, जिस प्रकार एकाग्रभूमि में समाधि होने पर वह संप्रज्ञात समाधि कहलाती है। ‘संस्कार शेष’ का अभिप्राय यह है कि इस अवस्था में संस्कार ही रहते हैं। निरोध एवं व्युत्थान-दोनों के संस्कार ही यहाँ ग्राह्य हैं। चूंकि निरोध-संस्कार के द्वारा व्युत्थान-संस्कार अभिभूत रहता है, अतः वह सक्रिय होकर प्रत्ययों का उत्पादन नहीं करता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निरुपक्रम कर्म

जिस कर्म का विपाक (= फल) आयु है, वह सोपक्रम अथवा निरुपक्रम होता है। निरुपक्रम कर्म वह है जो मन्द वेग से फल देता है। (उपक्रम=व्यापार)। निरुपक्रम कर्म में संयम करने पर संयमी को अपरान्त (=मरण) का ज्ञान होता है (योगसू. 3/22)। प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि आयुष्कर कर्म ऐकभविक (=प्रधानतः एक जन्म में ही निष्पन्न) होते हैं। व्याख्याकारों ने कहा है कि अन्य व्यक्ति के आयुष्कर कर्म में संयम करने पर उसके मरण का भी ज्ञान होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निरुपाधि-माट

देखिए ‘माट’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

निरोध-संस्कार

निरोध का संस्कार चित्त का अपरिदृष्ट धर्म है। निरोध (= वृत्तियों का उदय न होना) काल में चूंकि ह्रास-वृद्धि देखी जाती है, अतः यह स्वीकार करना होगा कि निरोध का भी संस्कार होता है। चूंकि यह संस्कार चित्त का धर्म है, अतः इसका प्रवाह भी संभव होता है, जिसको प्रशान्तवाहिता कहा जाता है। निरोध-संस्कार के साथ व्युत्थान-संस्कार का विरोध है; एक के द्वारा दूसरा अभिभूत होता रहता है; जिस समय व्युत्थान-संस्कार का अभिभव करके प्रबल निरोध-संस्कार उत्पन्न होता है, वह समय ‘निरोध-क्षण’ कहलाता है (योगसू. 3/9) और उस समय चित्त का जो परिणाम (यह अलक्ष्य है) होता है वह ‘निरोध-परिणाम’ कहलाता है। निरोध एवं निरोध-संस्कार दोनों ही अलक्ष्य हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

निरोधपरिणाम

चित्त (वृत्ति -संस्कार-धर्मों के धर्मी) के जो त्रिविध परिणाम हैं, उनमें निरोध एक है (अन्य दो हैं – समाधिपरिणाम तथा एकाग्रतापरिणाम)। 3/9 योगसूत्र में इसका लक्षण इस प्रकार दिया गया है – जिस समय व्युत्थानसंस्कार अभिभूत होते रहते हैं और निरोधसंस्कार प्रादुर्भूत (बलशाली होकर प्रकट) होते रहते हैं, उस समय चित्त-रूप धर्मी में जो परिणाम होता है, वह निरोधपरिणाम कहलाता है। यहाँ यह द्रष्टव्य है कि निरोधपरिणाम का सम्बन्ध संस्कार के साथ ही है, वृत्तियों के साथ नहीं तथा वृत्तियों में जिस प्रकार प्राबल्य-दौर्बल्य होते हैं, संस्कारों में भी तथैव प्राबल्य-दौर्बल्य होते हैं। व्युत्थान और निरोध – दोनों ही एक चित्तरूप धर्मी के धर्म हैं। चूंकि व्युत्थान के बाद निरोध होता है और निरोध भी गुणस्वभाव के कारण कालान्तर में टूट जाता है, अतः निरोध स्वयं परिणामी है। परिणामी होने के कारण निरोध के भी उत्कर्ष -अपकर्ष होते हैं – यह भी सिद्ध होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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