भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

त्रितत्त्व धारणा

1. आणवोपाय की तत्त्व अध्वा की धारणा का वह प्रकार, जिसमें साधक मंत्र महेश्वर को धारणा का आलंबन बनाकर उसी को अकल प्रमाता के रूप में तथा उसकी शक्ति के रूप में तथा उसके अपने स्वरूप में व्याप्त होकर ठहरा हुआ देखा करता है। इससे वह उसे परिपूर्ण परमेश्वरमय देखता हुआ सद्यः अपने शिवभाव के समावेश को प्राप्त करता है। (तं.आ. 10-5, वही वि. पृ. 6; मा.वि.तं. 2-7)।
2. आणवोपाय में अपने शिवभाव का समावेश प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली वह धारणा, जिसमें नर, शक्ति तथा शिव को क्रम से आधार बनाया जाता है। इस धारणा में नरभाव से शिवभाव में पहुँचने के लिए शक्ति ही प्रमुख साधन बनती है।
3. आणवोपाय की ही एक और धारणा, जिसमें अपने शिवभाव के समावेश को प्राप्त करने के लिए आत्मकला, विद्याकला तथा शिवकला (देखिए) को क्रम से अपने ही शुद्ध स्वरूप में देखते हुए भावना द्वारा व्याप्त करना होता है। (तं.सा.पृ. 111)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिपुरा

वामकेश्वर दर्शन में (नि.षो.उ.पृ. 85) त्रिपुरा ही परा संवित् अथवा परब्रह्म है। प्रपंचसार (9/2) में बताया गया है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी पहले उसकी स्थिति है। यही इस त्रिमूर्ति की जननी है। यह त्रयीमय है और प्रलयावस्था में त्रिलोकी की इसी में स्थिति रहती है। इसीलिये इस अम्बिका का नाम त्रिपुरा है। विवरणकार द्वारा उद्धृत श्लोक में (पृ. 571) वहीं बताया गया है कि शिव, शक्ति और आत्मा – इन तीनों तत्त्वों की पूरिका और त्रिलोकी की जननी होने से यह त्रिपुरा कहलाती है। नित्याषोडशिकार्णव (4/4-16) में भगवती त्रिपुरा का यह स्वरूप विस्तार से वर्णित है। वहाँ बताया गया है कि शक्ति से रहित परम पुरुष कुछ भी नहीं कर सकता। टीकाकारों ने त्रिपुरा पद की अनेक प्रकार की निरुक्तियाँ बताईं हैं। तीन शक्ति, तीन चक्र, तीन धाम, तीन बीज, तीन तत्त्व, तीन गुण, तीन कोण, तीन पीठ, तीन लिंग प्रभृति सभी तीन संख्या वाली वस्तुओं की यह जननी है, इन सबसे पहले इसकी स्थिति होने से यह त्रिपुरा कहलाती है। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तिरूप त्रिपुर (श्रृंगार, त्रिकोण) की भी यह जननी है। औपनिषद त्रिवृत्करण प्रक्रिया के प्रधान आधार तेज, जल और अन्न नामक तीनों तत्त्वों की यह पूरिका है। अथवा पुर शब्द का अर्थ शरीर भी किया जा सकता है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामक शरीरों को यही धारण करती है। लघुस्तव (श्लो. 16) में बताया गया है कि देवत्रय, अग्नित्रय, शक्तित्रय, लोकत्रय प्रभृति सभी तीन संख्या वाले पदार्थ भगवती त्रिपुरा के ही स्वरूप हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

त्रिब्रह्म

शाम्भवोपाय की मातृका की उपासना के क्रम में श, ष, और स, ये तीन वर्ण क्रम से शुद्ध विद्या तत्त्व, ईश्वरतत्व और सदाशिव तत्त्व के साक्षात्कार की अभिव्यंजना करते है। शुद्ध विद्या के अधिपति भगवान् अनंतनाथ हैं और शेष दो के ईश्वर भट्टारक और सदाशिव भट्टारक। ये तीनों ही इस प्रंपच का बृहंण अर्थात् विकास करते हैं अतः ब्रह्म कहलाते हैं। इनके साक्षात्कार के अभिव्यंजक ये तीन उष्म वर्ण इसीलिए त्रिब्रह्म कहलाते हैं। किसी किसी साधना में इन तीन वर्णो को महामाया, शुद्धविद्या और ईश्वर तत्त्व के अभिव्यंजक माना गया है। तब भी ये तीनों ब्रह्म ही हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिविध निरोध

अपनी शक्तियों से युक्त भगवान् द्वारा जगत में की जाने वाली क्रीडाएँ निरोध हैं। तामस, राजस, सात्त्विक तीन प्रकार के निरोध्य भक्तों के अनुसार निरोध भी तीन हैं – तामस, राजस और सात्त्विक। इन विविध निरोधों के द्वारा भक्तजन प्रपञ्च की ओर से निरोध पाकर भगवान् में आसक्ति प्राप्त कर लेते हैं (प्र.र.पृ. 159)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

त्रिविध भगवत्तनु

शांत, अशांत, मूढ़योनि ये तीन प्रकार के भगवत्तनु (शरीर) हैं। शांत शरीर सात्त्विक है, अशांत शरीर राजस है तथा मूढ़योनि शरीर तामस है। ये तीनों ही शरीर भगवान् की लीलाओं के साधन होने से भगवान् के ही तनु हैं (भा.सु. 11टी. पृ. 626)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

त्रिविधाक्षर ब्रह्म

अक्षर ब्रह्म तीन हैं। प्रथम – पुरुषोत्तम का व्यापि बैकुण्ठादि स्वरूप धाम अक्षर ब्रह्म हैं। “अव्यकतोSक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।” (गीता) द्वितीय – जिसकी संपूर्ण शक्तियाँ तिरोहित हैं, ऐसा सर्वव्यवहारातीत द्वितीय अक्षर ब्रह्म है। तृतीय – पुरुषोत्तम शब्द वाच्य श्रीकृष्ण स्वरूप तृतीय अक्षर ब्रह्म है (प्र.र.पृ. 55)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

त्रिविधात्मा

सामान्य जीव रूप, अंतर्यामी भगवद् रूप तथा विभूति रूप ये आत्मा के तीन भेद हैं (भा.सु.11 टी. पृ. 500)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

त्रिवृत्करण

तेज, अप् (जल) और पृथ्वी इन तीनों के प्रत्येक में अपने से भिन्न दो तत्त्वों का सम्मिश्रण त्रिवृत्करण है। जैसे, तेजस्तत्त्व में अप् और पृथ्वी तत्त्व का मिश्रण, अप् तत्त्व (जल) में तेजः और अप् तत्त्व का मिश्रण तथा पृथ्वी में तेजः और अप् तत्त्व का मिश्रण। इस प्रकार त्रिवृत्करण प्रक्रिया द्वारा प्रत्येक तत्त्व निरूपात्मक बन जाते हैं (अ.भा.पृ. 806)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

त्रिवृत्जन्म

शुक्ल, सावित्र और दैक्ष (याज्ञिक) ये त्रिवृत् जन्म हैं। ब्राह्मणादि के रूप में जन्म शुक्ल है। गायत्री में अधिकार की प्राप्ति सावित्र जन्म है तथा यज्ञ में दीक्षा प्राप्त हुए का दैक्ष जन्म है (भा.सु.पृ 74)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

त्रिसत्य

भूः, भुवः, और स्वःरूप तीनों लोक अथवा जीव, अन्तर्यामी और विभूति रूप त्रिविध आत्मा सत्य हैं जिसके, ऐसे भगवान् त्रिसत्य हैं। अथवा ज्ञान, बल और क्रियारूप त्रिविध शक्तियों से युक्त होने के कारण भगवान् त्रिसत्य हैं (त.दी.नि.पृ. 78)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

त्रिसर्ग

तीनों गुणों का कार्य देह सर्ग, इन्द्रिय सर्ग और अन्तःकरण सर्ग, ये त्रिसर्द हैं। भगवान् इन त्रिविध सृष्टि कल्पना के अधिष्ठानमात्र हैं, उन्हें वस्तुतः देहादि नहीं है। अथवा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक भेद से त्रिविध सृष्टि त्रिसर्ग है (भा.सु.11 टी. पृ. 22)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

त्र्यंबक मठिका

त्र्यंबकादित्य के द्वारा स्थापित की गई अद्वैत प्रधान शैव शास्त्र की मठिका। पंद्रहवें त्र्यंबकादित्य के पुत्र संगमादित्य के आठवीं शताब्दी में कश्मीर में ही स्थिरवास करने पर यह मठिका कैलास से आकर कश्मीर में ही स्थापित हो गई। (शि.दृ. 7, 114-119)। इस मठिका में भिन्न भिन्न आचार्य, ग्रंथकार और भाष्यकार प्रकट हुए, जिनमें से वसुगुप्त, भट्टकल्लट, सोमानंद, उत्पलदेव और अभिनव गुप्त प्रमुख हैं। अंतिम तीन गुरु अपने अपने समय में इस त्र्यंबकमठिका के प्रधान गुरु भी थे। इस मठिका के गुरु मुख्यतः त्रिक आचार के ही उपासक थे। शैवदर्शन की यह त्र्यंबक शाखा वर्तमान समय में भी किसी न किसी रूप में चल ही रही है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्र्यंबकादित्य

काश्मीर शैव दर्शन के प्रवर्तक। कलियुग में अभेद दृष्टि को लेकर श्रीकंठनाथ की ही आज्ञा से अवताररूप में प्रकट हुए सिद्ध पुरुष। (तं.आ.36-13)। इन्हें त्र्यंबक भी कहते हैं। आचार्य सोमानंद के अनुसार कलियुग के आगमन पर जिन सिद्ध पुरुषों के पास शैव दर्शन सुरक्षित था, वे कलापि ग्राम आदि अदृश्य स्थानों को चले गए, जिससे इस विद्या का उच्छेद हो गया। तत्पश्चात् अद्वैत शैव दर्शन को जनसाधारण को पुनः सुलभ करवाने के उद्देश्य से कैलास पर्वत पर विचरण कर रहे भगवान् श्रीकंठनाथ की प्रेरणा से मुनीश्वर दुर्वासा ने अपने मानस पुत्र त्र्यंबकादित्य द्वारा इस दर्शन के शिक्षण क्रम को पुनर्जीवित कर दिया। प्रथम त्र्यंबकादित्य कुछ समय तक कैलास पर्वत पर इस विद्या का प्रचार करते रहे। बाद में अपने ही मानस पुत्र द्वितीय त्र्यंबकादित्य को यह कार्य सौंप कर स्वयं सिद्धलोक के प्रति उत्क्रमण कर गए। यही क्रम चौदहवीं पीढ़ी तक इसी प्रकार चलता रहा। पंद्रहवीं पीढ़ी के त्र्यंबकादित्य ने बर्हिर्मुखतावश किसी ब्राह्मण कन्या का वरण कर संगमादित्य नामक पुत्र को उत्पन्न किया। (शिव दृष्टि 7, 107-119) देखिए त्र्यंबकमठिका। इस अद्वैत शैव दर्शन का पूर्ण विकास काश्मीर मंडल में ही होने के कारण इस दर्शन का नाम काश्मीर शैव दर्शन पड़ा है। वस्तुतः इस दर्शन का प्राचीन नाम त्र्यंबक-शैव-दर्शन है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App