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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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तुटि

1. दो क्षणों (देखिए) को तुटि कहते हैं। (स्व.तं. 11-199)।
2. प्रथम स्पंद। भट्ट कल्लट के अनुसार तुटिपात हो जाने से सर्वज्ञता तथा सर्वकर्तृता जैसी शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। (शि.दृ. 1-8; मा.नि.वा. – 177)। परमशिव में जब सृष्टि के प्रति अति सूक्ष्म सी उमंग उठती है परंतु अभी सृष्टि नहीं हुई होती है उस प्रथम परिस्पंद को भी प्रथम तुटि कहते हैं। (शि.दृ.वृ.पृ. 10)। उसी तुटि के साक्षात्कार से साधक को सर्वज्ञता और सर्वकर्तृता की प्राप्ति हो जाती है। परमेश्वर की परमेश्वरता भी अनुत्तर पद की अपेक्षा इस प्रथम तुटि में ही अभिव्यक्त होने लग जाती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तुर्य भू / तुरीया

देखिए तुर्यदशा।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तुर्यदशा

शुद्ध ज्ञानमयी अवस्था। वास्तविक आत्मसाक्षात्कार की आनंदमयी दशा। यह अवस्था शुद्ध चैतन्यमयी होती है। इस अवस्था में आनंदमयी शुद्ध चेतना को ही प्राणी अपने आप समझता रहता है। उसे शून्य, प्राण, बुद्धि आदि जड़ पदार्थों के प्रति आत्मता का अभिमान नहीं रहता है। वह इन सभी को तथा बाह्य जगत को भी शुद्ध संविद्रूपता से ही सना हुआ और व्याप्त हुआ देखता है। इस अवस्था के ऊपरी स्तरों पर आत्मा को अपने स्वभावभूत ऐश्वर्य की साक्षात् अनुभूति हुआ करती है। विज्ञानाकल से लेकर अकल प्राणी तक इसका उत्तरोत्तर विकास होता है। ये सभी प्राणी तुर्या की भिन्न भिन्न भूमियों में ठहरते हैं। (इ. प्र. 3-2-15; तन्त्रालोक 10-264, 265)। जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में यह अवस्था चैतन्यरूपता से व्याप्त होकर विद्यमान रहती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तुर्यद्वार

तुर्यदशा के अनुभव का स्थान तथा तुर्यातीत दशा में प्रवेश करने के लिए द्वार का कार्य करने वाला ब्रह्मरंध्र ही तुर्यद्वार कहलाता है। (स्व.तं.उ, 2, पृ. 281)। इस तुर्यद्वार को साधना का आलम्बन बनाकर अभ्यास करने वाला योगी तुर्यदशा में प्रवेश कर जाता है, इसी कारण इसे तुर्यदशा का द्वार कहा गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तुर्या सृष्टि

शुद्ध अध्वा (देखिए) की सृष्टि। विज्ञानाकल से लेकर अकलपर्यंत शुद्ध विद्या दशा और शक्ति दशा के सभी प्राणी इसी सृष्टि के अंतर्गत आते हैं। इस सृष्टि के प्राणी प्रायः संवित् स्वरूप ही होते हैं। इस सृष्टि का संपूर्ण व्यवहार तुर्या दशा में होने वाले व्यवहार की भाँति होता है। इस सृष्टि में ठहरने वाले प्राणियों का दृष्टिकोण भेदाभेद या पूर्ण अभेद वाला होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तुर्यातीत

तुर्यादशा (देखिए) से भी उत्तीर्ण पद। अनुत्तर एवं आनंद का परिपूर्ण सामरस्यात्मक परम पद। तुर्यदशा में शुद्ध एवं परिपूर्ण संविद्रूपता की अभिव्यक्ति मात्र होती है परंतु तुर्यातीत में तो शिव एवं शक्ति अर्थात् प्रकाश एवं विमर्श के परम समरस रूप परिपूर्ण आनंदात्मक संविद्रूपता की स्फुट अभिव्यक्ति होती है। यहाँ किसी भी प्रकार का कोई भी भेद संस्कार भी शेष नहीं रहता है, केवल पूर्ण एवं अनवच्छिन्न आनंद पर ही विश्रांति होती है। (तन्त्रालोक 10-278 से 281, 297)। तुर्या में समस्त प्रमेय-प्रमाणात्मक जगत् के अवभास से सर्वथा शून्य एकमात्र शुद्ध शिवरूपता ही चमकती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तुर्यादशा

देखिए तुर्यदशा।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

तुष्टि

सांख्यसम्मत ‘प्रत्ययसर्ग’ के जो चार भेद हैं, तुष्टि उनमें से एक है (द्र. सां. का. 46 तथा 50)। अभीष्ट विषय की प्राप्ति होने से पहले किसी के भ्रान्त वाक्य को सुनकर जो यह मिथ्या सन्तोष होता है कि उचित उपाय का अवलम्बन करने की आवश्यकता नहीं है, अभीष्ट फल स्वतः प्राप्त हो जाएगा, तुष्टि है। इस तुष्टि के कारण प्राणी न केवल चेष्टा से विरत हो जाता है, बल्कि संशय की निवृत्ति के लिए भी यत्न नहीं करता।
यह तुष्टि नौ प्रकार की है – चार आध्यात्मिक तुष्टियाँ तथा पाँच बाह्य तुष्टियाँ। प्रकृति स्वयं ही विवेकख्याति को उत्पन्न करेगी, ऐसा समझकर ध्यान आदि उपायों को छोड़ देना ‘प्रकृति’ तुष्टि है। प्रवज्या का ग्रहण करना ही विवेकख्याति के लिए पर्याप्त है – ऐसा समझकर ध्यानादि न करना ‘उपादान’ तुष्टि है। कालानुसार अथवा भाग्यानुसार स्वतः विवेकख्याति उत्पन्न होगी, यह समझकर ध्यानादि का अभ्यास न करना क्रमशः ‘कालतुष्टि’ और ‘भाग्यतुष्टि’ है। ये चार आध्यात्मिक तुष्टियाँ हैं। (कई व्याख्याकारों ने तुष्टि का संबंध विवेकख्याति के प्रकटीकरण से जोड़ा है। अन्य विषयों में भी कृत्रिम सन्तोष -रूप तुष्टि उद्भूत होती है, यह ज्ञातव्य है)।
बाह्य विषयों से संबंधित जो अर्जन, रक्षण, क्षय, संग या भोग तथा हिंसा है, उनमें दोष देखकर (उदाहरणार्थ अर्थोपार्जन दुःखकर है, अतः त्याज्य है, ऐसा सोचकर अर्जन आदि से विरत होना पाँच प्रकार की बाह्य तुष्टियाँ हैं (‘भोग के स्थल पर कहीं-कहीं अतृप्ति’ पाठ है, तात्पर्य दोनों का समान है)। प्राचीनतर आचार्यों के द्वारा ये नौ तुष्टियाँ अम्भः, सलिल आदि नामों से अभिहित होती थीं – यह सांख्यकारिका (50 का.) के टीकाकारों ने कहा है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

तृतीयावस्था

पाशुपत साधक की एक अवस्था।

पाशुपत साधना की जिस अवस्था में साधक को भिक्षावृत्‍ति से जीविका का निर्वाह करना होता है, वह साधना की तीसरी अवस्था तृतीयावस्था कहलाती है। इस अवस्था में साधक की तपस्या में दिन प्रतिदिन वृद्‍धि हो जाती है और उसके मल साफ होते जाते हैं। उससे वह अपने ऐश्‍वर्य के साक्षात् अनुभव के योग्य बन जाता है, जो अनुभव उसे चतुर्थावस्था में प्राप्‍त होता है। (ग.का.टी.पृ.5)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

तौष्टिक

तुष्टि (द्र. ‘तुष्टि’ शब्द) जिनका प्रयोजन है, वे तौष्टिक कहलाते हैं। ये अनात्मभूत ‘अव्यक्त’ आदि को आत्मा समझते हैं अथवा अज्ञानवश विषयत्याग को ही प्रकृत त्याग समझते हैं। कुछ तौष्टिक प्रकृतिलीन होते हैं; (द्र. प्रकृतिलय शब्द)। किसी-किसी के अनुसार तौष्टिक वे हैं, जो ‘आत्मतुष्टि’ (द्र. मनुसंहिता 2/6) को ही प्रमाण मानकर चलते हैं। ऐसे लोगों में भी अनात्मा में आत्मबुद्धि होती है, यह निश्चित है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

त्यागांग

देखिए ‘अंग’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

त्रयोदश तत्त्व धारणा

तेरह तत्त्वों को साधना का आलम्बन बनाकर की जाने वाली आणवोपाय की तत्त्वाध्वा नामक धारणा। इसे त्रयोदशी विद्या भी कहते हैं। साधक इस धारणा में सकल को आलम्बन बनाकर उसी के स्वरूप को अकल, मंत्रमहेश्वर, मंत्रेश्वर, मंत्र (विद्येश्वर) विज्ञानाकल तथा प्रलयाकल नामक छः प्रमाताओं के रूप में और उनकी छः शक्तियों के रूप में सभी को मिलाकर बारह तत्त्वों में तथा आलम्बनभूत सकल स्वरूप में व्याप्त होकर ठहरे हुए देखता है। इस प्रकार से उसे परिपूर्ण शिवरूपतया देखता हुआ अपने को भी तद्रूप ही देखता है। इस प्रकार के भावनात्मक अभ्यास से उसे परिपूर्ण शिवभाव का आणव समावेश प्राप्त हो जाता है जिसके अभ्यास से उसे पहले जीवन्मुक्ति और फिर विदेहमुक्ति का लाभ होता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिक (अपर)

नर, शक्ति तथा शिव नामक तीन तत्त्व। (पटलजी.वि. पृ. 2)। यह समस्त प्रपंच इन तीन तत्त्वों के त्रिक से बना हुआ है। यह निचला सांसारिक त्रिक है जिसमें साधक ठहरा है। (तं.आ.वि. 1 पृ. 20) नर जीव और जड़ जगत को कहते हैं। शिव इसका उद्गम-स्थान है। शक्ति इसके अवरोहण का और आरोहण का मार्ग है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिक (पर)

प्रकाश, विमर्श तथा इन दोनों की अनुत्तर समरसता। ई.प्र.वि. 1-8-10, 11)। परतत्त्व अर्थात् परमशिव का स्वरूप यही परत्रिक है। यह वह सर्वोत्तीर्ण त्रिक है जिसे साधक को प्राप्त करना होता है। (तं.आ.वि., 1, पृ. 7)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिक (परापर)

परमेश्वर की इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया नामक तीन सर्वप्रमुख शक्तियाँ। (शि.दृ. 1-3, 4)। जब साधक इन शक्तियों को अपने में अभिव्यक्त करके देख पाता है तो तभी उसे अपने परमशिवभाव पर पक्का विश्वास स्थिरतया जम सकता है। इस तरह से यह त्रिक नर को शिवपदवी तक पहुँचा देने वाला मध्यम त्रिक है, जिसे परापर त्रिक कहते हैं। (तं.आ.वि. 1, पृ. 16)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिक आगम

देखिए आगम (त्रिक)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिक आचार

यह आचार ज्ञान प्रधान और योग प्रधान साधना मार्ग है। इस आचार में एक उत्कृष्ट अभेदमयी समता की दृष्टि को अपनाना होता है। अतः इसमें समस्त विधिनिषेधों के प्रपंच ढीले पड़ जाते है। कुल-आचार की चर्यामयी साधना को यहाँ अत्यंत आवश्यक नहीं माना गया है। परंतु सर्वशिवतामयी दृष्टि के कारण उसका निषेध भी इस आचार में नहीं किया गया है। इस आचार को सर्वोत्कृष्ट आचार माना गया है, क्योंकि इसके उत्कृष्ट स्तर पर न तो मुद्रा, मंडल, होम आदि क्रियाकलापों की आवश्यकता पड़ती है और न ही मकारों के सेवन की। यहाँ तक कि अष्टांग योग की या हठ योग की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। साधक सहज योग के और सच्चे तत्त्व ज्ञान के अभ्यास के द्वारा अनायास ही अपने परमेश्वरात्मक स्वभाव को त्रिक आचार के द्वारा पहचान सकता है। (पटलत्री.वि.पृ. 91.92;163)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिक दर्शन

काश्मीर का शैव (प्रत्यभिज्ञा) दर्शन त्रिक दर्शन कहलाता है। त्रिक शब्द की अनेक व्याख्याएँ मिलती हें, किन्तु इसमें कुल, क्रम और प्रत्यभिज्ञा इन तीनों अद्वैतवादी दर्शनों के तत्त्वों की समष्टि होने से इसको यह नाम दिया गया है। तन्त्रालोक के टीकाकार जयरथ ने (1/18, पृ. 49) त्रिकशास्त्र को सिद्धा, नामक और मालिनी नाम के तीन खण्डों में विभक्त किया है। इनमें क्रिया-प्रधान तन्त्र को सिद्धा और ज्ञान-प्रधान तन्त्र को नामक बताया गया है। मालिनीमत में क्रिया और ज्ञान दोनों प्रतिपादित हैं। अभिनवगुप्त ने स्वयं ‘तत्सारं त्रिकशास्त्रं हि तत्सारं मालिनीमतम्’ (1/18) ऐसा कहकर इनमें मालिनीमत को प्रधानता दी है। क्षेमराज अपने विज्ञानोद्योत (पृ. 4) में सिद्धा, मालिनी और उत्तर यह नाम देकर इनका उत्तरोत्तर उत्कर्ष बताते हैं। नामक नाम का कोई तन्त्र हमारी दृष्टि में नहीं आया। क्षेमराज के ‘उत्तर’ नाम के आधार पर ऐसी कल्पना की जा सकती है कि जयरथ के ग्रन्थ में ‘नामक’ न होकर ‘वामक’ पाठ होना चाहिये। वामतन्त्र शिव के उत्तर मुख से उद्भूत माने जाते हैं। वामक के नाम से वामकेश्वर तन्त्र का भी ग्रहण किया जा सकता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

त्रिक-शास्त्र

देखिए आगम (त्रिक)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

त्रिकोण बीज

ए (देखिए)। अनुत्तर, आनंद तथा इच्छा के संघट्ट से बना हुआ एकार स्वरूप बीज। एकार में अनुत्तर तत्त्व की प्रधानता रहती है तथा इसमें इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया नामक तीन शक्तियाँ समरस अवस्था में ही रहती हैं। (शि.सू.वि.पृ. 30)। इसको इसलिए भी त्रिकोण बीज कहते हैं कि प्राचीन शारदा लिपि में इसका आकार एक ओर से त्रिकोणात्मक ही होता था। त्रिकोण जैसे आकार के कारण इसका नाम योनिबीज भी है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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