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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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चक्र

तन्त्र, हठयोग आदि शास्त्रों में चक्रसम्बन्धी विवरण विशेष रूप से मिलता है। कभी-कभी ‘पद्म’ शब्द भी प्रयुक्त होता है। इन शब्दों से शरीर के विभिन्न मर्मस्थल लक्षित होते हैं, जिनको लक्ष्य कर या जिनका आश्रय कर भावना -विशेष या ध्यान -विशेष का अभ्यास किया जाता है। ये चक्र वस्तुतः चक्राधार या पद्माकार नहीं हैं। ध्यान करने की सुविधा के लिए उन आकारों की कल्पना की गई है। ध्यानादि के समय चक्रगत बोधविशेष ही आलम्बन होता है – मांसादिमय शरीरांश नहीं। शरीरविद्या की दृष्टि से देखने पर ये चक्र वस्तुतः शास्त्रवर्णित रूप में शरीर में प्राप्त नहीं होते हैं। सर्वनिम्नस्थ मूलाधार चक्र में स्थित अधोगामी कुण्डलिनी नामक शक्ति (यह वस्तुतः देहाभिमान का काल्पनिक रूप है) को अभ्यास विशेष के बल पर ऊर्ध्वस्थ चक्रों में क्रमशः उठा कर मस्तिष्कस्थ सहस्रार पद्म में स्थित शिवरूपी परमात्मा में लीन करना षट्चक्र -मार्ग का मुख्य उद्देश्य है। शारीरिक क्रियाओं का रोध इस अभ्यास में अवश्य ही अपेक्षित होता है। इन चक्रों के साथ पृथ्वी आदि तत्व, भूः आदि लोक तथा अन्यान्य आध्यात्मिक पदार्थों का संबंध है।
चक्रों की संख्या में मतभेद है। षट्चक्र प्रसिद्ध हैं – (1) मूलाधार, (गुह्यदेशस्थित), (2) स्वाधिष्ठान (उपस्थदेश स्थित), (3) मणिपूर (नाभिदेश स्थिति), (4) अनाहत (हृदयदेशस्थित), (5) विशुद्ध (कण्ठदेशस्थित) तथा (6) आज्ञा (भ्रूमध्यस्थित)। मस्तिष्कस्थ सहस्रारिचक्र इनसे भिन्न है। नाथयोग आदि के ग्रन्थों में राजदन्तचक्र, तालुचक्र, घण्टिकाचक्र आदि चक्रों का उल्लेख भी मिलता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चतुर्थावस्था

पाशुपत साधक की एक अवस्था।

पाशुपत साधना की इस अवस्था में साधक को यथालब्ध से, अर्थात् बिना मांगे जो स्वयमेव ही भिक्षा रूप में मिले उसी से जीविका का निर्वाह करना होता है। यह साधक की वृत्‍ति हुई। साधक का देश अर्थात् निवास स्थान इस अवस्था में श्‍मशान होता है। अर्थात् साधक को साधना की इस उत्कृष्‍ट अवस्था में पहुँचकर श्मशान में निवास करना होता है। साधना की यह चौथी अवस्था चतुर्थावस्था कहलाती है। (ग.का.टी.पृ.5)। इस अवस्था में साधक का पाशुपत व्रत तीव्रता की ओर बढ़ता है। इस चतुर्थावस्था की साधना के अभ्यास से साधक को रुद्र सालोक्य की प्राप्‍ति होती है। (पा.सू. 4-19.20)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

चतुर्विध पुष्टि भक्ति

पुष्टि भक्ति चार प्रकार की होती है –
1. पुष्टि पुष्टि भक्ति, 2. प्रवाह पुष्टि भक्ति, 3. मर्यादा पुष्टि भक्ति और 4. शुद्ध पुष्टि भक्ति।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध पुष्टि भक्ति

1. जो पुष्टि भक्त पुष्टि से अर्थात् भजनोपयोगी भगवान् के विशिष्ट अनुग्रह से युक्त होते हैं; उनकी पुष्टि पुष्टि भक्ति होती है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध पुष्टि भक्ति

2. शास्त्र विहित क्रिया में निरत भक्तों की प्रवाह पुष्टि भक्ति है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध पुष्टि भक्ति

3. भगवत् गुण ज्ञान से युक्त भक्तों की मर्यादा पुष्टि भक्ति है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध पुष्टि भक्ति

4. भगवत् प्रेम से युक्त भक्तों की शुद्ध पुष्टि भक्ति है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध पुष्टि भक्ति

(प्र.र.पृ. 83)
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध मूल रूप

1. श्री कृष्ण शब्द का वाच्य जो पुरुषोत्तम स्वरूप है, वह भगवान् का ही एक मूल रूप है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध मूल रूप

2. अक्षर शब्द का वाच्यार्थ भूत व्यापक बैकुण्ठ रूप जो पुरुषोत्तम का धाम है, वह भी भगवान् का ही एक मूल रूप है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध मूल रूप

3. भगवान् का एक मूल रूप वह भी है, जिसमें भगवान् की समस्त शक्तियाँ तिरोहित होकर रहती हैं, अर्थात् प्रकट रूप में नहीं रहती हैं तथा भगवान का वह मूल रूप सभी व्यवहारों से अतीत रहता है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध मूल रूप

4. भगवान् का वह भी एक मूल रूप है जिस स्वरूप से वह अंतर्यामी होकर सभी पदार्थों में रहता है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुर्विध मूल रूप

उक्त चारों ही भगवान् के मूल स्वरूप माने गए हैं।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चतुष्पात्त्व

चतुष्पात्त्व भगवान का एक विशेषण है। भगवान के एक पाद के रूप में समस्त भूत भौतिक जगत्-तत्त्व है, तथा तीन अमृत पाद हैं, ये हैं – जनलोक, तपःलोक और सत्य लोक। (द्रष्टव्य अमृतपाद शब्द की परिभाषा) (अ.भा.पृ. 963)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चंद्र

देखिए सोम।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

चर-जंगम

देखिए ‘अष्‍टावरण’ के अंतर्गत ‘जंगम’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चर-लिंग

देखिए ‘लिंग-स्थल’ शब्द के अंतर्गत ‘जंगम-लिंग’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चर-स्थल

देखिए ‘चर-जंगम’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चर्या

उपाय का एक प्रकार।

पाशुपत धर्म की भस्मस्‍नान, भस्मशयन आदि क्रियाओं को चर्या कहते हैं। (ग.का.टी.पृ. 17)। चर्या त्रिविध कही गई है- दान, याग और तप। इनमें से दान ‘अतिदत्‍तम्’, याग ‘अतीष्‍टम्’ तथा तप ‘अतितप्‍तम्’, इन शीर्षकों के अंतर्गत आए हैं। चर्या के इन तीन प्रकारों के भी दो दो अंग होते हैं – व्रत तथा द्‍वार। व्रत गूढ़ व्रत के अंतर्गत आया है तथा द्‍वार क्राथन, स्पंदन मंदन आदि पाशुपत साधना के विशेष प्रकारों को कहते हैं।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

चर्या

सिद्धांत शैव में चर्या मंदिरों में की जाने वाली सेवा को कहते हैं और अट्ठाईस आगम शास्त्रों के चर्यापादों में उसी का सांगोपांग वर्णन मिलता है। परंतु काश्मीर शैव दर्शन में चर्या पद से पंचमकारों के सदुपयोग वाली तांत्रिक साधना ही को लिया जाता है। चर्यामार्ग एक तलवार की धार पर चलने का मार्ग होता है। लाखों में कोई एक साधक इस पर चल सकता है। (पटलत्री.वि.पृ. 281)। चर्या का प्रयोजन विषय भोग न होकर स्वचित्त परीक्षण ही होता है जब चर्या के पाँचों अंगों का सेवन करते हुए भी साधक का चित्त तत्त्व से विचलित नहीं होने पाता है तो आगे संसार का कोई भी विषय उसे ज़रा भर भी विचलित नहीं कर सकता है। वह संसार के समस्त व्यवहारों को करता हुआ भी अहोरात्र आत्मस्वरूप में ही रमण करता रहता है। भगवान कृष्ण जैसे साधक इस बात के उदाहरण हैं। (तं.आ.वि.3,पृ. 269)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन
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