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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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चैतन्य

सांख्ययोगशास्त्र में ‘चैतन्य’ और ‘चेतन’ समानार्थक हैं। दोनों शब्द चित्-स्वरूप पुरुष के वाचक हैं। ‘चेतन का भाव’ – इस अर्थ में चैतन्य शब्द इस शास्त्र में प्रयुक्त नहीं होता। ‘चैतन्यलक्षणः पुरुषः’ आदि शास्त्रवाक्यों में चैतन्य तथा पुरुष एक ही पदार्थ हैं – लक्षण को स्वरूप मानकर ऐसा प्रयोग किया गया है। चैतन्य और पुरुष एक पदार्थ होने पर भी ‘चैतन्य पुरुष का स्वरूप है’ ऐसा भेदपरक वाक्य प्रयुक्त होता है ‘ यह वाक्य विकल्पवृत्ति का उदाहरण है – ऐसा योगशास्त्र का कहना है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चैतन्य

आत्मा। (शि.सू. 1-9)। शरीर, प्राण, बुद्धि, शून्य आदि से उत्तीर्ण केवल परिपूर्ण तथा शुद्ध आत्मस्वरूप। संपूर्ण ज्ञानों और क्रियाओं में अपने परिपूर्ण स्वातंत्र्य से विचरण करने में समर्थ शुद्ध चेतनामय आत्म का ही चैतन्य कहलाता है। (शि.सू.वृ.पृ.1)। चैतन्य चिति रूपसंवेदना है। यह संवेदना ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति रूप स्वातंत्र्य से युक्त होती है। चैतन्य ही भाव का प्राणदायक होता है। चैतन्य वह सारतत्त्व है जिसके कारण वस्तु चेतन होती है। अतएव हर एक भाव की आत्मा, अर्थात् उसकी भावता का मूल-आधार, चैतन्य होता है। समस्त प्रमेय जगत् का वास्तविक स्वरूप यह चैतन्य ही है। (शि.सू.वा.पृ. 3)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

च्युति

मल का एक प्रकार।

पाशुपत दर्शन के अनुसार जब साधक का चित्‍त रुद्र तत्व में न लगकर वहाँ से च्युत हो जाए, अर्थात् ध्येय में से चित्‍त की स्थिर निश्‍चल स्थिति हट जाए, तो चित्‍त के ऐसे च्यवन को च्युति कहा गया है जो कि मलों का एक प्राकर है; क्योंकि इस तरह की च्युति से साधक बंधन में पड़ जाता है तथा उसकी मुक्‍ति में बाधा पड़ती है। (ग.का.टी.पृ. 22)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

च्युतिहानि

विशुद्‍धि का एक प्रकार।

पाशुपत दर्शन के अनुसार च्युतिहानि विशुद्‍धि का चतुर्थ भेद है। जब पाशुपत साधक की योग में इतनी दृढ़ स्थिति हो जाती है कि उस परावस्था से फिर च्युति (अध:पतन) नहीं होती है, तब वह च्युतिहानि रूप शुद्‍धि की प्राप्‍ति अंतत: साधक को मुक्‍ति प्रदान करने में सहायक बनती है क्योंकि उसका चित्‍त पर ध्यान में सतत रूप से समाहित रहता है। (ग.का.टी.पृ. 7)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

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