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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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चिच्छक्‍ति

देखिए ‘शक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चिच्छायापत्ति

विषयों के साथ साक्षात् सम्बन्ध बुद्धि का है, पुरुष का नहीं। यह बुद्धि पुरुष के प्रकाश से प्रकाशित होती है। बुद्धिगत इस पौरुष प्रकाश को ‘चित्-छाया का पतन’ कहा जाता है। चित् -रूप पुरुष चूंकि प्रतिसंचारशून्य है – निर्विकार है, अतः ‘छाया’ शब्द प्रयुक्त होता है; कभी-कभी प्रतिबिम्ब शब्द भी प्रयुक्त होता है। चित्-छायापत्ति चैतन्याध्यास, चिदावेश आदि शब्दों से भी अभिहित होता है।
बुद्धिगत इस चित्-छाया के कारण अचेतन बुद्धि और बुद्धिधर्म अध्यवसाय – दोनों चेतनसदृश प्रतिभात होते हैं। व्याख्याकारों का कहना है कि चित्त इन्द्रिय माध्यम से विषयाकार में आकारित होने पर (यह विषयाकार-परिणाम की वृत्ति कहलाता है) विषयविशिषिट चित्तवृत्ति पुरुष में प्रतिफलित होती है। यह प्रतिफलित होना प्रमा है और चित्तवृत्ति प्रमाण है। अन्य मत के अनुसार पुरुष चित्तवृत्ति में प्रतिबिम्बित होता है। यह प्रतिबिम्बित होना ही पुरुष छायापत्ति है। चैतन्य में बुद्धि का भी प्रतिबिम्ब पड़ता है – यह भिक्षु ने कहा है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चिति

चिति एवं चितिशक्ति शब्द अविकारी पुरुषतत्व के लिए प्रयुक्त होते हैं। चिति के साथ ‘शक्ति’ शब्द का जो प्रयोग किया जाता है, उससे यह प्रकट होता है कि चिति अविकृत रूप में रहकर ही चित्त की विषयी होती है। चिति के जो पाँच विशेषण व्यास-भाष्य (1/2) में दिए गए हैं (अपरिणामिनी, अप्रतिसंक्रमा, दर्शितविषया, शुद्धा और अनन्ता) उनसे पुरुष (चिति) का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। ‘चिति’ शब्द के साथ ‘शक्ति’ शब्द के प्रयोग की तरह ‘भोक्ता’ एवं ‘दृक्’ शब्द के साथ भी ‘शक्ति’ शब्द प्रयुक्त होता है जिसकी सार्थक्य व्याख्या ग्रन्थों में दिखायी गई है। ‘चिति’ के लिए ‘चित्’ शब्द भी प्रयुक्त होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चितिशक्ति

चितिशक्ति’ या ‘चिति’ पुरुष (तत्व) का समानार्थक है। ‘चिति’ शब्द पुरुष के स्वप्रकाश स्वभाव को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त हुआ है। पुरुष के द्वारा बुद्धि प्रकाशित होती है – यह अभिप्राय भी ‘चिति’ से ध्वनित होता है। चिति रूप पुरुष अविकृत रूप में रहकर ही ‘विषयी’ होता है – इसको सूचित करने के लिए चिति शब्द के साथ शक्ति शब्द का भी प्रयोग किया गया है (द्र. विवरण टीका)। उपनिषद् में जो ‘चेता’ शब्द है (द्र. श्वेताश्वतर 6/11) वह चिति का समानार्थक है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चित् कला

देखिए ‘निरालंब-चित्’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चित् शक्ति

परमशिव की शुद्ध प्रकाशरूपता। उसकी प्रमुख पाँच अंतरंग शक्तियों में से प्रथम तथा समीपस्थ शक्ति। यह शक्ति परिपूर्ण, असीम एवं शुद्ध संविद्रूप परमशिव में केवल परिपूर्ण प्रकाशरूपतया ही चमकती रहती है। उसकी अन्य समस्त शक्तियाँ भी इस शक्ति में प्रकाशरूपता में ही सदा चमकती रहती है। (तन्त्र सार पृ. 6)। काश्मीर शैव दर्शन के मुख्य ग्रंथों में परमशिव में चित्शक्ति की अभिव्यक्ति मानी गई है। (शि.दृ.वृ.पृ. 23)। परंतु कहीं कहीं साधना के क्रम में उन तत्त्वों की मूल कारणभूत शक्तियों को ही उन उन तत्त्वों का आंतरिक स्वरूप मानते हुए भावना के अभ्यास का उपदेश किया गया है। तदनुसार परमार्थसार, तंत्रसार आदि में शिवतत्त्व के साथ ही चित्शक्ति को जोड़ा गया है। (पटलसा.14)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

चित्-पिण्ड

देखिए ‘निरालंब-चित्’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चित्त

चित्त शब्द यद्यपि मन का पर्याय है और इस अर्थ में यह कभी-कभी पांतजल योग के ग्रन्थ में भी प्रयुक्त होता है (द्र. 4/2 योगवा.) तथापि यह स्पष्टतया ज्ञातव्य है कि योगसूत्र में जो चित्त शब्द है (चित्तवृत्तिनिरोध के प्रसंग में), वह मन नहीं है। यह चित्त प्रत्यय और संस्कार रूप धर्मों का धर्मी द्रव्य है; यह द्रष्टा और दृश्य से उपरक्त रहता है (योगसूत्र 4/23); इसकी वृत्तियाँ सदैव ज्ञात रहती हैं (योगसूत्र 4/22)। यह सत्त्वप्रधान है (इसीलिए चित्तसत्व शब्द प्रायः प्रयुक्त भी होता है)। धर्मज्ञान-वैराग्यादि इसके ही धर्म माने गए हें (व्यासभाष्य 1/2)। प्रतीत होता है कि योगसूत्र का चित्त सांख्य की बुद्धि या महतत्त्व है अर्थात् व्यावहारिक आत्मभाव ही चित्त है जो विषय से साक्षात् संबद्ध है। ‘चित्तं महदात्मकम्’ इस प्रकार के जो वचन मिलते हैं, उनसे भी उपर्युक्त मत सिद्ध होता है। योग में संस्कार को चित्त का धर्म माना गया है (3/15 भाष्य) और सांख्यसूत्र (2/42) कहता है – ‘तथाशेषसंस्कारधारत्वात्’ अर्थात् बुद्धितत्व सभी संस्कारों का आधार है – संस्काररूप धर्म का धर्मी है – यह भी उपर्युक्त मत की पुष्टि करता है। इस चित्तसत्त्व की पाँच वृत्तियाँ हैं – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति (द्र. प्रमाणादि शब्द)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चित्तप्रसादन

इसका अर्थ है – प्रसन्न अवस्था में चित्त का होना। यह प्रसन्नता एकाग्रता का सोपान है। प्रसन्न चित्त ही योगशास्त्रोक्त विशिष्ट उपायों (योग सू. 1/34 आदि में उक्त) की सहायता से स्थिति को प्राप्त कर सकता है। श्रद्धा आदि उपायों (द्र. योगसू. 1/20) का भी सफल अभ्यास तभी किया जा सकता है, जब चित्तप्रसादन उत्पन्न हो। गीता एवं योगग्रन्थों में ‘प्रसन्नमनाः’, ‘प्रसन्नचेताः’ आदि जो विशेषणपद योगी के लिए दिए गए हैं, वे इस चित्तप्रसादन को ही लक्ष्य करते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चित्तभूमि

जो अवस्था (धर्मविशेष) चित्त में अनायास उदित रहती है, वह भूमि कहलाती है। व्यासभाष्य (1/1) के अनुसार चित्त की पाँच भूमियाँ हैं – क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध (द्र. क्षिप्त आदि शब्द)। प्रत्येक भूमि में समाधि हो सकती है, अतः समाधि को ‘चित्त का सार्वभौम धर्म’ कहा जाता है। व्यासभाष्य का कहना है कि प्रथम तीन भूमियों में समाधि होने पर वह योग के पक्ष में नहीं होती, क्योंकि वह विक्षेप के द्वारा सहज रूप से अभिभूत हो जाती है। एकाग्र एवं निरुद्ध भूमि में होने वाली समाधि ही योग (=कैवल्य) के लिए उपकारक होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चित्तसंविद्

हृदय में संयम करने पर चित्तसंविद् होता है – यह योगसूत्र (3/34) में कहा गया है। चित्तसंविद् = चित्तसाक्षात्कार – ऐसा प्राचीन टीकाकारों का कहना है; पर हमारी दृष्टि में यह व्याख्या स्थूल है। भास्वती टीकाकार कहते हैं कि जिस अवस्था में ग्रहणस्मृति का प्राधान्य होता है (अर्थात् जिस अवस्था में ग्राह्य विषय की ओर लक्ष्य न कर विषय के ज्ञाता की ओर प्रधानतः लक्ष्य किया जाता है) इस प्रकाशबहुल ग्रहण -स्मृति का प्रवाह ही चित्तसंविद् है। यह बोध आनन्दबहुल होता है। यह चित्तसंविद् पुरुषज्ञान का सोपान रूप है; यही कारण है कि पुरुषज्ञानविषयक सूत्र इस सूत्र के अनंतर आया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

चित्प्रतिबिम्बता

परमशिव के परम प्रकाशरूप चित् के भीतर परिपूर्ण संविद्रूप में स्थित समस्त विश्व का प्रतिबिम्ब रूप में बाह्यरूपतया प्रकट होना। संपूर्ण विश्व परमशिव के ही संविद्रूप चित् में प्रतिबिम्बित होता है। इस प्रकार प्रतिबिम्ब, प्रतिबिम्बित होने की क्रिया तथा चित् रूप दर्पण ये सभी उसी की लीला की भिन्न भिन्न भूमिकाएँ हैं। अतः संपूर्ण विश्व के वैचित्र्य का उल्लास उसी की शुद्ध विद्रूपता में प्रतिबिम्बतया चमकता हुआ उसी में ठहरता है। इसे ही चित्प्रतिबिम्बता कहते हैं। (तं.आ.वि.खं.2,पृ.4)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

चित्र तांडव

यह एक प्रकार का नृत्य विशेष है। इसका अनुष्ठान भगवान् कृष्ण ने किया था। चित्र तांडव का तन्योक्त लक्षण निम्नलिखित है –
“धाधा धुक् धुक् णङ णिङ णङ -णिङ् ङण्णिङां ङण्णिङांणाम्”।
“तुक् तुक् तुं तुं किडगुड् किडगुड् द्रां गुडु द्रां गुडुड्राम्”।।
धिक् धिक् धोंधों किटकिट किटधां दम्मिधां दम्मिधां धाम्।
आगत्यैवं मुहुरिह तु सदः श्रीमदीशो ननर्त।। (भा.सु.वे.प्रे.पृ. 57)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

चिदानंद

1. देखिए चिदाह्लाद।
2. उच्चार योग की प्राण धारणा में अभिव्यक्त होने वाली आनंद की छः भूमिकाओं में से छठी भूमिका।सभी प्रमाण एवं प्रमेयों से संबंधित संपूर्ण विकल्पात्मक आभासों को उदान नामक प्राण के तेज में पूर्णतया शांत कर देने पर जब सभी आभासों सहित वह तेज भी प्रशमित हो जाता है, तब व्यान नामक प्राण-वृत्ति का उदय हो जाता है, जो व्यापक होने के कारण सभी व्यवच्छेदों से स्वतंत्र तथा सभी उपाधियों से परे होती हैं। इस प्रकार के व्यान नामक प्राण को आलंबन बनाकर जब उस पर विश्रांति प्राप्त कर ली जाती है तो चिदानंद की अनुभूति होती है। (तं.सा.पृ. 38; तं.आ.आ. 5-49)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

चिदानंद

देखिए ‘निरालंब-चित्’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चिदाह्लाद

परमशिव के प्रकाश एवं विमर्श का पूर्ण संघट्टात्मक स्वरूप। परमशिव का वह स्वभावभूत स्वरूप, जिसमें चित्, निवृति (आनंद), इच्छा ज्ञान तथा क्रिया – इन पाँचों शक्तियों का परिपूर्ण सामरस्य हो। सभी अवस्थाओं से परे परिपूर्ण परमशिव में ये पाँचों शक्तियाँ एकरस होकर चमकती हैं। परंतु शिवतत्त्व की अवस्था में शुद्ध एवं परिपूर्ण अहं, जिसके प्रकाश तथा विमर्श नैसर्गिक स्वभाव हैं, उसे ही चित् एवं आह्लाद का अर्थात् आनंद का समरस रूप माना जाता है। दूसरे किसी की भी अपेक्षा न होने के कारण यही पूर्ण स्वतंत्र स्वभाव वाले परमशिव की मुख्य परमेश्वरता है। इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया इसी के भिन्न भिन्न रूप हैं। अतः चित् और आनंद की ही प्रमुखता होने के कारण परमशिव के स्वभावभूत स्वरूप के लिए इस शब्द का प्रयोग किया गया है। (शि.दृ. 1-3, 4; शि.दृ.वृ., पृ. 6,7)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

चिद्‍बिंदु

देखिए ‘निरालंब-चित्’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चिन्‍नाद

देखिए ‘निरालंब-चित्’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

चीनाचार

शक्तिसंगम तन्त्र (3/7/47-49) में भूटान, चीन और महाचीन देशों की सीमा बताई गई है। तदनुसार भूटान के पास ही चीन और महाचीन देश स्थित हैं। इनकी सीमा मानसरोवर और कैलाश पर्वत के आस-पास मानी गई है। इनमें कभी तान्त्रिक धर्म का विशेष प्रचार था। आज भी तिब्बत में प्रचलित धर्म प्रधानतः तान्त्रिक ही है। चीन और महाचीन देश में प्रचलित तान्त्रिक आचार-विचार ही क्रमशः चीनाचार और महाचीनाचार के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। शक्तिसंगम तन्त्र (1/8/11-12) में चीनाचार का वर्णन करते हुए बताया गया है कि इसमें स्नान-दान, शौच-अशौच, जप, तपस्या आदि का कोई नियम नहीं है। सकल और निष्कल के भेद से यह दो प्रकार का होता है। वहीं द्वितीय खण्ड (21/1-4) में ब्रह्मचीन, दिव्यचीन, वीरचीन, महाचीन और निष्कलचीन के भेद से इसके पाँच प्रकार बताए गए हैं और कहा गया है कि महाचीनाचार के अनुसार तारा विद्या की उपासना शीघ्र फल देती है। महाचीनाचार के भी दो भेद किये गये हैं- सकल और निष्कल। इनमें से सकल उपासना बौद्धों के लिये और निष्कल उपासना ब्राह्मणों के लिये विहित है। चीनाचार में विहित स्नान, नमस्कार, वेष आदि का भी यहाँ वर्णन मिलता है। चीनाचार, महाचीनाचार के प्रतिपादक स्वतंत्र तन्त्र ग्रंथ भी उपलब्ध हैं।
Darshana : शाक्त दर्शन

चूलिकार्थ

चूलिकार्थ को कभी-कभी मूलिकार्थ (मूलभूत विचार्य विषय) भी कहा जाता है। तत्त्वसमाससूत्र का सूत्र है – दश मूलिकार्थाः (18) अर्थात् सांख्यशास्त्र में दस मूलभूत विचार्य विषय हैं, जो ये हैं – (1) प्रधान और पुरुष का अस्तित्व, (2) प्रधान का एकत्व, (3) भोग -अपवर्ग रूप दो अर्थ = प्रयोजन; (4) प्रकृति -पुरुष -भेद; (5) प्रधान की परार्थता = पुरुष के लिए उपकारक होना; (6) पुरुष का बहुत्व; (7) पुरुष -प्रकृति का वियोग, (8) पुरुष -प्रकृति का संयोग; (9) स्थूल -सूक्ष्म रूप से प्रकृति की स्थिति अथवा (मतान्तर में) जीवन्मुक्त अवस्था, (10) पुरुष का अकर्तृत्व। (युक्तिदीपिका के मंगलाचरण श्लोक (11) में ‘चूलिकार्थ’ मूलपाठ है और मूलिकार्थ पाठान्तर के रूप में माना गया है – यह ज्ञातव्य है)। सांख्यकारिका की चन्द्रिका -टीका में मौलिकार्थ गणनापरक एक श्लोक हैं, जिसमें ये पदार्थ गिनाए गए हैं – प्रधान, प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, तन्मात्र, इन्द्रियाँ तथा भूत। यह अर्वाचीन काल की दृष्टि है – ऐसा स्पष्टतया प्रतीत होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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