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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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गुरु-लिंग-जंगम

वीरशैवधर्म में गुरु, लिंग और जंगम ये तीनों पूजनीय माने जाते है। दीक्षा, शिक्षा तथा ज्ञान का उपदेश करने वाला गुरु कहलाता है। दीक्षा में गुरु से प्राप्‍त शिव का चिह्न ही ‘लिंग’ है, जो कि वीरशैव उपासना का एक प्रमुख साधन है। जीवन्मुक्‍त महापुरुष को ‘जंगम’ कहते हैं। वीरशैव धर्म में इन तीनों को भिन्‍न नहीं माना जाता। ये शिव के ही तीन रूप हैं, अर्थात् शिव ही स्वयं अपने भक्‍तों के कल्याणार्थ इन तीन रूपों में अवतरित होते हैं। अतः इन तीनों की अभेद रूप से उपासना की जाती है (सि.शि.त्र 9/1, 2 पृष्‍ठ 155)। (इन तीनों का विस्तृत विवरण ‘अष्‍टावरण’ शब्द के अंतर्गत देखिये)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

गुरुलिंग

देखिए ‘लिंग-स्थल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

गुरुवक्त्र

विसर्ग पद, शक्ति चक्र (देखिए)। (पटलत्री.वि.पृ. 182)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

गुरुशुश्रूषा

पाशु योग के अनुसार यमों का एक प्रकार।

पाशुपत योग के अनुसार योगी के लिए गुरु-शुश्रूषा नामक यम का पालन करना आवश्यक होता है। क्योंकि उस योग में गुरु को अत्यधिक महत्‍ता प्रदान की गई है। गुरु के हर एक कृत्य का छाया की तरह अनुसरण करना ही गुरु शुश्रूषा होती है। जैसे – शिष्य गुरु से पहले ही निद्रा से जागे और गुरु के सोने के पश्‍चात् सोए। गुरु ने किसी कार्य के लिए नियोजित किया हो अथवा न किया हो, शिष्य उसके किसी भी कार्य को करने के लिए सदैव तत्पर रहे। अपना सर्वस्व अर्पण करने को तत्पर रहे और भस्म स्‍नान आदि क्रियाओं को करने में गुरु का अनुसरण छाया की भांति करे। शिष्य का नित्य आचार हो कि गुरु की सेवा में सदा प्रस्तुत रहकर यह विचार रखे कि यह कार्य कर लिया है, अमुक कार्य करूँगा और क्या क्या कार्य करना है। गुरु की दी हुई शिक्षा का आगे प्रचार करना भी गुरु शुश्रूषा होती है। ब्रह्मचर्य अवस्था के अवसानोपरांत गुरू का सम्मान व श्रद्‍धा ही ब्रह्मचर्य होता है। गुरू मोक्ष का ज्ञान करवाता है, योग का दर्शन करवाता है। अतएव गुरु पूजा शिव पूजा के समान श्रेयस्कर होती है। अतः जो गुरु को पूजता है मानो वह शिव को ही पूजता है। (पा.सू.कौ.भा.प. 27,28)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

गुहावासी

गुफा में निवास करने वाला।

पाशुपत योग में साधना के एक मध्यम स्तर पर पहुँचने पर पाशुपत साधक के निवास के लिए शून्य घर या गुहा का उपदेश दिया गया है, अर्थात् साधक को किसी पर्वत की गुफा में निवास करना होता है, ताकि वह निर्बाध रूप से संग आदि दोषों से पूर्णरूपेण मुक्‍त होकर साधना का अभ्यास कर सके। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 116)।

भासर्वज्ञ ने गुहा को देश का एक प्राकर माना है। साधक को साधना के तृतीय चरण में गुहा में निवास करना होता है। (ग.का.टी.पृ. 16)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

गूढ़ पवित्रवाणि

पवित्र वाणी का गोपन।

पाशुपत विधि के अनुसार साधक के लिए एक विधि होती है कि वह संस्कृत मंत्र, भजन रूपी पवित्र वाणी (जो वाणी पूजन आदि में प्रयुक्‍त होती है) को गुप्‍त रखे, क्योंकि सुंदर, संस्कृत व पवित्र वाणी को स्पष्‍टतया प्रकट करने पर साधक की विद्‍या का स्फुट प्रकाशन होगा और लोग उस साधक की विद्‍याबुद्‍धि की प्रशंसा करेंगे। प्रशंसा को पाशुपत शास्‍त्र में बंधकारक माना गया हे। क्योंकि प्रशंसा से आदमी में गर्व तथा अभिमान आता है, जिसके कारण उसमें पापों व दोषों का समावेश हो जाता है। अतः पाशुपत योग में बारंबार इस बात पर बल दिया गया है कि पाशुपत साधक प्रशंसा से दूर रहे। (पा.सू.कौ.भा.पृ. 94,95)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

गूढ़विद्‍या

विद्‍या का गोपन।

पाशुपत योग में विद्‍या का संगोपन करना भी एक तरह की विधि है। वहाँ साधक को अर्जित ज्ञान को संगुप्‍त रखना होता है अर्थात् अर्जित ज्ञान का प्रकाशन नहीं करना होता है। विद्‍या को गुप्‍त रखने से वह तप: स्वरूप बन जाती है और अंतत: परम उद्‍देश्य की प्राप्‍ति करवाती है। बहि: प्रकाशन से विद्‍या क्षीण हो जाती है। (पा.सू.कौ.भा. पृ. 92)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

गूढ़व्रत

व्रतों का गोपन।

पाशुवत मत के अनुसार साधक को सभी धार्मिक कृत्यों (व्रतों) को गुप्‍त रखना होता है। व्रत से यहाँ पर भस्मस्‍नान, भस्मशयन, उपहार, जप, प्रदक्षिणा आदि से तात्पर्य है। पाशुपत मत के अनुसार ये सभी कृत्य एकांत में गुप्‍त रूप से करने होते हैं। इन्हें प्रकट रूप में करने से लोग साधक की प्रशंसा करेंगे, जिससे उसको गर्व होगा, जो उसकी आध्यात्मिक प्रगति में बाधा डाल सकता है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 94)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

गृहिणोपसंहार

गृहस्थ भी क्रमशः ब्रह्मलोक की प्राप्ति कर सकता है, इस बात का निष्कर्ष के रूप में प्रतिपादन करना गृहिणोपसंहार है। जैसे, “आचार्यकुलाद् वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधत् आत्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्म लोकम मिनिष्पद्यते न च पुनरावर्तते” (छा.उ.) इस मंत्र द्वारा कहा गया है। इस मंत्र में गृहस्थ के लिए ब्रह्मलोक प्राप्ति का मार्ग बताया गया है (अ.भा.पृ. 1243)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

गोकुलपरत्व

पुष्टिमार्ग में बैकुंठ से भी गोकुल का श्रेष्ठत्व अभिप्रेत है। “ता वां वास्तून्युष्मसि गमध्यै यम गावो भूरिश्रृंगा अयासः तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि”। यह श्रुति गोकुल को परम पद प्रतिपादित करती है क्योंकि गोकुल में ही हृदय और बाहर उभयत्र लीलारसात्मक भगवान् का प्राकट्य होता है। यद्यपि बैकुंठ प्रकृति-काल आदि से अतीत है, तथापि उसमें भगवान की लीलायें नहीं हैं। अतः बैकुंठ से भी गोकुल का उत्कृष्टत्व है (अ.भा.पृ. 1323)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

गोचरी

वामेश्वरी शक्ति के वह समूह जो जीवों की बुद्धि, अहंकार और मन की भूमिकाओं में अर्थात् अंतःकरणों में विचरण करते रहते हैं। अतःकरण में विचरण करने के कारण ये शक्तियाँ शक्तिपात से पवित्र हुए साधक के अंतःकरण को शुद्ध संकल्पों वाला बनाती हैं तथा शक्तिपात से विहीन साधकों को नीचे ही नीचे टिकाए रखती हैं। (स्पंदकारिकास.पृ.20)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

गौड सम्प्रदाय

शक्तिसंगम तन्त्र में पूरे भारतवर्ष को कादि और हादि के भेद से 56 देशों में बाँटा गया है और बताया गया है कि सिलहट्ट से सिन्धु देश तक गौड सम्प्रदाय को मान्यता प्राप्त है। हादिमत के अनुसार गौड सम्प्रदाय में तारा की और कादिमत के अनुसार काली की उपासना की जाती है। इस सम्प्रदाय में पूर्णभिषेक की प्रधानता है। प्रथमतः यह ऋग्गौड, यजुर्गौड, सामगौड और अथर्वगौड के भेद से चतुर्धा विभक्त है। शिवगौड, शक्तिगौड और शिवशक्तिगौड भेदों को शुद्ध, उग्र और गुप्त भेदों में विभक्त कर पुनः इसके 9 भेद बताये गये हैं। गौड सम्प्रदाय के वाम और दक्षिण भेद भी यहाँ वर्णित हैं, किन्तु प्रधानतः गौड सम्प्रदाय वाममार्गी ही माना जाता है। इस सम्प्रदाय का आविर्भाव निगम, अर्थात् तंत्रशास्त्र से माना गया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

गौण सिद्धि

सिद्धि का गौण-मुख्य रूप विभाग किसी प्राचीन ग्रन्थ में नहीं है। तत्त्वकौमुदी की टीका (51 का.) में वाचस्पति ने इस विभाग का उल्लेख किया है। यह ‘सिद्धि’ योगशास्त्रीय विभूति नहीं है; सांख्यशास्त्र में जो चतुर्विध प्रत्ययसर्ग उल्लिखित हुआ है (का. 46), सिद्धि उसमें एक है। ऊह आदि भेदों से यह सिद्धि आठ प्रकार की है (का. 51)। इन आठों में पाँच गौण सिद्धियाँ हैं, जिनके नाम है – ऊह, शब्द, अध्ययन, सुहृतप्राप्ति तथा दान। ये गौण सिद्धियाँ मुख्य तीन सिद्धियों (दुःखों का त्रिविध नाश) की हेतुरूपा हैं – यह भी वाचस्पति ने कहा है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ग्रहण

सांख्ययोगशास्त्र में ‘ग्रहण’ शब्द प्रधानतया इन्द्रियों का वाचक है (जिसके द्वारा विषय गृहीत होता है, वह ग्रहण है – इस व्युत्पत्ति के अनुसार)। योगशास्त्र में जो ग्रहणसमापत्ति है (योदसूत्र 1/41) उसका विषय इन्द्रियाँ ही हैं। योगसूत्र में इन्द्रियों के जिन पाँच रूपों का उल्लेख है, उनमें प्रथम ग्रहण है (द्र. 3/47)। इसका लक्षण है – ग्राहय् शब्दादि-विषयों में इन्द्रियों की वृत्ति। यह ‘ग्रहण’ ‘आलोचन’ भी कहलाता है। वस्तुतः इन्द्रियों की विषयाकार परिणति ही ग्रहण है। ये शब्दादि रूप विषय सामान्य-रूप भी होते है, विशेष-रूप भी। बुद्धि के जो छः मूलभूत व्यापार हैं, उनमें ग्रहण एक है (ग्रहण के बाद धारण, ऊह, अपोह, तत्त्वज्ञान और अभिनिवेश होते हैं)। इन्द्रिय द्वारा विषय-ग्रहण-मात्र यह ग्रहण है (द्र. व्यासभाष्य 2/18)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ग्रहणसमापत्ति

संप्रज्ञात-समाधिजात प्रज्ञा का नाम समापत्ति है। यह प्रज्ञा ग्राहय-विषयक, ग्रहणविषयक एवं ग्रहीत-विषयक होती है (योगसूत्र 1.41)। ग्रहण वह स्थूल या सूक्ष्म इन्द्रिय है जिसके द्वारा विषयों का ग्रहण किया जाता है। व्याख्याकारों का कहना है कि आनन्दानुगत संप्रज्ञातसमाधि के क्षेत्र में ग्रहण रूप विषय आता है। समापत्ति की प्रकृति के भेद के अनुसार जो भेद होते हैं, तदनुसार ग्रहण-विषयक समापत्ति के भी भेद होंगे – यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ग्रहीतृसमापत्ति

जिस समापत्ति का विषय ग्रहीता है, वह ‘ग्रहीतृ-समापत्ति’ कहलाती है। ग्रहीता केवल पुरुष तत्व नहीं है। ग्रहीता चित्स्वरूप आत्मा तथा महत्तत्त्व दोनों का समाहारभूत पदार्थ है। इसको बुद्धिप्रतिबिम्बित आत्मा या बुद्धिबोधक आत्मा भी कहा जाता है। सांख्यीय तत्त्वदृष्टि के अनुसार यह विषय का प्रकाशक आत्मा है। यह व्यावहारिक आत्मभाव है। ग्रहीता में मुक्त पुरुष का भी समावेश होता है। विवेकख्याति का दृष्टा पुरुष ही मुक्त पुरुष है – यह क्लेशादिहीन चित्त की स्थिति है। यह ज्ञातव्य है कि पुरुष (तत्त्व) -विषयक समापत्ति या अव्यक्त विषयक समापत्ति नहीं होती।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

ग्राह्यसमापत्ति

जिस समापत्ति का विषय ‘ग्राह्य’ पदार्थ है, वह ग्राह्यसमापत्ति कहलाती है। आलम्बन के भेद से इस समापत्ति के तीन अवान्तर भेद होते हैं – 1. भौतिक या विश्वभेद; 2. भूततत्त्व या स्थूलभूत तथा 3. तन्मात्र या सूक्ष्म भूत (द्र. व्यासभाष्य 1/41)। ग्राह्यविषयों में जो स्थूल है वह सवितर्का और निर्वितर्का समापत्ति का विषय है तथा जो सूक्ष्म है वह सविचारा और निर्विचारा का विषय है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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