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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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कंचुक तत्त्व

पाश। परिपूर्ण एवं शुद्ध संवित्स्वरूप परमशिव को उसी के स्वातंत्र्य से पशुभाव तक पूरी तरह से ले आने वाले संकोचक तत्त्व। कला, विधा, राग, नियति एवं काल नामक ये पाँच आवरक तत्त्व माया तत्त्व के ही परिणाम है। इन्हें पंच कंचुक कहते हैं। माया सहित इन आवरक तत्त्वों की संख्या छः मानी गई है। इसी मायादिषट्क को कंचुकषट्क कहा जाता है। इनके प्रभाव से परमशिव की सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता आदि शक्तियाँ किंचिज्ज्ञता, किंचित्कर्तृता आदि में परिणत हो जाती हैं। इस प्रकार जीवभाव में आने पर वह इन संकोचक तत्त्वों के प्रभाव से यह विश्वास कर बैठता है कि वह केवल अमुक अमुक कार्य को ही इतनी ही मात्रा में जानता हुआ आसक्त या अनासक्त बना हुआ, इतने समय में कर सकता है। (तं.सा.पृ. 81 से 83)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कंद

1. विश्व सृष्टि का मूल शक्तिमय स्वरूप। (स्व.तं. पृ. 2, 57)।
2. पद्म स्वरूप समस्त सृष्टि को अपने ही सामर्थ्य से अपने में ही अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली पारमेश्वरी इच्छाशक्ति का विश्रांति स्थान। कंद के उन्मेष अर्थात् प्रसार से ही अंकुर एवं नालस्वरूपा क्रमशः महामाया पर्यंत समस्त विशुद्ध सृष्टि तथा माया से पृथ्वी पर्यंत समस्त अशुद्ध सृष्टि की अभिव्यक्ति होती है। (वही 37)।
3. साधना के क्रम में शरीर में ही अभ्यास का आलंबन बनने वाला वह मूल स्थान जिस पर ध्यान केंद्रित करने पर शक्ति उद्बुद्ध होती है और जिसके ब्रह्मरंध तक पहुँचने पर साधक को अपने चिदानंद स्वरूप का साक्षात्कार होता है। (वही)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कंप

उच्चार योग की प्राण, अपान आदि पर की जाने वाली धारणा में आनंद की छः भूमिकाओं में से किसी भी भूमिका में प्रवेश करने से पूर्व प्रकट होने वाले पाँच लक्षणों में से तीसरा लक्षण। उच्चार योग की किसी भी धारणा में विश्रांति होने के साथ ही साथ पहले अपूर्व आनंद की अनुभूति होती है फिर देह उछलने लगता है। इन दो लक्षणों के पश्चात् प्रकट होने वाला लक्षण कंप कहलाता है। उच्चार योग के अभ्यास के तीसरे सोपान में जब देह का अभिमान पूर्णतया शांत होने लगता है तथा ऐसा होने पर जब अपने अंतः बल पर स्थिति प्राप्त होती है तो उस समय सारे शरीर में जो एक प्रकार की थरथराहट स्पष्टतया झलकती हुई अनुभव में आती है, उसे यहाँ कंप कहते हैं। (तन्त्र सार पृ. 40; तन्त्रालोक 5-103)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

करण

करणं दैहसंनिवैशविशेषात्मा मुद्रादिव्यापारः’ (पृ. 35) शिवसूत्र विमर्शिनी के परिशिष्ट (टि. 19) में करण का यह लक्षण बताया गया है। योग शास्त्र के ग्रन्थों में वर्णित खेचरी प्रभृति मुद्राओं और जालन्धर प्रभृति बन्धों का इसी में समावेश किया जाता है। इनमें शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखने का अभ्यास किया जाता है। करण की गणना आणव उपाय में की जाती है। त्रिशिरोभैरव के आधार पर तन्त्रालोक के पंचम आह्निक (पृ. 438-443) में करण के सात भेद बताये गये हैं। इनके नाम हैं – ग्राह्य, ग्राहक, संवित्ति, संनिवेश, व्याप्ति, आक्षेप और त्याग। तन्त्रालोक के 16वें आह्निक में ग्राह्य और ग्राहक का, 11वें आह्निक में संवित्ति का, 15 वें आह्निक में व्याप्ति का, 29वें आह्निक में त्याग और आक्षेप का और 32वें आह्निक में संनिवेश (मुद्रा) का संकेत भाव से वर्णन मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

करण-हसिगे

यहाँ पर ‘करण’ का अर्थ है स्थूल, सूक्ष्म आदि शरीर में रहने वाले सभी तत्व और ‘हसिगे’ का अर्थ होता है विभाग, अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म शरीर में रहने वाले सभी तत्वों को विभक्‍त करके उनके स्वरूप को यथार्थ रूप से जान लेना ही ‘करण-हसिगे’ कहलाता है। वस्तुत: दर्शनांतर में जिसे ‘पंचीकरण’ कहते हैं, उसे ही यहाँ ‘करण-हसिगे’ कहा गया है। जैसे परमात्मा को जानने के लिए ब्रह्माण्ड का ज्ञान आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा को जानने के लिये पिण्डाण्डस्थित सभी तत्वों का यथार्थ ज्ञान आवश्यक है। पिण्डाण्ड के यथार्थ ज्ञान से ही उससे भिन्‍न रहने वाली आत्मा का भी यथार्थ ज्ञान होता है।

वीरशैव संत साहित्य में इस पिण्डाण्ड-विज्ञान के प्रतिपादक ग्रंथ को भी ‘करण-हसिगे’ कहा गया है। श्री चन्‍नबसवेश्‍वर अपने ‘करण-हसिगे’ नामक लघु ग्रंथ में ऊँकार से पंचमहाभूतों की उत्पत्‍ति बता कर उन भूतों से स्थूल, सूक्ष्म आदि शरीरों के सभी तत्वों की उत्पत्‍ति को विस्तार रूप से आगम की दृष्‍टि से समझाया है। स्थूल शरीर में रहने वाले अस्थि, मांस, चर्म, नाड़ी और रोम ये पाँच गुण पृथ्वी के हैं; क्षुधा, तृष्‍णा, निद्रा, आलस्य और संग ये पाँच गुण तेज के हैं; धावन, बलन, आकुंचन, प्रसारण तथा वियोग ये पाँच गुण वायु के हैं। इस प्रकार पंचीकृत पंचमहाभूतों के पच्‍चीस गुणों से इस स्थूल शरीर की उत्पत्‍ति बताई गयी है। उसके बाद सूक्ष्म शरीर में रहने वाले श्रोत्र आदि पंच ज्ञानेन्द्रियों की; वाक् आदि पंच कर्मेन्द्रियों की; प्राण, अपान आदि दशविध वायुओं की; मन, बुद्‍धि आदि अंतःकरण की उक्‍त पंचमहाभूतों के ही परस्पर मिश्रण से उत्पत्‍ति बताकर, शरीर में उनसे होने वाले कार्य, उनके अधिष्‍ठातृदेवता का स्वरूप एवं तत्‍तत् इंद्रियों के विषयों का भी प्रतिपादन किया गया है। इसके बाद आत्मा का निरूपण आता है। पंचमहाभूत, पंचप्राण, दशविध इंद्रियाँ तथा अंतःकरण-चतुष्‍टय इन चौबीस अनात्मतत्वों से भिन्‍न जो पच्‍चीसवाँ तत्व है और जिसके कारण इन सब में चेतन का व्यवहार होता है वह चिद्रूप ‘आत्मा’ ही है। यह आत्मा ज्ञानस्वरूप है। परशिव ही इसके अधिष्‍ठातृदेवता है।

यह आत्मा जब देह से संपृक्‍त होता है, तो उसको अष्‍टमद, सप्‍तव्यसन, षडर्मियाँ, अरिषड्वर्ग, षड्विकार, पंचक्लेश, तापत्रय इत्यादि की प्राप्‍ति किस प्रकार होती है, इसका विस्तार से यहाँ वर्णन किया गया है। इस प्रकार शरीर आदि की उत्पत्‍ति, उससे आत्मा का संपर्क तथा शरीर के संपर्क से आत्मा में होने वाले विकारों का विवरण बताकर पिण्डाण्ड का संपूर्ण विज्ञान इस ग्रंथ में प्रतिपादित है। इसके अध्ययन से अनात्मतत्वों को पंचमहाभूतों के विकार जानने से निर्विकार आत्मा का यथार्थ बोध उत्पन्‍न होता है। इस प्रकार देह के सभी तत्वों का विभाग करके उनके स्वरूप का बोध कराने वाले इस ग्रंथ को ‘करण-हसिगे’ कहा गया है। (च.ब.व. पृष्‍ठ 669-685; व.वी.ध. पृष्‍ठ 113-115)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

करणयोग

शैवी साधना के आणव उपाय में देह धारणा को ही करणयोग कहते हैं। आणवोपाय में ध्यानयोग और उच्चार योग से नीचे करणयोग का स्थान आता है। इस योग कमें साधक देह के सूक्ष्म, स्थूल तथा करण – इन तीनों प्रकारों को क्रम से धारणा का आलंबन बनाता हुआ उन्हीं के साथ संपूर्ण प्रमेय जगत् के तादात्म्य को तीव्र भावना के द्वारा स्थापित करता है। इस धारणा को करणयोग कहते हैं। करण साधन को कहते हैं। साधक का शरीर ही उसकी साधना का करण होता है। अतः यह योग करण योग कहलाता है। इस योग पर स्थिति हो जाने से साधक अपनी सर्वव्यापकता के भाव के अनुभव को प्राप्त करता हुआ और प्रमेय जगत् के साथ देह धारण से प्राप्त हुई संघट्टात्मकता को अपने संवित् स्वरूप में विलीन करता हुआ सभी कुछ को उसी परिपूर्ण रूप में ही देखने लग जाता है। ऐसा होने पर उसे शिवभाव का आणव समावेश हो जाता है। (तं.आ.वि.आ. 5-129)। इस करणयोग के अभ्यास से सद्यः ऐसी घटनाएँ चित्त में घटती हैं जिनसे साधक पथभ्रष्ट भी हो सकता है। अतः इसे अत्यंत रहस्यात्मक कहा गया है। इसी कारण इसका स्फुट प्रतिपादन तंत्रालोक आदि में किया ही नहीं गया है। मुद्राओं का अभ्यास करणयोग ही होता है। कुंडलिनी योग को भी इसी कोटि में गिना जा सकता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

करणवैकल्य

करण (=इन्द्रियाँ) कभी-कभी अपने विषय के ग्रहण में या स्वव्यापार के निष्पादन में असमर्थ हो जाते हैं (यह असमर्थता ‘अशक्ति’ नाम से सांख्य में कही जाती है, द्र. सांख्यकारिका 46)। यह असामर्थ्य वैकल्य-हेतुक है – ऐसा पूर्वाचार्यों का कहना है – वैकल्पाद् असामर्थ्य ‘अशक्ति’: (युक्तिदीपिका 46)। सांख्यकारिका के व्याख्याकारों ने जैसी व्याख्या की है, उससे यह ज्ञात होता है कि यह विकलता इन्द्रियों के शरीरस्थ के अधिष्ठानों की है, इन्द्रियतत्त्व की नहीं। स्वरूपतः इन्द्रियाँ आभिमानिक (=अस्मिता से उद्भूत) हैं, भौतिक नहीं हैं; अतः उनमें विकलता संभव नहीं है। पर इन्द्रियों के शरीरस्थ अधिष्ठानों के विकल होने पर स्थूलविषय का ग्रहण या स्थूल विषय का व्यवहार अवरूद्ध हो जाता है, अतः गौणदृष्टि से यह शारीरिक असमर्थता इन्द्रिय की असमर्थता कही जाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

करुणा

चार परिकर्मों में करुणा द्वितीय है। करुणा = परदुःख को दूर करने की इच्छा। करुणा-वृत्ति का विषय वह प्राणी है जो दुःखी है। दुःखी प्राणियों पर करुणा-भावना करने से चित्त प्रसन्न होता है और वह क्रमशः ‘स्थिति’ को प्राप्त करता है। ‘कोई भी दुःख मुझमें न हो’ यह इच्छा सभी को रहती है। पर शत्रुओं के रहते ऐसा होना कभी भी संभव नहीं है। अतः शत्रुओं के प्रति अकरुणा की भावना या द्वेष की भावना होती है, जिससे चित्त अधिक विक्षिप्त होता रहता है। दुःखी शत्रु को भी दुःख न हो – इस प्रकार की करुणाभावना से चित्त अक्षुब्ध होकर एकाग्र हो जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

कर्ता

सांख्यीय दृष्टि में कर्तृत्व त्रिगुण में ही रहता है, गुणातीत पुरुष कर्ता नहीं हो सकते। आचार्य पंचशिख का एक वचन व्यासभाष्य (2/18) में उद्धृत है, जिसमें ‘त्रिषु गुणेषु कर्तृषु’ (तीन गुणों के कर्त्ता होने के कारण) कहा गया है। कर्तृत्व गुणों में रहने के कारण गुणविकारभूत बुद्धि आदि करणों में भी कर्तृत्व रहता है। त्रिगुण में ही कर्तृत्व रहने के कारण पुरुष ‘अकर्ता’ कहलाते हैं (सांख्यकारिका 19 में अकर्तृभाव शब्द प्रयुक्त हुआ है)। किसी-किसी आचार्य ने कर्तृत्व को दो प्रकार का माना है – प्रयोकर्तृत्व -रूप तथा स्वयंकारित्व-रूप। यद्यपि उदासीन पुरुष में किसी प्रकार का भी कर्तृत्व नहीं है, तथापि उन पर अविवेक के कारण बुद्धिगत कर्तृत्व का आरोप होता है। पुरुष को कर्ता कहना औपचारिक (गौण) प्रयोग है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

कर्तृ- सादाख्य

देखिए ‘सादाख्य’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

कर्म

योगशास्त्र में कर्म को कभी दो भागों में बाँटा जाता है – कुशल – अकुशल रूप से (व्यासभाष्य 1/24), कभी चार भागों में – शुक्ल आदि भेदों से (योगसूत्र 4/7)।। आत्मज्ञान के साधक या विवेकमूलक कर्म कुशल हैं तथा उसके विपरीत कर्म अकुशल हैं। (शुक्ल, शुक्लकृष्ण, कृष्ण एवं अशुक्ल -अकृष्ण कर्मों के स्वरूप के लिए शुक्ल आदि शब्द द्रष्टव्य हैं)।
कर्म यद्यपि क्लेश + (अविद्या, अस्मिता आदि) – मूलक हैं, तथापि क्लेश की तरह वह अनादि हैं। जीव सदैव उपयोगी शरीर में रहकर स्थूल -सूक्ष्म कर्म करते रहते हैं। प्रलयकाल में कर्मसंस्कार सुप्तस्थिति में रहता है, पर नष्ट नहीं होता, अतः ब्रह्माण्ड व्यक्त होने पर जीव स्वाभाविक रूप से कर्म करते रहते हैं। कर्म की आत्यन्तिक निवृत्ति चित्त का आत्यन्तिक निरोध होने पर ही होती है। सांख्यीय दृष्टि में प्राणी की कर्मप्रवृत्ति ईश्वरादिहेतुक नहीं होती। बुद्धिगत भोग एवं अपवर्ग ही कर्म के हेतु हैं।
गीता (18/13 -15) में कर्मसम्बन्धी एक सांख्यीय सिद्धान्त का उल्लेख हुआ है। अधिष्ठान (शरीर), कर्त्ता (उपाधियुक्त भोक्ता), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (प्राणापानादि -व्यापार) तथा दैव – इन पाँचों को शरीर-वाक्य-मन द्वारा निष्पाद्य कर्मों का हेतु माना गया है। यद्यपि प्रचलित सांख्यीय ग्रन्थों में यह मत नहीं मिलता, तथापि सांख्यीय मूल दृष्टि के साथ इस मत का कोई विरोध नहीं है। किसी-किसी का कहना है कि ‘पंचकर्मयोनि’ का जो उल्लेख तत्त्वसमाससूत्र में है (सू. 11), वह इन पाँचों को ही लक्ष्य करता है। सभी प्रकार के कर्मों से उनके अनुरूप संस्कार उत्पन्न होते हैं – अशुक्ल – अकृष्ण कर्मों का ऐसा फल नहीं होता।
कर्मसम्बन्धी अन्यान्य विचारों के लिए कर्माशय, वासना, संस्कार एवं क्लेश शब्द द्रष्टव्य हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

कर्म – सादाख्य

देखिए ‘सादाख्य’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

कर्म मिश्रा भक्ति

गृहस्थ के लिए अधिकृत भक्ति कर्म मिश्रा भक्ति है। यह भक्ति सात्त्विकी, राजसी और तामसी भेद से तीन प्रकार की होती है (शा.भ.सू.वृ.पृ. 162)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कर्मज्ञान मिश्रा भक्ति

वानप्रस्थाश्रयी के लिए अधिकृत भक्ति कर्मज्ञान मिश्रा भक्ति है। यह भक्ति सत्त्व गुण के तारतम्य से तीन प्रकार के भक्तों के भेद से (क) उत्तम भक्ति (ख) मध्यम भक्ति और (ग) प्राकृत भक्ति तीन प्रकार की होती है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कर्मज्ञान मिश्रा भक्ति

(क) उत्तम भक्ति
किसी भी प्राणी का इन्द्रियों द्वारा ग्रहण होने पर चित्त की द्रवावस्था के कारण उस प्राणी में प्रविष्ट भगवदाकारता के कारण सर्वत्र भगवद् भावनामय हो जाना उत्तम भक्ति है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कर्मज्ञान मिश्रा भक्ति

(ख) मध्यम भक्ति
ईश्वर प्रभृति में प्रेम आदि से युक्त भक्त के चित्त की किंचित द्रवावस्था मध्यम भक्ति है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कर्मज्ञान मिश्रा भक्ति

(ग) प्राकृत भक्ति
चित्त की द्रवावस्था से रहित होने पर भगवान् के निमित्त श्रवणादि भागवत धर्म के अनुष्ठान में संलग्न रहना प्राकृत भक्ति है।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कर्मभेदक

शब्दान्तर, अभ्यास (आवृत्ति), संख्या, गुण, प्रक्रिया और नामधेय ये छः कर्म के भेदक होते हैं, यह बात पूर्वमीमांसा में कही गयी है और यह नियम सर्वमान्य है। इस नियम के अनुसार अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय से भिन्न आनंदमय परमात्मा है। यह बात अन्नमयादि शब्द से भिन्न आनन्दमय के प्रयोग से सिद्ध है। इसी प्रकार कर्मभेदक अभ्यास के समान ही “को हयेवान्यात् कः प्राण्यात् यदेष आकाश आनंदों न स्यात्, एष हयेवानन्दयाति” इत्यादि विभिन्न स्तुति वाक्यों में अन्नमयादि शब्द की आवृत्ति न कर आनन्द पद की बार-बार आवृत्ति किए जाने से भी अन्नमय आदि से भिन्न आनंदमय है – यह सिद्ध है। संख्यादि कर्मभेदकों के उदाहरण मीमांसा शास्त्र में वर्णित हैं।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कर्मयोग

देखिए ‘कायक’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

कर्मविपाक

कर्मविपाक का अर्थ है – कर्मफल। वस्तुतः कर्मविपाक का अभिप्राय है कर्माशय के तीन विपाक : 1. जाति (जन्म, शरीर-ग्रहण) 2. आयु (इस गृहीत शरीर का स्थितिकाल) और 3. भोग (सुख-दुःख-बोध)। कर्म चाहे कुशल हो या अकुशल – सभी के विपाक होते हैं। दूसरे शब्दों में, कृष्ण (परपीड़ाकर), शुक्ल (तपःस्वाध्यायादि), और कृष्णशुक्ल (कृषि आदि, जिनमें परापकार-परोपकार दोनों होते हैं), कर्मों के विपाक अवश्य होते हैं; अशुक्ल – अकृष्ण (निरोधफलक) कर्म का विपाक (जाति आदि रूप) नहीं होता। अविद्या का प्राबल्य जब तक रहेगा तब तक यह विपाक चलता ही रहेगा।
विपाक वासना का निमित्त है। जिस संस्कार के जाति आदि विपाक होते हैं, वह कर्माशय कहलाता है (कर्माशय अनेक संस्कारों का समूह है)। विपाकों के अनुभवमात्र से जो संस्कार होता है, वह वासना है। वासना का विपाक नहीं होता, पर कर्माशय का विपाक वासना के बिना नहीं होता – यह भेद विशेष रूप से ज्ञातव्य है।
ये तीन विपाक सदैव होते हों, ऐसी बात नहीं है। दुष्टजन्मवेदनीय कर्माशय का एक ही विपाक (आयु या भोग के रूप में) होता है, या कभी-कभी आयु तथा भोग दो भी होते हैं। कर्माशय नियतविपाक भी होता है, अनियत विपाक भी होता है। जिसका विपाक अनियत हो, उसकी तीन गतियाँ हैं, (द्र. ‘अदृष्टजन्मवेदनीय’)। चूंकि योगज प्रज्ञा के बिना विपाक के देश, काल और निमित्तों का सम्यक् अवधारण नहीं होता, अतः कर्म की गति को दुर्बोध माना गया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन
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