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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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क्लिष्टवृत्ति

चित्त-परिणाम-रूप जो वृत्ति है, उसके दो भेद हैं – क्लिष्ट और अक्लिष्ट। जिस वृत्ति के उदय में अविद्या आदि क्लेशों का प्राधान्य है, वह वृत्ति क्लिष्ट कहलाती है। क्लिष्ट वृत्ति प्राणी को रागद्वेषादिपूर्वक कर्म करने के लिए बाध्य करती है और क्लिष्ट संस्कार को बढ़ाती है। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति – ये पाँच प्रकार की वृत्तियाँ क्लिष्ट भी होती हैं, अक्लिष्ट भी। उदाहरणार्थ – क्लिष्ट प्रमाण रूप वृत्ति वह है जो विवेकज्ञान के अनुकूल नहीं होती है; क्लिष्ट प्रमाण रूप वृत्ति वह है जो योगाभ्यास की विरोधिनी है; विवेक की साधक जो नहीं है, वह क्लिष्ट स्मृति है। यह ज्ञातव्य है कि क्लिष्ट वृत्तियों में उत्कर्ष -अपकर्ष होते हैं तथा क्लिष्टवृत्ति के साथ अक्लिष्टवृत्ति अंशतः संयुक्त रहती है जैसा कि व्यासभाष्य में कहा गया है – ‘क्लिष्ट वृत्ति के छिद्र में अक्लिष्ट वृत्ति रहती है’ (1/5 सूत्रभाष्य)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

क्लेश

आत्मविषयक अज्ञान (विपर्ययज्ञान) का संस्कार (जिसके कारण प्राणी का संसरण होता रहता है) क्लेश है (योगसूत्र 2.3)। यह क्लेश वृत्तिरूप नहीं है; मुख्यतः वासनारूप है। वृत्तियों को जो क्लेश रूप कहा जाता है, वह गौण दृष्टि से है। क्लेश प्राणी को कर्म करने के लिए बाध्य करता है, इसलिए कर्माशय को क्लेशमूलक कहा जाता है। प्रधान क्लेश अविद्या है; इस अविद्या के ही स्थूल रूप अन्य चार क्लेश हैं, जिनके नाम हैं – अस्मिता राग, द्वेष और अभिनिवेश। क्लेशों का नाश पहले क्रियायोग से, बाद में ध्यानविशेष से किया जाता है। चित्त के नाश (स्वकारण में लय) के साथ ही क्लेश का आत्यन्तिक नाश होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

क्ष

क अर्थात् पृथ्वी तत्त्व एवं ष अर्थात् सदाशिव तत्त्व के संयोग से बनने वाला कूटस्थ बीज। यह मातृका का पच्चासवाँ वर्ण है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्षण

क्षण शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त होता है। क्षण मुहूर्तवाची है – एक क्षण = दो घटिका = 48 मिनट। एक अन्य मत यह है – 18 निमेष में एक काष्ठा; 30 काष्ठा में एक कला; 30 कला में एक क्षण। इस प्रकार के क्षणों से सांख्ययोग के क्षण का सम्बन्ध नहीं है। यह स्पष्टतया ज्ञातव्य है कि योगशास्त्रीय क्षण का कालपरिमाण लौकिक दृष्टि से निर्धार्य नहीं हो सकता, अर्थात् यह नहीं कहा जा सकता कि क्षण एक सैकेन्ड का कितना भाग है।
योगशास्त्र की दृष्टि में क्षण काल का अणुपरिमाण है, अर्थात् क्षण वह काल-परिमाण है जिसमें तन्मात्र पूर्व देश को छोड़कर उत्तरदेश में जाता है। इस काल-परिमाण की उपलब्धि चित्त की स्थिरता विशेष के द्वारा की जा सकती है। तान्मात्रिक ज्ञान धारा का एक-एक खण्ड परिमाण जिस काल में होता है – वह एक क्षण है। इन क्षणों का जो क्रम है, वही वस्तुतः काल है (योगियों की दृष्टि में)। क्षणपरिमाण काल्पनिक नहीं है, बल्कि योगियों का अनुभवगम्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

क्षण

मनुष्य को पलक झपकने में जितना समय लगता है उसका आठवाँ अंश क्षण कहलाता है। दो क्षणों को तुटि कहते हैं। (स्व.तं. 11-199, 200)। वह सूक्ष्म अवधि, जिसमें एक विचार चित्त में ठहरता है, को भी क्षण कहते हैं। (तं.आ.7-25)। भिन्न भिन्न स्तरों के प्राणियों के तथा भिन्न भिन्न जाग्रत्, स्वप्न आदि अवस्थाओं में क्षण का परिमाण भिन्न भिन्न ही हुआ करता है। चित्त में क्रम से उदय होने वाले ज्ञानांशों से यही क्षणों की गणना की जाती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्षार

देखिए ‘अष्‍टावरण’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

क्षिप्तभूमि

यह चित्त (= अन्तःकरण) की पाँच भूमियों में एक है (भूमि = सहज अवस्था)। जिस अवस्था में चित्त विषय-संपर्क से निरन्तर चंचल होता रहता है, वह क्षिप्तभूमि है। यह अवस्था रजः-प्रधान है। इस अवस्था में चित्त पारमार्थिक विषय सोच ही नहीं पाता तथा वैषयिक चिन्ता ही उसको प्रिय लगती है। क्षिप्त-अवस्था में क्लेशों की (विशेषतः राग-द्वेषों की) प्रबलता रहती है। हिंसा आदि की भावना से ऐसे चित्त में भी समाधि हो सकती है। शत्रुओं की हत्या करने के उद्देश्य से लोग अभीष्ट देवता में समाहित होते हैं; यह समाहित होना क्षिप्तभूमि में समाधि होने का उदाहरण है। यह योगसम्मत समाधि नहीं है, यद्यपि इसमें भी कभी-कभी थोड़ी देर के लिए असाधारण शक्ति आ जाती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

क्षेमी

मुक्‍त जीव का लक्षण।

पाशुपत दर्शन के अनुसार युक्‍त साधक क्षेमी (निर्भय या अनन्त सुखी) हो जाता है, क्योंकि उसके समस्त अधर्म, जो योगसाधना में बाधक होते हैं, निवृत्‍त हो जाते हैं। अतः रुद्र में स्थित साधक क्षेमी होकर ठहरता है। जैसे भयंकर कांतार को पार करके मनुष्य शांत व स्वस्थ होकर ठहरता है, ठीक उसी प्रकार मुक्‍तात्मा इस सांसरिक कांतार को पार करके रूद्रतत्व में शांत व स्वस्थ होकर ठहरता है। (पा.सू.कौ.भा.पु. 139)। साधक की समस्थ शंकाएं जब अतिक्रांत या निवृत्‍ति हो जाती हैं, तो उसकी वह अवस्था क्षेमित्व की होती है। (सर्वाशङ्कास्थाना तिक्रान्तित्वं क्षेमित्वम् – ग.का.टी.पृ. 16)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

क्षोभ

ज्ञेयधर्मता, उद्भव, उद्यंतृभाव अर्थात् बाह्य रूप में भासित होने की तीव्र इच्छा। प्रकाश एवं विमर्श की शुद्ध एवं परिपूर्ण सामरस्यात्मक अवस्था के बाद की तथा पूर्ण भेदात्मक विश्व के रूप में प्रकट होने से पूर्व का बाह्य रूप तथा आभासित होने की उत्कट इच्छा। परमशिव जब अपनी विमर्शात्मक आनंद शक्ति से पूर्णतया उद्वेलित होकर अपने ही स्वातंत्र्य से बाह्य रूप में आभासित होने के प्रति तीव्र इच्छायुक्त हो जाता है, तब उसमें उसकी सभी शक्तियाँ उद्वेलित हो जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप सृष्टि की रचना होती है। उसकी इस सर्वशक्तिविलोलता वाली अवस्था को क्षोभ कहते हैं, यद्यपि वस्तुतः यह क्षोभ न होता हुआ ही उस जैसा कहने मात्र में आता है। (त.आ.वि.2, पृ. 93, 94)।
2. प्राण, बुद्धि, देह आदि को अपना वास्तविक स्वरूप समझना। (स्पंदकारिकावि.पृ. 39)। ऐसा क्षोभ वाणी के व्यवहार में क्षोभ ही कहला सकता है।
3. मूल प्रकृति में गुण वैषम्य से पहली हो जाने वाली वह हलचल, जिसके फलस्वरूप प्रकृति महत्तत्त्व में परिणत हो जाती है। यह क्षोभ भी वस्तुतः क्षोभ ही होता है। प्रकृति में यह क्षोभ भगवान श्रीकंठनाथ की प्रेरणा से आता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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