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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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कैवल्य

कैवल्य का अर्थ है – केवल (असहाय, अद्वितीय) का भाव। सांख्ययोग में कैवल्य का अर्थ है – स्वरूपतः गुणातीत जो पुरुष है (अर्थात् केवल पुरुष), उसका गुणों के साथ अमिश्रित रूप से अवस्थान। बुद्धि -आदि गुणविकारों के साथ संबंधित रहने पर पुरुष अ-केवल होता है, अतः बुद्धि या चित्त का शाश्वत लय होने पर चित्तसाक्षी पुरुष की जो स्थिति होती है, वहीं कैवल्य है। भोग-अपवर्ग रूप पुरुषार्थ के चरितार्थ होने पर ही गुणविकारभूत बुद्धि आदि स्वकारण में लीन होते हैं। यह केवलीभाव जिस प्रकार पुरुष का है, उसी प्रकार (दृष्टिभेद से) बुद्धि का भी है। यही कारण है कि वाचस्पति ने कैवल्य प्रतिपादक योगसूत्र (4/34) की व्याख्या में ‘पुरुषस्य मोक्षः’ के साथ-साथ ‘प्रधानस्य मोक्षः’ भी कहा है। भिक्षु ने भी ‘बुद्धेः कैवल्यम्’ के साथ-साथ ‘पुरुषस्य कैवल्यम्’ भी कहा है। चूंकि पुरुष स्वरूपतः अपरिणामी हैं, अतः उनका केवलीभाव रूप कैवल्य गौणदृष्टि से ही कहा जाता है – अविद्या के कारण ही पुरुष गुणमिश्रित (अर्थात् अ -केवल) है – ऐसा प्रतीत होता है। बुद्धि और पुरुष – दोनों का कैवल्य होता है – ऐसा व्यासभाष्य (2/6) में स्पष्टतः प्रतिपादित हुआ है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

कौल मत

श्रीचक्र को वियच्चक्र भी कहा जाता है। दहराकाश और बाह्याकाश में भी इसकी पूजा होती है, अतः इसको वियच्चक्र कहा जाता है। बाह्याकाश का अभिप्राय यह है कि बाह्य आकाश, अर्थात् अवकास में स्थित पीठ, भूर्जपत्र, शुद्ध पट अथवा सुवर्ण, रजत आदि से निर्मित पट्ट पर श्रीचक्र को अंकित कर उसकी पूजा की जाए। इसी को कौल पूजा कहते हैं। पाँच शक्ति चक्र और चार वह्नि (शिव) चक्रों के संयोग से श्रीचक्र बनता है। यहाँ समय मत के विपरीत चार शिव चक्रों की स्थिति अधोमुख और पाँच शक्ति चक्रों की स्थिति ऊर्ध्वमुख मानी गई है। कौल मत में संहार क्रम से श्रीचक्र लिखा जाता है। सौन्दर्यलहरी के टीकाकार लक्ष्मीधर ने (श्लो. 34, पृ. 161) कौल मत के दो भेद बताये हैं – पूर्वकौल और उत्तर कौल। पूर्व कौल पीठ प्रभृति में अंकित श्रीचक्र की पूजा करते हैं और उत्तर कौल तरुणी की प्रत्यक्ष योनि में श्रीचक्र की भावना कर उसकी सविधि उपासना करते हैं। उत्तर कौल सिद्धान्त में शक्ति तत्त्व से पृथक् शिव तत्त्व नहीं है, वह शक्ति में ही अन्तर्भूत है। अतः यहाँ शक्ति की ही उपासना की जाती है। अर्थरत्नावली (पृ. 74) में विद्यानन्द ने कुलपंचक शास्त्र का उल्लेख करते हुए उसके कुल, अकुल, कुलाकुल, कौल और शुद्ध कौल नामक भेद गिनाये हैं। कौलज्ञाननिर्णय में पदोत्तिष्ठ कौल, महाकौल, मूलकौल, योगिनीकौल, बह्निकौल, वृषणोत्थकौल, सिद्धकौल नामक सात भेद कौलों के मिलते हैं। इनमें से योगिनीकौल और सिद्धकौलों का उल्लेख मृगेन्द्रागम के चर्यापाद में (पृ. 221) भी आया है।
Darshana : शाक्त दर्शन

कौलिक योग

नेत्रतन्त्र के सप्तम अधिकार में सूक्ष्म ध्यान का वर्ण मिलता है . व्याख्याकार क्षेमराज ने इसको कुलप्रक्रिया, अर्थात् कौलिक योग कहा है। कुलागम, कुलतन्त्र, अर्थात् शिवोक्त शास्त्रविशेष में वर्णित योग का नाम है कौलिक योग। तदनुसार छः चक्र, षोडश आधार, तीन लक्ष्य, पाँच व्योम, बारह ग्रंथि, तीन शक्ति, तीन धाम, तीन और दस नाडी तथा दस प्राणों से समन्वित व्याधिग्रस्त इस पिण्ड (शरीर) को सूक्ष्म ध्यान के माध्यम से आप्यायित करने पर योगी को दिव्य देह की प्राप्ति होती है। जन्म, नाभि, हृदय, तालु, बिंदु और नाद स्थान में नाड़ी, माया, योग, भेदन, दीप्ति और शान्त नामक छः चक्र स्थित हैं। अंगुष्ठ, गुल्फ, जानु, मेढ्, पायु, कन्द, नाभि, जठर, हृदय, कूर्मनाडी, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त ये सोलह आधार है। अथवा कुल, विष, शाक्त, वह्नि, घट, सर्वकाम, संजीवन, कूर्म, लोल, सुधाधार, सौम्य, विद्याकमल, रौद्र, चिन्तामणि, तुर्याधार, नाड्याधार नामक कुलप्रक्रियासंमत सोलह आधारों को यहाँ ग्रहण किया जा सकता है। अंतर्लक्ष्य, बहिर्लक्ष्य और उभयविध लक्ष्य ये तीन लक्ष्य हैं। माया, पाशव, ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, ईश्वर, सदाशिव, इन्धिका, दीपिका, बैन्दव, नाद और शक्ति ये बारह ग्रंथियाँ कर्थात् पाश हैं। इच्छा, ज्ञान और क्रिया ये तीन शक्तियाँ हैं। सोम, सूर्य और वह्नि ये तीन धाम हैं। सव्य, अपसव्य और मध्य पवन स्थित इडा, पिंगला और सुषुम्णा नामक तीन नाडियों तथा इनके साथ गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशा, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी नाडी को जोड़ देने पर दस नाडियों और इनके माध्यम से बहने वाले प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनंजय नामक दस प्राणों से यह शरीर आवृत है। वस्तुतः यह शरीर 72 हजार अथवा साढ़े तीन करोड़ नाडियों से जकड़ा हुआ है और आणव, मायीय और कार्म मलों के कारण मलिन भी हो गया है। अतः दिव्य देह की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि साधक योगी कन्द स्थान में चित्त को एकाग्र कर संकोच और विकास का अभ्यास करें। मध्यविकास की प्रतीक्षा करता हुआ वह मतगन्ध स्थान को दबावे, जिससे कि मध्यधाम सुषुम्णा की ऊर्ध्व गति उन्मुक्त हो जाए। कन्द भूमि में जब यह शक्ति जग जाती है, तो साधक को खेचरी मुद्रा प्राप्त हो जाती है। इसके प्राप्त होने से प्राण उसके अधीन हो जाता है और मन्त्र के प्रभाव से उसकी गति द्वादशान्त की तरफ मुड़ जाती है। पहले उसका प्राण समना धाम में प्रविष्ट होता है। वहाँ उसे अपान के उल्लास के लिये चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। चन्द्रोदय हो जाने पर योगी उससे प्राप्त अमृत से शरीरवर्ती चक्र, आधार प्रभृति को सिंचित करता है और इस प्रकार अपने पूरे शरीर को दिव्य बना लेता है, अर्थात् उसका स्वात्मस्वरूप प्रस्फुटित हो उठता है। नित्याषोडशिकार्णव (4/12-14) में भी इस स्थिति का वर्णन मिलता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

कौलिकी शक्ति

अकुल परमशिव में ही समस्त कुलों को अभिव्यक्त करनेवाली उसकी नैसर्गिक स्वभावरूपा अभिन्नपराशक्ति। इसी को अनंदशक्ति, विसर्गशक्ति परिपूर्ण स्वातंत्र्यशक्ति आदि कहा जाता है। परमशिव को अकुल कहते हैं क्योंकि उसकी परा संविद्रूपता में समस्त शक्ति समूह, छत्तीस तत्त्व, संपूर्ण सूक्ष्म तथा स्थूल सृष्टि आदि केवल उसकी संवित् के ही रूप में चमकते रहते हैं। वहाँ किसी भी प्रकार के भेदाभेद या भेद का आभास नहीं होता है। परंतु परमशिव अपने निरतिशय आनंद से उद्वेलित होकर अपने में ही उन बाह्य रूपों में प्रतिबिम्ब न्याय से स्फुटित होता रहता है। यही उसका स्वरूप विमर्शन है। उसके इस अविदुर्घट कार्य को संपन्न करने वाली उसकी स्वभावभूता शक्ति को कौलिकी शक्ति कहते हैं। (तं.आ.आ. 3, 67 से 79)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्रम

क्रमरूपता का आभास। क्रमरूपता क्रियाशक्ति के व्यापार में प्रकट होती है। वहाँ वस्तुओं का या घटनाओं का क्रम नियत होता है। अतः क्रियाशक्ति को भी क्रम कहते हैं। (ई.प्र. 2-1-1, 2, 3)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्रम दर्शन

क्रम दर्शन को कालीनम भी कहते हैं। इसमें शाक्त उपाय का सहारा लिया जाता है। तन्त्रालोक के चतुर्थ आह्निक में और महार्थमंजरी प्रभृति ग्रन्थों में क्रमदर्शन का अच्छा विश्लेषण किया गया है। इन ग्रन्थों के आधार पर स्वर्गीय डॉ. कान्तिचन्द्र पाण्डेय ने और विशेष कर उनके प्रिय शिष्य डॉ. नवजीवन रस्तोगी ने क्रमदर्शन पर सराहनीय कार्य किया है। अन्य दर्शनों की अपेक्षा इसकी विशेषता यह है कि इसके आगम ग्रन्थों का उपदेश भगवती ने किया है और श्रोता भगवान् शिव हैं। पंचकृत्यों में निग्रह और अनुग्रह के स्थान पर अनाख्या और भासा का समावेश है। इस दर्शन में द्वादश या त्रयोदश काली की वृन्दचक्र में पंचवाह पद्धति से उपासना की जाती है। पंचवाह क्रम में ज्ञान सिद्ध, मन्त्रसिद्ध, मेलापसिद्ध, शाक्तसिद्ध और शाम्भवसिद्ध समाविष्ट हैं। धाम, मुद्रा, वर्ण, कला, संवित्, भाव, पात और अनिकेत – इनसे वृन्दचक्र बनता है। यह शुद्ध अद्वैतवादी दर्शन है।
Darshana : शाक्त दर्शन

क्रम मुक्ति

क्रम से मुक्ति प्राप्त करने को क्रम मुक्ति कहते हैं। जो साधक सद्यःमुक्ति की अपेक्षा लोकांतरों के अभिष्ट ऐश्वर्यों का आस्वाद लेता हुआ ही पूर्ण मुक्ति की इच्छा रखे, वह क्रम से मुक्ति को प्राप्त करता है। ऐसे साधकों में किसी न किसी अंश में बहिर्मुखता के संस्कार बने रहते हैं। इस कारण ये अपने वैभव का आस्वाद भी लेते रहते हैं तथा पूर्ण मुक्ति को प्राप्त करने का प्रयास भी करते रहते हैं। ऐसे साधक ऊर्ध्व भुवनों में ऐश्वर्य का भोग करते करते ही परमार्थ मुक्ति की ओर आगे बढ़ते जाते हैं।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्रम योग

1. क्रियायोग के अभ्यास से किया जाने वाला स्वरूप साक्षात्कार का एक उपाय। इस अभ्यास की परिपक्वता पर साधक को अपने शिवभाव पर आणव समावेश हो जाता है। देखिए आणव समावेश।
2. क्रियायोग की सहायता से किया जाने वाला वह ज्ञानयोग, जिसमें द्वादश महाकालियों की उपासना के द्वारा अपने भीतर समस्त प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेय रूप विश्व का संहरण किया जाता है और उससे अपने परिपूर्ण शिवभाव का शाक्त समावेश हो जाता है। इसे क्रमनय भी कहते हैं। यह त्रिक साधना का ही एक विशेष अंग है। यद्यपि जयरथ ने भक्ति विशेष और रुचि विशेष के कारण इसे पृथक् क्रम दर्शन नाम दिया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्रमनय

देखिए क्रम योग।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्रमशः वृत्ति

बाह्य वस्तु के विषय में जो ज्ञानरूप वृत्ति होती है, उसमें तीन अन्तःकरणों (मन, अहंकार, बुद्धि) के व्यापारों के साथ किसी एक ज्ञानेन्द्रिय का व्यापार रहता है, क्योंकि बाह्य ज्ञान ज्ञानेन्द्रिय के बिना नहीं होता। इन चारों करणों (तीन अन्तःकरण एवं पाँच ज्ञानेन्द्रियों में से कोई एक ज्ञानेन्द्रिय) के व्यापार एक साथ (युगपत्) भी होते हैं और क्रमशः भी – यह सांख्यशास्त्र का मत है (द्र. सां. का. 30)।
तत्त्ववैशारदी में वाचस्पति ने कहा है कि जब कोई व्यक्ति मन्द प्रकाश में किसी वस्तु को देखता है (यह आलोचन ज्ञान है जो चक्षु रूप ज्ञानेन्द्रिय का है), बाद में ध्यानपूर्वक यह सोचता है कि यह चोर ही है (यह मन का संकल्प रूप व्यापार है) और उसके बाद यह देखकर कि यह बाण का निक्षेप कर मुझे मारने वाला ही है (यह अभिमान है जो अहंकार का व्यापार है) भागने का निश्चय करता है (यह बुद्धि का अध्यवसाय रूप व्यापार है) तब यह क्रमशः वृत्ति का उदाहरण होता है। अप्रत्यक्ष पदार्थ में अन्तःकरणों की ही वृत्तियाँ होती हैं; ये वृत्तियाँ युगपत् भी होती हैं, क्रमशः भी। पर ये वृत्तियाँ चाहे जैसी भी हों, बाह्यकरणवृत्ति -पूर्वक ही होती हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

क्राथन

पाशुपत योग की एक विशेष साधना।

जगते हुए ही नींद का अभिनय करना क्राथन कहलाता है। जब पाशुपत साधक को साधना का काफी अभ्यास हो जाता है तो उसे फिर किसी शहर या गाँव में जाकर लोगों से थोड़ी दूर (ताकि वे केवल उसे देख सकें) सो जाने या ऊँघने का अभिनय करना होता है, जबकि वास्तव में वह जाग रहा होता है, फिर उसे ज़ोर ज़ोर से ऊँघना होता है। लोग जब उस साधक को ऐसे बीच मार्ग में ऊँघते हुए देखते हैं तो निंदा करते हैं। इस तरह से उनके निंदा करने से साधक के पाप उन लोगों को लगते हैं तथा उनके पुण्यों का संक्रमण इस योगी में होता है। इस तरह से क्राथन पाशुपत मत की एक विशेष योग क्रिया है। (पा. सू. कौ. पृ 83, 84) गणकारिकाटीका में भी क्राथन की यही व्याख्या हुई है। (तन्त्राऽसुप्‍तस्येव सुप्‍तलिंग – प्रदर्शन क्राथनम् – ग.का.टी.पृ 19)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

क्रिया

दीक्षा का एक अंग।

शिवलिङ्ग के तथा शिष्य (जिसको दीक्षा देनी हो) – उसके संस्कार कर्म क्रिया कहलाते हैं। क्रिया दीक्षा का तृतीय अंग है, (ग.का.टी.पृ. 8,9)। क्रिया, नामक दीक्षा का विस्तार इस समय किसी ग्रंथ में नहीं मिलता है। गणकारिका की रत्‍नटीका में लिखा है कि इसका विस्तार संस्कारकारिका में देखना चाहिए। संस्कारकारिका से या तो किसी अन्य ग्रंथ को लिया जा सकता है, जो कहीं इस समय उपलब्ध नहीं है। अन्यथा गणकारिका में से ही संस्कारों से संबद्‍ध कारिका को लिया जा सकता है जिसका स्पष्‍टीकरण सुकर नहीं। गणकारिका के अनुसार क्रिया के द्‍वारा लिंङ्ग का भी संस्कार किया जाता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

क्रिया स्वातंत्र्य

परिपूर्ण परमेश्वरता। स्वेच्छा से अपने ही आनंद के लिए प्रत्येक कार्य को करने में पूर्ण स्वातंत्र्य। देखिए क्रिया शक्ति, स्वातंत्र्य शक्ति।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्रियाचार

देखिए ‘सप्‍ताचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

क्रियादीक्षा

देखिए ‘दीक्षा’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

क्रियाफलाश्रय

सत्यप्रतिष्ठा से ‘क्रियाफलाश्रयत्व’ रूप फल का लाभ होता है – यह योगसूत्र (2/36) में कहा गया है। क्रिया = धर्माधर्म रूप क्रिया। फल = धर्माधर्म के फलभूत स्वर्गनरकादि। योगी किसी को धार्मिक होने के लिए वर दें तो वह धार्मिक हो जाता है – यह क्रियाश्रयत्त्व का उदाहरण है। उसी प्रकार स्वर्गलाभ के लिए किसी को वर दें तो उसको जो स्वर्गलाभ होता है – यह फलाश्रयत्त्व का उदाहरण है। यह ज्ञातव्य है कि ‘आग पानी हो जाए’, ऐसा विपरिणाम सत्यप्रतिष्ठा से नहीं होता। चेतन प्राणी के मन पर ही सत्यप्रतिष्ठा की शक्ति कार्य करती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

क्रियायोग

जिनके चित्त स्वभावतः व्युत्थित (व्युत्थानधर्म से युक्त) रहते हैं, उनके लिए क्रियायोगमार्ग का विधान किया गया है (द्र. योग सू. 2/1 -2)। इस मार्ग में चूंकि कर्मों की सहायता से चित्तवृत्तिनिरोध-रूप योग की प्राप्ति की जाती है, इसलिए यह क्रियायोग कहलाता है। इस क्रियायोग के तीन भाग हैं – तपः, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान। क्रियायोग का साक्षात् फल है समाधि का अधिगम तथा अविद्या आदि क्लेशों का क्षीणीकरण। क्रियायोग के द्वारा क्षीण होने पर ही अविद्या आदि क्लेशों को ध्यान विशेष की सहायता से नष्ट किया जा सकता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

क्रियायोग

देखिए आणव-उपाय।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

क्रियाशक्‍ति

देखिए ‘शक्‍ति’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

क्रियाशक्ति

परमशिव की पाँचवीं अंतरंग शक्ति। उसकी वह शक्ति, जिसके द्वारा उसमें ‘इदम्’ अर्थात् प्रमेय अंश का स्फुट आभास हो जाता है और वह आगे की सृष्टि करने के लिए तैयार हो जाता है। इस शक्ति से अहंता के भीतर इदंता विशेष स्फुटतया चमकने लगती है। (तं.सा.पृ.6)। यह शक्ति ईश्वर तत्व में अभिव्यक्त होती है। (शि.दृ.वृ.पृ. 37)। परंतु साधना क्रम में उसकी अभिव्यक्ति विद्या तत्व में मानी जाती है। (पटलसा.14)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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