भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

काश्मीर सम्प्रदाय

शक्ति संगम तन्त्र में पूरे भारतवर्ष को कादि और हादि के भेद से 56 देशों में बाँटा गया है और बताया गया है कि मरुदेश से नेपाल तक काश्मीर सम्प्रदाय को मान्यता प्राप्त है। हादि मत के अनुसार काश्मीर में त्रिपुरा की और कादि मत के अनुसार तारिणी की उपासना की जाती है। इस सम्प्रदाय में शक्तिपात के अनुसार ऊर्ध्वाम्नाय दीक्षा प्राप्त होती है। प्रथमतः यह ऋक्काश्मीर, यजुःकाश्मीर, सामकाश्मीर और अथर्वकाश्मीर के रूप में चतुर्धा विभक्त है। शैवकाश्मीर, शाक्तकाश्मीर और शिवशक्तिकाश्मीर विभागों को शुद्ध, उग्र और गुप्त भेदों में विभक्त करने पर इसके 9 भेद होते हैं। काश्मीर सम्प्रदाय को सर्वदिव्य नाम यहाँ दिया गया है और फिर उसके भावनाथ, क्रियानाथ, ज्ञाननाथ, चित्पर, चेतनेश, सिद्धनाथ और ऋद्धिनाथ नामक भेद गिनाये गये हैं। भावदिव्य और क्रियादिव्य के भेद से भी काश्मीर सम्प्रदाय के दो भेद होते हैं। पूजा विधि और पात्रासादन विधि के भेद के अनुसार ही उक्त भेद प्रदर्शित हैं। वस्तुतः देखा जाए तो इनमें परस्पर कोई भेद नहीं है।
Darshana : शाक्त दर्शन

कुंडलिनी

अपने तीन रूपों द्वारा विश्व को धारण करने वाली चित् शक्ति। तीन रूप इस प्रकार हैं :- 1. शक्ति कुंडलिनी ‘परमेश्वर की वह पराशक्ति जिसके द्वारा वह अपनी परमेश्वरता को निभाता रहता है। 2. विश्व कुंडलिनी – जगत् के व्यवहार में प्रवृत्त वह पारमेश्वरी शक्ति जो समस्त ब्रह्मांड को भीतर से और बाहर से धारण करती हुई इसे सतत गति से चलाती रहती है। 3. प्राण कुंडलिनी- प्राणन-क्रिया की आधारभूत वह शक्ति जिससे प्राणियों के समस्त चेतनोचित व्यापार चलते रहते हैं। यह मुख्यतया ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के रूपों में अभिव्यक्त होती रहती है। यह कीटाणु से लेकर ब्रह्मा तक सभी प्राणियों में सदैव जागती ही रहती है। (तन्त्रालोक, खं. 2, पृ. 140 से 142)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कुंडलिनी प्रबोध

साधक की प्राण कुंडलिनी के सामर्थ्य में सद्यः एक विशेष वृद्धि का हो जाना। वह विशेष वृद्धि इतनी आश्चर्यकारिणी होती है कि साधक यह समझ बैठता है कि मानो उसके भीतर कोई सोई हुई शक्ति जाग पड़ी हो। यह प्रबोध क्रिया-योग से भी होता है, ज्ञान योग से भी और इच्छा योग से भी। उत्तरोत्तर योग में प्रबोध सुगमता से, आयास राहित्य से होता है और दुष्परिणाम से मुक्त रहता है। क्रिया-योग द्वारा यत्नपर्वूक और आयास पूर्वक होता है, परंतु ज्ञानयोग और इच्छायोग के अभ्यास में स्वयमेव हो जाता है और कुंडलिनी की ऊपर नीचे गति भी वैसे ही हो जाती है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कुण्डलिनी

कुण्डलिनी को कुलकुण्डलिनी अथवा शक्तिकुण्डलिनी भी कहते हैं। कुल चक्र में कुण्डलाकार अवस्थित होने से इसको कुलकुण्डलिनी कहते हैं। अथवा कु अर्थात् पृथ्वी तत्त्व के आधार मूलाधार में लीन रहने से इसको कुलकुण्डलिनी कहते हैं। तन्त्रशास्त्र में मूलाधार में सर्पतुल्य कुण्डलाकार स्थित शक्ति का नाम कुण्डलिनी है, अतः इसको शक्तिकुण्डलिनी भी कहते हैं। इसको कुण्डलिनी इसलिये कहते हैं कि यह कुण्डलाकार स्थित है। कुण्डलिनी शक्ति निद्रित नागिन के समान आकृति वाली है। वह स्वयंभू लिंग को वेष्टित किये रहती है। कोटि विद्युत् के समान दीप्तिमती, नाना प्रकार के वस्त्र और अलंकार से विभूषित है। यह श्रृंगार रस से ओत-प्रोत है और इसको कारण द्रव्य प्रिय है। कारण द्रव्य को कुल द्रव्य कहा जाता है। इसलिये भी इसको कुलकुण्डलिनी कहते हैं। यह सर्वमन्त्रमयी और सर्वतत्त्वस्वरूपिणी है। रुद्रयामल आदि तन्त्रों में इसकी उपासना विस्तार से वर्णित है। संमोहन तन्त्र में इसको कुण्डली कहा गया है। वहाँ बताया गया है कि यह मनोहर शक्तिपीठ त्रिकोणाकार है। उसके गह्वर में जीव रूपी अतिचंचल कामवायु स्थित है। उसमें अधोमुख लिंग रूपी स्वयंभू भगवान् निवास करते हैं। इसमें नीवार धान्य के अग्रभाग तुल्य सूक्ष्म शंख वर्ण और साढ़े तीन बलय युक्त श्रेष्ठ देवता कुण्डली का निवास है। वह अपने मुख से ब्रह्ममुख को आच्छादित किये रहती है। जो साधक इस कुण्डलिनी शक्ति को अपने वश में कर लेता है, वह मानव नहीं, देवता बन जाता है। तन्त्रसार (शब्दकल्पद्रुम, भास्करी 2, पृ. 140 पर उद्धृत) में बताया गया है कि मूलधार निवासिनी, इष्ट देवता स्वरूपिणी, सार्धत्रिवलयवेष्टिता, विद्युत् के समान कान्तिवाली, स्वयंभू लिंग को वेष्टित कर स्थित, उदयोन्मुख दिनकर के समान कान्ति वाली कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान कर उसको प्राण मन्त्र द्वारा उत्थापित करना चाहिये। समस्त अशुभ क्रमों की शान्ति के लिये साधक को एकाग्रचित्त होकर दृढ़ संकल्प के साथ इस बात की भावना करनी चाहिये कि मेरा समस्त शरीर उस शक्ति के प्रभा पटल से व्याप्त है। जाग्रत् होने पर यह कुण्डलिनी शक्ति षट्चक्र का भेदन कर सहस्रार चक्र में शिव के साथ समरस हो जाती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

कुण्डलिनी योग

यह सत्य है कि पातंजल योगसूत्र में कुण्डलिनी अथवा षट्चक्र आदि में से किसी एक का भी उल्लेख नहीं है, किन्तु यह निश्चित है कि कुण्डलिनी योग एक प्राचीन भारतीय योग की विशेष पद्धति है। आगम और तन्त्रशास्त्र की विभिन्न शाखाओं में इसका वर्णन मिलता है। कहा जा सकता है कि यह एक तान्त्रिक योगपद्धति है। कुछ आचार्य “अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या” (10/2/31) इस अथर्ववेद के मन्त्र में कुण्डलिनी का उल्लेख मानते हैं। प्रायः सभी आगमिक और तान्त्रिक आचार्य प्रसुप्तभुजागाकारा, सार्धत्रिवलयाकृति, मूलाधार स्थित शक्ति को कुण्डलिनी के नाम से जानते हैं। जिस योगपद्धति की सहायता से इस कुण्डलिनी शक्ति को जगा कर सुषुम्ना मार्ग द्वारा षट्चक्र का भेदन कर सहस्त्रार चक्र तक पहुँचाया जाता है और वहाँ उसका अकुल शिव से सामरस्य सम्पादन कराया जाता है, उसी का नाम कुण्डलिनी योग है। आधारों अथवा चक्रों आदि के विषय में मतभेद होते हुए भी मूलाधार स्थिति कुण्डलिनी शक्ति का सहस्त्रार स्थित शिव से सामरस्य सम्पादन सभी मतों में निर्विवाद रूप से मान्य है। सम्प्रति षट्चक्र भेदन का पूर्णानन्द यति विरचित श्रीतत्त्वचिन्तामणि के षष्ठ प्रकाश में वर्णित क्रम ही प्रायः सर्वमान्य है। अतः तदनुसार ही यहाँ इस विषय का निरूपण किया गया है। यम और नियम के नित्य नियमित आदरपूर्वक निरन्तर अभ्यास में लगा हुआ योगी गुरुमुख के मूलाधार से सहस्त्रार पर्यन्त कुण्डलिनी के उत्थापन के क्रम को ठीक से जान लेने के उपरान्त पवन और दहन के आक्रमण से प्रतप्त कुण्डलिनी शक्ति को, जो कि स्वयंभू लिंग को वेष्टित कर सार्धत्रिवलयाकार में अवस्थित है, हूंकार बीज का उच्चारण करते हुए जगाता है और स्वयंभू लिंग के छिद्र से निकाल कर उसको ब्रह्म द्वार तक पहुँचा देता है। कुण्डलिनी पहले मूलाधार चक्र स्थित स्वयंभू लिंग का, तब अनाहत चक्र स्थित बाण लिंग का और अन्त में आज्ञाचक्र स्थित इतर लिंग का भेदन करती हुई ब्रह्मनाडी की सहायता से सहस्त्र दल में प्रविष्ट होकर परमानन्दमय शिवपद में प्रतिष्ठित हो जाती है। योगी अपने जीवभाव के साथ इस कुलकुण्डलिनी को मूलाधार से उठाकर सहस्त्रार चक्र तक ले आता है और वहाँ उसको पर बिन्दु स्थान में स्थित शिव (पर लिंग) के साथ समरस कर देता है। समरसभावापन्न यह कुण्डलिनी शक्ति सहस्त्रार चक्र में लाक्षा के वर्ण के समान परमामृत का पान कर तृप्त हो जाती है और इस परमानन्द की अनुभूति को मन में सजोये वह पुनः मूलाधार चक्र में लौट आती है। यही है कुण्डलिनी योग की इतिकर्तव्यता। इसके सिद्ध हो जाने पर योगी जीवन्मुक्त हो जाता है, शिवभावापन्न बन जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

कुमारी

1. सतत रूप से क्रीडनशील परा शक्ति।
2. पूर्ण भेदात्मक दृष्टिकोण के कारण कुत्सित बनी हुई संसृति को मारने वाली (कु : मारी) अर्थात् शांत करनेवाली प्रभुशक्ति।
3. सर्वज्ञता तथा सर्वकर्तृता से सर्वथा पूर्ण होने के कारण समस्त विशुद्ध एवं अशुद्ध सृष्टि को व्याप्त करने वाली तथा इस कार्य में सहायक बनने वाली सभी शक्तियों की सामरस्यस्वरूप होने के कारण संपूर्ण कुत्सित संसृति को अपने में पूर्णतया विलीन कर देनेवाली पारमेश्वरी इच्छाशक्ति। (देखिए) (शि.सू.वा.पृ. 16)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कुल कुण्डलिनी

अकुल कुण्डलिनी शब्द का विवरण देते हुए बताया गया है कि नीचे अकुल स्थान स्थित अरुण वर्ण के ऊर्ध्वमुख सहस्त्रार पद्म को कुल कुण्डलिनी कहा जाता है। यह विमर्शात्मक हकार स्वरूपा है। नित्याषोडशिकार्णव (4/14) में इसको कुलयोषित तथा त्रिपुरसुन्दरी दण्डक (26 अनु.) में कूलवधू कहा गया है। उक्त दोनों ग्रन्थों में बताया गया है कि यह कुलवधू (कुलेश्वरी = कुलाभिमानिनी संवित्) मूलाधारगत चतुर्दल कमल के मध्य में स्थित त्रिकोणात्मक कुल स्थान, अर्थात् श्रृंगाट पीठ से उठ कर कुटिल मार्ग पर, अर्थात् स्वाभाविक सृष्टि मार्ग को छोड़कर गुरु प्रदर्शित युक्ति के सहारे संहार मार्ग पर चल कर सूक्ष्म रूप से सुषुम्ना मार्ग के भीतर प्रविष्ट हो आगे बढ़ती है। वह अनाहत स्थान स्थित सूर्यमण्डल को भेदती हुई अकुल कुण्डलिनी से जा मिलती है। वहाँ यह शिव और शक्ति के सामरस्य से समुद्रभूत अमृतमय परमानन्द में डूब जाती है, निर्लक्षण, निर्गुण, कुल और रूप से रहित पर-पुरूष को प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार सृष्टि प्रक्रिया में यह कुण्डलिनी अकुल स्थान से कुल स्थान की ओर गतिशील होती है और संहार प्रक्रिया में कुल स्थान से अकुल स्थान तक आती है। इसकी अकुल स्थान से कुल स्थान की ओर गति ही सृष्टि, अर्थात् बन्ध का तथा कुल स्थान से अकुल स्थान तक की गति संहार, अर्थात् मोक्ष का कारण बनती है। शैव सिद्धान्त (अघोरशिवाचार्य कृत मृगेन्द्र वृत्ति – दीपिका, पृ. 349) में कुण्डलिनी को महामाया कहा गया है।
पूर्णानन्द की श्रीतत्त्वचिन्तामणि (6/11-14) में कुल कुण्डलिनी का वर्णन इस प्रकार किया गया है – चतुष्कोणात्मक मूलाधार चक्र के मध्य में स्थित त्रिकोणाकार कामरूप पीठ के बीच स्वयंभू लिंग का निवास माना जाता है। इस स्वयंभू लिंग के ऊपर विषतन्तु के समान अत्यंत सूक्ष्म, ब्रह्मरन्ध्र के द्वार को अपने मुँह में पकड़े हुए, शंख के आवर्त के समान आकार वाली, सोये हुए सर्प के समान सार्धत्रिवलयाकृति कुण्डलिनी शक्ति सोई रहती है। यह कुण्डलिनी शक्ति वर्णात्मक और ध्वन्यात्मक शब्दों की जननी है और यहीं से प्राण और अपान, श्वास और प्रश्वास की भी उत्पत्ति होती है। इसी के मध्य में वह पराशक्ति अवस्थित है, जिससे कि इस पूरे विश्व की उत्पत्ति होती है। योगी के हृदय में इसी की कृपा से ब्रह्मज्ञान का उदय होता है। इसका अभिप्राय यह है कि स्वयंभू लिंग के ऊपर प्रसुप्त सार्धत्रिवलया कुण्डलिनी शक्ति के ऊर्ध्व भाग में नादात्मक परा शक्ति का निवास है। यही कुल कुण्डलिनी के नाम से प्रसिद्ध है। मूलाधार चक्र में इसका ध्यान किया जाता है।
Darshana : शाक्त दर्शन

कुल शक्ति

कुलार्णव तन्त्र (17/27) में कुल शब्द का अर्थ शक्ति तथा अकुल शब्द का अर्थ शिव किया है। इस संबंध में अकुल शब्द की व्याख्या करते समय कुछ लिखा जा चुका है। शाक्त दर्शन में शक्ति को विमर्श के नाम से अभिहित किया गया है। लिपि (हकार) इसकी वाचिका है। प्रकाशात्मक अकुल शिव के बोधक अकार के साथ विमर्शात्मक कुल शक्ति के बोधक हकार को मिलाने से ‘अहम्’ पद बनता है। प्रकाश विमर्शात्मक इस अहंतत्त्व से ही शब्दार्थात्मक षडध्वमय जगत् की सृष्टि होती है। तन्त्रालोक (3/67) में कुल शक्ति को कौलिकी कहा है। इस कौलिकी शक्ति से अकुल शिव कभी जुड़ा नहीं रहता। नित्याषोडशिकार्णव (4/6-7) और सौन्दर्य लहरी के प्रथम श्लोक में बताया गया है कि बिना शक्ति के शिव कुछ भी नहीं कर सकता, वह शव के तुल्य है। शक्तिसंवलित शिव ही जगत् की रचना करने में समर्थ हो सकता है। इसीलिये विज्ञानभैरव (श्लो. 20) में शक्ति को शिव का मुख कहा गया है, क्योंकि इस शक्ति की सहायता से ही शिव स्वरूप की अभिव्यक्ति हो सकती है।
शक्ति के अतिरिक्त कुल शब्द के अन्य भी अनेक अर्थ शास्त्रों में मिलते हैं। अकारादि हकारान्त वर्णमातृका को आठ वर्गों में बाँटा गया है। इन आठ वर्गों की ब्रह्माणी प्रभृति महालक्ष्मी पर्यन्त आठ अधिष्ठातृ देवियाँ हैं। इस समूह को कुल कहा गया है (नि. अ. पृ. 26)। षट्त्रिंशतत्त्वात्मक जगत् को तथा शरीर को भी कुल कहा जाता है (नि . कृ. पृय 27, 213)। शैव और शाक्त दर्शन में कुल नाम का एक स्वतन्त्र शास्त्र है (नि. अ. पृ. 74)। भैरव को भी कुल कहते हैं (नि. अ. पृ. 139)। मेय, माता और मिति लक्षण जगत को भी कुल कहा गया है (चि. च श्लो. 72)। देह से संबद्ध दस इन्द्रियाँ भी कुल कही गई हैं (यो. दी. पृ. 295)। अर्ध्यभट्टारक को भी कुल बताया गया है (भ. म. पृ. 115)। महानिर्वाणतन्त्र में जीव, प्रकृति, दिक्, काल, आकाश, क्षिति, जल, तेज और वायु इन नौ पदार्थों को कुल शब्द से अभिहित किया गया है। कुल रत्न में आचार, विनय, विद्या, प्रतिष्ठा, तीर्थदर्शन, निष्ठा (श्रद्धा), वृत्ति, तप और दान – इन नौ पदार्थों को कुल की संज्ञा दी है।
Darshana : शाक्त दर्शन

कुलचक्र

कुलाचार की रहस्यमयी साधना का गुप्त स्थान। किसी भवन में केवल कुलाचार के साधक उनकी शक्तियाँ, कुलगुरु और उसकी दूती प्रवेश करते हैं। वहाँ कुल प्रक्रिया की साधना के अनुकूल विविध मंडलों से सुशोभित एक विशाल मंडप को सजाकर उसके भीतर तांत्रिक प्रक्रिया से पंचमकारमयी रहस्य चर्या के द्वारा शक्ति की उपासना की जाती है जिससे साधकों को सद्यः शिवभाव की अभिव्यक्ति के साथ ही साथ विविध ऐश्वर्यों की भी प्राप्ति होती है। शक्तिपूजा के अनुकूल उस सजे हुए और समस्त उपयोगी सामग्री से युक्त तथा विविध मंडलों से सुशोभित साधना मंडप को कुलचक्र कहते हैं। उसी के भीतर चक्रयाग किया जाता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कुलयाग

संपूर्ण भावजात को शिवशक्ति के स्फार के रूप में अनुभव करना, देखना तथा इसी के अनुसार व्यवहार करना। कुल को परमेश्वर की परमाशक्ति, स्वातंत्र्य, ओज, वीर्य इत्यादि कहा जाता है। समस्त विश्व इसी परमाशक्ति का ही विविध रूपों में प्रसार है। योगी समस्त विश्व को कुल के ही रूप में देखता हुआ जिस व्यवहार को करता है उस व्यवहार को कुलयाग कहते हैं। (तं.आ.आ. 29, 4 से 6)। इस याग की प्रायोगिक प्रक्रिया को रहस्य चर्चा कहा जाता है। उसका उपदेश गुरु से अधिकारवान् शिष्य को ही मिलता है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कुलाचार

एक विशेष प्रकार का साधना मार्ग। मोक्षप्राप्ति के अनेकों मार्ग माने गए हैं। उनमें उत्तरोत्तर उत्कृष्ट मार्ग यह हैं – वेदाचार, शैवाचार (सिद्धांत शैव का भक्ति प्रधानमार्ग) वामाचार, दक्षिणाचार, कुलाचार, मताचार, कौलाचार और त्रिकाचार। (तं.आ.वि. 1 पृ. 48, 49)। कुलाचार में भी उपासना पंचमकारों की सहायता से की जाती है। उससे त्वरित तन्मयता हो जाती है और सद्यः मुक्ति और मुक्ति दोनों ही फलों का लाभ होता है। कुलाचार का यह उपासना मार्ग एक रहस्य मार्ग है और कोई कोई विरले इंद्रियजयी वीर साधक ही इसको ग्रहण कर सकते हैं। वर्तमान युग में शायद ही कोई उसे अपना सके।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कूटस्थनित्यता

नित्यता दो प्रकार की है – कूटस्थ-नित्यता और परिणामी-नित्यता। जिस पदार्थ में परिणाम नहीं होता, उसकी नित्यता कूटस्थनित्यता कहलाती है। ऐसी नित्यता केवल पुरुष (तत्त्व) में होती है। कूटस्थ नित्य पदार्थ कालातीत होता है, अतः अतीत-अनागत-वर्तमान काल का बोधक ‘था-रहेगा-है’ शब्दों का प्रयोग भी पुरुष के लिए करना असंगत है, यद्यपि व्यवहार-सिद्धि के लिए हम बद्धजीव (अविद्यावान् जीव) ऐसा कहते रहते हैं। ऐसा व्यवहार विकल्पवृत्ति में परिगणित होता है। कूट का अर्थ वह कठिन लौह निर्मित हथौड़ा है, जिससे लौहकार लौहनिर्मित अस्त्रादि का निर्माण करता है। जिस प्रकार विभिन्न प्रकार के अस्त्रादि के परिवर्तन होते रहते हैं, पर ‘कूट’ अर्थात् लौह हथौड़ा का परिवर्तन नहीं होता, उसी प्रकार चित्त के परिणाम होते रहने पर भी चित्तसाक्षी पुरुष का परिणाम नहीं होता – इस सादृश्य से ‘कूट’ शब्द नित्यता के प्रसंग में प्रयुक्त होता है। कूट को पर्वत शिखरवाचक मानकर ‘जो शिखरवत् अचंचल रहता है वह कूटस्थनित्य है’ ऐसा भी कहा जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

कृतात्यय

कृत के सोमभाव का अत्यय नाश कृतात्यय है। द्युलोक, पर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष और योषित् इनका वर्णन विभिन्न आहुतियों के निक्षेपार्थ पंचाग्नि के रूप में छान्दोग्य उपनिषद् में किया गया है। इनमें पर्जन्य रूप द्वितीय अग्नि में सोम भाव को प्राप्त अप् (जल) की आहुति होने पर अप् का सोमभाव नष्ट हो जाता है और वह अप् वृष्टि भाव को प्राप्त कर जाता है। यही कृत का अत्यय है अर्थात् सोम भाव का नाश है। यही अप् क्रमशः योषित् रूप पंचम अग्नि में आहुति रूप में निक्षिप्त होकर गर्भक्रम से पुरुष भाव को धारण कर लेता है (अ.भा. 3/118)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कृष्ण

यद्यपि कृष्ण शब्द वासुदेव के अर्थ में सुप्रसिद्ध है, तथापि वल्लभ वेदांत में श्री कृष्ण साक्षात् ब्रह्म हैं। इसीलिए वल्लभ सम्प्रदायानुसार नित्य सत् एवं नित्य आनंद रूप पर ब्रह्म का बोधक है। कृष् धातु में ‘ण’ के योग से कृष्ण शब्द बना है। इसमें कृष् धातु सत्ता का वाचक है, तथा ‘ण’ निर्वृत्ति का (आनंद का) वाचक है एवं दोनों का ऐक्य रूप जो पर ब्रह्म है, वही कृष्ण है (त.दी.नि.पृ. 20)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कृष्णकर्म

चार प्रकार के कर्मों में से एक। दुरात्मा के कर्म कृष्णकर्म होते हैं – यह सामान्यतया कहा जाता है (व्यासभाष्य 4/7)। परपीड़न ही कृष्णकर्म का मुख्य लक्षण है। कृष्णकर्म मुख्यतः बाह्यसाधनों के अधीन रहता है; यह तामस भाव का वर्धक है; दुःख ही इस कर्म का प्रधान फल है। कृष्ण कर्म के संस्कार का नाश शुक्लकर्म के संस्कार से ही होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

केरल सम्प्रदाय

शक्ति संगत तन्त्र में पूरे भारतवर्ष को कादि और हादि के भेद से 56 देशों में बाँटा गया है तथा बताया गया है कि अंग से मालव पर्यन्त केरल सम्प्रदाय को मान्यता प्राप्त है। हादि मत के अनुसार केरल सम्प्रदाय में कालिका की और कादि मत के अनुसार त्रिपुरा की उपासना की जाती है। यह उपासना षट्शाम्भव पद्धति से होती है और इसमें साधक सर्वोत्कृष्ट मेधा दीक्षा भी प्राप्त कर सकता है। प्रथमतः यह सम्प्रदाय ऋक्केरली, यजुःकेरली, सामकेरली और अथर्वकेरली नाम से चार भागों में विभक्त है। इस सम्प्रदाय के पुनः शैवकेरल, शक्तिकेरल और शिवशक्तिकेरल के विभाग होते हैं और इन तीनों को शुद्ध, उग्र और गुप्त भेदों में विभक्त करने पर इसके 9 भेद हो जाते हैं। द्रविड़ सम्प्रदाय का भी केरल में ही अन्तर्भाव होता है। भवसिद्ध, हरसिद्ध, कलहट्ट, गोमुख, विज्ञानी, पूर्वकेरल उत्तरकेलर, दिव्य, सत्य, चैतन्य, चिद्धन, सर्वज्ञ, ईश, माहेश्वर, विश्वरूप, ज्ञानकेरल, व्यंकटेशाख्यकेरल प्रभृति भी केरल सम्प्रदाय के ही अंग हैं। इस सम्प्रदाय के दिव्य, कौल और वाम भेद भी इसी ग्रन्थ में प्रदर्शित हैं, किन्तु वहीं यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि केरल सम्प्रदाय में दक्षिणाचार की प्रधानता है और यह वेद मार्ग का अनुवर्तन करता है। इसीलिये इसको शुद्ध मार्ग भी कहा जाता है। सम्प्रदायों के भेद का मुख्य कारण पूजाविधि और पात्रासादन विधि का अन्तर है।
Darshana : शाक्त दर्शन

केवल प्रकृति

“केवल प्रकृति” “मूल प्रकृति” भी कहलाती है। यह वह प्रकृति है जो साक्षात् रूप से या परंपराक्रम से सब अनात्मवस्तुओं का उपादान तो है, पर स्वयं किसी का कार्य नहीं है। यह प्रकृति साम्यावस्थापन्न त्रिगुण है, जो नित्य (परिणामी -नित्य) है और हेतुहीन है। यह “अलिंग” भी कहलाता है। मूल प्रकृति, प्रकृतिविकृति, केवल विकृति एवं अप्रकृति अविष्कृत रूप विभाग तत्त्वदृष्टि से हैं – यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

केवलविकृति

सांख्यशास्त्र में तत्त्वरूप प्रमेय पदार्थों को चार भागों में बाँटा गया है – केवल प्रकृति या मूलप्रकृति, प्रकृति-विकृति, विकृति या केवल विकृति तथा अप्रकृति-अविकृति। (द्र. ‘मूलप्रकृति’ आदि शब्द)। ‘केवल विकृति’ वह वस्तु (तत्त्व) है, जिससे कोई तत्त्व उद्भूत नहीं होता – जो किसी तत्त्व का उपादान नहीं है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँच भूत – ये सोलह पदार्थ ‘केवल विकृति’ में गिने जाते हैं। पाँच भूतों से घट आदि जो भौतिक पदार्थ बनते हैं, वे तत्त्व नहीं हैं – यह ज्ञातव्य है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

केशव

क + ईश + व के योग से केशव पद बनता है। क शब्द का अर्थ ब्रह्मा है, ईश का अर्थ शंकर है तथा व का अर्थ सुख है। पहले केश शब्द में द्वन्द्व समास होकर पुनः व शब्द के साथ अन्य पदार्थ प्रधान बहुव्रीहि समास से केशव शब्द बना है। इसके अनुसार ब्रह्मा और शंकर को भी जिससे सुख प्राप्त होता है, वह केशव है। अर्थात् अन्तर्यामी रूप में ब्रह्मा और शिव को भी सुख प्रदान करने वाले भगवान् श्री कृष्ण ही केशव हैं (भा.सु 11टी.पृ. 216)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

कैमुतिक न्याय

किमुत-सुष्ठु, तत्संबंधी न्याय कैमुतिक न्याय है। वेदांतों में उपास्य रूप में प्रतिपादित होने से आसन्य (आस्य में हुआ) प्राण भी ब्रह्मातिरिक्त नहीं है। इसीलिए सामगों ने उसे पापवेध से रहित कहा है। इस प्रकार प्राणादि रूप ब्रह्म की विभूति में जब निर्दोषत्व है, तब मूलभूत ब्रह्म की निर्दोषता को क्या कहना है? अर्थात् ब्रह्म की निर्दोषता तो सुष्ठु भांति अर्थात् अनायास सिद्ध है। यही कैमुतिक न्याय है (अ.भा.पृ. 1051)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App