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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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कायसिद्धि

तप से जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वे दो प्रकार की हैं – कायसिद्धि तथा इन्द्रियसिद्धि (योगसूत्र 2/43)। शरीरसम्बन्धी सिद्धियाँ कायसिद्धि हें – ऐसा प्रतीत होता है। प्राचीन सांख्याचार्य देवल के अनुसार अणिमा, महिमा और लघिमा – ये तीन कायसिद्धियाँ हैं। 2/43 योगसूत्र की व्याख्या में वाचस्पति ने उपर्युक्त तीनों के अतिरिक्त ‘प्राप्ति’ सिद्धि को भी (द्र. अणिमादि सिद्धियों का विवरण) कायसिद्धि में गिना है।
कायसिद्धि अर्थात् देहसिद्धि का विशिष्ट उल्लेख हठयोगशास्त्र में (विशेषकर नाथयोग शाखा में) मिलता है। योगाग्नि से पवित्र होने के कारण शरीर में जो जरादिहीनता होती है, वह कायसिद्धि है – यह इन शास्त्रों का कहना है। ऐसा शरीर काठिन्य आदि भौतिक धर्मों से बाधित नहीं होता, ऐसा माना जाता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

कारण

हेतु।

पाशुपत दर्शन के अनुसार ईश्‍वर अथवा पति ही वास्तविक कारण पदार्थ है। ईश्‍वर ही समस्त कार्य अथवा सृष्‍टि का परम कारण है, भवोद्‍भव है। (पा. सू. 1.44)। ईश्‍वर समस्त सृष्‍टजगत का एकमात्र उद्‍भव है। वह इस सृष्‍ट जगत को केवल उत्पन्‍न ही नहीं करता है अपितु इस जगत की स्थिति व संहार भी करता है तथा इन कृत्यत्रय को करने में पति पूर्णरूपेण स्वतंत्र है। उसे और किसी बाह्य वस्तु या कारण की अपेक्षा नहीं होती है। पति ही जीवों को बंधन में डालता है तथा वहीं उनको मुक्‍ति देता है। अतः समस्त कार्य का एकमात्र आधारभूत कारण पति है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 54, 55)। जन्म के कारणभूत प्राक्‍तन कर्म तभी सफल होते हैं जब पति उन्हें सफल बनाएँ। अतः मूल कारण वही है। मूल प्रकृति तेईस तत्वों का उपादान कारण है, परंतु उसे परिणामशील बना देने वाला पति ही वास्तविक कारण है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

कारण

कारण पंचक
सृष्टि, स्थिति, संहार, विधान तथा अनुग्रह नामक पाँच पारमेश्वरी कृत्यों को क्रियान्वित करने वाले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव नामक पाँच कारणों को कारण पंचक कहते हैं।
कारण षट्क
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव तथा अनाश्रित शिव को कारण षट्क कहते हैं। (तं.सा.पृ. 57)। बहिर्मुख स्पंदन के उन्मेष मात्र की अवस्था में स्थित शिव को ही अनाश्रित नाम दिया गया है। इसे शून्यातिशून्य दशा का अधिपति माना गया है। सृष्टि आदि करने में किसी का भी आसरा न लेने के कारण इसे अनाश्रित नाम दिया गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कारण बिन्दु

भास्कर राय आगम और तन्त्रशास्त्र के अंतिम महान् आचार्य माने जाते हैं। नित्याषोडशिकार्णव की सेतुबंध टीका, वरिवस्या रहस्य और ललिता सहस्त्र नाम की सौभाग्य भास्कर व्याख्या इनके प्रसिद्धतम ग्रन्थ हैं। सौभाग्य भास्कर में प्रसंगवश इन्होंने प्रपंचसार में प्रतिपादित सृष्टि प्रक्रिया की व्याख्या की है। वे लिखते हैं कि प्रलयावस्था में ब्रह्म घनीभूत दशा में अवस्थित रहता है। उस समय आगे जिन प्राणियों की सृष्टि की जाने वाली है, उनके कर्मों के साथ ब्रह्मा की माया शक्ति भी प्रसुप्तावस्था में रहती है। समय के अनुसार कर्मों का परिपाक होने पर ब्रह्म की विचिकीर्षा उत्पन्न होती है। उस समय माया शक्ति प्रबुद्ध हो उठती है। ब्रह्म की यह शक्ति अवयक्त के नाम से अभिहित होती है, क्योंकि इस दशा में यद्यपि कर्मों का परिपाक हो जाता है और उसकी शक्ति भी प्रबुद्ध हो जाती है, किन्तु वह अभी अव्यक्त रहती है। इसी को कारण बिन्दु कहते हैं, क्योंकि यह जगत रूपी अंकुर का कन्द भाग है। कन्द भाग, अर्थात् जड़ के विकसित होने के बाद ही जैसे अंकुर फूटकर ऊपर आता है, उसी तरह से इस कारण बिन्दु के विकास के बाद ही आगे की सृष्टि चलती है ‘विचिकीर्षुर्घनीभूता सा चिदम्योति बिन्दुताम्’ प्रपंचसार के इस वचन में बिन्दु पद कारण बिन्दु का बोधक है।
Darshana : शाक्त दर्शन

कारवण

पाशुपत मत का उद्‍भव स्थान।

पुराणों और अभिलेखों के आधार पर कारवण उस स्थान विशेष का नाम है, जहाँ पर महेश्‍वर ने लकुलीश के रूप में मानव अवतार धारण किया। उस समय उस स्थान का नाम कायावरोहण या कायारोहण पड़ गया। यह स्थान बड़ौदा नगर से उन्‍नीस मील दूर स्थित वर्तमान कारवन नाम गाँव से अभिन्‍न है। कायावरोहण का अर्थ काया का अवरोहण अर्थात् उतरना तथा कायारोहण का अर्थ काया का उठना या चढ़ना है। दोनों शब्द विपरीतार्थक हैं, परंतु इन दोनों नामों का औचित्य यों सिद्‍ध होता है। जब महेश्‍वर की काया का अवरोहण श्मशान में पड़े शव में हुआ तो उस स्थान का नाम कायावरोहण पड़ गया। उस शव में अवतरित काया उस शरीर या काया के माध्यम से ही उठी तो स्थान का नाम कायारोहण पड़ गया। इस स्थान कायावरोहण अथवा कायारोहण का विस्तृत वर्णन कारवन माहात्म्य में मिलता है जो ईश्‍वर, देवी तथा ऋषियों आदि का संवाद है तथा गणकारिका के परिशिष्‍ट के रूप में ओरियंटल इंस्टीट्‍यूट, बड़ौदा से छपा है। इसमें कारवन का महात्म्य गाया गया है तथा लकुलीश के अवतार लेने के बारे में लंबा चौड़ा वर्णन किया गया है। इसमें लकुलीश का मुनि अत्रि के वंश में विश्‍वराज के पुत्र के रूप में जन्म का वर्णन है। (ग.का कारवन माहात्म्य पृ. 51)। इसमें कहा गया है कि इस स्थान पर शंकर स्वयं निवास करते हैं तथा इस स्थान के चार युगों में चार नाम गिनाए गए हैं। वे हैं – कृतयुग (सत्ययुग) में इच्छापुरी, त्रेतायुग में मायापुरी, द्‍वापरयुग में मेघावती तथा कलियुग में कायावरोहण। इस तरह से कारवण – माहात्म्य में कायावरोहण अथवा कायारोहण को पुष्यस्थली माना है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

कार्ममल

देखिए ‘मल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

कार्ममल

संकुचित कर्तृत्व या कर्मकर्तृत्व का अपरिपूर्ण अभिमान तथा कर्मवासना रूपी मल। कार्ममल को संसृति का मूल कारण माना गया है। आणव तथा मायीय मलों द्वारा अपने पूर्ण प्रकाशात्मक तथा विमर्शात्मक स्वातंत्र्य से रहित हो जाने पर तथा द्वैत दृष्टिकोण के प्रकट हो जाने पर प्रमाता कार्ममल का भागी बनता है। कार्ममल के कारण प्रमाता को अपने शुद्ध स्वरूप से भिन्न जड़ स्वभाव देह, बुद्धि आदि पर अहंता का तथा इनकी क्रियाओं पर अपने संकुचित कर्तृत्व का अभिमान हो जाता है। उसका यही अभिमान कर्मवासना में परिणत हो जाता है। परिणामस्वरूप वह संसृति के भंवर में फंस जाता है। वस्तुतः परम शिव ही सर्वकर्ता है। परंतु इसके विपरीत अपने संकुचित स्वरूप पर ही संकुचित कर्तृत्व का अभिमान होना कार्ममल है। (ई.प्र. 3-2-4, 5, 10; मा.वि.वा. 1-314,15)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कार्य

जगत्।

पाशुपत दर्शन के मुख्य पाँच पदार्थों में प्रथम पदार्थ कार्य है। इस दर्शन में जगत् को कार्य (फल) कहा गया है। कार्य को अस्वतंत्र माना गया है। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 147)। गणकारिका टीका में भी कार्य की यही व्याख्या है कि जो कुछ भी अस्वतंत्र है वह कार्य है। (यदस्वतंत्रं तत्सर्वंकार्यं-ग.का.टी.पृ. 10)। वहाँ पर कार्य को द्रव्य भी कहा गया है। माधव के अनुसार जो तत्व ईश्‍वर पर निर्भर है वह कार्य है। (सर्वदर्शनसंग्रह प-.167)। कार्य त्रिविध होता है – विद्‍या, कला तथा पशु। इस तीन तरह के कार्य का एकमात्र कारण ईश्‍वर है। उसी में कार्य उत्पन्‍न होते हैं, उसी में लीन होते हैं।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

कार्य बिन्दु

कारण बिन्दु से क्रमशः कार्य बिन्दु, नाद और बीज की उत्पत्ति होती है, जो कि पदार्थों की पर, सूक्ष्म और स्थूल दशा के प्रतीक हैं। ये क्रमशः चित्स्वरूप, चिदचिन्मिश्रित स्वरूप और अचित्स्वरूप होते हैं। ये ही कारण बिन्दु प्रभृति चार तत्त्व अधिदैवत अवस्था में अव्यक्त, ईश्वर, हिरण्यगर्भ और विराट् के, शान्ता, वामा, ज्येष्ठा, रौद्री शक्ति के तथा अम्बका, इच्छा, ज्ञाना, क्रिया शक्ति के रूप में विकसित होते हैं। अधिभूत अवस्था में ये कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओड्याण पीठ का रूप धारण करते हैं और अध्यात्म पक्ष में कारण बिन्दु, शक्ति, पिण्ड, कुण्डली प्रभृति शब्दों से अभिहित होते हैं, जिनकी कि स्थिति मूलाधार में रहती है।
Darshana : शाक्त दर्शन

काल

दीक्षा का अंग।

दीक्षा को देने का कोई विशेष समय होता है। वह पूर्वाह्न अथवा पूर्वसंध्या का समय या दिन का पूर्व भाग होता है। (ग.का.टी.पृ.8)। काल दीक्षा का द्‍वितीय अंग है। उचित काल पर दी हुई दीक्षा शिष्य के लिए सफल हो जाती है, अतः उचित काल पर ही दीक्षा देने का विधान पाशुपत साधना में माना गया है। इसीलिए गणकारिका में काल को दीक्षा का एक अंग माना गया है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

काल

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत शास्‍त्र में ईश्‍वर को ‘काल’ नाम से अभिहित किया गया है क्योंकि वह समस्त चराचर जगत् (ब्रह्मा से लेकर कीट पर्यन्त) का सृष्‍टि संहार करता है।

ब्रह्मादिभूर्जपर्यन्तं जगदेतच्‍चराचरम्
यत: कलयते रुद्रः कालरूपी ततः स्मृतः।
काल्यात् कलयते यस्मात् कलाभ्यः कालपर्यपात्
कलनात् कालनाच्‍चापि काल इत्यभिधीयते।।
(पा. सू. कौ. भा. पृ. 73)।

महेश्‍वर भिन्‍न-भिन्‍न जीवों को भिन्‍न-भिन्‍न शरीरों में भिन्‍न-भिन्‍न स्थानों पर उत्पन्‍न करता है तथा संहार करता है, अतः उनका विविध रूपों में कलन करता हुआ वह काल भी कहलाता है।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

काल तत्त्व

क्रमरूपता को आभासित करने वाला संकोचक तत्त्व। माया तत्त्व से ही विकास को प्राप्त हुए पाँच कंचुक तत्त्वों में से यह पाँचवाँ कंचुक तत्त्व है। यह तत्त्व कला, विद्या आदि कंचुक तत्त्वों के प्रभाव से संकोच को प्राप्त हुई ज्ञान और क्रिया शक्तियों को और अधिक संकुचित करता हुआ उनमें क्रमरूपता के आभास को प्रकट कर देता है। इससे प्रमाता ऐसा सोचने लगता है कि उसने अमुक कार्य किया, कर रहा है या करेगा, वह था, वह यह या वह होगा आदि। इसी प्रकार प्रमेय पदार्थो में भी यह तत्त्व क्रमरूपता को प्रकट करता हुआ प्रमाता के व्यवहार को बहुत अधिक संकुचित कर देता है। (ई.प्र.वि., 2, पृ.208, तं.सा.पृ. 80)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

काल संकर्षिणी

शिव से लेकर पृथ्वी पर्यंत समस्त सूक्ष्म एवं स्थूल सृष्टि का सृजन करने के कारण भैरव रूप वाली तथा इस प्रकार के पर-भैरव के साथ अभिन्न तथा अवभासित होने वाली परमशिव की नैसर्गिक पराशक्ति। इस शक्ति की स्पंदमानता के बिना कुछ भी आभासित नहीं हो सकता है। यही शक्ति समस्त विश्व की सारी कलना का स्रोत बनती हुई उसको स्फुटता प्रकट करती हुई पुनः उसे अपने में पूर्णतया आत्मसात् करती हुई शुद्ध, असीम एवं परिपूर्ण संवित् रूप में चमकती रहती है। (तं.आ. 3-234, वही वि. पृ. 223)। परमेश्वर की परा, परापरी तथा अपरा नामक तीन मुख्य शक्तियों को व्याप्त करके ठहरने वाली उसकी स्वभावभूता पराकलनात्मिका शक्ति। (तन्त्र सार पृ. 1.28)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

काल-अध्वन्

आणवोपाय की स्थान – कल्पना नामक धारणा में वर्ण, मंत्र और पद को आलंब न बनाकर की जाने वाली शैवी साधना में शिवभाव में समाविष्ट करने वाला एक आणव मार्ग। कालाध्वा की धारणा में साधक पद, मंत्र और वर्ण को क्रम से आलंबन बनाता हुआ समस्त काल परिमाणों को अपने श्वास प्रश्वास रूप प्राण के ही एक एक संचार के भीतर भावना के द्वारा देखता हुआ समस्त काल तत्त्व को व्याप्त कर लेता है। इसके सतत अभ्यास से वह काल के संकोच से मुक्त हो जाता है तथा परमशिव के कालातीत रूप के समावेश को प्राप्त करता है। (तन्त्र सार पृ. 57, 61)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कालचक्र

कालचक्र शब्द का सामान्य अर्थ समय का चक्र है, जो कि निरन्तर गतिशील है, रात-दिन घूमता रहता है। किन्तु बौद्ध तन्त्रों में यह एक विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। वहाँ इसका अर्थ अद्वय, अक्षर, परम तत्त्व है। काल करुणा से अभिन्न शून्यता की मूर्ति है। चक्र पद का अर्थ संवृति रूप शून्यता है। बौद्ध तन्त्रों में बताया गया है कि जाग्रत् अवस्था के क्षीण होने के कारण बोधिचित काय शान्त या विकल्पहीन होता है, यही ‘का’ से अभिप्रेत है। कायबिन्दु के निरोध से ललाट में निर्माणकाय नाम का बुद्धकाय प्रकट होता है। स्वप्नावस्था का जो क्षय होता है, यही प्राण का लय है। इस अवस्था में वाग्बिन्दु का विरोध होता है। इससे कण्ठ में संभोगकाय का उदय होता है, जो ‘ल’ से अभिप्रेत है। सुषुप्ति के क्षय होने पर चित्त बिन्दु का निरोध होता है। उस समय हृदय में धर्मकाय का उदय होता है। जाग्रत् तथा स्वप्नावस्था में चित शब्द आदि विषयों में विचारण करता है। इसीलिये चंचल रहता है और तम से अभिभूत हो जाता है। अठारह प्रकार के धातु विकारों से यह विकृत रहता है। इनका अपसारण करने पर चित्त निरुद्ध हो जाता है। यही ‘च’ का अभिप्राय है। इसके बाद तुरीयावस्था का भी क्षय हो जाता है। तब काय आदि सभी बिन्दु सहज सुख के द्वारा अच्युत हो जाते हैं। उसी समय तुरीयावस्था का भी नाश हो जाता है। स्वरगत ज्ञानबिन्दु के निरोध से नाभि में सहजकाय का अविर्भाव होता है। यही ‘क्र’ का अभिप्राय है। इस तरह से इस कालचक्र में चार बुद्धकायों का समाहार है। इसी को प्रज्ञा और उपाय का सामरस्य कहते हैं। वज्रयान और सहजयान के समान कालचक्रयान भी बौद्ध तन्त्रों की एक विशिष्ट उपासना विधि है। इसका विपुल साहित्य उपलब्ध है (भारतीय साधना और संस्कृति, भास्करी 2, पृ. 540)।
Darshana : शाक्त दर्शन

कालमुख

पाशुपत मत का अवान्तर भेद।

कालमुख पाशुपत मत का ही अवान्तर भेद है। वास्तव में कापालिक ही दो तरह के थे। वेद विहित विधि का पालन करने वाले ब्राह्‍मण कापालिक मतावलंबी थे। ब्राह्मणेतर तथा वेद विरोधी कालमुख मतावलंबी थे। ये अपने विधि विधानों में पूर्णरूपेण स्वतंत्र थे तथा कापालिकों से और आगे बढ़े हुए थे। रामानुज ने ब्रह्मसूत्र के शारीरक मीमांसाभाष्य ग्रंथ में कालमुखों के मत के बारे में थोड़ा बहुत परिचय दिया है। वे कहते हैं कि कालमुख मत के अनुसार जीवन सुख व मोक्ष दोनों की प्राप्‍ति विशेष विधानों के पालन करने से होती है। विशेष विधान हैं – मानवखोपड़ी को पान भाजन के रूप में प्रयोग करना, शव के भस्म को शरीर पर मलना, शव के मांस को खाना, लगुड धारण करना, रूद्राक्ष का वलय बाँह पर धारण करना आदि। (श्रीभाष्य अथवा शारीरक मीमांसाभाष्य 2-2, 35-37)।

कालमुखों के विधि विधान अधिक उग्रवादी हैं। इन्हें अतिवादी भी कहा जा सकता है। इन्हीं के एक संप्रदाय को अघोरंपथी कहते हैं जो शिव के अघोर रूप को पूजते हैं। कापालिक और कालमुख दोनों मतों के सिद्‍धांत कोई नए नहीं थे अपितु साधना के विधि विधान ही कुछ नए अपनाए गए थे। कालमुखों को कई बार कालामुख भी कहा गया है। टी.ए.जी. राव कहते हैं कि इन संन्यासियों को माथे पर काला तिलक लगाने के कारण कालामुख नाम पड़ा हो। (एलीमेंट्स ऑफ़ हिंदू आइकोनोग्राफी, भाग 1, 25)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

कालशक्ति

क्रमरूपता का आभास करवाने वाली पारमेश्वरी शक्ति। (तं.आ. 6-8)। परमेश्वर अपनी इसी शक्ति से अपनी परिपूर्ण अभेद दशा में भी भेद की सी दशा को आभासित करता हुआ काल को अवभासित करता है। पारमेश्वरी शक्ति जब क्रिया का अवभासन करती है तो एक क्रिया के अंगों में परस्पर तथा अनेकों क्रियाओं में परस्पर जो वैचित्र्य प्रकट होता है उसके आधार पर मापीय प्रमाता क्रमरूपतामय संबंध की कल्पना करता हुआ क्रमात्मक काल की कल्पना करता रहता है। ऐसी कल्पना का बीज परमेश्वर की जिस शक्ति में विद्यामान रहता है उसे कालशक्ति कहते हैं। (मा.वि.वा. 1-99, 100)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

काली

परमेश्वर की कलन सामर्थ्य रूपिणी परमेश्वरता। कलना जिन कई एक प्रकारों से होती है, उन्हें – 1. क्षेप, 2. ज्ञान, 3. संख्यान, 4. गति, 5. नाद इत्यादि कहते हैं। (1) क्षेप अपने से भिन्नतया अवभासन करने को कहते हैं। (2) भिन्नतया अवभासित वस्तु के निर्विकल्प अवभासन को ज्ञान कहते हैं। (3) विकल्पन व्यापार को संख्यान कहते हैं। (4) प्रकाशस्वरूप पर प्रतिबिम्बवत् आरोपण करने को गति कहते हैं। (5) आभासित वस्तु को आत्म विमर्शन में ही विलीन करना नाद कहलाता है। इस प्रकार की पाँच प्रकार की कलना समस्त प्राणियों के विचित्र व्यवहारों में जिस शक्ति के द्वारा परमेश्वर चलाता रहता है उसे काली कहते हैं। तात्पर्य यह है कि लोकव्यवहार में उच्चतम से लेकर निम्नतम प्राणियों से सम्बद्ध प्रमातृ-प्रमेय-प्रमाण के परस्पर व्यापारों को चलाने वाली परमेश्वरी शक्ति का नाम काली है। इसीलिए इसको एक दूसरा नाम ‘मातृ सद्भाव’ भी दिया गया है, क्योंकि सभी स्तरों में चलने वाला सारा प्रमातृ व्यापार काली के द्वादश स्वरूपों के अधिकार क्षेत्र में ही पूरा हो जाता है। काली को कालसंकर्षिणी भी कहते हैं। आगमों में इसे वामेश्वरी भी कहा गया है। व्यवहार में इसके बारह प्रकार प्रकट होते हैं जिन्हें द्वादश काली कहते हैं। (तन्त्रालोक, 3-234, वही. वि., पृ. 223,तन्त्र सार , पृ. 28, 30)। देखिए वामेश्वरी चक्र, काली द्वादश।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

काली द्वादश

परमेश्वर समस्त प्रमातृ-प्रमेय-प्रमाण व्यापारों को भेद, अभेद और भेदाभेद के क्षेत्रों में अपनी जिस शक्ति से चलता है उसे इन व्यवहारों की कलना कराने के कारण काली (देखिए) कहते हैं। अभेदात्मक शक्ति क्षेत्र में इन व्यवहारों को चलाने वाली काली को परा देवी कहते हैं। विद्यादशा के भेदाभेदमय क्षेत्र में इन्हें परापरा देवी नामक काली चलाती है और मायादशा के भेदात्मक क्षेत्र में अपरा देवी नामक काली। ये तीन देवियाँ उपरोक्त व्यवहारों समेत इन तीन क्षेत्रों के प्रपंचों को धारण करती हैं। फिर जिस पराशक्ति के द्वारा परमेश्वर इन समस्त कलनात्मक व्यापारों की धारणात्मक क्रिया को अपने भीतर ही समाते हुए उसका अभेदमय विमर्शन करता है उसे काल संकर्षिणी (देखिए) देवी कहा जाता है। यह चार काली नामक देवियाँ अपने स्वातंत्र्य से अपने अपने क्षेत्रों में सृष्टि, स्थिति और संहार को करती हुई तीन तीन रूपों में प्रकट होकर विविध वैचित्र्यपूर्ण कलनाओं को करती रहती हैं। इस प्रकार से एक एक के तीन तीन रूप बनते हैं और उसके फलस्वरूप इन कालियों की संख्या बारह बन जाती है। किसी किसी उपासना क्रम में इन बारह के एक समष्टि रूप को भी मानकर तेरह कालियों की उपासना होती है। इन कालियों की उपासना के द्वारा साधक अपने में इन कालियों को उद्बुद्ध करता है। तब ये कालियाँ समस्त प्रमातृ व्यापारों को अपने में इस तरह से धारण करती हैं कि मानों उनका ग्रसन करती हों। बारह कालियों में से पहली चार प्रमेय प्रपंचों का ग्रसन करती हैं। मध्य वाली चार कालियाँ प्रमाण व्यापारों का और अंतिम चार प्रमातृ व्यापारों का। ऐसी ग्रसन लीला का अभ्यास करता हुआ योगी परिपूर्ण भैरव भाव से समाविष्ट होता हुआ उत्कृष्ट प्रकार के शाक्त समावेशों का अनुभव करता है। इस प्रकार से काश्मीर के शैवों की काली उपासना कोई बाह्य पूजा न होकर शाक्त योग का एक उत्कृष्टतर प्रकार है। (तन्त्र सार , पृ. 28, 30)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

कालोपाय

देखिए काल-अध्वन्।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

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